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रविवार, 22 अगस्त 2021

बाल कहानी 'सच्चाई की जीत' : नागेश पांडेय 'संजय'

सच्चाई की जीत

बाल कहानी : डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

प्रिंस दस साल का था। कोई उसे प्यार से राजकुमार कहता तो कोई उसे राजू भी कह देता था। प्रिंस कक्षा चार में पढ़ता था। उसकी एक बहुत अच्छी आदत थी, सच बोलने की। यद्यपि सच बोलने के कारण उसे कई बार डांट भी पड़ जाती थी। वह सोचता, स्कूल में मैडम तो कहती हैं कि सदा सच बोलना चाहिए। सच्चाई की सदा जीत होती है। फिर सच बोलने पर मेरी डांट क्यों पड़ी? सबने मेरा मजाक क्यों उड़ाया? मुझे बुद्धू क्यों कहा गया? फिर यह क्यों कहा गया, कि अरे! अभी यह बच्चा है। 

अब इसका क्या मतलब? तो क्या बड़े होकर हमें झूंठ बोलना चाहिए? प्रिंस कई बार यह देखकर चौंक जाता था कि बड़े भी झूंठ बोल देते हैं। जैसे उस दिन दरवाजे पर एक भिखारी आया था। उसने खाने के लिए रोटी मांगी। मम्मी ने तपाक से कह दिया, भैया ! रोटी तो खत्म हो गई। 

प्रिंस बीच में बोल पड़ा, ‘...नहीं मम्मी, आप शायद भूल गईं। रोटियां अभी है। किचन में जाकर देखिए।’ 

रोटियां तो थीं ही लेकिन मम्मी ने उन्हें कामवाली के लिए बचाकर रखा था। उन्होंने भिखारी को रोटी दे तो दी लेकिन बाद में प्रिंस की क्लास भी ली। पापा से उसकी शिकायत भी की।

प्रिंस ने भोलेपन से कहा, ‘तो मम्मी आप झूंठ क्यों बोलीं? आपको तो यह कहना था कि रोटियां एक्सट्रा नहीं हैं।’ 

पापा हंस पड़े, ‘हां, प्रिंस की बात तो एकदम ठीक है।’

एक बार अंकल उसे मेला ले गए। मेले में झूला था। नौ साल तक के बच्चों का आधा टिकिट था। अंकल बोले, ‘इसका आधा टिकिट दे दो।’ 

झूलेवाले ने पूछा, ‘यह कितने साल का है?’

अंकल ने झूठ बोल दिया, नौ साल का। लेकिन प्रिंस तपाक से बोल पड़ा, ‘नहीं अंकल। मैं तो दस साल का हूं।’ 

बेचारे अंकल, वे चुप रह गए। उन्होंने झुंझलाकर पूरा टिकिट ले लिया। 

बाद में घर पर प्रिंस को समझाया गया, जब बड़े बात कर रहे हों तो बीच में नहीं बोलते। यह गंदी बात होती है। प्रिंस ने कहा, ‘लेकिन मुझे लगा कि शायद अंकल को मेरी उम्र ठीक से पता नहीं। इसलिए मैंने सच बोल दिया था। ...तो यह गंदी बात कैसे?’

 इस बार दादी ने प्रिंस का पक्ष लिया। ‘हां, प्रिंस ने सच बोला और सच बोलना तो अच्छी बात है।’

एक दिन तो मजा ही आ गया। प्रिंस पड़ोस वाली आंटी के घर खेलने गया था। दरवाजे पर दस्तक हुई। अखबारवाला पैसे मांगने आया था। आंटी के पास खुले पैसे न थे। उन्होंने सोचा कि इसे टाल दिया जाए। वे प्रिंस से बोलीं, ‘जाओ अखबार वाले भैया से कह दो,आंटी घर पर नहीं हैं।’ 

प्रिंस भागता हुआ दरवाजे पर गया। जोर से बोला, ‘अंकल। अभी आप जाओ। आंटी कह रहीं हैं कि वे अभी घर पर नहीं हैं।’

अखबारवाला हंस पड़ा। बाहर खड़े कुछ और लोग भी हंस पड़े। अब तो आंटी को दरवाजे पर आकर सच बात बतानी ही पड़ी कि उनके पास खुले पैसे नहीं। बाद में आ जाना।

अखबारवाला चला गया। आंटी प्रिंस से बोलीं, ‘तुमने उसे सच क्यों बता दिया?’

प्रिंस ने भोलेपन से कहा, ‘...क्योंकि आंटी हमेशा सच बोलना चाहिए। सच्चाई की हमेशा जीत होती है।’ 

आंटी ने प्यार से उसके गाल पर हाथ फेरे, ‘अच्छा मेरे प्यारे हरिश्चंद जी।’ 

प्रिंस चौंका, आंटी। आप क्या मेरा नाम भूल गईं? मैं प्रिंस हूं, हरिश्चंद नहीं। 

आंटी हंसीं, ‘हां, हां। तुम प्रिंस ही हो। पर राजा हरिश्चंद से कम नहीं।’ फिर आंटी ने उसे सत्यवादी राजा हरिश्चंद की कहानी सुना दी, जो कभी भी झूंठ नहीं बोलते थे । प्रिंस को बहुत अच्छा लगा। वह यह सोचकर चहक उठा कि कितनी कठिन परीक्षा के बाद भी राजा हरिश्चंद ने सच्चाई का साथ न छोड़ा। ...और अंत में जीत भी तो सच्चाई की ही हुई।

प्रिंस समझ गया था कि सच्चाई एक ऐसा रास्ता है, जिस पर कठिन मोड़ होते हैं। लेकिन तो क्या हुआ? सम्मान तो सच को ही मिलता है न। झूठ तो कभी न कभी बेनकाब ही होता है। गांधी जी सच बोलते थे, तभी तो दुनियां उन्हें महात्मा कहती है। झूठ बोलने वालों को भला कौन महत्व देता है?

लेकिन एक दिन क्लास में अजब घटना घटी। झूठ बोलने वाले ही महत्व पा गए।

मैथ का पीरिएड था। मैडम ने पूछा, ‘कितने बच्चे होमवर्क करके नहीं लाए? खड़े हो जाओ।’

प्रिंस किसी कारणवश अपना होमवर्क नहीं कर पाया था। होमवर्क तो गरिमा, केतन, आदित्य और रमन ने भी नहीं किया था। रमन तो क्लास का मानीटर था। उसी ने बच्चों को समझा रखा था, अगर मैथवाली मैडम होमवर्क के लिए पूछे तो चालाकी से काम लेना। वरना बहुत डांट पड़ेगी। 

तो सारे बच्चे चुपचाप बैठे रहे। हां, प्रिंस खड़ा हो गया। धीमे से बोला, ‘मैडम, मैंने होमवर्क नहीं किया है।’

फिर क्या, मैडम ने उसे खूब डांटा। बेंच पर खड़ा कर दिया। सारे बच्चे हंसने लगे। 

मैडम ने मानीटर रमन से कहा, ‘आज ब्रेक में बाकी सारे बच्चों की कापियां जमा कर लेना। मैं छुट्टी में चेक करके कल वापस कर दूंगी।’

      ‘ओ के मैडम!’ रमन अंदर ही अंदर अपनी चालाकी पर खुश होते हुए बोला। 

ब्रेक में रमन ने गरिमा, केतन और आदित्य से कहा, ‘चलो, साथियों, अब हम जल्दी से अपना होमवर्क पूरा कर लें। फिर कापियां जमा कर मैडम को दे आऊँगा। ...’

रमन ने प्रिंस का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘चाहो तो बच्चू, तुम भी हमारी पार्टी में शामिल होकर काम पूरा कर लो।’ 

सब हंस पड़े। पर यह क्या? 

अचानक मैथवाली मैडम आ धमकीं। रमन से बोलीं, ‘बेटे! आज बाकी बच्चों की कापियां रहने दो। तुम बस अपनी होमवर्क की कापी दे दो। आज प्रिंसिपल सर केवल मानीटर्स की  कापियां देखेंगे।’

 बेचारा रमन। अब तो जैसे उसके काटो तो खून नहीं वाला हाल। वह पसीने-पसीने हो गया। उसने होमवर्क किया ही कहां था? मैडम ने सारी बात जानीं तो बहुत नाराज हुईं। उसका मानीटर पद भी छीन लिया। कहा, ‘मुझे झूंठे लोग तो बिल्कुल पसंद नहीं। झूठ बोलनेवाला बच्चा भला एक अच्छा मानीटर कैसे हो सकता है?’ 

मैडम ने प्रिंस की जमकर तारीफ की। उसकी पीठ थपथपाई। सिर पर हाथ फेरा। सारे बच्चों की ओर देखते हुए कहा, ‘सीखो इस बच्चे से। पनिश्मेंट ले लिया लेकिन झूठ नहीं बोला। मैं आज से इसको मानीटर बनाती हूं।’ 

सारे बच्चों ने नए मानीटर यानी प्रिंस के लिए जोरदार तालियां बजाईं। 

प्रिंस बहुत खुश था। बहुत ही खुश। 

एक बार फिर उसका मन मजबूत हुआ था। झूठ कितनी भी सफाई से बोला जाए, झूठ ही रहता है और अंत में जीत सदा सच्चाई की ही होती है। ■

(यह कहानी प्रभात खबर, रांची में 18 अगस्त 2021 को प्रकाशित हुई थी।)

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' की कहानी 'वीर बनूँगा मैं भी...'

 वीर बनूंगा मैं भी...

नितिन को उसके नौवें जन्मदिन पर ढेरों उपहार मिले। ढेर सारे खिलौने। ढेर सारे कपड़े। लेकिन ये सब तो उसके पास पहले से ही थे न, इसलिए उसकी निगाह ...बस ....एक अलग ढंग के गिफ्ट पैक पर ही जमी थी। सबके जाते ही उसने सबसे पहले उसी को खोला। खोलने से पहले उसने मम्मी-पापा से पूछा भी, ‘अच्छा बताइए तो इसमें क्या होगा?’

मम्मी ने कहा, ‘डायरी।’

पापा बोले,‘किताब।’

हां, यह किताब ही थी। कहानियों की किताब। वीर बालक और बालिकाओं की कहानियों की किताब।

‘अरे! वाह। मैं तो इसे जरूर पढ़ूंगा।’ नितिन चहक उठा। किताब मोटी थी। कोई तीस कहानियां उसमें थीं। नितिन ने चार कहानियां तो तुरंत ही पढ़ डालीं। वह तो मम्मी ने मना कर दिया,‘अरे! अब सो भी जाओ। आराम से पढ़ना इसे।’सच पूछो तो नितिन किताब को छोड़ना नहीं चाहता था। हां, लेकिन कल सुबह स्कूल भी तो जाना था और रात भी ज्यादा हो ही चुकी थी। 

नितिन सो गया। सुबह किताब को उसने बस्ते में रखा और बस में भी दो कहानियां उसने पूरी कर लीं। फिर एक पीरियड खाली था तो तीन कहानियां और...। वाकई मजा आ रहा था। बड़ा अचरज हो रहा था। बार-बार आंखें बडी़ हो जातीं। रोंगटे खड़े हो रहे थे। कई बार तो ऐसा लगता कि वह कहानी नहीं पढ़ रहा है, बल्कि सारी घटना उसके सामने ही घटित हो रही है। मजा इसलिए भी आ रहा था क्योंकि ये कहानियां सच्ची कहानियां थीं। ऐसे बच्चों की कहानियां जो लगभग उसकी ही उम्र के थे। अरे!  दो-चार साल बड़े भी हों तो क्या, मतलब थे तो बच्चे ही। 

बाप रे ! एक बच्चा कुएं में कूद गया। ...एक बच्चे ने आग में घिरे लोगों की जान बचाई। ...एक बच्चा बाढ़ में भी न डरा। ...एक लकड़हारे के बच्चे ने जंगल में भेड़िए का सामना किया। ...एक दीदी ने पहाड़ से गिरे बच्चों को बचाया। एक बच्चे ने लुटेरों को पकड़वाया। ...मतलब कितनी कहानियां और वह भी एकदम सच। बच्चों के फोटो भी किताब में छपे थे। ऐसा नहीं कि नितिन पहली बार वीर बच्चों की कहानियां पढ़ रहा हो। उसके कोर्स में भी ऐसी कहानियां थीं। टीचर भी तो अक्सर ऐसी कहानियां सुनाते ही रहते थे। बालक भरत ने षेरों के दांत गिने थे। राम के पुत्र लवकुश ने अश्वमेघ के घोड़े को भी बांध दिया था। ...जैसी कितनी कहानियां उसने सुनी पढ़ी थीं लेकिन कभी उसे अचरज नहीं हुआ। उसे तो लगता था कि ये सब तो बस कहानियां हैं। या फिर वह सोचता था कि वह जमाना और रहा होगा। तब सब ज्यादा शक्तिशाली होते होंगे। लेकिन ये सब तो ? एक दम सामान्य से परिवारों के बच्चे। उसके ही जैसे बच्चे। भई वाह! यह तो कारनामा ही है। इसके लिए उन बच्चों को प्रधानमंत्री जी ने अवार्ड दिया। तो यह तो और बड़ी बात हुई। 

नितिन बहुत उत्साहित था। वह बार-बार सोचता कि वह ऐसा कौन सा काम करे कि उसका भी नाम बालवीरों में आए। उसे भी अवार्ड मिले। मैडम कहती हैं कि हर काम की शुरुआत छोटी होती है लेकिन धीरे-धीरे हम बड़े काम कर डालते हैं। तो अब उसे चूकना नहीं है। कहीं भी मौका मिला तो चांस मिस नहीं होगा। उसे वीर बनना है तो बनना है। 

पांच दिन में नितिन ने सारी किताब पढ़ डाली। उसमें जबरदस्त परिवर्तन भी आया। उसे लगा कि वह भी किसी से कम नहीं है। उस दिन रात में अचानक लाइट गई मगर हमेशा की तरह वह जोर से नहीं चिल्लाया, मम्मी! जल्दी आओ। डर लग रहा।

बाथरूम में मोटी छिपकली को देखकर भी वह डरा नहीं। झाड़ू उठा लाया, तीन बार हट हट हट क्या कहा कि छिपकली भागती नजर आई। 

पड़ोस के रस्तोगी अंकल के बंधे हुए झबरू कुत्ते को देखकर ही उसकी धड़कन बढ़ जाती थी मगर अब तो नितिन बेधड़क चलता चला जाता है और हमेशा उसे देखते ही भूं भूं करने वाला वह झबरू उसे चकित भाव से घूरता रह जाता है। 

एक दिन स्कूल बस खराब हुई लेकिन हमेशा की तरह नितिन इस बार चुपचाप नहीं बैठा रहा, जैसे उसे कुछ पता ही नहीं। ...अरे! बड़े बच्चे जाएंगे। धक्का लगाएंगे और चल ही पड़ेगी बस। नितिन एक झटके में उठा। अन्य बच्चों की तरह नीचे गया। ये लगाया धक्का और लो ये हुई बस स्टार्ट। 

नितिन अब काले-काले कपड़े पहने लाल आंखों वाले बाबा से भी नहीं डरता। नहीं तो जब वे दरवाजे पर भीख मांगने आते थे तो उसकी तो सिट्टी पिट्टी ही गुम हो जाती थी। 

नितिन को लगने लगा कि हां, वह भी वीर है। वह भी कारनामे कर सकता है और उसे करना है। और क्या, जब नहीं डरना है तो करना है।

एक रोज नितिन नुक्कड़ से समोसे लेने जा रहा था। उसने देखा, उसकी ही उम्र का एक लड़का छोटी सी एक लड़की को खींचता हुआ ले जा रहा है। वीरता दिखाने का यह अच्छा मौका था। बस...नितिन ने उसे जा लपका। बच्ची को छुड़ाना चाहा तो वह उलटे उसी लड़के से लिपट गई। क्यों न लिपटती? उसकी छोटी बहन जो थी। बच्ची और ज्यादा सहम गई। वह लड़का तो नितिन से भिड़ने पर आमादा हो गया। कुछ और लोग वहां आए तो वे भी नितिन को भला बुरा कहने लगे। रोती हुई बच्ची शांत होकर चुपचाप अपने भाई के साथ चली गई। 

बेचारा नितिन, उसकी तो समझ ही नहीं आ रहा था कि भला उसकी क्या गलती थी?

एक दिन इंटरवल में केजी में पढ़ने वाले एक छोटे से बच्चें का खिलौनेवाला ऐरोप्लेन लाइब्रेरी की टीनवाली छत पर जा पहुंचा। बच्चा जोरों से सुबक रहा था। नितिन ने आव देखा न ताव, लाइब्रेरी की खिड़की और रोशनदान को पकड़ते-पकड़ते छत पर जा पहुंचा। ऐरोप्लेन तो उसने नीचे फेंक दिया लेकिन अब खुद कैसे नीचे आए? यह तो बड़ी समस्या खड़ी हो गई। नीचे उतरने का तो कोई जुगाड़ ही नहीं। कभी इधर तो कभी उधर। उस पर प्रिंसिपल सर का डर। बेचारे नितिन बुरे फंसे। सारे बच्चे तमाशा देख रहे थे।

एक बच्चा हिंदी वाली शुचिता मैडम को बुला लाया। उन्होंने गेटकीपर अंकल से सीढ़ी मंगवाई। फिर बड़ी सावधानी से नितिन को उतारा गया।

मैडम को जब यह पता चला कि नितिन वीर बनने और वीरता के अवार्ड के लिए ये सब करता फिर रहा है तो पहले तो अपनी हंसी न रोक सकीं। फिर प्यार से उसे समझाया,‘तुम्हें क्या लगता है कि जिन बच्चों ने वीरता के काम किए हैं तो उसके लिए कोई सोची समझी प्लानिंग रही होगी? कम से कम अवार्ड तो उनका लक्ष्य बिल्कुल भी न रहा होगा।’

थोड़ा रुककर मैडम ने कहा,‘वीरों का काम है खतरों से खेलना। न कि जबरदस्ती खतरे मोल लेना। माना कि अभी तुम गिर जाते। चोट खा जाते। हाथ या पैर टूट जाता तो भला एक प्लास्टिक के ऐरोप्लेन के लिए इसमें कौन सी बड़ी बहादुरी होती?’

नितिन के साथ-साथ अन्य सारे बच्चे भी मैडम की बात ध्यान से सुन रहे थे। मैडम ने कहा कि बड़े होकर तुम जानोगे कि वीर कई तरह के होते हैं, जैसे दयावीर, दानवीर, युद्धवीर...आदि आदि। तुम अगर अपने मन में दीन दुखियों के प्रति दया का भाव रखते हो। उनकी सहायता करते हो तब भी तुम वीर ही हो। तुम अगर जरूरतमंदों की मदद करते हो। अपनी चीजों का मिलजुलकर प्रयोग करते हो तो भी तुम किसी वीर से कम नहीं। और वीर होने के लिए बुद्धि और बल तो बहुत ही जरूरी है। अब यह मौके पर ही पता चलेगा कि तुम्हें बुद्धि का प्रयोग करना है या बल का? वैसे वीरता की अधिकांश घटनाओं को देखकर यही समझ आता है कि बल की तुलना में बुद्धि ज्यादा काम आती है। जहां बुद्धि है, वहीं बल है।’

नितिन चहकता हुआ अचानक बोल पड़ा,‘जी, मैडम। सही कह रही हैं, ...बुद्धि के बल पर अकेला बच्चा आग में घिरे तमाम लोगों की जान बचा लेता है। ...एक बच्चा बाढ़ में फंसे कितने लोगों को सुरक्षित स्थान पर जा पहुंचाता है। अकेला बच्चा डरावने भेड़िए को भी हरा देता है। चालाकी से एक बच्चा कितने लुटेरों को पकड़वा देता है।...

नितिन आगे कुछ बोलता, इससे पहले सारे बच्चों की तालियां गूंज उठीं। मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘...और बच्चों, कभी भी अवसर आए तो तुम भी पीछे नहीं हटना। बुद्धि से काम लेते हुए वीरता की मिसाल गढ़ना। गढ़ोगे न ?’

‘बिल्कुल मैडम।’ सारे बच्चों का शोर एकदम संगीतमय हो उठा क्योंकि साथ में इंटरवल खत्म होने की घंटी भी बज उठी थी।

(बाल भारती'मासिक अगस्त 2021 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 14 जुलाई 2021

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' की किशोर कहानी 'बौरा'


 बौरा 
कहानी : डा. नागेश पांडेय ‘संजय'

बात पुरानी है, पर है सच। गांव के बच्चे उसे बौरा कहकर चिढ़ाते थे। उस पर कंकड़ फेंकते। वह आंआंआं कर चिल्लाता तो सब ताली पीट-पीट हंसते। हां, अगर मेरी मां देख लेतीं तो बच्चों की शामत आ जाती। वे बच्चों को डांटती। सब नौ दो ग्यारह हो जाते। मां, उसे बुलाकर कुछ न कुछ खाने को देतीं। वह चबूतरे पर बैठ जाता। जल्दी-जल्दी खाता। कभी इधर देखता तो कभी उधर। मां कहतीं, आराम से खा ले। कोई तुझे तंग न करेगा। 

उसका कोई नहीं था। न मां, न बाप। मां बतातीं, मैंने इसकी मां देखी है। वह भी गूंगी थी। सब उसे बौरी बुआ कहते थे। वह जिसके तिसके घर चौका बरतन कर देती और लोग उसे कुछ खाने पीने को दे देते थे। बौरी बुआ को भेड़िए ने मार दिया था। तब यह मुश्किल से दो साल का था। इशारे में ही बात करता था। इसकी बूढ़ी दादी ने इसे जैसे तैसे पाला। थोड़ा बड़ा हुआ तो सबने जाना कि यह भी गूंगा  है। बाद में इसकी दादी भी नहीं रहीं। बेचारा निबट अकेला रह गया। अब तो वह 15-16 साल का किशोर था। तगड़ा-तंदरुस्त भी। परेशान करने वाले बच्चों में से अगर वह एक को भी पकड़ लेता तो क्या मजाल कि सारे मिलकर भी उसे छुड़ा पाते। लेकिन वह कभी कुछ कहता ही नहीं। बच्चे चिढाते तो बस भाग लेता। कई बार तो बच्चे उसे गांव के बाहर तक छोड़ आते। वह वहां ताल के पास बैठा रहता। ताल में कंकड़ फेंकता। कई बार तो ताल में घुस जाता। जलकुंभी तोड़ता। उसके पैर मिट्टी से सन जाते। वह बाहर निकलकर पीपल के पेड़ के पास बैठ जाता। दिन भर बैठा रहता। मिट्टी उसके पैरों में सूख जाती। वह उसे छुड़ाता और आजू बाजू घूरता। 

हमारे गांव के उत्तर में बहुत बड़ा जंगल था। बहुत ही बड़ा। मीलों लंबा। जंगल के इर्द गिर्द और भी गांव थे। मेरे गांव के कई लोग वहां लकड़ी बीनने जाते। इधर बौरा भी जंगल जाने लगा था। लोग उससे काम कराते और थोड़ा बहुत खाने को दे देते। वह खुश हो जाता। अब तो जंगल जाना उसके लिए आम बात हो गई थी। वह लकड़हारों की राह तकता। कब कोई दिखे और वह साथ चल पड़े। अब तो वह दिन में गांव में दिखता ही न था। मैंने एक दिन गुस्से में बच्चों से कहा, वह तुम सबके कारण अब गांव में नहीं दिखता।

बच्चों ने तालियां पीटीं, 'हां, वह डरता है हमसे। डरपोक कहीं का।'

मेरा मन हुआ कि मैं जोर से कहूं कि नहीं, वह डरपोक नहीं। लेकिन मैं चुप रहा। दरअसल मेरी मां कहतीं थीं, किसी से भी न उलझो। बहस अच्छी बात नहीं होती। बहस ही लड़ाई में बदल जाती है। 

फिर भी मुझे चुप रहकर बुरा लगा था। मेरा मन हमेशा कहता कि वह डरपोक नहीं है। वह डरपोक होता तो क्या ताल में घुस जाता? पेड़ पर चढ़ जाता? जंगल से अंधेरे में आता? 

याद आया, एक दिन रात में हमारे चबूतरे पर आहट सी हुई। हमारे गांव में तब बिजली न थी। रात को डर लगता था। शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता। झींगुरों की आवाज डराती थी। आधी रात में तो अक्सर सियार की हुआ हुआ शुरू हो जाती थी। हम बच्चे तो दुबक ही जाते थे। उस दिन हवा भी तेज चल रही थी। तेल की कुप्पी बार बार बुझी तो लैंप जलानी पड़ी। लैप का शीशा भी उस दिन ठीक से साफ नहीं हुआ था। 

कौन है? मां जोर से चिल्लाईं। 

उधर से कोई आवाज नहीं। पड़ोस की दीवार से चाचा ने मां का चिल्लाना सुना तो पूछा, क्या हुआ?

देखो भैया, दरवाजे पर कोई है। 

धीरे धीरे बाहर जाकर देखा गया तो बौरा खड़ा था। हाथ में ढेर सारे कमल। मां हंस पड़ीं, अच्छा तो तू है। 

वह मुस्कुराया और कमल मेरे हाथ में थमा दिए।

मां ने इशारे से कहा, खाना खाएगा तो वह चबूतरे पर ही बैठ गया। उसने खाना खाया और लंबे लंबे डग भरते हुए चला गया। 

अब तो वह आए दिन शाम को मेरे घर आ जाता। जंगल  से कभी फूल लाता तो कभी फल। कभी कभी लकड़ी भी दे जाता। मां मना करतीं तो वह इशारे से खाने के लिए मना करता। मतलब अगर आप उसकी दी हुई चीजें नहीं लेंगे तो वह भी आपसे खाना नहीं लेगा। 

एक दिन रात में हम लोग गहरी नींद में थे। जोर का शोर गूंजा। पता चला कि गांव में भेड़िया आया था। राशिद काका की बकरी उठाकर भाग रहा था। लोगों ने लाठी डंडे लेकर उसका पीछा किया मगर उसने बकरी को नहीं छोड़ा तो नहीं छोड़ा। बौरा भी साथ में दौड़ा था। सबने भेड़िए को गांव के बाहर तक दौड़ाया। भेड़िया जैसे हवा हो गया। किसी की भी पकड़ में न आया। सब हार थक कर वापस लौट आए। लेकिन एक अजीब बात हुई। वापस आए तो देखा बौरा तो साथ में था ही नहीं। उसके ठिकाने पर भी जाकर देखा गया। तो क्या...? वह भेड़िए के पीछे जंगल चला गया था? 

शायद हां...।

सब उसे आवाज लगाते रहे। देर तक उसकी ही बात करते रहे। हां, भला आधी रात में उसे खोजने जंगल कौन जाता तो सब अपने अपने घर लौट गए। उस रात मुझे नींद नहीं आई। बस सुबह का इंतजार था। 

सुबह काफी लोग जंगल गए। दूर तक बौरा को बहुत खोजा गया पर वह नहीं मिला। 

सबका मन बहुत दुखी था। 

बौरा गया तो गया कहां? 

मुझे तो रोना आता था। क्या भेड़िया उसे भी खा गया?

...

कोई दस दिन बाद बहुत दूर के एक गांव से खबर आई कि भेड़िया मारा गया। मेरे गांव से कई लोग उसे देखने गए। पता चला कि किसी अनजान इंसान ने उसे मार गिराया। सब भौचक थेे। वह अनजान और कोई नहीं, बौरा ही था। गांववालों ने बताया कि पिछले दस दिनों से हम लोग इसे जंगल में भटकते देख रहे थे। लोगों ने इससे पता ठिकाना जानना चाहा तो ये बता नहीं पाया। साथ चलने को कहा तो आया नहीं। शायद यह इसी भेड़िए को पकड़ने की फिराक में मारा मारा घूम रहा था। 

बौरा गांव आ गया। आ क्या गया। सब उसे सम्मान सहित लेकर आए। यह कहते हुए कि अरे! यह तो हमारे गांव का है। हमारे गांव में तो बच्चा बच्चा वीर है।  

भेड़िए से भिड़ने में बौरा को चोटें भी खूब आईं थीं। कई जगह जख्म भी थे। 

गांववालों ने उसकी बहुत सेवा की। 

खासकर उन बच्चों ने तो खूब ही, जो कहते थे कि वह डरपोक है।■

(कहानी बाल किलकारी, मासिक के जुलाई 2021 अंक में प्रकाशित)



गुरुवार, 10 जून 2021

बाल कहानी 'फुदकू का पैराशूट'- डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

 

फुदकू का पैराशूट
डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

सिटी के बाहर एक ताल था। बहुत बड़ा। पास में ढेर सारी झाड़ियां थीं। फिर उसके बाद कई पेड़। पेड़ों पर जहां तरह-तरह के पक्षियों के घर थे, वहीं ताल मछलियों का ठिकाना था।

 झाड़ियों में ढेर सारे मेंढक थे। सुबह होते ही सब ताल किनारे जा पहुंचते। कूदते-फांदते। मछलियों के साथ खेलते और मन करता तो पेड़ों के पास जाकर चिड़ियों के सुर में सुर मिलाने की कोशिश करते। इधर चिड़ियों की चीं चीं चीं और उधर उनकी टर्र टर्र। कबूतर करते गुटरगूं और वे करते टर्र टर्र। बंदर खों खों खों करते, तब भी उनकी टर्र टर्र गूंजने लगती। झींगुर अपना इकतारा बजाता तो भी वे अपनी टर्र टर्र शुरू कर देते। कौआ कांव कांव करता, तब भी। यहां तक कि ऊपर से हवाई जहाज या हेलीकाप्टर गुजरता तो भी सब उसकी गड़गडाहट के साथ टर्र टर्र करना न भूलते। यानी हर किसी के साथ वे अपनी मौजूदगी का अहसास कराते। 

इन दिनों ताल में सिंघाड़े उगे थे। मेंढकों को वहां बहुत अच्छा लगता। वे उनके पत्तों पर जा बैठते। तैरते। इन्हीं मेंढकों में एक तो बहुत ही अनोखा था। उसका नाम था फुदकू। फुदकू नाम भी ऐसे ही नहीं पड़ गया। दरअसल वह हमेशा इधर-उधर फुदकता रहता। फुदकते-फुदकते कितनी दूर निकल जाता। फिर घरवाले उसे ढूंढ़ने निकलते। साथ में पेड़ के पक्षी भी। जिससे-तिससे पूछते फिरते। जबाव मिलता- हां, उधर जाओ सिटी के पास चौराहे पर। वहीं फुदक रहा था। उफ, घरवाले कितना परेशान होते। पर भला फुदकू, वह कहां मानता।

किसी की निगाह पड़ जाती तो चिल्लाता-देखो, वह रहे मियां फुदकू। 

सब चैन की सांस लेते।

फुदकू प्रामिस करते-ठीक है। अब इतनी दूर नहीं जाऊँगा। मगर फुदकते-फुदकते वे कहां पहुंच जाएंगे, ये तो खुद उनको भी न पता होता। 

एक दिन फुदकू निकले तो चलते ही गए। चलते-चलते ...हां, मतलब फुदकते-फुदकते वे शहर के सिटी पार्क में जा पहुचे। पहले तो पूरे पार्क का एक चक्कर लगाया। बच्चों की ट्रेन देखी तो उसके पीछे दौड़े मगर पकड़ न पाए। फिर वहां फब्बारा देखा तो फूले न समाए। उसमें खूब नहाए। 

तरह तरह के फूलों को देखा। बच्चे वहां फोटो खींच रहे थे। फुदकू उन्हें ताकने लगे। अचानक एक बच्चा उन्हें पकड़ने दौड़ा। 

अरे! बाप रे। -फुदकू भागे और झाड़ियों में जा छिपे। कुछ देर तक वहीं दुबके रहे। फिर बाहर झांककर देखा तो बच्चे वहां से जा चुके थे। बच्चे कहां गए? अब फुदकू उन्हें देखने चल दिए। दरअसल वे बच्चे पिकनिक मनाने आए थे। सब फब्बारे के पास चटाई बिछाकर बैठ चुके थे। 

फुदकू ने देखा, खाने की तैयारी हो रही थी। एक बच्चे ने पिज्जा निकाला। दूसरे ने बर्गर। किसी ने डोसा। किसी ने चाउमीन तो किसी ने कुरकुरे।

 ...और कोल्ड ड्रिंक... वह तो उसी दौड़ानेवाले बच्चे के पास थी। वह बोला, ‘अरे, पहले डांस करते हैं। फिर ये सब खाएंगे।’ 

सबने पूछा- ‘भला क्यों?’

वह बोला-‘नहीं तो फिर ये सारी चीजें पेट में डांस करेंगी।’

कुछ बच्चे उठकर डांस करने लगे। 

कुछ मिलकर गाने लगे।

कुछ बच्चे गोल-गोल बैठ गए। वे कभी कुछ खाते तो कभी बात करते-करते ताली पीटने लगते। मियां फुदकू का बार-बार मन करता कि वे भी सुर में सुर मिलाएं। मगर उनको वही दौड़ाने वाला बच्चा याद आ जाता।

बेचारे चुपचाप छिपे बैठे रहे।

 कुछ देर बाद, एक गुब्बारे बेंचनेवाला उधर आया। गैसवाले गुब्बारे। बच्चों ने गुब्बारे खरीदे। 

वाह! फिर नया खेल। बच्चे गुब्बारों को छोड़ देते। गुब्बारे उड़ चलते। बच्चे उछलकर उन्हें लपक लेते। 

फुदकू को भी खूब मजा आ रहा था। 

अचानक दो बच्चे आपस में टकरा गए। उनके गुब्बारे उड़ गए। दोनों लड़ने लगे-तेरे कारण मेरा गुब्बारा गया। 

दोनों गुब्बारे उड़े जा रहे थे। बाकी बच्चे उन्हें देख खुश हो रहे थे। फुदकू भी आंखे फाड़े उन्हें ताक रहे थे। 

अब बच्चे थक गए थे। तीन गुब्बारे बचे थे। बच्चों ने उन्हें एक में बांधा और फिर धागे को झाड़ियों में बांध दिया। शुक्र मानों कि वहीं छिपे बैठे फुदकू पर उनकी नजर न पड़ी। 

गैसवाले गुब्बारों के कारण झाड़ियों में खिंचाव होने लगा। फुदकू को लगा कि अब तो यहां से खिसकने में ही भलाई है। वे थोड़ा उछले तो उनका तो पैर ही धागे में फंस गया। फुदकू ने धागे को काटना चाहा। पर ऐसा नहीं हुआ। फुदकू फिर उछले, पर इस बार तो वे कलाबाजी ही खा गए। धागे का फंदा बन गया। बेचारे फुदकू, वे जोर पर जोर लगाते मगर धागे में उनके पैर उलझते ही जा रहे थे। 

अचानक धागा टूट गया। 

गैस वाले गुब्बारे उड़ चले और साथ में फुदकू भी। 

बच्चे चीखे-‘हमारे गुब्बारे।’

तभी उनकी नजर उसमें लटके फुदकू पर पड़ी। अब तो सारे बच्चे ताली बजाने लगे-पैराशूट, पैराशूट। 

गुब्बारे उड़ते रहे और मियां फुदकू भी। बहुत देर बाद जब गैस कम हुई तो गुब्बारे नीचे आए। 

फुदकू ने चैन की सांस ली। 

बहुत देर चुपचाप बैठे रहे।

इधर उधर ताकते रहे।

पता नहीं, क्या-क्या सोचते रहे।  

फिर धीरे से बोले-टर्र टर्र और जल्दी से अपने ताल की ओर चल दिए। 

(नंदन, मासिक के अप्रैल, 2018 अंक में पृष्ठ 60 पर प्रकाशित)

मंगलवार, 1 जून 2021

बाल कहानी 'शाबाश केतन - डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

 'हरिभूमि (बाल भूमि) में 3 मई 2018 को  प्रकाशित
शाबाश केतन
डा. नागेश पांडेय ‘संजय’
    बारह साल में यह पहला मौका था जब केतन अपनी मां से दूर कहीं और आया था। उसे रह-रह कर मां की याद आ  रही थी। ऐसा नहीं कि मामा के घर उसे कोई तकलीफ थी लेकिन फिर भी बात यही थी कि उसे अच्छा नहीं लग रहा था। 
    गर्मी की छुट्टियां थीं। मामा ने बहुत कहा तो मां ने उसे साथ भेज दिया। केतन ने कहा भी था-‘न मामा, मुझे तो मां की बहुत याद आएगी।’  मामा हंसे थे-‘...और जब तुम्हें मां की याद आए, तुम दो बार मां, मां कहना। बस, मैं तुरंत हाजिर हो जाऊँगा।’ 

    मां भी चहक पड़ी थीं- ‘और क्या बेटे, मैं तो बस मां हूं लेकिन मामा में तो देखो, दो बार मां आता है।’  फिर मां ने समझाया था-‘देखो, अब बड़े हो चुके हो। पूरे बारह के। कहीं आना जाना नहीं सीखोगे तो...।’

    ‘हां, हां मां, मैं समझ गया।’ केतन बीच में ही बोल पड़ा था। वैसे भी उसे मामी और पुष्कर भैया, निखिल भैया से मिले भी काफी समय हो गया था। शिवम अंकल की शादी में सब इकट्ठे हुए थे। कितना मजा आया था। खूब धमा चौकड़ी की थी। कितना नाचे थे। खाने की तो सुध ही न रही थी। जयमाल पड़ जाने के बाद सब खाने पर पहुंचे थे। आधे आइटम तो खत्म ही हो गए थे। न चाउमीन न डोसा। बुआ के बेटे आदू का तो पेट ही खराब हो गया था। सब बता रहे थे कि उसने एक-एक कर पूरे पांच डोसे खाए थे। अगले दिन सबने उसे खूब चिढ़ाया था- 
आदू भाई, आदू भाई

तुमने दावत खूब उड़ाई।

    यों तो आए दिन मामा-मामी और पुष्कर भैया, निखिल भैया से फोन पर बात तो होती ही रहती थी। वाट्सएप पर खूब वीडियो कालिंग भी करते थे। पर साथ बैठ बतियाने की तो बात ही कुछ और है न?

    मामा ने ज्यादा कहा और मां ने भी हामी भर दी तो केतन चला आया। सफर में कोई छह घंटे लगे होंगे। मामा ने पूरा ख्याल रखा। पहुंचा तो जबरदस्त वेलकम हुआ लेकिन फिर मां की याद आना शुरू हुई तो सब फीका लगने लगा। 

    केतन ने मां से वीडियो कालिंग की। मां ने पूछा-‘ठीक से पहुंच गए न ?’

    और थोड़ी ही देर बाद केतन ने फोन मामी को दे दिया। उसे लग रहा था कि वह रो पड़ेगा। ...मामी उसकी मंशा जैसे समझ गईं थीं। उन्होंने कुछ देर तक बात करने के बाद फोन रख दिया। वे केतन से बोलीं-बेटे, तुम थक गए होगे। थोड़ा सो लो। फिर शाम को मामा तुम्हें घुमाने ले जाएंगे। 

    मामी ने केतन के माथे पर पियानो बजाने की स्टाइल में अंगुलियां क्या फिराईं, केतन तो नींद के आगोश में जा पहुंचा। शाम को कोई चार बजे उसकी आंख खुली। निखिल भैया बड़े मजे से फर्श चमकाने में लगे थे। 

    केतन हंस पड़ा-‘अरे! तुम यह काम कर रहे हो?’

    ‘हां, तो तुम घर का काम नहीं करते क्या?’

    ‘ना, मैं भला ये क्यों करूंगा?’ केतन ने थोड़ा हेकड़ी से उत्तर दिया। उसके उत्तर में थोड़ा उपहास भी छिपा था। 

    ‘निखिल भैया कहां हैं?’

    ‘किचन में।’ 

    ‘किचन में !’ केतन एक बार फिर चौंका। ‘वहां क्या कर रहा है?’

    ‘तुम खुद ही जाकर देख लो।’ 
       केतन ने वहां जाकर देखा, मामी किचन में अप्पे बना रहीं थीं। पुष्कर भैया उनकी मदद कर रहे थे। 

    ‘अरे! तुम यहां हो?’

    केतन को आया देख मामी ने पुष्कर  से कहा-‘जाओ, बेटे। तुम इसके साथ खेलो जाकर। यहां सब हो जाएगा।’

पुष्कर उसे लेकर कमरे में चल दिया-‘कैरम खेलोगे?’

    ‘हां, बिल्कुल।’ 

    तब तक निखिल भी आ गया। खेल शुरू हो गया। गोटियों की खट-खट गूंजने लगी। 

    किचन से मामी की आवाज आई- ‘पुष्कर, चटनी में नमक तो डाला था न?’

    ‘हां, मम्मी। एकदम कंप्लीट है। आप बस अप्पे तैयार कर लो। फिर साथ-साथ खाते हैं।’ 

    केतन की चाल थी लेकिन वह भौचक सा पुष्कर का मुंह ताक रहा था। 

    ‘क्या हुआ प्यारे?’

    ‘चटनी तुमने बनाई है?’

    ‘हां, और क्या? आम और पुदीने की चटनी है। खाओगे तो याद करोगे?’

    ‘और... ये अप्पे क्या होता है?’ 

    ‘आज पहली बार बन रहा है। मैंने कल ही यू ट्यूब पर ये नया नाश्ता खोजा है। हम सब आज पहली बार इसका स्वाद लेंगे।’

    हम लोग बाजार की चीजें कम ही खाते हैं। बस, मिल जुलकर सारी चीजें घर पर ही तैयार कर लेते हैं।’  

    ‘वा....ह!’ 

    केतन चकराया सा हमउम्र दोनों भाइयों को ताक रहा था। वह तो बस मोबाइल में गेम खेला करता था। और भला किचन या घर के कामों से उसका क्या काम? मां खुद ही सारे काम करती हैं। सुबह चार बजे उठती हैं। फिर रात को दस बजने से पहले उनकी छुट्टी कहां होती है? कैसे थककर चूर हो जाती हैं बेचारी। उसने तो आज तक मां के किसी काम में हाथ नहीं बटाया। यहां तक कि वह कहीं भी अपने कपड़े डाल देता है। कहीं भी बस्ता। मां हर समय फैलाव ही ठीक करती रहती हैं। कालबेल बजने पर दरवाजा भी मां ही खोलने जाती हैं। उसे कुछ चाहिए होता है तो बस हुक्म देता है-मां, यह ले आना। मां, वह ले आना। और बेचारी मां, वे भी तो हंसते-हंसते उसे सब कुछ हाथ में ही लाकर देती हैं।

    निखिल ने केतन को हिलाया-‘क्या सोचने लगे? अपनी चाल चलो भाई।’

    केतन अनमना था। कैरम की बिखरी गोटियों को समेटते हुए बोला-‘खेल में मन नहीं लग रहा।’

    ‘क्यों, घर की याद आ रही है?’ 

    ‘हां, मां की याद....।’

    तब तक मामा आ गए। हंसकर बोले- ‘तो बोलो न मां, मां।’

    मामी भी नाश्ता लेकर आ गईं। पुष्कर और निखिल उसे प्लेट में रखने लगे। केतन ने अप्पे देखकर आंखे बड़ी कीं-‘अरे! ये तो बिल्कुल गोलगप्पों की तरह हैं!’

    फिर केतन ने मामा से कहा-मामा, मां से बात कराओ न प्लीज!

    ‘हां, अभी लो।’ और मामा ने तुरंत मां को वीडियो काल लगा दी। जल्दी ही स्क्रीन पर मां प्रगट हुईं-‘कैसा है रे?’

    ‘मैं ठीक हूं मां। नाश्ता करने जा रहा हूं।’ थोड़ा रुककर केतन ने पूछा-‘आपने नाश्ता किया मां?’

    ‘अभी तो नहीं बेटे। थोड़ा काम है, उसे निबटा लूं फिर...।’

    केतन को लगा कि वह मोबाइल पर ही मां को प्यार कर ले। कहे उनसे- मां, देखना वापस आने पर मैं आपका कितना ख्याल रखूंगा। पुष्कर और निखिल की तरह मैं भी...। ...लेकिन केतन कुछ बोला नहीं। बस, उसके ओंठ हिलकर रह गए। 

    ‘क्या है केतन ? क्या कह रहा है? आवाज नहीं आ रही?’ 

    ‘कुछ नहीं मां, ...आपके लिए मैंने एक गिफ्ट सोचा है।’

    ‘गिफ्ट! ...अच्छा क्या? बता तो भला?’

    ‘बताऊँगा नहीं मां, जब वापस आऊँगा तब देखना। ...बस...।’ 
      मां उसे निहारती रह गईं। तब तक मामी ने अप्पे उठाकर केतन के मुंह में रख दिया। हंसते हुए बोलीं-‘बाकी बातें ब्रेक के बाद...।’
  सब नाश्ता करने लगे। 
    मोबाइल पर मां के चेहरे की चमक साफ दिख रही थी। 

    ...और केतन का तो मन ही दमक उठा था।
(कहानी हरिभूमि, दिल्ली में 3 मई 2018 को  प्रकाशित )

शुक्रवार, 21 मई 2021

बाल कहानी : 'सबसे गंदे ...? डॉक्टर अंकल' -डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'




 'सबसे गंदे ...? डॉक्टर अंकल' 

 कहानी :डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

    ऑक्छी! ऑक्छी! नेहा की छींक पर छींक आए जा रही थी। जुकाम के मारे बुरा हाल था। सारा शरीर ऐंठ रहा था, और सिर दर्द की तो पूछो ही मत। लगता था जैसे चम्पावत उसे बहुत महंगा पड़ गया।

    चम्पावत में नेहा के मौसा रहते हैं। चम्पावत नया जिला है, कभी इसे पिथौरागढ़ नाम से जाना जाता था। जो भी हो, यह दर्शनीय स्थल है। जिधर नजर डालो, पहाड़ ही पहाड़। लगता जैसे उनकी चोटियां पुकार रही हों- आओ, आओ चढ़ो हम पर। ऊंचे- ऊंचे पेड़ अचरज में डालते हैं । झरने मन मोहते हैं और देखने को मिलते हैं तरह-तरह के लोग। ये लोग यात्री हैं। मां पूर्णागिरि के दर्शनार्थी । पूर्णागिरि का मन्दिर ऊंची चोटी पर है। कहते हैं जब भगवान शिव मृत पार्वती को लेकर आकाश मार्ग से चले थे तो उनके अंग जगह-जगह पर गिरते गये। पूर्णागिरि पर मां पार्वती की नाभि गिरी थी, चोटी पर इसी मन्दिर के दर्शन हेतु दूर-दूर से सब आते हैं।

    नेहा भी अपने चाचा के साथ गयी थी। साथ में थे मौसा- मौसी । उन्होंने ही ये कहानी सुनाई थी। नेहा को पहाड़ पर चढ़ना अच्छा लगा। पहाड़ पर रहने वालों को व्यायाम की क्या जरूरत ? तनिक चढ़े कि हो गया व्यायाम | चढ़ाई करने से भूख भी लगती है। पहाड़ की फायदेमंद हवा से शरीर स्वस्थ बनता है । नेहा को भी पहाड़ चढ़ने में मजा आया। मजा इसलिए भी आता है, क्योंकि जो चीजें बहुत पास दिखती हैं वास्तव में होती दूर हैं। रास्ते घुमावदार हैं, बस वहीं घूमते रहो । लगता है, अब पहुंचे- अब पहुंचे।

    नेहा समझदार है, मन से पढ़ती और समझती है । लेकिन 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' मुहावरे का सही अर्थ उसे यहीं समझ आया।

    मां पूर्णागिरि के मन्दिर पर भीड़ थी, मगर ज्यादा नहीं। दर्शन आसानी से हुए। मौसा जी ने कहा 'देखो, वह नीचे शारदा नदी बह रही है।' क्या दृश्य था- पहाड़ों से अठखेलियां करती शारदा नदी ऊपर से बड़ी सुहावनी लग रही थी। ज्यों प्रकृति सफेद मोतियों की चमचमाती माला पहने, निश्चिन्त होकर विश्राम कर रही हो

    नेहा मचली- 'मौसा जी, मैं तो नहाऊंगी इसमें।

    ''हां, नहाना । मगर कम-कम।' चाचा ने समझाया। वापस चले तो यात्रा शानदार हो गयी । कठिनाई चढ़ाई में होती है, उतरने में क्या । बस, भागते चले जाओ । न थकान, न उलझन। फिर भी सावधानी तो हर जगह चाहिए । सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। जीवन की दोस्ती सावधानी से हो। जिसने इसका साथ छोड़ा, नुकसान उठाया।

    एक आदमी था, पैर पकड़े बैठा था। मोच आ गयी थी । इधर उधर देखता लापरवाही से चल रहा था, फिसल गया पैर।

    फिसलन उनके लिए नहीं है, जो सावधान हैं। सावधान रहने से विश्राम मिलता है, असावधानी से कष्ट । चाचा कहने लगे- 'बेटा, चढ़ना-उतरना ही जीवन है। पढ़ाई भी पहाड़ है, पढ़ाई की सीढ़ियां सतर्क होकर चढ़ो तो आगे विश्राम ही विश्राम है, सुख ही सुख है । जो पढ़ाई के पहाड़ से डरते हैं, डर कर चढ़ते नहीं। उन्हें विश्राम नहीं, कष्ट मिलता है। अभी मेहनत से पढ़ाई की सीढ़ियां चढ़ोगे तो आगे चलकर उतार मिलेगा। सुख और आराम का उतार । नहीं तो संघर्षों की चढ़ाई शुरू होती है। लोग उस पर चढ़ते-चढ़ते थक जाते हैं।'

    चाचा की बातें अच्छी थीं, मगर नेहा का मन पहाड़ों में रमा था। उसे झरने में नहाने के सुख की प्रतीक्षा थी, लो आ गए वहीं।

    मौसा- मौसी नहाए, चाचा नहाए । नेहा नहाई, मगर जमकर । छप-छपा-छप। आ! जी करता है, हमेशा यही रहें । टंकी के फव्वारे में नहाने का सुख यहां फीका है ।

    'अब, बस भी करो।' मौसा-मौसी और चाचा सभी ने कहा। मगर नेहा, उसे तो मजा आ गया नहाने में। नहाए जाओ, नहाए जाओ ।

    चाचा ने उसे पकड़ा- 'चलो चेंज करो कपड़े । यह पहाड़ी पानी है। ज्यादा नहाना नुकसान कर सकता है।

    बात तो ठीक थी । 'अति सर्वत्र वर्जयेत।' नेहा ने नहाने की अति कर दी थी ।

    नेहा मानी । तैयार होकर सब चल दिए। वापस मौसा के घर आये। सो गये पड़कर । थकान हो तो नींद अच्छी आती है। अच्छी नींद चाहिए तो थकान जरूरी है। थकान के लिए कुछ न कुछ करते रहना। चाहिए। कुछ करते रहने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि आलस्य करो । यों आलसी को सर्वाधिक थकान आती है मगर मेहनती और आलसी की थकान में अंतर है। मेहनती की थकान उसे उन्नति के पथ पर ले जाती है और आलसी की थकान उसे अवनति के पथ पर, बीमारी के पथ पर । खैर, नेहा की थकान तो मेहनत से थी ।

    मगर नेहा ने मेहनत के साथ-साथ गलती भी की थी । कौन सी गलती अति करने की गलती । नहाने की अति करने से उसे तकलीफ शुरू हुई और जब उसकी आंख खुली तो मुंह से आवाज निकली आंक छीं!

    केवल छींक ही नहीं, कसकर जुकाम और भयंकर सिर दर्द । ज्यादा नहाने का दण्ड उसके सामने था थर्मामीटर से देखने पर पता चला कि उसे बुखार भी है । बुखार एक सौ एक। 

    'चलो, तुम्हें डॉक्टर को दिखाएं।'

    'डॉक्टर !' नेहा की बोलती बन्द । नेहा को डॉक्टरों से बड़ा डर लगता था । बस वही रटे रटाए वाक्य और रटे-रटाये उपदेश । ऊपर से मां-बाप की झिड़कियां सुनो सो अलग। पास में डॉक्टर गिरिजा बहादुर थापा थे, नेहा को  वहां ले जाया गया।

    'हुंअँ! तुम्हें तो जमकर बुखार है। हाथ नब्ज देखकर डॉक्टर थापा बोले- 'रोटी तो नहीं खाई ? ' 'नहीं।'

    उन्होंने आला निकाला 'पीठ इधर करो ।' नेहा पीछे घूम गयी।

    'सांस गहरी लो । '

    'हंअ ! हंअ'

    'और गहरी । '

    'हंअ ! हंअ ! हंअ' 'बेटे, थोड़ा और गहरी '

    हां ! हां ! हां ! हां ! हां ! नेहा जोर-जोर से आवाज निकालने लगी ।'

    वहां बैठे मरीज हंस दिये। नेहा को गुस्सा आया । डॉक्टर थापा ने उसकी आंखें देखीं फिर कहा

    'मुंह दिखाओ, आ करो।'

    'आ आ'

    'यह तुम्हारे मुंह में क्या है ? '

    'टॉफी। "

    'टॉफी ? टॉफी बिल्कुल बन्द । कतई मत खाना।' 'और चॉकलेट ?' सहमकर नेहा ने पूछा ।

    'टॉफी, चॉकलेट, लेमनजूस, लालीपॉप सब बन्द ।'

    अब नेहा ने गहरी सांस ली। तभी डॉक्टर थापा बोले, ' और दो तीन दिन पूरा आराम करना । खेलने भी नहीं जाना।'

    'क.... क्या खेलने भी नहीं ?"

    'हां, और टी. वी. भी न देखना, नहीं तो सिर दर्द बन्द नहीं होगा।'

    डॉक्टर थापा ने नेहा को सुई लगाई वह जोर से चीखी- 'उई' उन्होंने दो दिन की दवा दी । ये छह पुड़ियां थीं। कहा- 'चीनी के साथ इन्हें पीना । एक अभी पियो । '

    बाप रे बाप! कितनी कड़वी दवा । नेहा का मुंह जैसे उत्तर प्रदेश का नक्शा बन गया । चेहरा तमतमा उठा। सोचा- कभी स्कूल में मैडम पूछेंगी बोलो, सबसे गन्दा कौन ?"

    मैं कहूंगी - 'सबसे गन्दे डॉक्टर अंकल । '

    नेहा के मन में आया, अगर उसका वश चले तो सारे के सारे नियम चेन्ज कर दे बजाय सुई के बच्चों को ‘स्ट्रा’ पाइप दे और कहे- लो बेटे, मैंगो जूस पियो बजाय दवा की पुड़ियां या गोलियों के उन्हें टाफियां दें, लालीपॉप दे और कहे बच्चों, चार टाफियां सुबह खाओ, चार दोपहर में और चार शाम को सुबह शाम लालीपॉप चूसो और सारा दिन खेलो । जमकर खेलो, तभी तबियत ठीक होगी। अगर वह मंत्री बन जाये तो सबसे पहले सारे डॉक्टरों की दुकानें बन्द करा दे |

    'चलो बेटी ।' अचानक चाचा ने उसे हिलाया वह खड़ी हुई, चलने को हुई तभी किसी की कराह सुनाई दी।

    यह एक आदमी था, पैर में तगड़ी चोट थी शीशा चुभ गया था । डॉक्टर थापा ने देर न की । झट से घाव साफ किया । शीशा निकाला। मरहम पट्टी की । उसकी जान में जान आयी ।

    नेहा स्तब्ध ये सब देख रही थी। तभी एक बुढ़िया आयी, उसने डॉक्टर के पैर पकड़ लिये दुआएं देने लगी- 'आप भगवान हैं मेरे । आपने मेरे पति को बचा लिया । अब वह खतरे से बाहर हैं । आपने मुझ गरीब पर बड़ी कृपा की। मुफ्त इलाज किया। मैं कैसे आपको धन्यवाद कहूं?' 

    'चलो, चलो बेटी ।' एक बार फिर चाचा ने नेहा की तन्द्रा भंग की ।

    नेहा ने चाचा की अंगुली पकड़ी, बड़े विनम्र आदर भाव से डॉक्टर अंकल को देखा और बोली 'अच्छे डॉक्टर अंकल, नमस्ते ।'

    ‘नमस्ते! नमस्ते' डॉक्टर थापा मुस्करा दिये।

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'



(यह कहानी 25 अक्टूबर,1998 को दैनिक जागरण {साप्ताहिक परिशिष्ट}, कानपुर में प्रकाशित हुई थी. यह लेखक की पुस्तक 'यस सर ! नो सर!'में संकलित है.)


सोमवार, 17 मई 2021

बाल कहानी : भय का भूत- डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

भय का भूत
बाल कहानी : डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

सुंदरवन के पूरब में था एक छोटा सा घर। घर में रहता था टोनू खरगोश  और उसका छोटा सा परिवार। परिवार में पता है कौन-कौन था? टोनू की पत्नी और उसके दो बच्चे। बच्चों के नाम थे टिंकू और रिमझिम। टिंकू बड़ा और रिमझिम छोटी थी।  

रिमझिम छोटी जरूर थी मगर थी दिलेर। सब उसके साहसी स्वभाव की तारीफ करते। हां, टिंकू था नंबर एक का अंधविश्वासी और डरपोक। कहीं जरा सी आवाज भी क्या होती कि जा दुबकता मम्मी के पास। डर उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ था।  

तो एक बार की बात है। मम्मी-पापा किसी काम से बाहर गए हुए थे। घर पर टिंकू और रिमझिम अकेले थे। शाम हो रही थी और मम्मी-पापा अभी तक वापस नहीं लौटे थे। यों वे कहकर गए थे कि षाम होने से पहले ही लौट आएंगे। धीरे-धीरे रात घिर आई। घुप्प अंधेरा छा गया। सुंदरवन  में आज बिजली भी नहीं आई थी। टिंकू को डर लगने लगा। वह कांपते हुए रिमझिम से बोला-

अंधकार छाया जमकर,

और अकेले हम घर पर।

कहीं आ गया भूत अगर,

हाय! लग रहा मुझको डर।

रिमझिम ने टिंकू की हिम्मत बंधाई-

डरो न भैया! डरो न भैया!

डरने की कुछ बात नहीं।

भूत-वूत कुछ भी न होता,

यूं घबड़ाओ आप नहीं।

मैं तो कितनी छोटी पर,

मुझे न लगता बिल्कुल डर।

रिमझिम की बात पर टिंकू थोड़ा गुस्से से बोला-

तू पगली है क्या जानें,

भूत-वूत को क्या मानें।

भूत अकेले में आते,

मार डालते-ले जाते।

हाय! कहीं जो आया भूत?

क्या होगी उसकी करतूत!

टिंकू की बात पर रिमझिम मन ही मन हंसी। उसने दोबारा समझाया-

बीता जो कहलाता भूत,

बीता क्या फिर आता है?

वर्तमान की बात करो जब

वर्तमान से नाता है।

बढ़िया-बढ़िया बातें कर,

सो जाएं हम खा-पीकर।

हो सकता है कुछ पल में 

मम्मी-पापा आ जाएं,

लेकिन क्या यह अच्छा है?

बेमतलब हम घबड़ाएं?

तुम बैठो, मैं जाती हूं,

अभी किचन से आती हूं। 

लेकर के बढ़िया खाना,

खाना खाना सो जाना। 

रिमझिम किचन में चली जाती है। उसके समझाने का टिंकू पर कोई असर नहीं पड़ता। वह भगवान की मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर कहता है-

क्या होगा अब हे भगवान?

है मुश्किल  में अपनी जान। 

रक्षा करना भूतों से,

भूतों की करतूतों से। 

घर में चोरी करने के इरादे से बाहर खड़ा कड़कू सुअर सारी बातें सुन रहा होता है। इधर रिमझिम किचन से खाना लेकर आती है और कड़कू सुअर कालबेल बजाकर गुर्राता है-

हो हो हो मैं आया भूत,

बड़े-बड़े भूतों का दूत।

आया हूं यमलोक से,

अभी मारता तुम दोनों को,

मैं भाले की नोक से।

खोल गेट, अंदर आऊँ,

तुम दोनों को खा जाऊँ। 

बस, फिर क्या था। बेचारा टिंकू, उसकी तो कंपकपी ही छूट जाती है। जिसका डर था, वही हो गया। 

उसने रोते हुए प्रार्थना की-

हाय भूत जी जाओ तुम,

गेट नहीं खुलवाओ तुम। 

हाय न तुम अंदर आओ,

अरे! तरस कुछ तो खाओ।

भूत बना सुअर डरावनी हंसी हंसते हुए कहता है-

तरस नहीं मैं खाता हूं,

मैं तो मांस चबाता हूं।

पीता खून, फोड़ता पेट,

खोलो-खोलो जल्दी गेट। 

टिंकू की घिघ्घी बंध जाती है। रिमझिम धीरे से उसके कान में कहती है- भैया! मत डर। जरूर दाल में कुछ काला है। मैं कुछ करती हूं। 

रिमझिम ने दरवाजे के पास जाकर कांपते हुए बोली-

हाय! भूत जी, मानो तुम,

हमको बच्चा जानो तुम। 

हमें छोड़ जो भी चाहो,

उसको फौरन ले जाओ। 

भूत बना कड़कू चोर चहक कर तुरंत बोल उठा-

तुम दोनों ही बच्चे हो, 

दोनों बच्चे अच्छे हो। 

अच्छा, तुम्हें न खाऊँगा,

पर रुपया ले जाऊँगा,

सूटकेस रुपयोंवाला,

मुझको झट दे जाओ तुम,

अपनी जान बचाओ तुम।

टिंकू ने जब भूत की दया भरी बातें सुनीं तो खुश  हो गया। जल्दी से सूटकेस उठाने चला। रिमझिम ने उसे रोका-

रुक भैया! कुछ गड़बड़ है,

ये सब तेरी हड़बड़ है।

मुझे हो रहा है आभास,

  है कोई यह ठग-बदमाश ।

जाती हूं छत के ऊपर,

इसको मारूंगी पत्थर।

रिमझिम के चलते ही टिंकू जोर-जोर से रोने लगता है-

रुक जा रिमझिम,

रुक, मत जा, 

भूत क्रोध में आएगा,

अभी हमें खा जाएगा।

तू मेरी प्यारी बहना,

हाय! मान भी ले कहना।

भूत बना कड़कू सुअर समझता है कि टिंकू रिमझिम को सूटकेस लाने से रोक रहा है। उसे और गुस्सा आ जाता है। वह दांत पीसता है-

मूर्ख इसे तू आने दे,

सूटकेस दे जाने दे।

सूटकेस यदि पाऊँगा,

तो तुमका ना खाऊँगा।

रिमझिम टिंकू को लेकर जल्दी से छत के ऊपर पहुंचती है। उसे चुप रहने को कहकर एक पत्थर का टुकड़ा उसकी ओर फेंकती है। पत्थर कड़कू सुअर के सिर पर लगता है। वह दर्द से तड़प उठता है-

हाय! मर गया, हाय मरा,

फूट गया सर हाय मरा।

अरे! बचाओ, जल्दी आओ,

अस्पताल मुझको ले जाओ।

उसी वक्त गश्त  लगाते इंस्पेक्टर हाथी दादा अपने सिपाहियों के साथ वहां आ पहुंचते हैं। कड़कू चोर को देखते ही वे समझ जाते हैं कि ये यहां क्यों आया होगा। तुरंत उसे पकड़ लेते हैं।

 सारी बात जानकर वे बहुत खुश होते हैं। रिमझिम को शाबासी देते हैं। टिंकू को समझाते हैं-बेटे! कभी भी अंधविश्वास मत करो। भूत होते ही नहीं। डर का नाम ही भूत है। डर भगाओ, भूत भाग जाएगा। 

बात टिंकू के समझ में आ जाती है। वह कहता है-

दादा बात आपकी ठीक,

जो बच्चे होते निर्भीक।

वे कुछ कर दिखलाते हैं,

वे ही नाम कमाते हैं। 

कहता हूं मैं सीना ठोक,

नहीं रहूंगा अब डरपोेक।

तब तक मम्मी पापा आ जाते हैं। सारी बात सुन वे फूले नहीं समाते। वे हाथी दादा को भी धन्यवाद देते हैं। हाथी दादा कड़कू सुअर को लेकर चले जाते हैं। 

सभी घर में घुसते हैं। 

अचानक खट की आवाज होती है। टिंकू चौंककर पूछता है- कौन?

मैं हूँ भूत का दूत -रिमझिम डरावनी आवाज में बोलती है। 

धत, यह तो रिमझिम की आवाज है अब नहीं डरने वाला मैं....

सब हंस पड़ते हैं। 


चम्पू शैली की यह  बाल कहानी अमर उजाला रविवासरीय परिशिष्ट में 13.10.96 को प्रकाशित हुई थी. यह लेखक की बाल कहानियों की पुस्तक 'भाग गये चूहे ' (1997) में भी संकलित है.

शुक्रवार, 14 मई 2021

बाल कहानी 'ईद मुबारक'-डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'


कहानी : डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

    अखिल और अकील, दोनों गहरे दोस्त थे। यह बेमिसाल दोस्ती दादा-परदादा के जमाने से चली आ रही थी। उनके पापा और अब्बू की दोस्ती, उनके दादा और बाबा की दोस्ती की भी लोग मिसाल देते थे। केवल दो परिवारों में ही नहीं, दो घरों में भी गजब की दोस्ती थी। दोनों घरों की पीठ आपस में जुड़ी थी। अकील का घर पश्चिम मुख को था और अखिल का घर पूरब मुख को। दोनों की छतें एक थीं और आज भी बीच में कोई बाउंड्री नहीं थी। मतलब एक दूसरे के घर से कोई भी चाहता तो पूरब से पश्चिम या पश्चिम से पूरब आ-जा सकता था। बस, छत पर जाकर आवाज लगानी होती थी-चाची या चाचा, दरवाजा खोलो। फिर क्या था, जीने से नीचे उतरकर चाहे अकील के घर जाओ या फिर अखिल के। इस घर से उस घर और उस घर से इस घर चहल कदमी चलती ही रहती थी।
    अखिल और अकील की उम्र में ज्यादा अंतर नहीं था। हां, वैसे अखिल बड़ा था और अकील छोटा। जब अकील का जन्म हुआ तो उसके दादू हंसते चहकते हुए मिठाई लेकर आए थे। छत से जोर से आवाज लगाई थी-अरे सुनो मियां, एक और अखिल आ गया। और अखिल के पापा तेजी से छत पर भागे थे। पीछे-पीछे सारा घर। अखिल की बूढ़ी दादी भी उस दिन जीना चढ़कर छत पर जा पहुंची थी। सब चकित रह गए थे। अकील के अब्बा जान ने मलाई का लड्डू अखिल के पापा के मुंह में ठूंस दिया था। मम्मी ने मोबाइल से दोनों का फोटो खींच लिया था। वह फोटो आज भी दोनों के घर में लगा है।
     दादी ने बूंदी के लड्डू मंगाकर पूरे मोहल्ले में बांटे थे। सबसे कहती थीं, मेरा एक और पोता आ गया। छोटा अखिल। अखिल के दादू को उर्दू का भी ज्ञान था। उन्होंने पूछा था-क्यों बरखुरदार। इसका नाम क्या रखोगे?
‘नामकरण करना तो तुम्हारा काम है पंडित जी। बताओ क्या नाम रखा जाए?’
‘अकील। अकील नाम रखेंगे इसका।’ अखिल के दादा ने चहक कर कहा था। फिर थोड़ा रुककर बोले थे-‘पता है न? अकील का मतलब होता है ज्ञानी।’
     मजा तो तब आया, जब दोनों बड़े हुए। कोई आवाज लगाता- अखिल ओ अखिल?’ और अकील  जवाब देता-आया जी।
     ऐसा भी होता जब अखिल और अकील दोनों ही एक साथ जवाब दे उठते। यह तो गनीमत थी कि दोनों के घर अलग दिशा में थे। नही तो दोनों ही अपने-अपने दरवाजों पर दौड़ पड़ते।
     इन दिनों कोरोना के चलते लॉकडाउन था। ज्यादातर लोग घर से बाहर नहीं निकलते थे। बच्चे तो बिल्कुल ही नहीं। खासकर अखिल और अकील को तो घर से बाहर जाने की कतई मनाही थी। वे किताबें पढ़ते। आनलाइन लूडो, कैरम या अन्य कोई गेम खेलते। आपस में वीडियो काल करते।  
    चार दिन बाद ईद थी। दोनों की बातें चल रही थी।
    अकील कह रहा था-‘मार्च में इतनी जिल्लत नहीं थी। इसलिए होली तो जैसे तैसे मन ही गई। मगर ईद कैसे मनेगी? इस बार तो ईद पर मेला भी शायद ही लगे। अगर लगेगा भी तो ऐसी भीड़ भाड़ में जाना ठीक न होगा।
 अखिल ने हामी भरी और दो साल पुरानी यादों में खो गया। जब वह भी अकील के साथ ईद के मेले गया था। दोनों ने साथ में झूला झूला था। खाजा खाया था। अखिल ने भी अकील के जैसा चिकन का कुर्ता पाजामा पहना था जो उस पर कितना फब रहा था। शाम को अकील की अम्मी कितनी लजीज सिवइयां घर पर दे गईं थीं।
    अकील गुस्साया-‘मैं तुमसे बात कर रहा हूं और तुम न जाने कहां खोए हो? क्या काल काट दूं?’
‘न...नहीं यार। मैं सोच रहा था कि तो क्या इस बार तुम सिवइयां भी नहीं खिलाओगे?’
‘अरे क्यों नहीं ? ऐसा नहीं होगा।’
     दोनों के ही पापा टीचर थे। चुनाव की ड्यूटी के बाद स्कूल में छुट्टी हो गई थी। इसलिए अब वे भी घर में ही रहते थे। बस सुबह-शाम को ही सबका छत पर टहलना होता था। सब मास्क लगाए रहते और दो गज दूरी का पालन भी करते हुए एक दूसरे की खैर मनाते। एक दूसरे के लिए दुआएं करते। यह समझाते भी कि इस समय किसी भी हालत में मन को कमजोर नहीं होने देना है। मन मजबूत रहेगा तो बीमारी से लड़ना भी आसान हो जाएगा।
 चारों तरफ हाहाकार था। शायद ही कोई हो जिसका कोरोना के कारण मन परेशान न हो। अखिल के पापा घर में सभी से योग और प्राणायाम कराते रहते। अकील के घर में सब पंचवक्त नमाजी थे। पापा उनसे कहते भी, देखो भाई आपका तो योग नमाज के बहाने ही हो जाता है।
     अकील की दादी को बहुत सी देशी दवाओं के नुस्खे जैसे रटे हुए थे। वे आनन-फानन में इलाज बता देती थीं और लोगों के रोग उड़न छू हो जाते थे।
    पर न जाने क्या हुआ, दादी अम्मा बीमार पड़ गई। उन्हें जुकाम बुखार आया। बहुत कमजोरी आ गई। उमर का भी असर था। डाक्टर साहब को बड़ी मुश्किल से दिखा पाए। अस्पताल में बहुत भीड़ थी।
    दादी का टेस्ट कराए आज 4 दिन हो चुके थे, मगर रिपोर्ट अभी तक नहीं आई थी। आज ईद भी थी। वैसे भी ईद को लेकर इस बार कोई खास तैयारी न थी। पर अब मन ज्यादा उचाट हो गया था।
    वैसे दादी को आराम तो हो रहा था। कभी अकील तो कभी अखिल के पापा उनकी दवा लेने जाते थे। पूरा घर उनकी तीमारदारी में लगा था। दादी अम्मा झल्लाती भी-मेरे कारण सभी परेशान हैं।
      अखिल और अकील वीडियो काल कर रहे थे। अचानक अखिल को अपने पापा अकील के घर पर दिखे। उनके हाथ में कोई लिफाफा था। वे खुश होकर बता रहे थे- फिकर नहीं करना। डाक्टर के यहां से आ रहा हूं। अम्मा की रिपोर्ट तो बिल्कुल ठीक है। एक-दो दिन में पूरी तरह चंगी हो जाएंगी।’अकील ने मोबाइल कैमरा दादी अम्मा की ओर कर दिया। वे कह रही थीं, मैं तो कब से कह रही थी। मेरी फिकर मत करो। ठीक हो जाऊंगी। यही सब हैं कि पूरा घर सर पर उठा रखा है। सब मायूसी में बैठे रहते हैं। आज ईद है। सिवइयां तक नहीं बनाईं।                              
   इधर अखिल के फोन पर सारी बातें उसकी मम्मी सुन रही थीं। वे खुश होकर बोलीं-ईद मुबारक हो अम्माजी। सिवइयों की चिंता न करें, अम्मा जी। मैंने बना ली हैं। बस,..अभी लाती हूं गरम-गरम। दादी ने आंखों पर चढ़ा चश्मा दो-तीन बार हिलाया। हंसते हुए बोलीं-‘हां, जल्दी से ले आ बहू।...लेकिन ध्यान रहे....दो गज दूरी....
    '...बहुत जरूरी।' आगे का वाक्य सभी ने मिलकर पूरा किया।
    ...और फिर दोनों ही घरों से ईद मुबारक-ईद मुबारक का शोर गूंज उठा।  

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

बाल कहानी/किशोर कहानी : 'नेहा की दीदी'-डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

नेहा की दीदी
बाल कहानी : डॉ० नागेश पांडेय ‘संजय’
    दीदी, जो नेहा को कभी अच्छी नहीं लगीं, बहुत प्यारी लगने लगीं है। वह कनखियों से उन्हें देखती है, उन्हें देखते-देखते गुमसुम सी हो जाती है। अकेले में उनके बारे में सोचती है-सोचती है-सोचती है... सोचती जाती है...और ...और छल्ल से आँसू टपक पड़ते हैं। आँसुओं की धार फूट पड़ती है।
    दीदी चली जाएँगी।
    इक्कीस को दीदी की शादी है। आज पाँच है, सोलह दिन शेष। कल
पंद्रह दिन शेष रहेंगे। फिर चौदह, तेरह, बारह और फिर...और फिर...!
    नेहा पिछले दो महीने से एक-एक करके दिन गिन रही है।
    दीदी चली जाएंँगी।
    दीदी नेहा से कोई बारह साल बड़ी हैं। नेहा सात में पढ़ती है। उम्र यही होगी बारह या तेरह। उसकी रुचि पढ़ने में है और दोस्ती में। दोस्ती ऐसी सहेलियों से जो फुल इंज्वाय करें। बैठें, गप्पें लड़ाएँ। कुछ इधर की, कुछ उधर की। कुछ खट्टी, कुछ मीठी। अरे, अभी उम्र ही क्या है जो जिंदगी भर के जंजाल के बारे में सोचा जाए। रोटी कैसे बने? हलवा कैसे बने? कढ़ाई कैसे हो-तुरपाई कैसे हो? पापड़ चिप्स, ढोकला, डोसा कैसे बनेगा?... अरे,
क्या करना है जी। नेहा को तो चाय बनाना भी नहीं आता। माँ ने एक बार हँस कर कहा था, ‘‘सास बहुत मारेगी। चाय बनाना भी नहीं आता।’’
    और नेहा ने लपकते अंदाज में जबाव दिया था, ‘‘टी इज इंज्यूरियस टू
हेल्थ। अरे, दूध पिलाऊँगी सासू को। दूध...दूध...दूध.... हड्डी मजबूत।’’
    बातों को बनाना, छौंकना और पकाना नेहा को आता है। बस।
    दीदी से इसीलिए उसका छत्तीस का आँकड़ा था। जब देखो, काम
में जुटी रहती हैं। जुटे भी क्यों न ? सब कुछ तो आता है जी।
    नहीं आता तो सीखने के लिए तुरंत तत्पर। राइटिंग-वाह! जैसे मोती
जड़े हों। किसी को चिट्ठी-विट्ठी या कुछ भी लिखाना हो तो दौड़ा चला आता है- ‘‘दीदी, तुम्हारी राइटिंग बहुत अच्छी है, लिख दो न।’’
    पाक कला-वाह! फाइव स्टार होटल के कुक की भी परनानी हैं। सब कुछ अजीज और लजीज तैयार करती हैं, वह भी फटाफट। तो जूझो हरदम। घर में सब उन्हीं से बनवाते हैं। अरे, बिटिया से बनवाओ, उसका तो जबाव नहीं। कभी-कभी पड़ोस से भी फरमाइशें आती हैं-बिटिया को भेज दो। ढोकले बनवाने हैं या ऐसा ही कुछ  और।
    कढ़ाई-बुनाई- वाह! वाह! वाह! तभी तो आँखों पर चश्मा चढ़ा है। कभी मौसा का स्वेटर, कभी चाचा का। कभी बगल से कोई आता है-अच्छा, फंदे तुम डाल दो, बुन हम लेंगे। कोई कहेगा फ्रंट वाला पल्ला तुम बुन दो न! वो कोने में जो चार लिहाफ रखे हुए हैं, हाँ... हाँ इन्हीं के स्वागत में। शादी में भी फुरसत नहीं।
    नेहा तो कहा करती थी-शादी में हलवाई को आर्डर मत देना, इन्हीं से कहना। बाराती उँगली चाटेंगे। कहो, उँगली चाटते-चाटते खा ही न जाएँ।
    ...और दीदी मारने दौड़ती-ठहर, ठहर जरा।
    किससे करेगी ये सब अठखेलियाँ ?
    दीदी चली जाएँगी।
    
    दीदी, वास्तव में नेहा को कभी अच्छी नहीं लगी। सब उसे दीदी से तौलते हैं। अरे! इसे भी कुछ सिखाओ। बिटिया, तू भी तो कुछ सीख।
    जब सीखने का वक्त आएगा, तब सीखेंगे न। क्या जल्दी है ? और फिर
नहीं भी सीखेंगे, तो क्या ! जमाना फास्ट है। रेडीमेड जमाना। हमीं सब कुछ सीख लेंगे तो बेचारे मार्केटवाले क्या करेंगे ?
    जब तक डोसा, समोसा बनाने की सोंचे और करें तब तक मार्केट से
दस बार आ सकता है।
    दीदी मशीन चलाती हैं, कपड़े सिलती हैं। बाजार वाली चकाचौंध उनमें कभी नहीं आ पाती। मँहगे भी तो पड़ते हैं।
    अरे, क्या करना है। दो मिनट का काम है जी। दुकान पर उलटा-पलटा    और हो गया सलेक्शन, वह भी मनमाफिक। अब दीदी लाख चिल्लाती
रहें, जींस-टीशर्ट कभी सलवार कुर्ता की जगह नहीं ले सकता। न ले।
जमाना फास्ट है। लड़कों की बराबरी करनी है।
    याद आया। इसी बात पर उस दिन नेहा और दीदी में अनबन हो गई
थी।
दीदी : बराबरी क्या लड़कों की नकल करने से होगी। उनके बाल कटे हैं, हम भी कटा लें। वे शर्ट-पैंट पहनते हैं तो हम भी पहनें। अरे, वे क्यां नकल नहीं करते हमारी ? बढ़ाएँ बाल, पहने सलवार-सूट।
    ‘‘हाँ, हाँ पहनेंगे। पहनेंगे। बाल तो बढ़ा ही लिए हैं।’’
    नेहा जोर से हँसी थी।
    जबाव नहीं था दीदी के पास।
    नेहा जबाव नहीं देती। मगर जब देती है तो यह सच है, दीदी के पास जबाव नहीं होता।
    अरे, फिजूल की बातें करती रहती है।
    ‘‘धीमे बोला करो। आवाज बाहर न जाए।’’
    - क्यों न जाए, जी! और फिर वह कोई मोबाइल फोन तो नहीं है जो वाल्यूम लेवल कम कर ले।
    ‘‘तुम बड़ी हो गई हो। लॉन में रस्सी लेकर न कूदा करो।’’
    - तो, ... तो क्या घर में कूदें, कमरे में।... ... इसके लिए केबिन बनवाएँ क्या।
    पता नहीं, दीदी की बुद्धि कैसी है जी। कहने को पी-एच. डी. हैं। कालेज में पढ़ाती हैं। ये तो आज की लड़कियों को बेकार कर देंगी।

    नेहा, इसीलिए जब उन्हें आता देखती है तो मुस्कान छूटती है -आ गईं डॉक्टर साहिबा! फिजीशियन एंड सर्जन। शरीर कैसा रखो, यह बताएँगी। कुछ कहो, तो बातों का आपरेशन करेंगी।
    इधर दीदी चुपचाप काम में लगी हैं। दादी का, मम्मी का सहयोग कर
रही हैं। अब वह नेहा से कुछ नहीं कहतीं। उसे डाँटती भी नहीं, न कोई सुझाव देती हैं।
    नेहा को लग रहा है, कुछ है जो छूट रहा है।
    ... ... दीदी, चली जाएँगी।
    वह दीदी से बात करना चाहती है, कहे क्या ?
    दो दिन शेष हैं।
    ... ... अब एक दिन।
    ... ... आज शादी है ... कल ... दीदी चली जाएँगी।
    कल यानि चौबीस घंटे शेष। तेईस, बाइस... .... अट्ठारह, अब सत्तरह, ... ... तेरह... ... बारह, सिर्फ बारह घंटे।
    शाम का समय है, जयमाल का कार्यक्रम। सच! जोड़ी कितनी फब रही है।
लकी हैं दीदी। जीजाजी भी कितने सहज। पूरा परिवार सहज। कुछ नहीं माँगा। कहा-बहू तो खुद खजाना है।
    सब कितने खुश हैं... ...
    चहल-पहल, नाच-गाना, खावा-पीवी।
    नेहा को कुछ अच्छा नहीं लग रहा! ... ... दीदी ... ...
    नेहा को लग रहा है, सुबह के आठ जैसे बजने ही वाले हैं। दीदी चल देंगी। सब रोएँगे... ...जोर-जोर से। और वह... ... वह तो ...। वह जब गले लगेगी तो शायद दीदी यही कहें - ‘‘लो, नेहा। अब तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा।’’
    धाँय-ताड़, धाँय-ताड़।
    आतिशबाजी शुरू हो गई। ... पर ... आतिशबाजी ? वह तो पापा ने मना
किया था ... ... ! फिर... ...?
    ‘‘खबरदार जो कोई हिला। अभी मौत की माला गले में डाल दूँगा।’’
    सात-आठ नकाबपोश दिखे , सब के सब हथियार लैस।
    पंडाल शांत।

    सब के सब किंकर्त्व्यविमूढ़। जैसे ढेरों मूर्तियाँ किसी संग्रहालय में स्थापित हों।
    ‘‘क्यों बरखुरदार! शादी में एक पैसा नहीं ले रहे? दहेज रहित विवाह !दुनिया की आँखों में धूल झोंक सकते हो, हमारी आँखों में नहीं।’’
    ...और वह लंबा-चौड़ा छह फुटी बदमाश लड़के के पिता को छोड़ नेहा के पिता की ओर हो लिया -‘‘कितना दे रहे हो बैक डोर से ? अरे, इन्हें नहीं चाहिए तो मुझे दे दो ... ...। देर नहीं ... ...,हाँ, जल्दी ...।’’
    ‘‘प... ... प ... ...। ’’ पापा के मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे।
    पंडाल में सैकड़ों लोग। पर सब तमाशबीन। सर्द मौसम में सब पसीने-पसीने। अचानक दीदी उठती हैं - ‘‘पापा, क्या चाहते हैं आप? मेरी जिंदगी में जहर घोल देंगे क्या ?’’ और वे आगे बढ़ती हैं -
    ‘‘प्लीज पापा, वह ब्रीफकेस इन्हें दे दीजिए।’’ 
वह बिल्कुल पास आती हैं- ‘‘आइए, आइए भाई साहब।’’ और अचानक एक गाय जैसे शेरनी का रूप धारण कर लेती है। रिवाल्वर अब दीदी के हाथ में है। वह आदमी नीचे।
     -‘‘सारी की सारी गोलियाँ भेजे में उतार दूँगी। बोल ... ...।’’
    कोई कुछ बोलता नहीं। सभी साथी बंदूकें फेंक देते हैं। भीड़ ने उन्हें दबोच लिया है।
    कोई एक घंटे में : सब पुलिस कस्टडी में।
    जयमाल का कार्यक्रम फिर से शुरू।
    नेहा को लग रहा है। कोई माडर्न नहीं बन पाया। माडर्न तो दीदी हैं।
    दीदी तो लाजबाव हैं।
    सुबह के आठ।
    नेहा को जरा भी शिकन नहीं। दीदी चली जाएँगी।
    आज घर में सारे अखबार आए हैं, सब में दीदी का बड़ा-सा फोटो छपा है - बड़ा-सा समाचार।
    नेहा तैयारी में जुटी है।
    दीदी को विदा जो करना है।

    नेहा दीदी से पूछती है - ‘‘दीदी, मैं भी तुम्हारे साथ चलूँ ? तुमसे तो बहुत कुछ सीखना है।’’
    दीदी हँसकर कहती हैं - ‘‘अपने जीजाजी से पूछ। वे ‘दहेज’ के सख्त खिलाफ हैं।’’
    नेहा लजाकर रह जाती है। आज उसके पास कोई जबाव नहीं है।
डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
(यह कहानी साहित्य भंडार, इलाहाबाद से प्रकाशित  लेखक की पुस्तक 'यस सर ! नो सर! में संकलित है.)



गुरुवार, 14 जनवरी 2016

बाल कहानी/नाट्य रूपक : चूहे के पेट में चूहे कूदे - डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’

 चूहे के पेट में चूहे कूदे
- डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’



(चम्पू शैली की इस कहानी को नाटक के रूप में भी खेला जा सकता है  नाट्य रूपक में केवल 4 पात्र रहेंगे । नेपथ्य में उदघोषक कथा को प्रस्तुत करेंगे और पात्र उनके कथनानुसार अनुकरण/ अभिनय करेंगे। संवाद बच्चे भी बोल सकते हैं अथवा वाचक ही संवादों को भी बोलते रहेंगे और बच्चे उसके अनुरूप अभिनय करते रहेगे।)

स्थान - बरगद का पेड़। उसके नीचे एक घर। (यह दृश्य परदे के माध्यम से भी सम्भव है। पेड़ कोई और भी हो सकता है। जैसी सुविधा रहे। मंच की सज्जा अपनी सुविधानुसार की जा सकती है ।)
पात्र -  1.चुनुआ- नन्हा चूहा 2.चुहिया- चुनुआ की मम्मी 3.बिल्ला- धूर्त 4.कुत्ते दादा-पडोसी(पात्रों की वेशभूषा के लिए मुखौटों का प्रयोग किया जाएगा)  
समय- दोपहर 

बरगद के पेड़ के नीचे एक बिल था। उसमें एक चुहिया रहती थी। उसका नन्हा-सा एक बच्चा था। बच्चे का नाम था चुनुआ। चुनुआ था बड़ा जिद्दी और जल्दबाज।

हाँ, तो एक बार की बात है। चुहिया खाना बना रही थी। चुनुआ को जोरों की
भूख लगी थी। वह जल्दबाज तो था ही, मचाने लगा उधम-लगा रोने और चिल्लाने -

चुनुआ- अम्मां मुझको भूख लगी है, जल्दी दो कुछ खाने को।

कल तुम जो पपड़ी लाईं थीं, लाओ मुझे चबाने को।।

चुहिया ने उसे समझाया। कहा - बेटे, पपड़ी तो कल ही खत्म हो गई थी। अभी
खाना बना जाता है, मजे से खाना।

चुनुआ ठहरा जिद्दी। वह नहीं माना। रोने लगा कसकर ।

चुनुआ- देर मत करो जल्दी लाओ, पेट हमारा देखो तो।

इसमें चूहे कूद रहें हैं, जल्दी कुछ खाने को दो।।

चुनुआ रो रहा था, तभी वहां से एक बिल्ला गुजरा। 

जब उसने सुना कि चुनुआ के पेट में चूहे कूद रहे हैं तो फूला नहीं समाया। उसने सोचा, ‘अरे वाह! चूहे के पेट में चूहे। आज तो एक ही चूहा खाने से मेरा पेट भर जाएगा। बिल्ला मक्कार तो होता ही है। वह आवाज बदल कर गाने लगा -


बिल्ला- बिन पैसे मैं लड्डू बांटू, जिसको खाना हो आए।
जितने खा पाए खा जाए, चाहे तो घर ले जाए।।
रुन्नुक झुन्ना रुन्नुक झुन, झुन्नुक झुन्ना झुन्नुक झुन।।

लड्डू का नाम सुनकर चुनुआ उछलने लगा। वह चुहिया से बोला -

चुनुआ- अम्मां लड्डू वाला आया, मैं तो बाहर जाऊंगा।

हप-हप लड्डू, गप-गप लड्डू, आज पेट भर खाऊंगा।।

ताक लग गई झम्मक झम, लड्डू खाऊं छम्मक छम।।

चुहिया ने उसे रोका, ‘‘नहीं चुनुआ, बाहर मत जाना। यह जरूर कोई चालबाज ठग
है।’’ लेकिन चुनुआ भला क्यों मानता। वह तेजी से भागते हुए बोला -

चुनुआ- अब न सुनूं बात मैं कोई,
 लड्डू मुझको खाने दो।

भूख लगी है मुझको भारी,
 मुझको भूख मिटाने दो।।

चुनुआ बाहर गया। लेकिन वहां तो कोई नहीं था। चुनुआ आगे बढ़ा, और आगे बढ़ा ... ... और बढ़ा ... फिर लार टपकाते हुए बोला -

चुनुआ- आहा लड्डू, वाहा लड्डू , 
लड्डू वाले आओ न।

मैं लड्डू खाने आया हूँ, 
लड्डू मुझे खिलाओ न।।

बिल्ला झाड़ी में छिपा बैठा था। आवाज बदल कर वह बोला -

बिल्ला- आंख बंद कर लो पहले तुम, 
लड्डू तभी खिलाऊंगा।

पांच किलो लड्डू हैं ये सब, 
अभी तुम्हें दे जाऊंगा।।

चुनुआ ने तुरंत आंखें बंद कर लीं। 
मारे खुशी के वह ठुमकने लगा -

चुनुआ- चप्पर-चप्पर, चपर-चपर, 
लड्डू खाऊं हपर-हपर।

आंख बंद कर लीं हैं मैंने, 
जल्दी कर अब जल्दी कर।।

इधर चुनुआ ने आंखें बंद की और उधर बिल्ला ने लपक कर उसे धर पकड़ा। 
अपने पंजे उसके शरीर मे गड़ाते हुए वह हँसा -
बिल्ला- न्यारा चूहा हाथ लगा, प्यारा चूहा हाथ लगा,

पेट में इसके चूहे हैं, खूब बेचारा हाथ लगा,

अब मैं इसको खाऊंगा, बड़ा मजा पाऊंगा।

मारे दर्द के चुनुआ तड़पने लगा। रोते हुए वह चिल्लाया-

चुनुआ- मुझे न खाओ, मुझे न खाओ, हाए मैं मर जाऊंगा,

मुझको छोड़ो, मुझको छोड़ो, मैं न लड्डू खाऊंगा।

छोड़ो छोड़ जल्दी छोड़ो, मुझे बचाओ कोई दौड़ो।।

तब तक चुनुआ को खोजते-खोजते चुहिया वहां आ गई। चुनुआ की हालत देख वह बिलख उठी। सौभाग्य से वहीं पर कुत्ते दादा का घर था। 
चुहिया ने जोर से चिल्लाते हुए उन्हें पुकारा -

चुहिया- कुत्ते दादा, कुत्ते दादा, जल्दी दौड़ो जल्दी आओ,

चुनुआ को बिल्ला ने पकड़ा, आओ जल्दी इसे छुड़ाओ।

चीख सुनकर कुत्ते दादा तुरंत आए। 

बिल्ले को देखकर वह भौंके-

कुत्ते दादा- भौं-भौं बिल्ले ओ रे बिल्ले, 
चुनुआ को तू छोड़ फटाफट,

मार तुझे डालूंगा वर्ना, 
पी जाऊंगा खून गटागट।।

बिल्ला डर गया। उसने चुनुआ को छोड़ा और दुम दबाकर भागा। 
चुनुआ की जान में जान आई। चुहिया ने कुत्ते दादा का आभार व्यक्त किया।
 चुनुआ अपनी करनी पर बहुत दुखी था। वह रोते हुए बोला -

चुनुआ- अम्मां मैंने मनमानी की, कितनी गंदी शैतानी की।

शैतानी का फल पाया, देखो खून निकल आया।।

अम्मां माफ मुझे कर दो, दादा माफ मुझे कर दो,

कर दो माफ मुझे दादा, लो करता हूँ मैं वादा -

बात बड़ों की मानूंगा, कभी नहीं जिद ठानूंगा,

धैर्य सदा अपनाऊंगा, लालच में न आऊंगा।

चुनुआ की बात सुनकर चुहिया और कुत्ते दादा बहुत खुश हुए।

 चुहिया बोली-चल, तुझे खाना खिलाऊं।

चुनुआ- माँ दादा को भी तो साथ ले चलो। आज हम सब साथ-साथ खाना खाएंगे।

सब खुश होकर चल दिए।

(समाप्त)
यह कहानी बालहंस अक्टूबर प्रथम 1995 अंक में प्रकाशित हुई थी तथा यह लेखक की पुस्तक 'अमरूद खट्टे हैं'में संकलित है.