विभिन्न पत्र पत्रिकाओं (नंदन, बाल भारती, हिंदी प्रचारक पत्रिका, अक्षर भारत में 'नेहा ने माफी मांगी' पुस्तक पर प्रकाशित टिप्पणियाँ
(1) नंदन, नई दिल्ली
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| (नंदन, मासिक , नई दिल्ली, सितंबर 1995, पृष्ठ 64) |
नेहा ने माफी मांगी- लेखक 'संजय'; प्रकाशक : राही प्रकाशन, 43, चौकसी, शाहजहांपुर (उ.प्र.); मूल्य 10 रुपए ।
कुल छह कहानियां है पुस्तक में। खेल-खेल में, अंधेरा हट गया, देखा तो चौंकी, जल्दी चलिए वहां, नेहा ने माफी मांगी तथा मैं जान गया हूं। आज के बच्चों के सामने कैसी-कैसी समस्याएं आती हैं, वे उनसे किस तरह बचने के रास्ते निकालते हैं- कहानियां इन्हीं बच्चों के आसपास घूमती है। 'खेल-खेल में' कहानी बहुत अच्छी है।
- बृज (नंदन, मासिक , नई दिल्ली, सितंबर 1995, पृष्ठ 64)
(2) बाल भारती, नई दिल्ली
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| (बाल भारती, मासिक, नई दिल्ली, अक्टूबर 1994, पृष्ठ 60) |
पुस्तकः नेहा ने माफी मांगी; लेखकः नागेश पांडेय 'संजय'; प्रकाशकः राही प्रकाशन, 43, चौकसी, शाहजहांपुर (उ.प्र.)-242001; मूल्यः 10 रुपये।
छः कहानियों की इस पुस्तक में बच्चों को सिखाया गया है कि आपस में हिलमिल कर रहना चाहिए। एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए इत्यादि। अच्छे नागरिक बनने की दिशा में ये कहानियां बच्चों के लिए सहायक सिद्ध होंगी।
(बाल भारती, मासिक, नई दिल्ली, अक्टूबर 1994, पृष्ठ 60)
(3) हिंदी प्रचारक पत्रिका, वाराणसी
(हिंदी प्रचारक पत्रिका , वाराणसी, नवंबर 1995 पृष्ठ 6)
नेहा ने माफी माँगी/ ले. नागेश पाण्डेय 'संजय'
बाल मन को कहानियाँ आरम्भ से प्रभावित करती रही हैं। कहानियाँ बालकों को किसी बात को सरल और आसान ढंग से समझाने का माध्यम रही हैं। श्री 'संजय' की कहानियाँ आधुनिकता बोध से जुड़ी हैं। बाल मानसिकता की उनकी कहानियों में बाल जीवन का स्पन्दन है। सरल भाषा में लिखी उनकी कहानियाँ सहज ही अपना प्रभाव छोड़ती हैं। (हिंदी प्रचारक पत्रिका , वाराणसी, नवंबर 1995 पृष्ठ 6)
(4) यू.यस. एम. पत्रिका, गाजियाबाद
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| (यू.एस.एम. पत्रिका/नव.-दिस. 1994, पृष्ठ 74) |
बाल कथा पुस्तक : नेहा ने माफी मांगी
समीक्षक : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
इस पुस्तक की पहली ही कहानी 'खेल खेल में' पढ़ी तो उसने मुझे ऐसा जकड़ लिया कि उठने ही न दिया, और उसी क्रम में सारी कहानियां एक ही सांस में, एक ही 'सिटिंग' में पढ़ गया। बहुत कम होता है ऐसा मेरे साथ।
बालकों की शैतानी, उनके नटखटपन, उनकी चपलता. उनके चुलबुलेपन को लेखक ने बड़े ही सहज-सरल ढंग में चित्रित किया है। साथ ही उनकी इन चंचलताओं को उनके हृदय परिवर्तन की दिशा में जो स्वस्थ मोड़ दिया है वह भी बहुत सहज है, सर्वथा सराहनीय है।
साहित्य बड़ों के लिए हो या बालकों के लिए, युग बोध से जुड़ा तो उसे होना ही चाहिए। भावी पीढ़ी को चरित्र की दृष्टि से वलिष्ठ बनाना आज के युग की बहुत बड़ी आवश्यकता है। इस दृष्टि से भी विना कोई उपदेश दिए,बालकों में स्वस्थ संस्कारों के अंकुर जमाने में श्री नागेश पांडेय संजय' का यह कहानी संग्रह प्रभावी सिद्ध होगा, ऐसा मेरा. विश्वास है। विश्वास यह भी है कि बालक इन कहानियों को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और स्वस्थ साहित्यिक आनंद प्राप्त करेंगे।
कहानियों की भापा बोल चाल की भाषा है, बालकों जैसी ही सरल है। अभिव्यक्ति में भी लगता है जैसे बालक स्वयं ही बोल रहे हों।
पुस्तक : नेहा ने माफी मांगी (बाल कहानी संग्रह); लेखक : नागेश पांडेय 'संजय'; प्रकाशक : राही प्रकाशन, शाहजहांपुर; मूल्य : दस रुपये
समीक्षक : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
(यू.एस.एम. पत्रिका/नव.-दिस. 1994, पृष्ठ 74)
(5) अक्षर भारत दैनिक, नई दिल्ली
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| (अक्षर भारत, दैनिक 2 सितम्बर 1996) |
बच्चों के लिए प्यारी बाल कहानियाँ
युवा बाल साहित्यकार नागेश पांडेय 'संजय' की छह बाल कहानियों का संग्रह 'नेहा ने माफी मांगी' राही प्रकाशन, 43, चौकसी, शाहजहांपुर (उ.प्र.) से प्रकाशित हुआ है। इसमें कथाकार की प्रतिनिधि बाल कहानियां संग्रहीत हैं।
कहानियों की भाषा अत्यंत सरल है। कहीं भी उपदेश थोपने की गलती नहीं की गयी है। कथाकार में बच्चों की मानसिकता के अनुरूप कथा बुनने की कला है और वह बहुत सहज और प्रभावी ढंग से अपनी बात कहानी के माध्यम से व पिरो देता है। भूमिका में डा. श्रीप्रसाद ने ठीक ही लिखा है 'बाल मानसिकता की उनकी कहानियों में बाल जीवन स्पंदित होता है। यही उनके कहानी लेखन की सफलता है।
विश्वास है दस रुपए वाली इस कथा कृति का बाल पाठकों में स्वागत होगा।
समीक्षक : भगवती प्रसाद द्विवेदी
(अक्षर भारत, दैनिक 2 सितम्बर 1996)
(6) नवनीत मासिक, मुंबई
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| (नवनीत, मासिक, मुंबई, जुलाई 1995, पृष्ठ 25) |
समीक्ष्य कृति में बाल साहित्यकार नागेश पांडेय 'संजय' की छह प्रतिनिधि बाल कहानियां संग्रहीत हैं। रचनाकार ने स्वीकारा भी है कि उसने बाल साहित्यकारों और पाठकों की प्रतिक्रियाओं को आधार बनाकर रचनाओं का चयन किया है।
सकारात्मक जीवन की ये कहानियां बाल मनोविज्ञान की बारीकी से पड़ताल करने के बाद सजग होकर लिखी गई हैं। सभी कहानियों के केन्द्र में बालक हैं और उनके जीवन के उतार-चढ़ाव, ईर्ष्या-द्वेष, भटकाव और मनोवृत्ति को रेखांकित करते हुए उन्हें अत्यन्त सहज ढंग से सही राह पर कदम बढ़ाने की प्रेरणा दी गई है।
कहानियों की भाषा अत्यन्त सरल है। कहीं भी उपदेश थोपने की गलती नहीं की गई है। कथाकार में बच्चों की मानसिकता के अनुरूप कथा बुनने की कला है और वह बहुत सहज और प्रभावी ढंग से अपनी बात कहानी के माध्यम से कह देता है।
- भगवती प्रसाद द्विवेदी
(नवनीत, मासिक, मुंबई, जुलाई 1995, पृष्ठ 25)















