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शनिवार, 19 जून 2021

बाल कविता 'पिता हमारे'-नागेश पांडेय 'संजय'

पिता हमारे
कविता : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
पिता हमारे पेड़ सरीखे,
छाया देते हैं।
खुद दुःख सहकर हमको 
हर्ष सवाया देते हैं।

पिता नहीं ईश्वर से कम हैं,
पालनहारे हैं।
हमें पालते, हम उनकी 
आँखों के तारे हैं।

पिता मित्र हैं, गुरु हैं : हमको 
राह दिखाते हैं।
पिता हमारे सपनों का 
संसार सजाते हैं। 

पिता कभी कुछ नहीं माँगते,
क्या उनको दें हम?
कभी न ऐसा काम करें, जो
मिले पिता को गम। 
(कविता हरिभूमि, रायपुर में 19 जून 2021 को प्रकाशित)

गुरुवार, 10 जून 2021

बाल कहानी 'फुदकू का पैराशूट'- डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

 

फुदकू का पैराशूट
डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

सिटी के बाहर एक ताल था। बहुत बड़ा। पास में ढेर सारी झाड़ियां थीं। फिर उसके बाद कई पेड़। पेड़ों पर जहां तरह-तरह के पक्षियों के घर थे, वहीं ताल मछलियों का ठिकाना था।

 झाड़ियों में ढेर सारे मेंढक थे। सुबह होते ही सब ताल किनारे जा पहुंचते। कूदते-फांदते। मछलियों के साथ खेलते और मन करता तो पेड़ों के पास जाकर चिड़ियों के सुर में सुर मिलाने की कोशिश करते। इधर चिड़ियों की चीं चीं चीं और उधर उनकी टर्र टर्र। कबूतर करते गुटरगूं और वे करते टर्र टर्र। बंदर खों खों खों करते, तब भी उनकी टर्र टर्र गूंजने लगती। झींगुर अपना इकतारा बजाता तो भी वे अपनी टर्र टर्र शुरू कर देते। कौआ कांव कांव करता, तब भी। यहां तक कि ऊपर से हवाई जहाज या हेलीकाप्टर गुजरता तो भी सब उसकी गड़गडाहट के साथ टर्र टर्र करना न भूलते। यानी हर किसी के साथ वे अपनी मौजूदगी का अहसास कराते। 

इन दिनों ताल में सिंघाड़े उगे थे। मेंढकों को वहां बहुत अच्छा लगता। वे उनके पत्तों पर जा बैठते। तैरते। इन्हीं मेंढकों में एक तो बहुत ही अनोखा था। उसका नाम था फुदकू। फुदकू नाम भी ऐसे ही नहीं पड़ गया। दरअसल वह हमेशा इधर-उधर फुदकता रहता। फुदकते-फुदकते कितनी दूर निकल जाता। फिर घरवाले उसे ढूंढ़ने निकलते। साथ में पेड़ के पक्षी भी। जिससे-तिससे पूछते फिरते। जबाव मिलता- हां, उधर जाओ सिटी के पास चौराहे पर। वहीं फुदक रहा था। उफ, घरवाले कितना परेशान होते। पर भला फुदकू, वह कहां मानता।

किसी की निगाह पड़ जाती तो चिल्लाता-देखो, वह रहे मियां फुदकू। 

सब चैन की सांस लेते।

फुदकू प्रामिस करते-ठीक है। अब इतनी दूर नहीं जाऊँगा। मगर फुदकते-फुदकते वे कहां पहुंच जाएंगे, ये तो खुद उनको भी न पता होता। 

एक दिन फुदकू निकले तो चलते ही गए। चलते-चलते ...हां, मतलब फुदकते-फुदकते वे शहर के सिटी पार्क में जा पहुचे। पहले तो पूरे पार्क का एक चक्कर लगाया। बच्चों की ट्रेन देखी तो उसके पीछे दौड़े मगर पकड़ न पाए। फिर वहां फब्बारा देखा तो फूले न समाए। उसमें खूब नहाए। 

तरह तरह के फूलों को देखा। बच्चे वहां फोटो खींच रहे थे। फुदकू उन्हें ताकने लगे। अचानक एक बच्चा उन्हें पकड़ने दौड़ा। 

अरे! बाप रे। -फुदकू भागे और झाड़ियों में जा छिपे। कुछ देर तक वहीं दुबके रहे। फिर बाहर झांककर देखा तो बच्चे वहां से जा चुके थे। बच्चे कहां गए? अब फुदकू उन्हें देखने चल दिए। दरअसल वे बच्चे पिकनिक मनाने आए थे। सब फब्बारे के पास चटाई बिछाकर बैठ चुके थे। 

फुदकू ने देखा, खाने की तैयारी हो रही थी। एक बच्चे ने पिज्जा निकाला। दूसरे ने बर्गर। किसी ने डोसा। किसी ने चाउमीन तो किसी ने कुरकुरे।

 ...और कोल्ड ड्रिंक... वह तो उसी दौड़ानेवाले बच्चे के पास थी। वह बोला, ‘अरे, पहले डांस करते हैं। फिर ये सब खाएंगे।’ 

सबने पूछा- ‘भला क्यों?’

वह बोला-‘नहीं तो फिर ये सारी चीजें पेट में डांस करेंगी।’

कुछ बच्चे उठकर डांस करने लगे। 

कुछ मिलकर गाने लगे।

कुछ बच्चे गोल-गोल बैठ गए। वे कभी कुछ खाते तो कभी बात करते-करते ताली पीटने लगते। मियां फुदकू का बार-बार मन करता कि वे भी सुर में सुर मिलाएं। मगर उनको वही दौड़ाने वाला बच्चा याद आ जाता।

बेचारे चुपचाप छिपे बैठे रहे।

 कुछ देर बाद, एक गुब्बारे बेंचनेवाला उधर आया। गैसवाले गुब्बारे। बच्चों ने गुब्बारे खरीदे। 

वाह! फिर नया खेल। बच्चे गुब्बारों को छोड़ देते। गुब्बारे उड़ चलते। बच्चे उछलकर उन्हें लपक लेते। 

फुदकू को भी खूब मजा आ रहा था। 

अचानक दो बच्चे आपस में टकरा गए। उनके गुब्बारे उड़ गए। दोनों लड़ने लगे-तेरे कारण मेरा गुब्बारा गया। 

दोनों गुब्बारे उड़े जा रहे थे। बाकी बच्चे उन्हें देख खुश हो रहे थे। फुदकू भी आंखे फाड़े उन्हें ताक रहे थे। 

अब बच्चे थक गए थे। तीन गुब्बारे बचे थे। बच्चों ने उन्हें एक में बांधा और फिर धागे को झाड़ियों में बांध दिया। शुक्र मानों कि वहीं छिपे बैठे फुदकू पर उनकी नजर न पड़ी। 

गैसवाले गुब्बारों के कारण झाड़ियों में खिंचाव होने लगा। फुदकू को लगा कि अब तो यहां से खिसकने में ही भलाई है। वे थोड़ा उछले तो उनका तो पैर ही धागे में फंस गया। फुदकू ने धागे को काटना चाहा। पर ऐसा नहीं हुआ। फुदकू फिर उछले, पर इस बार तो वे कलाबाजी ही खा गए। धागे का फंदा बन गया। बेचारे फुदकू, वे जोर पर जोर लगाते मगर धागे में उनके पैर उलझते ही जा रहे थे। 

अचानक धागा टूट गया। 

गैस वाले गुब्बारे उड़ चले और साथ में फुदकू भी। 

बच्चे चीखे-‘हमारे गुब्बारे।’

तभी उनकी नजर उसमें लटके फुदकू पर पड़ी। अब तो सारे बच्चे ताली बजाने लगे-पैराशूट, पैराशूट। 

गुब्बारे उड़ते रहे और मियां फुदकू भी। बहुत देर बाद जब गैस कम हुई तो गुब्बारे नीचे आए। 

फुदकू ने चैन की सांस ली। 

बहुत देर चुपचाप बैठे रहे।

इधर उधर ताकते रहे।

पता नहीं, क्या-क्या सोचते रहे।  

फिर धीरे से बोले-टर्र टर्र और जल्दी से अपने ताल की ओर चल दिए। 

(नंदन, मासिक के अप्रैल, 2018 अंक में पृष्ठ 60 पर प्रकाशित)

मंगलवार, 1 जून 2021

बाल कहानी 'शाबाश केतन - डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

 'हरिभूमि (बाल भूमि) में 3 मई 2018 को  प्रकाशित
शाबाश केतन
डा. नागेश पांडेय ‘संजय’
    बारह साल में यह पहला मौका था जब केतन अपनी मां से दूर कहीं और आया था। उसे रह-रह कर मां की याद आ  रही थी। ऐसा नहीं कि मामा के घर उसे कोई तकलीफ थी लेकिन फिर भी बात यही थी कि उसे अच्छा नहीं लग रहा था। 
    गर्मी की छुट्टियां थीं। मामा ने बहुत कहा तो मां ने उसे साथ भेज दिया। केतन ने कहा भी था-‘न मामा, मुझे तो मां की बहुत याद आएगी।’  मामा हंसे थे-‘...और जब तुम्हें मां की याद आए, तुम दो बार मां, मां कहना। बस, मैं तुरंत हाजिर हो जाऊँगा।’ 

    मां भी चहक पड़ी थीं- ‘और क्या बेटे, मैं तो बस मां हूं लेकिन मामा में तो देखो, दो बार मां आता है।’  फिर मां ने समझाया था-‘देखो, अब बड़े हो चुके हो। पूरे बारह के। कहीं आना जाना नहीं सीखोगे तो...।’

    ‘हां, हां मां, मैं समझ गया।’ केतन बीच में ही बोल पड़ा था। वैसे भी उसे मामी और पुष्कर भैया, निखिल भैया से मिले भी काफी समय हो गया था। शिवम अंकल की शादी में सब इकट्ठे हुए थे। कितना मजा आया था। खूब धमा चौकड़ी की थी। कितना नाचे थे। खाने की तो सुध ही न रही थी। जयमाल पड़ जाने के बाद सब खाने पर पहुंचे थे। आधे आइटम तो खत्म ही हो गए थे। न चाउमीन न डोसा। बुआ के बेटे आदू का तो पेट ही खराब हो गया था। सब बता रहे थे कि उसने एक-एक कर पूरे पांच डोसे खाए थे। अगले दिन सबने उसे खूब चिढ़ाया था- 
आदू भाई, आदू भाई

तुमने दावत खूब उड़ाई।

    यों तो आए दिन मामा-मामी और पुष्कर भैया, निखिल भैया से फोन पर बात तो होती ही रहती थी। वाट्सएप पर खूब वीडियो कालिंग भी करते थे। पर साथ बैठ बतियाने की तो बात ही कुछ और है न?

    मामा ने ज्यादा कहा और मां ने भी हामी भर दी तो केतन चला आया। सफर में कोई छह घंटे लगे होंगे। मामा ने पूरा ख्याल रखा। पहुंचा तो जबरदस्त वेलकम हुआ लेकिन फिर मां की याद आना शुरू हुई तो सब फीका लगने लगा। 

    केतन ने मां से वीडियो कालिंग की। मां ने पूछा-‘ठीक से पहुंच गए न ?’

    और थोड़ी ही देर बाद केतन ने फोन मामी को दे दिया। उसे लग रहा था कि वह रो पड़ेगा। ...मामी उसकी मंशा जैसे समझ गईं थीं। उन्होंने कुछ देर तक बात करने के बाद फोन रख दिया। वे केतन से बोलीं-बेटे, तुम थक गए होगे। थोड़ा सो लो। फिर शाम को मामा तुम्हें घुमाने ले जाएंगे। 

    मामी ने केतन के माथे पर पियानो बजाने की स्टाइल में अंगुलियां क्या फिराईं, केतन तो नींद के आगोश में जा पहुंचा। शाम को कोई चार बजे उसकी आंख खुली। निखिल भैया बड़े मजे से फर्श चमकाने में लगे थे। 

    केतन हंस पड़ा-‘अरे! तुम यह काम कर रहे हो?’

    ‘हां, तो तुम घर का काम नहीं करते क्या?’

    ‘ना, मैं भला ये क्यों करूंगा?’ केतन ने थोड़ा हेकड़ी से उत्तर दिया। उसके उत्तर में थोड़ा उपहास भी छिपा था। 

    ‘निखिल भैया कहां हैं?’

    ‘किचन में।’ 

    ‘किचन में !’ केतन एक बार फिर चौंका। ‘वहां क्या कर रहा है?’

    ‘तुम खुद ही जाकर देख लो।’ 
       केतन ने वहां जाकर देखा, मामी किचन में अप्पे बना रहीं थीं। पुष्कर भैया उनकी मदद कर रहे थे। 

    ‘अरे! तुम यहां हो?’

    केतन को आया देख मामी ने पुष्कर  से कहा-‘जाओ, बेटे। तुम इसके साथ खेलो जाकर। यहां सब हो जाएगा।’

पुष्कर उसे लेकर कमरे में चल दिया-‘कैरम खेलोगे?’

    ‘हां, बिल्कुल।’ 

    तब तक निखिल भी आ गया। खेल शुरू हो गया। गोटियों की खट-खट गूंजने लगी। 

    किचन से मामी की आवाज आई- ‘पुष्कर, चटनी में नमक तो डाला था न?’

    ‘हां, मम्मी। एकदम कंप्लीट है। आप बस अप्पे तैयार कर लो। फिर साथ-साथ खाते हैं।’ 

    केतन की चाल थी लेकिन वह भौचक सा पुष्कर का मुंह ताक रहा था। 

    ‘क्या हुआ प्यारे?’

    ‘चटनी तुमने बनाई है?’

    ‘हां, और क्या? आम और पुदीने की चटनी है। खाओगे तो याद करोगे?’

    ‘और... ये अप्पे क्या होता है?’ 

    ‘आज पहली बार बन रहा है। मैंने कल ही यू ट्यूब पर ये नया नाश्ता खोजा है। हम सब आज पहली बार इसका स्वाद लेंगे।’

    हम लोग बाजार की चीजें कम ही खाते हैं। बस, मिल जुलकर सारी चीजें घर पर ही तैयार कर लेते हैं।’  

    ‘वा....ह!’ 

    केतन चकराया सा हमउम्र दोनों भाइयों को ताक रहा था। वह तो बस मोबाइल में गेम खेला करता था। और भला किचन या घर के कामों से उसका क्या काम? मां खुद ही सारे काम करती हैं। सुबह चार बजे उठती हैं। फिर रात को दस बजने से पहले उनकी छुट्टी कहां होती है? कैसे थककर चूर हो जाती हैं बेचारी। उसने तो आज तक मां के किसी काम में हाथ नहीं बटाया। यहां तक कि वह कहीं भी अपने कपड़े डाल देता है। कहीं भी बस्ता। मां हर समय फैलाव ही ठीक करती रहती हैं। कालबेल बजने पर दरवाजा भी मां ही खोलने जाती हैं। उसे कुछ चाहिए होता है तो बस हुक्म देता है-मां, यह ले आना। मां, वह ले आना। और बेचारी मां, वे भी तो हंसते-हंसते उसे सब कुछ हाथ में ही लाकर देती हैं।

    निखिल ने केतन को हिलाया-‘क्या सोचने लगे? अपनी चाल चलो भाई।’

    केतन अनमना था। कैरम की बिखरी गोटियों को समेटते हुए बोला-‘खेल में मन नहीं लग रहा।’

    ‘क्यों, घर की याद आ रही है?’ 

    ‘हां, मां की याद....।’

    तब तक मामा आ गए। हंसकर बोले- ‘तो बोलो न मां, मां।’

    मामी भी नाश्ता लेकर आ गईं। पुष्कर और निखिल उसे प्लेट में रखने लगे। केतन ने अप्पे देखकर आंखे बड़ी कीं-‘अरे! ये तो बिल्कुल गोलगप्पों की तरह हैं!’

    फिर केतन ने मामा से कहा-मामा, मां से बात कराओ न प्लीज!

    ‘हां, अभी लो।’ और मामा ने तुरंत मां को वीडियो काल लगा दी। जल्दी ही स्क्रीन पर मां प्रगट हुईं-‘कैसा है रे?’

    ‘मैं ठीक हूं मां। नाश्ता करने जा रहा हूं।’ थोड़ा रुककर केतन ने पूछा-‘आपने नाश्ता किया मां?’

    ‘अभी तो नहीं बेटे। थोड़ा काम है, उसे निबटा लूं फिर...।’

    केतन को लगा कि वह मोबाइल पर ही मां को प्यार कर ले। कहे उनसे- मां, देखना वापस आने पर मैं आपका कितना ख्याल रखूंगा। पुष्कर और निखिल की तरह मैं भी...। ...लेकिन केतन कुछ बोला नहीं। बस, उसके ओंठ हिलकर रह गए। 

    ‘क्या है केतन ? क्या कह रहा है? आवाज नहीं आ रही?’ 

    ‘कुछ नहीं मां, ...आपके लिए मैंने एक गिफ्ट सोचा है।’

    ‘गिफ्ट! ...अच्छा क्या? बता तो भला?’

    ‘बताऊँगा नहीं मां, जब वापस आऊँगा तब देखना। ...बस...।’ 
      मां उसे निहारती रह गईं। तब तक मामी ने अप्पे उठाकर केतन के मुंह में रख दिया। हंसते हुए बोलीं-‘बाकी बातें ब्रेक के बाद...।’
  सब नाश्ता करने लगे। 
    मोबाइल पर मां के चेहरे की चमक साफ दिख रही थी। 

    ...और केतन का तो मन ही दमक उठा था।
(कहानी हरिभूमि, दिल्ली में 3 मई 2018 को  प्रकाशित )

शुक्रवार, 21 मई 2021

बाल कहानी : 'सबसे गंदे ...? डॉक्टर अंकल' -डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'




 'सबसे गंदे ...? डॉक्टर अंकल' 

 कहानी :डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

    ऑक्छी! ऑक्छी! नेहा की छींक पर छींक आए जा रही थी। जुकाम के मारे बुरा हाल था। सारा शरीर ऐंठ रहा था, और सिर दर्द की तो पूछो ही मत। लगता था जैसे चम्पावत उसे बहुत महंगा पड़ गया।

    चम्पावत में नेहा के मौसा रहते हैं। चम्पावत नया जिला है, कभी इसे पिथौरागढ़ नाम से जाना जाता था। जो भी हो, यह दर्शनीय स्थल है। जिधर नजर डालो, पहाड़ ही पहाड़। लगता जैसे उनकी चोटियां पुकार रही हों- आओ, आओ चढ़ो हम पर। ऊंचे- ऊंचे पेड़ अचरज में डालते हैं । झरने मन मोहते हैं और देखने को मिलते हैं तरह-तरह के लोग। ये लोग यात्री हैं। मां पूर्णागिरि के दर्शनार्थी । पूर्णागिरि का मन्दिर ऊंची चोटी पर है। कहते हैं जब भगवान शिव मृत पार्वती को लेकर आकाश मार्ग से चले थे तो उनके अंग जगह-जगह पर गिरते गये। पूर्णागिरि पर मां पार्वती की नाभि गिरी थी, चोटी पर इसी मन्दिर के दर्शन हेतु दूर-दूर से सब आते हैं।

    नेहा भी अपने चाचा के साथ गयी थी। साथ में थे मौसा- मौसी । उन्होंने ही ये कहानी सुनाई थी। नेहा को पहाड़ पर चढ़ना अच्छा लगा। पहाड़ पर रहने वालों को व्यायाम की क्या जरूरत ? तनिक चढ़े कि हो गया व्यायाम | चढ़ाई करने से भूख भी लगती है। पहाड़ की फायदेमंद हवा से शरीर स्वस्थ बनता है । नेहा को भी पहाड़ चढ़ने में मजा आया। मजा इसलिए भी आता है, क्योंकि जो चीजें बहुत पास दिखती हैं वास्तव में होती दूर हैं। रास्ते घुमावदार हैं, बस वहीं घूमते रहो । लगता है, अब पहुंचे- अब पहुंचे।

    नेहा समझदार है, मन से पढ़ती और समझती है । लेकिन 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' मुहावरे का सही अर्थ उसे यहीं समझ आया।

    मां पूर्णागिरि के मन्दिर पर भीड़ थी, मगर ज्यादा नहीं। दर्शन आसानी से हुए। मौसा जी ने कहा 'देखो, वह नीचे शारदा नदी बह रही है।' क्या दृश्य था- पहाड़ों से अठखेलियां करती शारदा नदी ऊपर से बड़ी सुहावनी लग रही थी। ज्यों प्रकृति सफेद मोतियों की चमचमाती माला पहने, निश्चिन्त होकर विश्राम कर रही हो

    नेहा मचली- 'मौसा जी, मैं तो नहाऊंगी इसमें।

    ''हां, नहाना । मगर कम-कम।' चाचा ने समझाया। वापस चले तो यात्रा शानदार हो गयी । कठिनाई चढ़ाई में होती है, उतरने में क्या । बस, भागते चले जाओ । न थकान, न उलझन। फिर भी सावधानी तो हर जगह चाहिए । सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। जीवन की दोस्ती सावधानी से हो। जिसने इसका साथ छोड़ा, नुकसान उठाया।

    एक आदमी था, पैर पकड़े बैठा था। मोच आ गयी थी । इधर उधर देखता लापरवाही से चल रहा था, फिसल गया पैर।

    फिसलन उनके लिए नहीं है, जो सावधान हैं। सावधान रहने से विश्राम मिलता है, असावधानी से कष्ट । चाचा कहने लगे- 'बेटा, चढ़ना-उतरना ही जीवन है। पढ़ाई भी पहाड़ है, पढ़ाई की सीढ़ियां सतर्क होकर चढ़ो तो आगे विश्राम ही विश्राम है, सुख ही सुख है । जो पढ़ाई के पहाड़ से डरते हैं, डर कर चढ़ते नहीं। उन्हें विश्राम नहीं, कष्ट मिलता है। अभी मेहनत से पढ़ाई की सीढ़ियां चढ़ोगे तो आगे चलकर उतार मिलेगा। सुख और आराम का उतार । नहीं तो संघर्षों की चढ़ाई शुरू होती है। लोग उस पर चढ़ते-चढ़ते थक जाते हैं।'

    चाचा की बातें अच्छी थीं, मगर नेहा का मन पहाड़ों में रमा था। उसे झरने में नहाने के सुख की प्रतीक्षा थी, लो आ गए वहीं।

    मौसा- मौसी नहाए, चाचा नहाए । नेहा नहाई, मगर जमकर । छप-छपा-छप। आ! जी करता है, हमेशा यही रहें । टंकी के फव्वारे में नहाने का सुख यहां फीका है ।

    'अब, बस भी करो।' मौसा-मौसी और चाचा सभी ने कहा। मगर नेहा, उसे तो मजा आ गया नहाने में। नहाए जाओ, नहाए जाओ ।

    चाचा ने उसे पकड़ा- 'चलो चेंज करो कपड़े । यह पहाड़ी पानी है। ज्यादा नहाना नुकसान कर सकता है।

    बात तो ठीक थी । 'अति सर्वत्र वर्जयेत।' नेहा ने नहाने की अति कर दी थी ।

    नेहा मानी । तैयार होकर सब चल दिए। वापस मौसा के घर आये। सो गये पड़कर । थकान हो तो नींद अच्छी आती है। अच्छी नींद चाहिए तो थकान जरूरी है। थकान के लिए कुछ न कुछ करते रहना। चाहिए। कुछ करते रहने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि आलस्य करो । यों आलसी को सर्वाधिक थकान आती है मगर मेहनती और आलसी की थकान में अंतर है। मेहनती की थकान उसे उन्नति के पथ पर ले जाती है और आलसी की थकान उसे अवनति के पथ पर, बीमारी के पथ पर । खैर, नेहा की थकान तो मेहनत से थी ।

    मगर नेहा ने मेहनत के साथ-साथ गलती भी की थी । कौन सी गलती अति करने की गलती । नहाने की अति करने से उसे तकलीफ शुरू हुई और जब उसकी आंख खुली तो मुंह से आवाज निकली आंक छीं!

    केवल छींक ही नहीं, कसकर जुकाम और भयंकर सिर दर्द । ज्यादा नहाने का दण्ड उसके सामने था थर्मामीटर से देखने पर पता चला कि उसे बुखार भी है । बुखार एक सौ एक। 

    'चलो, तुम्हें डॉक्टर को दिखाएं।'

    'डॉक्टर !' नेहा की बोलती बन्द । नेहा को डॉक्टरों से बड़ा डर लगता था । बस वही रटे रटाए वाक्य और रटे-रटाये उपदेश । ऊपर से मां-बाप की झिड़कियां सुनो सो अलग। पास में डॉक्टर गिरिजा बहादुर थापा थे, नेहा को  वहां ले जाया गया।

    'हुंअँ! तुम्हें तो जमकर बुखार है। हाथ नब्ज देखकर डॉक्टर थापा बोले- 'रोटी तो नहीं खाई ? ' 'नहीं।'

    उन्होंने आला निकाला 'पीठ इधर करो ।' नेहा पीछे घूम गयी।

    'सांस गहरी लो । '

    'हंअ ! हंअ'

    'और गहरी । '

    'हंअ ! हंअ ! हंअ' 'बेटे, थोड़ा और गहरी '

    हां ! हां ! हां ! हां ! हां ! नेहा जोर-जोर से आवाज निकालने लगी ।'

    वहां बैठे मरीज हंस दिये। नेहा को गुस्सा आया । डॉक्टर थापा ने उसकी आंखें देखीं फिर कहा

    'मुंह दिखाओ, आ करो।'

    'आ आ'

    'यह तुम्हारे मुंह में क्या है ? '

    'टॉफी। "

    'टॉफी ? टॉफी बिल्कुल बन्द । कतई मत खाना।' 'और चॉकलेट ?' सहमकर नेहा ने पूछा ।

    'टॉफी, चॉकलेट, लेमनजूस, लालीपॉप सब बन्द ।'

    अब नेहा ने गहरी सांस ली। तभी डॉक्टर थापा बोले, ' और दो तीन दिन पूरा आराम करना । खेलने भी नहीं जाना।'

    'क.... क्या खेलने भी नहीं ?"

    'हां, और टी. वी. भी न देखना, नहीं तो सिर दर्द बन्द नहीं होगा।'

    डॉक्टर थापा ने नेहा को सुई लगाई वह जोर से चीखी- 'उई' उन्होंने दो दिन की दवा दी । ये छह पुड़ियां थीं। कहा- 'चीनी के साथ इन्हें पीना । एक अभी पियो । '

    बाप रे बाप! कितनी कड़वी दवा । नेहा का मुंह जैसे उत्तर प्रदेश का नक्शा बन गया । चेहरा तमतमा उठा। सोचा- कभी स्कूल में मैडम पूछेंगी बोलो, सबसे गन्दा कौन ?"

    मैं कहूंगी - 'सबसे गन्दे डॉक्टर अंकल । '

    नेहा के मन में आया, अगर उसका वश चले तो सारे के सारे नियम चेन्ज कर दे बजाय सुई के बच्चों को ‘स्ट्रा’ पाइप दे और कहे- लो बेटे, मैंगो जूस पियो बजाय दवा की पुड़ियां या गोलियों के उन्हें टाफियां दें, लालीपॉप दे और कहे बच्चों, चार टाफियां सुबह खाओ, चार दोपहर में और चार शाम को सुबह शाम लालीपॉप चूसो और सारा दिन खेलो । जमकर खेलो, तभी तबियत ठीक होगी। अगर वह मंत्री बन जाये तो सबसे पहले सारे डॉक्टरों की दुकानें बन्द करा दे |

    'चलो बेटी ।' अचानक चाचा ने उसे हिलाया वह खड़ी हुई, चलने को हुई तभी किसी की कराह सुनाई दी।

    यह एक आदमी था, पैर में तगड़ी चोट थी शीशा चुभ गया था । डॉक्टर थापा ने देर न की । झट से घाव साफ किया । शीशा निकाला। मरहम पट्टी की । उसकी जान में जान आयी ।

    नेहा स्तब्ध ये सब देख रही थी। तभी एक बुढ़िया आयी, उसने डॉक्टर के पैर पकड़ लिये दुआएं देने लगी- 'आप भगवान हैं मेरे । आपने मेरे पति को बचा लिया । अब वह खतरे से बाहर हैं । आपने मुझ गरीब पर बड़ी कृपा की। मुफ्त इलाज किया। मैं कैसे आपको धन्यवाद कहूं?' 

    'चलो, चलो बेटी ।' एक बार फिर चाचा ने नेहा की तन्द्रा भंग की ।

    नेहा ने चाचा की अंगुली पकड़ी, बड़े विनम्र आदर भाव से डॉक्टर अंकल को देखा और बोली 'अच्छे डॉक्टर अंकल, नमस्ते ।'

    ‘नमस्ते! नमस्ते' डॉक्टर थापा मुस्करा दिये।

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'



(यह कहानी 25 अक्टूबर,1998 को दैनिक जागरण {साप्ताहिक परिशिष्ट}, कानपुर में प्रकाशित हुई थी. यह लेखक की पुस्तक 'यस सर ! नो सर!'में संकलित है.)


सोमवार, 17 मई 2021

बाल कहानी : भय का भूत- डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

भय का भूत
बाल कहानी : डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

सुंदरवन के पूरब में था एक छोटा सा घर। घर में रहता था टोनू खरगोश  और उसका छोटा सा परिवार। परिवार में पता है कौन-कौन था? टोनू की पत्नी और उसके दो बच्चे। बच्चों के नाम थे टिंकू और रिमझिम। टिंकू बड़ा और रिमझिम छोटी थी।  

रिमझिम छोटी जरूर थी मगर थी दिलेर। सब उसके साहसी स्वभाव की तारीफ करते। हां, टिंकू था नंबर एक का अंधविश्वासी और डरपोक। कहीं जरा सी आवाज भी क्या होती कि जा दुबकता मम्मी के पास। डर उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ था।  

तो एक बार की बात है। मम्मी-पापा किसी काम से बाहर गए हुए थे। घर पर टिंकू और रिमझिम अकेले थे। शाम हो रही थी और मम्मी-पापा अभी तक वापस नहीं लौटे थे। यों वे कहकर गए थे कि षाम होने से पहले ही लौट आएंगे। धीरे-धीरे रात घिर आई। घुप्प अंधेरा छा गया। सुंदरवन  में आज बिजली भी नहीं आई थी। टिंकू को डर लगने लगा। वह कांपते हुए रिमझिम से बोला-

अंधकार छाया जमकर,

और अकेले हम घर पर।

कहीं आ गया भूत अगर,

हाय! लग रहा मुझको डर।

रिमझिम ने टिंकू की हिम्मत बंधाई-

डरो न भैया! डरो न भैया!

डरने की कुछ बात नहीं।

भूत-वूत कुछ भी न होता,

यूं घबड़ाओ आप नहीं।

मैं तो कितनी छोटी पर,

मुझे न लगता बिल्कुल डर।

रिमझिम की बात पर टिंकू थोड़ा गुस्से से बोला-

तू पगली है क्या जानें,

भूत-वूत को क्या मानें।

भूत अकेले में आते,

मार डालते-ले जाते।

हाय! कहीं जो आया भूत?

क्या होगी उसकी करतूत!

टिंकू की बात पर रिमझिम मन ही मन हंसी। उसने दोबारा समझाया-

बीता जो कहलाता भूत,

बीता क्या फिर आता है?

वर्तमान की बात करो जब

वर्तमान से नाता है।

बढ़िया-बढ़िया बातें कर,

सो जाएं हम खा-पीकर।

हो सकता है कुछ पल में 

मम्मी-पापा आ जाएं,

लेकिन क्या यह अच्छा है?

बेमतलब हम घबड़ाएं?

तुम बैठो, मैं जाती हूं,

अभी किचन से आती हूं। 

लेकर के बढ़िया खाना,

खाना खाना सो जाना। 

रिमझिम किचन में चली जाती है। उसके समझाने का टिंकू पर कोई असर नहीं पड़ता। वह भगवान की मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर कहता है-

क्या होगा अब हे भगवान?

है मुश्किल  में अपनी जान। 

रक्षा करना भूतों से,

भूतों की करतूतों से। 

घर में चोरी करने के इरादे से बाहर खड़ा कड़कू सुअर सारी बातें सुन रहा होता है। इधर रिमझिम किचन से खाना लेकर आती है और कड़कू सुअर कालबेल बजाकर गुर्राता है-

हो हो हो मैं आया भूत,

बड़े-बड़े भूतों का दूत।

आया हूं यमलोक से,

अभी मारता तुम दोनों को,

मैं भाले की नोक से।

खोल गेट, अंदर आऊँ,

तुम दोनों को खा जाऊँ। 

बस, फिर क्या था। बेचारा टिंकू, उसकी तो कंपकपी ही छूट जाती है। जिसका डर था, वही हो गया। 

उसने रोते हुए प्रार्थना की-

हाय भूत जी जाओ तुम,

गेट नहीं खुलवाओ तुम। 

हाय न तुम अंदर आओ,

अरे! तरस कुछ तो खाओ।

भूत बना सुअर डरावनी हंसी हंसते हुए कहता है-

तरस नहीं मैं खाता हूं,

मैं तो मांस चबाता हूं।

पीता खून, फोड़ता पेट,

खोलो-खोलो जल्दी गेट। 

टिंकू की घिघ्घी बंध जाती है। रिमझिम धीरे से उसके कान में कहती है- भैया! मत डर। जरूर दाल में कुछ काला है। मैं कुछ करती हूं। 

रिमझिम ने दरवाजे के पास जाकर कांपते हुए बोली-

हाय! भूत जी, मानो तुम,

हमको बच्चा जानो तुम। 

हमें छोड़ जो भी चाहो,

उसको फौरन ले जाओ। 

भूत बना कड़कू चोर चहक कर तुरंत बोल उठा-

तुम दोनों ही बच्चे हो, 

दोनों बच्चे अच्छे हो। 

अच्छा, तुम्हें न खाऊँगा,

पर रुपया ले जाऊँगा,

सूटकेस रुपयोंवाला,

मुझको झट दे जाओ तुम,

अपनी जान बचाओ तुम।

टिंकू ने जब भूत की दया भरी बातें सुनीं तो खुश  हो गया। जल्दी से सूटकेस उठाने चला। रिमझिम ने उसे रोका-

रुक भैया! कुछ गड़बड़ है,

ये सब तेरी हड़बड़ है।

मुझे हो रहा है आभास,

  है कोई यह ठग-बदमाश ।

जाती हूं छत के ऊपर,

इसको मारूंगी पत्थर।

रिमझिम के चलते ही टिंकू जोर-जोर से रोने लगता है-

रुक जा रिमझिम,

रुक, मत जा, 

भूत क्रोध में आएगा,

अभी हमें खा जाएगा।

तू मेरी प्यारी बहना,

हाय! मान भी ले कहना।

भूत बना कड़कू सुअर समझता है कि टिंकू रिमझिम को सूटकेस लाने से रोक रहा है। उसे और गुस्सा आ जाता है। वह दांत पीसता है-

मूर्ख इसे तू आने दे,

सूटकेस दे जाने दे।

सूटकेस यदि पाऊँगा,

तो तुमका ना खाऊँगा।

रिमझिम टिंकू को लेकर जल्दी से छत के ऊपर पहुंचती है। उसे चुप रहने को कहकर एक पत्थर का टुकड़ा उसकी ओर फेंकती है। पत्थर कड़कू सुअर के सिर पर लगता है। वह दर्द से तड़प उठता है-

हाय! मर गया, हाय मरा,

फूट गया सर हाय मरा।

अरे! बचाओ, जल्दी आओ,

अस्पताल मुझको ले जाओ।

उसी वक्त गश्त  लगाते इंस्पेक्टर हाथी दादा अपने सिपाहियों के साथ वहां आ पहुंचते हैं। कड़कू चोर को देखते ही वे समझ जाते हैं कि ये यहां क्यों आया होगा। तुरंत उसे पकड़ लेते हैं।

 सारी बात जानकर वे बहुत खुश होते हैं। रिमझिम को शाबासी देते हैं। टिंकू को समझाते हैं-बेटे! कभी भी अंधविश्वास मत करो। भूत होते ही नहीं। डर का नाम ही भूत है। डर भगाओ, भूत भाग जाएगा। 

बात टिंकू के समझ में आ जाती है। वह कहता है-

दादा बात आपकी ठीक,

जो बच्चे होते निर्भीक।

वे कुछ कर दिखलाते हैं,

वे ही नाम कमाते हैं। 

कहता हूं मैं सीना ठोक,

नहीं रहूंगा अब डरपोेक।

तब तक मम्मी पापा आ जाते हैं। सारी बात सुन वे फूले नहीं समाते। वे हाथी दादा को भी धन्यवाद देते हैं। हाथी दादा कड़कू सुअर को लेकर चले जाते हैं। 

सभी घर में घुसते हैं। 

अचानक खट की आवाज होती है। टिंकू चौंककर पूछता है- कौन?

मैं हूँ भूत का दूत -रिमझिम डरावनी आवाज में बोलती है। 

धत, यह तो रिमझिम की आवाज है अब नहीं डरने वाला मैं....

सब हंस पड़ते हैं। 


चम्पू शैली की यह  बाल कहानी अमर उजाला रविवासरीय परिशिष्ट में 13.10.96 को प्रकाशित हुई थी. यह लेखक की बाल कहानियों की पुस्तक 'भाग गये चूहे ' (1997) में भी संकलित है.

बालगीत : भैया जी-डा. नागेश पांडेय 'संजय'


भैया जी 
बालगीत :  डा. नागेश पांडेय 'संजय'

क्यों इतना हो हमें सताते ?

बोलो भैया जी ।

गुलगुल गुलगुल चुन्नू के,
गुलगुली मचाते क्यों?
मुझे पकड़कर, कहो कान में
गाना गाते क्यों ?

क्यों  कसकर हो  धौल जमाते,
बोलो   भैया जी ।
 
गोलू जब सो जाता,  उसके
मूँछ  बना देते ।
मोनू भैया के लम्बी-सी,
पूँछ  लगा देते।
क्यों ऐसे हो हमें चिढ़ाते  ?
बोलो भैया जी ।
 
कड़ी ठंड में ठंडे-ठंडे,
हाथ लगाते हो।
घुप्प अँधेरे में कोने में,
क्यों छुप जाते हो ?
फिर म्याऊँ कर हमे  डराते,
बोलो   भैया जी ।

शिशुगीत : चाचा जी -डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

चाचा जी  

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
सांझ ढले कल मेरे चाचा,
आए हैं अजमेर से। 
बहुत थके हैं इसीलिए वे,
आज उठेंगे देर से। 
मेरे चाचा जी अफसर हैं,
खूब मजे में रहते हैं। 
मुझसा बनना है तो जमकर,

करो पढ़ाई कहते हैं।