बालसाहित्य सृजन
डॉ.नागेश पांडेय 'संजय' का बालसाहित्य संसार
हमारे सम्मान्य समर्थक... हम जिनके आभारी हैं .
सोमवार, 28 सितंबर 2026
पुस्तक समीक्षा : समकालीन बाल साहित्य की दिशा समीक्षक : संतोष खन्ना
सोमवार, 31 अगस्त 2026
पुस्तक समीक्षा : समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा , समीक्षक : डॉ. आर. पी. सारस्वत
समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा
पुस्तक का नाम : समकालीन बालसाहित्य दिशा डॉ. शकुंतला कालरा
संपादक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय',
प्रकाशन : नमन प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2023
मूल्य : रु 950/- (सजिल्द)
पृष्ठ : 342
समीक्षक : डॉ. आर. पी. सारस्वत
पुस्तक के शीर्षक देखकर भ्रम की स्थिति बन जाती है ऐसा प्रतीत होता है कि पुस्तक डॉ. शकुंतला कालरा जी ने ही लिखी है, पर आगे जब सम्पादक पर निगाह पड़ती है तो पता चलता है कि शीर्षक के साथ आर्थात शीर्षक में ही डॉ. शकुंतला कालरा जी हैं। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह हुआ कि समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा जी हैं। और हों क्यों नहीं बालसाहित्य की प्रत्येक विधा पर डॉ. कालरा जी अपनी लेखनी न केवल चलाई है अपितु इससे प्रत्येक विधा को समुचित धार प्रदान की है- इसी कारण डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' को यह शर्षक पुस्तक का रखना पड़ा है जिसके लिए डॉ. पांडेय को बधाई !
यदि मैं यानी कि आम पाठक यह कहूँ कि मेरे पास ऐसे कोई टूल्स नहीं हैं जिनसे मैं सृजन की भरपूर जाँच-पड़ताल कर अपनी आख्या दे सकूँ तो भाई मेरे सभी टूल्स, रिर्पोटर्स उपलब्ध करा दी हैं- डॉ नागेश पांडेय 'संजय' ने तो उनका अध्ययन कर और अपनी राय बनाकर उन्हीं के आधार पर अपने विवेक एवं शब्द-चातुर्य के साथ लिख डाली है अपनी विवेचना तो वही मैं कर रहा हूँ, इस पुस्तक में डॉ संजय ने स्वयं विभिन्न साहित्यकार - विद्वानों से उनके ही टूल्स का प्रयोग कर उनसे ही रिर्पोट्स प्राप्त कर संपादन कर यह ग्रंथ-अनुपम ग्रंथ हमारे साहित्य जगत को सौंपा है जो कि एक महान एवं ऐतिहासिक ग्रंथ है जिसकी चर्चा आने वाले समय में सम्मान के साथ होगी तथा किसी भी विवेचनात्मक आलेख में इसका जिक्र अवश्य होगा ऐसा मेरा मानना है।
अपनी-अपनी लेखनी से निःसृत शब्द-पुंज ग्रंथ में बाल साहित्य-जगत के मूर्धन्य विद्वान यथा प्रकाश मनु पद्मश्री ऊषा यादव, विष्णु प्रभाकर, सुकीर्ति भटनागर, डॉ. अमिता दुबे, डॉ. मो० अरशद खान, मधुसूदन साहा, विनोदचन्द पांडेय विनोद, डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, कृष्ण शलभ, डॉ तारादत्त निर्विरोध, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, डॉ. मोहम्मद साजिद खान, प्रताप सहगल, मंजुरानी जैन, डॉ. रवि शर्मा, देवेन्द्र मेवाडी, सृष्टि पांडेय, पद्मा चौगांवकर, घनश्याम मैथिल 'अमृत', भगवती प्रसाद गौतम, दिविक रमेश, डॉ. भैरूलाल गर्ग, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, डॉ. नागेश पांडेय संजय, संतोष खन्ना, डॉ. दर्शनसिंह आशट, डॉ. राष्ट्रबंधु, डॉ. चक्रधर नलिन, डॉ. अश्वघोष, गोविन्द शर्मा, निर्मला सिंह, नीलम राकेश, डॉ. रमानाथ त्रिपाठी, डॉ. अनिल कुमार, चक्रधर शुक्ल तथा विशेष रूप से डॉ. विकास दवे, वेद मित्र शुक्ल एवं आशीष जिनके संयमित साक्षात्कारों से साहित्यकार डॉ. शकुंतला कालरा के विस्तृत भाव जगत से रू-ब-रू होना सुनिश्चित हुआ। लगभग आधे से भी ज्यादा - समसामयिक बाल साहित्य की दुनिया की साहित्यकारों ने इस ग्रंथ केपूर्ण होने में अपनी-अपनी आहुति दी है तब कहीं यह साहित्यक ग्रंथ पूर्ण हुआ है। मेरा सौभाग्य है - इस बहाने में इन सभी के सद्विचारों प्रयासो से जुड़ सका तथा जान पाया कि आदरणीय कालरा जी मेरी ही नहीं अपितु बाल साहित्यकारों की प्रिय हैं। सभी बहन शकुंतला कालरा कह कर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। करे भी क्यों नहीं इतना प्यार दुलार जो - उनसे मिलता रहता है हर कोई उनका बनकर रह जाता है। फोन पर वार्तालाप शुरू होते ही कैसे हो? - वीणा जी कैसी हैं मिसिज शलभ जी से कब मिले उनकी कुशलता लेना, यह उनका प्रथम काम होता है जो उन्हें अन्य से अलग करता है।
जैसा हम सब को मालूम है बहन डॉ. शकुंतला कालरा जी ने बाल साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी लेखनी बखूबी चलाई है क्या बाल - कविताएँ, क्या बाल नाटक, बाल उपन्यास, बाल कहानियाँ, आत्म कथा, साक्षात्कार, निबन्धात्मक शैली में लिखे बालकोपयोगी आलेख सबकुछ साहित्य - का सृजन किया है- वह भी प्रचुर मात्रा में सृजन, समीक्षा, संपादन, सबकुछ तथा प्रचार से बाल साहित्य अपने पारिवारिक दायित्वों के निवर्हन के बावजूद अपनी महती भूमिका उन्होंने निभाई है।
इस ग्रंथ के अवगाहन से हमें उनकी इस असाधारण प्रतिमा का भान हो जाता है, लगता है कि कितनी श्रम-साधना के उपरान्त उनका यह लेखन, सृजन हमारे सम्मुख आकार लेकर हमें अभिभूत कर रहा है। और इस सब के लिए बधाई के पात्र हैं डॉ नागेश पांडेय 'संजय' जिनके अथक प्रयास - से गम्भीर संपादकीय - कृत्य से इतने सारे साहित्यक व्यक्तियों को जोड़कर अपना अभीष्ट हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया है। इससे पता चलता है कि साहित्यजीवी कितना एक-दूसरे से तारतम्य बनाए हुए हैं तथा कितना एक दूसरे के-सृजन पर अपनी पैनी दृष्टि लगाए हुए हैं। आज के समय में इतना के साहित्य- कार्य भी करना कोई सरल नहीं है। दूसरे के कार्य को सराहना तथा प्रतिक्रया स्वरूप आलेख तैयार करना कोई कम कार्य नहीं। इतना कार्य डॉ. संजय ने करा लिया उनके लिए भी वे बधाई के पात्र हैं। कारण डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' स्वयं सरल एवं सीधे व्यक्तिव के धनी हैं। विद्वान बाल साहित्यकार हैं जो अपने कार्य में पूरी ईमानदारी एवं तल्लीनता से लगे रहते हैं तथा चुपके-चुपके ही विस्फोट कर देते हैं और सभी को चकित भी यह ग्रंथ भी उनका ऐसा ही चमत्कृत करने वाला कार्य है।
समकालीन बाल साहित्य को दिशा देने वाली डॉ. शकुंतला कालरा जी को ऐसे ही नहीं कहा जाता है - यह उनके विपुल बाल साहित्य के सृजित संसार की बदौलत है जो उनकी निरंतर साहित्य साधना का द्योतक भी है, चाहे इनके बाल कहनी संग्रह-मोती जोती 1998 सुनाओ वही कथा 2006, चमत्कार का रहस्य 2006, रात में दिन 2006, अपना घर आधुनिक भावबोध 2006, मेरी प्रिय कहानियाँ 2006 माँ का उपहार 2009 या फिर बाल उपन्यास मिट्टी - की चिट्ठी चंदा के नाम 2021, या बाल नाटक देर आए दुरूस्त आए और - फिर बाल कविता संग्रह करे तमाशा प्यारी मुनिया 1998, फुलवारी 2007. हँसते- महकते फूल 2012, जय जय भारत प्यारा 2012, ममता की छाँव में 2012, क्यों रूठी गौरैया 2008, या फिर निबंध संग्रह - बच्चों का व्यक्तिव - विकास कैसे हो? या फिर संपादित पुस्तकें बाल विकास का स्वरूप और रचना संसार 2002, बाल साहित्य के युग निर्माता 2006, बालकथा सुमनमाला - भाग 1, भाग2, बालकथा - सुमनमाला - भाग-2-2002 डॉ.दर्शन सिंह आशट उनका बाल साहित्य 2012 मीठी-मीठी लोरियाँ एवं प्रभातियाँ 2012. हिन्दी बाल साहित्य विघा विवेचन 2014 आलोचना के क्षेत्र में उनका लेखन सराहनीय एवं अद्वितीय है हिंदी बाल साहित्य के अनन्य साधक •2019, बालक और बाल साहित्य 2022 साक्षात्कार जो उनके द्वारा लिए गये हैं - कम रोचक नहीं हैं हिन्दी बाल साहित्य-विमर्श (साहित्यिक साक्षात्कार 2010), हिन्दी बाल साहित्यः समस्याएँ और समाधान 2017 इस तरह हम देखते हैं कि मौन साधक के रूप में साहित्य जगत को अपना योगदान अप्रितम, श्रेष्ठ योगदान डॉ. कालरा जी निरंतर प्रदान कर रही हैं। उनके अनेकानेक साहित्य-प्रेमी उनके इस स्तुतनीय कार्य की प्रशंसा करते हैं, यह में स्वयं उनमें पुस्तकों के लोकार्पण समारोह में शामिल होकर गवाह बना हूँ उनका सरल एवं सीधा सा व्यक्तित्व प्रत्येक को अपनी ओर आकर्षित सहज ही कर लेता है, यह उनके चुंबकीय व्यक्तिव का ही परिणाम है। चाहे फिर व प्रकाशमनु जी हो या बालस्वरूप राही जी अथवा दिविक रमेश, पद्मश्री डॉ. उषा यादव, पदमश्री डॉ. श्याम सिंह, डॉ. श्री प्रसाद, डॉ. रतन लाल शर्मा, सीताराम गुप्त, के. डॉ. बालशौरी रेड्डी, सूर्यकांत बाली, भैरूलाल गर्ग, डॉ. विकास दवे, डॉ. रामनाथ त्रिपाठी, गोविन्द शर्मा, डॉ. अश्वघोष, डॉ. राष्ट्रबंधु जी या उनके शिष्य डॉ. अनिल कुमार सभी उनकें मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे हैं।
इस ग्रंथ में एक उपलब्धि और है वह है- डॉ. शकुंतला कालरा जी में के दिए हुए साक्षात्कार पहला साक्षात्कार शीर्षक समकालीन बाल साहित्य - में परंपरा और आधुनिक भावबोध दोनों का सुंदर समन्वय है- डॉ. विकास दवे निदेशक, साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश एवं संपादक साक्षात्कार पत्रिका - जिसमें तमाम गूढ़ रहस्यों का जो बाल साहित्य से संबंधित है-का विवेचन बडी ही गहराई के साथ किया गया है जो वास्तव में पढ़ने-समझने लायक है। समझने लायक इसलिए कि वह डॉ. कालरा जी के गहन अध्ययन और बाल साहित्य के प्रति उनमे लगाव को दर्शाता है- डॉ. दवे ने बड़े ही सार्थक प्रश्नों को उनके सम्मुख रखा है जो उनकी विद्वता को प्रदर्शित करता है 17 पृष्ठीय इस साक्षात्कार जिसका अंत उन्होंने इस प्रकार किया है :-
"संकल्प शुभ रखें और उसे ईश्वर को समर्पित कर दें बस।" यह उनकी सात्विक सोच का परिचायक है।
दूसरा साक्षात्कार वेदमित्र शुक्ल - सहायक प्रोफेसर राजधानी कॉलेज, अंग्रेजी विभाग के शीर्षक सहज बचपन जीवन-यात्रा का सबसे - खूबसूरत पड़ाव होता है जिसके अंतर्गत उन्होनें उत्कृष्ट बाल कविता किसे कहेंगें पर अपना वक्तव्य इस प्रकार दिया है मेरी दृष्टि में उत्कृष्ट बाल कविता की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसमें बच्चों का नटखट संसार हो। उसमें लुभावनापन हो, रसीलापन ऐसा हो कि बालकों के साथ बड़े भी आनंद विभोर हो उठे। मनोविज्ञान का स्पर्श हो। बच्चों में उल्लास, चुलबुलाहट, और मौज-मस्ती का भाव पैदा करने वाली हों। बच्चों में मीठे सपने, उनमें बालहट, उनकी बालसुलभ चेष्टाएँ, शैतानियाँ, रूठना-मनाना, खेलकूद समाहित हो । कल्पना की उड़ान हो। सरसता, सहृदयता हो. जिज्ञासा, उत्सुकता हो । विंबात्मकता, मौलिकता हो।"
इससे उनके मानसिक स्तर के विस्तृत फलक का दर्शन किया जा सकता है जो उनके सजन में गाहे-बगाहे परिलक्षित होता है।
तीसरा साहित्यक-साक्षात्कार - आशीष बाल संपादक- 'अभिनव बालमन" अलीगढ़ का है जिसमें एक प्रश्न के जवाब में यह स्वीकारा है कि "काव्य - प्रतिभा जन्मजात होती है। ईश्वर प्रदत्त होती है। रचनाकार की संवेदना उसमें भाव, उसकी कल्पना, उसकी अभिव्यजना शक्ति और उसका भाषा पर अधिकार ही उसे साहित्यकार बनाता है।"
इस तरह प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य, बाल साहित्य-परक सामग्री तथा बाल साहित्य पर विवेचनात्मक जानकारी इस ग्रंथ में देकर संपादक डॉ.नागेश पांडेय 'संजय' ने बड़ा भारी कार्य किया है तथा जिज्ञासु पाठकों को डॉ. शकुंतला कालरा के बहाने ही सही बाल साहित्य के प्रति अनेकानेक खिड़कियाँ खोल दी हैं • इनसे बाहर या अंदर झाँक कर स्वविवेकानुसार हमारे - बाल साहित्यकार बंधु कुछ ग्रहण कर सकते हैं, आत्म चिंतन-मनन कर सकते हैं और हमारे समाज को उनसे प्रेरणा लेकर सात्विक, सार्थक सृजन कर सकते हैं ऐसा मेरा मानना है।
मेरी बहन डॉ. कालरा जी से स्नेह भरा लगाव है वे हमारी संस्था समन्वय, सहारनपुर की सम्मानित आजीवन सदस्य हैं- उनका आर्शीवाद समय-समय पर मिलता रहता है और आगे भी मिलता रहेगा - ऐसा मेरा मानना है।
मैं संस्था सचिव के नाते उनके उज्ज्वल साहित्यिक संसार के सृजन के लिए शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ और डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' के इस अनुपम प्रदेय के लिए आभार व्यक्त करता हूँ।
डा. आर.पी. सारस्वत
सचिव, 'समन्वय', सहारनपुर
नीरजा स्मृति बाल साहित्य न्यास
सहारनपुर 247001 -
मो० ना - 9557828950
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
पुस्तक समीक्षा : ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, समीक्षक : गोविंद शर्मा
पुस्तक - ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां
संपादक - डा. नागेश पांडेय संजय
प्रकाशक- राष्ट्रीय प्रकाशन मंदिर,लखनऊ
मूल्य -500/-
वर्ष - 2016
समीक्षक : गोविंद शर्मा
एक वह समय भी था जब बालकथाएं शुरू होती थी-एक था किसान या फलां गांव के रहने वाले....। आज के बालसाहित्य के लिये गुरूओं का यह कहना है कि उनमें वैज्ञानिकता होनी चाहिए और वे आज के बच्चे की आवश्यकता के अनुसार होनी चाहिए। आज के बच्चे की आवश्यकता क्या है- यह तय करने के लिये आप नेट पर सर्च करिए, विदेशी भाषा का बालसाहित्य पढिए और बच्चों से जरा दूर रहिए। क्योंकि यह बच्चों का काम नहीं है।
डा. नागेश पांडेय संजय स्थापित बालसाहित्य रचनाकार है। उन्होंने विपुल मात्रा में बालसाहित्य रचा है और दूसरों को पढा भी है। शायद इसी लिये उन्हें लगा कि बालसाहित्य से ग्रामीण परिवेश विदा हो गया है या विदा हो रहा है। उन्होंने बालकहानियों में ग्रामीण परिवेश तलाशना शुरू किया। फलस्वरूप रोचक कहानियों की पुस्तक ‘ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां’ पाठकों को उपलब्ध हुई। डा. नागेश पांडेय संजय द्वारा संपादित इस संग्रह में हिंदी के पन्द्रह बाल साहित्य रचनाकारों की 25 कहानियां हैं। डा.उषा यादव की ‘दादी अम्मा का खजाना’ और ‘आगिया वैताल की कथा’, गोविंद शर्मा की ‘अपना काम करेंगे’, और ‘मेहनत का मंत्र’, डा. जाकिर अली रजनीश की ‘सेमरा का शेर’ और ‘सपनों का गांव’ , डा. दिविक रमेश की ‘किस्सा चाचा तरकीबूराम का’, डा.नागेश पांडेय संजय की ‘गौतर’ एवं ‘मन का डर’, प्रकाश मनु की ‘तुम भी पढोगे जस्सु’, और ‘जमुना दादी’, मुरलीधर वैष्णव की ‘हबपब टोली’, डा.मोहम्मद साजिद खान की ‘बैल खुल गये’ एंव ‘बरगदी गांव’, रमाशंकर की ‘कायाकल्प’ और ‘शत्र्तो के सहारे- आई बहारें’, रावेन्द्र कुमार रवि की ‘मिल गई मां-, डा. श्री प्रसाद की ‘काला हाथ’ और ‘यह सच हंै’, संजीव जायसवाल संजय की ‘लोहार का बेटा’, डा.सुनीता की ‘सींक वाली ताई’, एवं ‘करमू चाचा का तांगा’, डा. हेमंत कुमार की ‘आलस्य का फल’, बाल कहानियां है।
सभी कहानियां रोचक हैं और लगता है कथाकारों ग्रामीण परिवेश देखा है। अधिकांश कहानियां संस्मरणात्मक हैं। कुछ की रचना शिक्षा देने या मनोरंजन करने के लिये की गई है। फिर भी किसी में भी रोचकता की कमी नहीं रहीं। संग्रह ग्रामीण परिवेश की बालकहानियों का है। पर नगरीय परिवेश के बाल पाठकों के लिये भी उपयोगी है। वे इन्हें पढकर जान सकेंगे कि गांव से शहर आये उनके माता-पिता किस माहौल में बड़े हुए, कैसे पढे, उनका बचपन कैसा था और कैसे अभावों का सामना कर अपने आपको इस योग्य बनाया कि तुम्हारे लिये हर तरह की सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं।
हां, पुस्तक के कवर प्रकाशन, भीतर की छपाई और कागज की क्वालिटी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था। मूल्य पांच सौ रूपये ज्यादा लगता है। कहानियों के साथ रेखाचित्र चित्र भी नहीं हें। बालसाहित्य में चित्रांकन का अपना महत्व होता है। तथापि, डा.नागेश पांडेय संजय इस महत्वपूण कार्य के लिये बधाई के पात्र है।
समीक्षक - गोविंद शर्मा,
ग्रामोत्थान विद्यापीठ
संगरिया- 335063 (राजस्थान)
शुक्रवार, 22 मई 2026
पुस्तक-समीक्षा : बालिकाओं की रोचक कहानियाँ , समीक्षक : नीलम राकेश
तुम्हारे लिए नई किताब / नीलम राकेश
बालिकाओं की रोचक कहानियाँ
बच्चों के लिए नागेश पांडेय 'संजय' के कई कहानी संग्रह आ चुके हैं। इनके संपादन में तुम्हारे लिए एक और कहानी संग्रह आया है - 'बालिकाओं की रोचक कहानियां'। इसमें उन्होंने देश के कई जाने-माने बाल साहित्यकारों की कहानियां संकलित की हैं, जो बालिकाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। ये कहानियां रोचक तो हैं ही, प्रेरक भी हैं।
क्षमा शर्मा की कहानी 'दिवाली के दिन' में किशोरियों को यह समझ दी गई है कि माता-पिता और भाई ही उनके असली शुभचिंतक होते हैं। दिविक रमेश ने बालिकाओं पर जरूरत से ज्यादा नियंत्रण को लेकर 'रितु के पापा' शीर्षक से एक कहानी लिखी है। प्रकाश मनु की मनोरंजक कहानी 'खीर खाई टेडी बीयर ने' पढ़कर तुम्हें खूब मजा आएगा। शकुंतला कालरा की कहानी 'मदर्स डे' में यह संदेश है कि भावनाएं अमूल्य होती हैं, भावनाओं की कीमत को भावनाओ से ही चुकाया जा सकता है। सूर्यनाथ सिंह की कहानी 'नानू का ननिहाल' में बच्चों को सैर-सपाटे का आनंद तो मिलेगा ही, अंधविश्वासों से सतर्क रहने की शिक्षा भी मिलेगी। समीर गांगुली की कहानी 'फूलों की खोज' बताती है, हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए। देवेंद्र कुमार की कहानी 'झुमकी का सपना' पढ़कर तुम झुमकी की तरह किसी लड़की का सपना पूरा करने के लिए प्रेरित होगे। उषा यादव की कहानी 'समय की कीमत' का संदेश है, हमें हमेशा समय का महत्व समझना चाहिए। इस कहानी संकलन में संपादक नागेश पांडेय 'संजय की भी एक कहानी 'मुझे कोई प्यार नहीं करता' पढ़ने को मिलेगी, जिसमें बताया गया है, अपने से छोटों को मिलते प्यार से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
इनके अलावा इस किताब में संकलित अन्य लेखकों की कहानियां पढ़कर भी तुम्हें अच्छी सीखें मिलेंगी।
किताब: बालिकाओं की रोचक कहानियां,
संपादक: डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' मूल्य: 230 रुपए,
प्रकाशक: लवकुश प्रकाशन, लखनऊ
गुरुवार, 23 अप्रैल 2026
पुस्तक-समीक्षा : टेढ़ा पुल , समीक्षक: अरविंद पथिक
पुस्तक समीक्षा
टेढ़ा पुल (बाल उपन्यास) : लेखक –डॉ. नागेश पाण्डेय ‘संजय'
समीक्षक : अरविन्द पथिक
बाल साहित्य अधिकार पूर्वक लिखना, साथ ही उसे रोचक और बोधगम्य बनाये रखना निश्चित ही बेहद कठिन और चुनौती पूर्ण कार्य है। यदि रोचकता और संदेश देने को बाल साहित्य लेखन की सफलता की कसौटी माना जाए तो डॉ. नागेश पाण्डेय संजय हमारे दौर के सर्वाधिक सफल बाल साहित्यकार हैं। उन्होंने अपनी नवीनतम कृति ‘टेढ़ा पुल’ का लेखन कर एक बार फिर इस बात को प्रमाणित किया है। उपन्यास का प्रारम्भ जिस रोचक अंदाज़ में होता है, वह लेखक के सफल शिक्षक और बाल मनोविज्ञान का अध्येता होना सिद्ध करता है। उपन्यास की प्रारम्भिक पंक्तियों से ही जो उत्सुकुता और रोचकता उत्पन्न होती है वह अंतिम पंक्तियों तक बनी रहती है।
उपन्यास का मुख्य पात्र ‘गिजू’ माता पिता के आपसी अलगाव की आंच में झुलसते बचपन और उसके अन्तर्द्वद्व को बार बार अभिव्यक्त करता है और पाठक को यह सोचने को मजबूर करता है कि आखिर माता पिता के आपसी विवाद ,कलह और अलगाव के दुष्परिणाम बच्चे क्यों झेलें ? बच्चों का कोड भाषा गढ़ना ,अपने शिक्षकों के उपनाम रखना, पिता के सान्निध्य को लालायित होना, स्कूल में शिक्षण ना होने पर भीतर ही भीतर कुढना जैसे मनोभावों को ‘टेढ़ा पुल ‘ में बहुत बारीकी और सहजता से डॉ. नागेश पाण्डेय संजय ने चित्रित किया है। उनकी कलम का कमाल इन पंक्तियों में देखिये -----मलकीत चिल्ला रहा था –"ओए,मैं फूल नहीं हूँ। आई एम नाट ए फूल। आई एम इंटेलीजेंट।"
"अच्छा तो एक सवाल का जबाव दोगे ?"
"पूछो।"
"बट मीन्स लेकिन तो व्हाट मीन्स क्या ?"
"क्या।" मलकीत ने तुरंत जबाव दिया।
अंकुर हंसा –"तुम बताओ"
"बताया तो... क्या ?"
"कहाँ बता पा रहे हो ? क्या क्या कर रहे हो।"
इस तरह बच्चों के आपस में चुहल करने की अनेक घटनाएँ ‘टेढ़ा पुल’ को सरस बनाये रखती हैं। इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष जो इसे पाठ्यक्रमोपयोगी बनाता है, वह है बहुत सहज सरल ढंग से मुहावरों और लोकोक्तियों के बारे में जानकारी देना। जिस तरह बाल साहित्य के जनक विष्णुगुप्त बच्चों को खेल-खेल में शिक्षा देने में निष्णात थे, उसी तरह टेढ़ा पुल का लेखक भी कहानी सुनाते सुनाते समय कब बच्चों को मुहावरे और लोकोक्तियों में फर्क करना,उनका अर्थ ग्रहण करना ,पर्यायवाची लिखना सिखा देता है पता ही नहीं चलता। पंक्तियाँ देखिये –
“ तिवारी सर, सख्त तो बहुत थे पर हिंदी बहुत अच्छी पढाते थे। मुहावरे और लोकोक्ति की पहचान का बहुत अच्छा तरीका उन्होंने बताया था कि मुहावरे के अंत में ‘ना’ आता है और लोकोक्ति पूरा कथन होती है। जैसे ‘हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या ? लोकोक्ति है तो आँखे दिखाना ,’नौ दो ग्यारह होना’ मुहावरा है। ----एक दिन उन्होंने बताया जल के पर्यायवाची याद कर लो, उनमे ‘द’ जोड़ दोगे तो बादल ,’ज’ जोड़ दोगे तो कमल और ‘धि’ जोड़ दोगे तो समुद्र के पर्यायवाची हो जायेंगे। जैसे जलद,वारिद ,तोयद आदि बादल के पर्यायवाची हैं।”
उपन्यास का शीर्षक ‘टेढ़ा पुल’’ गिजू के मनोमस्तिष्क पर अंत तक चिपका रहता है। लेखक शीर्षक को अपने अंत में अपने इस कथन के साथ उपयुक्त सिद्ध करने में सफल होता है –“वेरी गुड! अब मैं भी बेधडक दौड़ सकूंगा। मेरा टेढ़ा पुल भी सीधा हो गया है।”
दुधवा नेशनल पार्क की यात्रा, छात्रों का फिल्म देखने जाना समेत अनेक ऐसी घटनाएँ हैं जो बाल मन की स्वाभाविक जिज्ञासा को निरंतर उत्प्रेरित करती हैं। एक मात्र खटकने वाली बात यदि खोजी जाए तो इस उपन्यास में एक ही प्रतीत होती है वह है-- गिजू के पिता के अस्पताल में भर्ती होने के घटनाक्रम के साथ ही ‘गिजू’ के माता पिता के सुलह की संभावना निश्चित हो जाना। रहस्य का जो वातावरण कथा के प्रति निरंतर रोचकता और उत्सुकुता जगाए रखने के लिए आवश्यक था वह समय से पूर्व ही खुल गया है और कोई भी अस्पताल में गिजू के नाना नानी और मामा द्वारा गिजू के पिता की सेवा सुश्रुषा से निष्कर्ष निकाल सकता है कि इस उपन्यास का समापन गिजू के माता पिता के मिलन या अलगाव समाप्त होने के साथ होगा। इस बिंदु पर लेखक किसी घटनाक्रम को जोड़कर रहस्य को अंत तक बनाये रख सकता था परन्तु यह कोई ऐसा विषय नहीं है जिसके लिए इस ‘टेढ़ा पुल’ के सबल पक्षों को भुला या नकार दिया जाए। आकर्षक सजिल्द कलेवर 150 रूपये मूल्य का 64 पृष्ठों का विभा प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित ‘टेढ़ा पुल’ बाल उपन्यास डॉ. नागेश पाण्डेय ‘संजय‘ की रचना यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
समीक्षक : अरविंद पथिक
(समकालीन चौथी दुनिया, नई दिल्ली, जनवरी , 2018 में प्रकाशित)
बुधवार, 15 अप्रैल 2026
पुस्तक-समीक्षा, यदि ऐसा हो जाए (बाल कविता संग्रह), समीक्षक : प्रो. हौसिला प्रसाद सिंह
पुस्तक परख
पुस्तक : यदि ऐसा हो जाए (बाल कविता संग्रह)
रचनाकार : डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’
प्रकाशक :अनंत प्रकाशन ए-569, इंदिरा नगर, लखनऊ
मूल्य :150/- रुपये, पृ. 96
आज का बालक उपभोक्तावादी समाज का हिस्सा बन गया है। उसका सर्वाधिक प्रेम और लगाव मशीनों (टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल) से है। पढ़ाई के बोझ में दबे होने से साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के लिए उसके पास न तो समय है और न रुचि लेकिन इसके बाद भी बाल कहानियों और कविताओं के प्रभाव और क्षमता ने उसे अपनी ओर आकर्षित कर रखा है।
नागेश पांडेय ‘संजय‘ बाल साहित्य की रचनाशीलता में अग्रगण्य हैं। चल मेरे घोडे, अपलम चपलम और लारी लप्पा के बाद पिछले दिनों उनकी 51 बाल कविताओं का संग्रह यदि ऐसा हो जाए प्रकाशित हुआ है। संग्रह की कविताएँ आज के बाल परिवेश के सर्वथा अनुकूल हैं। जहां अत्याधुनिक विषय मोबाइल, रोबोट, पर्यावरण, चुनाव और सरकार पर इसमें रोचक कविताएँ हैं, वहीं प्रकृति, समाज, देश, शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और नीति पर भी बड़ी ही चुस्त और सधी हुयी रचनाएँ संकलित की गईं हैं। रचनाकार ने पुस्तक की भूमिका में लिखा भी है-"मैं मानता हूं कि तुम्हारी कविताएं-तुम्हारी अपनी भाषा में होनी चाहिए और उनमें तुम पूरी तरह जीते-जागते, उछलते-कूदते, ठुमकते-थिरकते, चहकते-खेलते भी नजर आओ, यह तो बहुत जरूरी है। दूसरी बात-कविता मन से उपजी हुई चीज है। ऐसा होता है, तभी वह मन को छूती है। इन कविताओं को पढ़ोगे तो उपर्युक्त बातों को जरूर महसूस करोगे। कविताओं में तुम्हारी अपनी सोच है। तुम्हारे अपने विचार है-तुम्हारी कल्पना है और तुम्हारे जीवन को सच भी। तुम्हारे आस-पास की चीजों को मैंने तुम्हारी निगाह से देखने-तुम्हारे दिल से महसूस करने और तुम्हारी अपनी शैली में कहने की कोशिस की है।"
पहली कविता में कल्पना भी है और आत्मबोध भी -इम्तहान को दिए बिना ही,अगली कक्षा जाएँ। बिना कुछ किए, सारे जग में ऊँचा नाम कमाएँ। यदि ऐसा हो जाए तो सच मजा बड़ा आएगा। पर भइया बिन मेहनत फल कुछ रास नहीं आएगा।
मोबाइल पर बाल मन की अभिव्यक्ति भी प्रशंसनीय है-
जहाँ कही भी जाता, तुमको हरदम रखता साथ। चिट्ठी का क्या काम, कि फौरन हो जाती है बात। लेकिन ‘विजी’ बोलते हो जब, तो उठती है खीझ।
चिड़ियाघर का मुख्य प्रयोजन बालकों का पशु पक्षियों से रिश्ता कायम करना है- बाघ, भेड़िये और लोमड़ी देख - देख हर्षाए, पर देखा जब हुक्कू बंदर फूले नहीं समाए। मजा आ गया उसके संग मे हुक्कू-हुक्कू दोहराकर। मैंने देखा चिड़ियाघर
शाब्दिक पुनरावृत्ति के चलते यह कविता बच्चों को विशेष रुप से मन भाएगी- भूख लगी है,कब तक कब तक? खाना-पानी, दें ना नानी जब तक जब तक, तब तक तब तक।
उड़न खटोला पर कविता संभवतः अपने विषय पर पहली कविता है-उफ! कितनी ऊँचाई थी,नीचे गहरी खाई थी। लोग बजाते थे सीटी, लगते थे जैसे चींटी।
चुनाव कविता किशोर मन के अधिक निकट है-यहां सभी को हैं सब प्यारे यहां नहीं गिरतीं सरकारें,नहीं पेंच या दाँव हमारे विद्यालय में। मम्मी हुआ चुनाव हमारे विद्यालय में।
धूप का मानवीकरण और फिर बालक का संवेदित मन इस कविता में सहज उदघाटित हुआ है-धूप न निकली आज,कहीं बीमार तो नहीं ? सुबह-सुबह आ जाती थी,इतराती-इठलाती थी,माखन बन मुस्काती थी,मिसरी बन शरमाती थी। कभी आग बरसाती थी,जो हो, मन को भाती थी। किए बेतुके काज, मगर हर बार तो नहीं।
दादा-दादी चुप क्यों रहते ? कविता मार्मिक है जो पौत्र के बहाने उनका अकेलापन बयां करती है और वृद्धों की दशा पर बड़ों को सोचने पर मजबूर भी करती है।
कुल मिलाकर प्रभावान्विति और प्रयोजनशीलता की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत उपयोगी और विशिष्ट है।
समीक्षक : प्रो. हौसिला प्रसाद सिंह, इलाहाबाद
(बाल वाटिका, भीलवाड़ा, राज. के सितम्बर 2013 अंक में पृष्ठ 47 पर प्रकाशित)
बुधवार, 8 अप्रैल 2026
पुस्तक-समीक्षा,नटखट बाल कहानियाँ, समीक्षक : राजकुमार जैन राजन
बालमन को प्रभावित करती 'नटखट बाल कहानियाँ'
समीक्षक : राजकुमार जैन राजन
समीक्ष्य कृति : 'नटखट बाल कहानियाँ'
लेखक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
प्रकाशक : अनुराग प्रकाशन, 4760-61, द्वितीय तल, 23-अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002
संस्करण : 2021
दूध, भोजन, खेल व जीवन रक्षक दवाएँ बालकों के लिए जितनी आवश्यक होती है उतनी ही आवश्यक होती हैं पुस्तकें। बच्चों का मन एक कोरे कागज जैसा होता है जिसपर लिखी गई इबारत को आसानी से नहीं मिटाया जा सकता है इसी तरह बाल मन पर जो कुछ अंकित हो जाता है वह अमिट स्थान बना लेता है। आज के परिवेश में बच्चे की जिज्ञासा का क्षितिज चाहे जितना बड़ा हो गया हो पर उसकी प्रारंभिक जिज्ञासा मूल रूप में अपरिवर्तित है। इसके लिए बालक के मनोविज्ञान को समझते हुए उसकी शिक्षा, दीक्षा, पठन, पाठन में बड़ी सावधानी रखनी चाहिए। बालकों के सुदृढ जीवन निर्माण में बाल साहित्य का प्रमुख स्थान है। विश्व के हर देश और हर भाषा में बाल साहित्य बहुतायत से लिखा जा रहा है। आज जो बच्चे अच्छा बाल साहित्य पढेंगें; वे ही कल इंजीनियर, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, सैनिक, व्यापारी, अधिकारी, साहित्यकार आदि बनेंगे। जिस प्रकार के आदर्श और नैतिक मूल्य हम उनके सामने रखेंगे, भविष्य में वही फलित होंगे। यदि हम बच्चों को श्रेष्ठ बाल साहित्य ही देंगे तो उन्हें अनेक दुष्प्रभावों से मुक्त रख सकते हैं।
अच्छी पुस्तकें बालकों के मानसिक क्षतिज को बढ़ाने में सहायक होती है तो दूसरी ओर उनकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता में भी नए आयाम जोड़ती है। बच्चों के सम्यक विकास में स्वस्थ, मनोरंजक, सुरुचिपूर्ण, संस्कार सम्पन्न्न, ज्ञानवर्धक बाल साहित्य की उपादेयता एवं उपयोगिता निर्विवाद है। बाल साहित्य के ख्यातनाम रचनाकार डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' का
बेहतरीन बाल कहानी संग्रह " नटखट बाल कहानियाँ " प्रकाशित हुआ है जो उपरोक्त कसौटियों पर खरा उतरता है।
आज के बालक की रुचि, रुझान और बाल मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ रखने वाले शाहजहाँपुर निवासी डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' के बच्चों के लिए अनेक कहानी, कविता, एकांकी, पहेली संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ; जिनमें 'आधुनिक बाल कहानियाँ', 'मोती झरे टप-टप', 'नेहा ने माफी मांगी', 'दीदी का निर्णय', 'छोटे मास्टर जी', 'कद्दू की दावत', 'अपलम चपलम', 'पीठ पर बस्ता', 'जो बुझे वो चतुर सुजान' आदि प्रमुख हैं। आपकी कई रचनाओं का पंजाबी, कन्नड़, गुजराती, मराठी, उड़िया, राजस्थानी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। आपकी कई रचनाओं को स-सम्मान शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में भी सम्मिलित किया गया है। बाल साहित्य में शोध/आलोचना के क्षेत्र में भी आपने कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है। 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान', ' चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट, इंडिया', 'नेपाल बाल साहित्य समाज', ' भारतीय बाल कल्याण संस्थान', ' राजकुमार जैन राजन फाउंडेशन', 'साहित्य मण्डल', 'बाल साहित्य शोध केंद्र' जैसी अनेक ख्यातनाम संस्थाओं द्वारा श्रेष्ठ बाल साहित्य सृजन के लिए डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' सम्मानित किया हैं।
" नटखट बाल कहानियाँ " बाल कहानी संग्रह में डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' की बालकों को जीवन का पाठ पढ़ाती 28 प्रतिनिधि बाल कहानियों को संजोया गया है। 'खेल-खेल में' कहानी में बताया गया है कि बेमतलब किसी को परेशान नहीं करना चाहिए अन्यथा कभी भी मुसीबत खड़ी हो सकती है। 'मैं जाग रहा था' एक मनोरंजक कहानी है जो बालमन के नटखटपन को दर्शाती है।किसी मे यदि कोई शारीरिक कमी हो तो बार-बार उसका मजाक बनाने, चिढ़ाने से वही स्वयं की आदत बन जाती है। 'कहीं ऐसा हो तो?' कहानी में नीरव की हकलाने की आदत को लेकर प्रणव उसकी मजाक बनाता रहता और स्वयं हकलाते हुए बोलता। धीरे-धीरे यह उसकी आदत ही बन गई जो ठीक नहीं हो पाई और नीरव ने लगातार प्रयास कर अपनी हकलाहट को खत्म कर दिया और धारा प्रवाह बोलने लगा। 'उड़न तश्तरी' कहानी को इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी कहना चाहूंगा जो पर्यावरण संरक्षण के साथ ही मानवता का सन्देश किस उत्कृष्ट अंदाज़ में देती है। इस कहानी का एक संवाद देखिए।एलियन सोनू को कहता है, *'क्योकि पृथ्वीवासियों को लड़ने -भिड़ने से ही फुर्सत कहाँ? आए दिन तो यहाँ दंगे-फसाद होते हैं।लोग खाली बैठ कर गप्पें लड़ाते हैं।एक दूसरे की बुराइयाँ खोजते हैं। जाति और धर्म के नाम पर जूझते हैं। हमारे ग्रह के हर वैज्ञानिक को खूब सुविधाएं हैं। .... आपकी पृथ्वी की तरह हमारे यहाँ ढेरों भगवान नहीं हैं। हमारे यहाँ सिर्फ एक ही भगवान है- विज्ञान। हम सब उसके बारे में ही सोचते हैं और कर्म को पूजा मानते हैं ... हमारे ग्रह पर पृथ्वी की तरह मानवों की जातियाँ भी नहीं होती .. हमारे यहाँ तो बस ... मानव जाति, पशु जाति, पक्षी जाति.. यह जरूर होता है ... आपकी आपकी पृथ्वी पर ऐसा कहाँ?'*
'काल करे सो आज कर' कहानी श्रम व समय की महत्ता बताती है तो 'नेहा ने माफी मांगी'एक नटखट बालिका की कहानी है जो अपनी हरकतों से सबको परेशान किया करती थी।एक दिन नेहा को ऐसा सबक मिलता है कि वह शरारतों से तौबा कर लेती है और अपनी गलतियों के लिए माफी मांगती है। इसी तरह इस संग्रह की सभी कहानियाँ एक से बढ़कर एक श्रेष्ठ हैं। लेखक बालकों को सीधे सीधे कोई सीख नहीं देता है बल्कि स्वयं निर्देशक बनता है है और चरित्रों को उसी दिशा में मोडता जाता है, जिससे पाठक अपने आप कहानी के मन्तव्य को ग्रहण कर लेता है।इन कहानियों की भाषा सहज एवं सरल है जिनमें बाल सुलभ मस्ती है, रोमांच है, संवेदनाएं हैं, राष्ट्रीयता की भावना है विज्ञान का ज्ञान है, पर्यावरण संरक्षण की बातें हैं, कहानियों में कविताएँ हैं, सामाजिकता है, रिश्तों की महक है, जागरूकता है और है कोमल हृदय को प्रभावित करने वाली निर्मलता भी। कुल मिलाकर देखें तो 28 ही कहानियों में उतने ही मन भावन रंग हैं। ये कहानियाँ बच्चों का मनोरंजन ही नहीं करेगी बल्कि उनके शारीरिक व मानसिक विकास में भी सहायता करेगी। पुस्तक खूबसूरत सजिल्द आवरण पृष्ठ के साथ सुंदर चित्रों सहित प्रकाशित की गई है। सबकुछ उत्कृष्टतम होते हुए भी 136 पृष्ठ की किताब का मूल्य 450 रुपये रखना गले नहीं उतरता है। बहरहाल, इस खूबसूरत बाल कहानी संग्रह के लिए डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' को हार्दिक बधाई । यह पुस्तक बाल साहित्य जगत व पाठकों में सम्मान प्राप्त कर बाल साहित्य जगत में श्रीवृद्धि करेगी, मंगलकामनाएं !
◆ समीक्षक : राजकुमार जैन राजन
(दैनिक "दस्तक प्रभात", पटना, 13/02/2022)








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