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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

पुस्तक-समीक्षा/नेहा ने माफी मांगी

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं (नंदन, बाल भारती, हिंदी प्रचारक पत्रिका, अक्षर भारत में 'नेहा ने माफी मांगी' पुस्तक पर प्रकाशित टिप्पणियाँ 

(1) नंदन, नई दिल्ली 

(नंदन, मासिक , नई दिल्ली, सितंबर 1995, पृष्ठ 64)

नेहा ने माफी मांगी- लेखक 'संजय'; प्रकाशक : राही प्रकाशन, 43, चौकसी, शाहजहांपुर (उ.प्र.); मूल्य 10 रुपए ।

कुल छह कहानियां है पुस्तक में। खेल-खेल में, अंधेरा हट गया, देखा तो चौंकी, जल्दी चलिए वहां, नेहा ने माफी मांगी तथा मैं जान गया हूं। आज के बच्चों के सामने कैसी-कैसी समस्याएं आती हैं, वे उनसे किस तरह बचने के रास्ते निकालते हैं- कहानियां इन्हीं बच्चों के आसपास घूमती है। 'खेल-खेल में' कहानी बहुत अच्छी है।

- बृज (नंदन, मासिक , नई दिल्ली, सितंबर 1995, पृष्ठ 64)

(2) बाल भारती, नई दिल्ली 

(बाल भारती, मासिक, नई दिल्ली, अक्टूबर 1994, पृष्ठ 60)

पुस्तकः नेहा ने माफी मांगी; लेखकः नागेश पांडेय 'संजय'; प्रकाशकः राही प्रकाशन, 43, चौकसी, शाहजहांपुर (उ.प्र.)-242001; मूल्यः 10 रुपये।

छः कहानियों की इस पुस्तक में बच्चों को सिखाया गया है कि आपस में हिलमिल कर रहना चाहिए। एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए इत्यादि। अच्छे नागरिक बनने की दिशा में ये कहानियां बच्चों के लिए सहायक सिद्ध होंगी।

(बाल भारती, मासिक, नई दिल्ली, अक्टूबर 1994, पृष्ठ 60)


(3) हिंदी प्रचारक पत्रिका, वाराणसी


(हिंदी प्रचारक पत्रिका , वाराणसी, नवंबर 1995 पृष्ठ 6)

नेहा ने माफी माँगी/ ले. नागेश पाण्डेय 'संजय'

बाल मन को कहानियाँ आरम्भ से प्रभावित करती रही हैं। कहानियाँ बालकों को किसी बात को सरल और आसान ढंग से समझाने का माध्यम रही हैं। श्री 'संजय' की कहानियाँ आधुनिकता बोध से जुड़ी हैं। बाल मानसिकता की उनकी कहानियों में बाल जीवन का स्पन्दन है। सरल भाषा में लिखी उनकी कहानियाँ सहज ही अपना प्रभाव छोड़ती हैं। (हिंदी प्रचारक पत्रिका , वाराणसी, नवंबर 1995 पृष्ठ 6)


(4) यू.यस. एम. पत्रिका, गाजियाबाद

(यू.एस.एम. पत्रिका/नव.-दिस. 1994, पृष्ठ 74)



बाल कथा पुस्तक : नेहा ने माफी मांगी 

समीक्षक : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी 

इस पुस्तक की पहली ही कहानी 'खेल खेल में' पढ़ी तो उसने मुझे ऐसा जकड़ लिया कि उठने ही न दिया, और उसी क्रम में सारी कहानियां एक ही सांस में, एक ही 'सिटिंग' में पढ़ गया। बहुत कम होता है ऐसा मेरे साथ।

बालकों की शैतानी, उनके नटखटपन, उनकी चपलता. उनके चुलबुलेपन को लेखक ने बड़े ही सहज-सरल ढंग में चित्रित किया है। साथ ही उनकी इन चंचलताओं को उनके हृदय परिवर्तन की दिशा में जो स्वस्थ मोड़ दिया है वह भी बहुत सहज है, सर्वथा सराहनीय है।

साहित्य बड़ों के लिए हो या बालकों के लिए, युग बोध से जुड़ा तो उसे होना ही चाहिए। भावी पीढ़ी को चरित्र की दृष्टि से वलिष्ठ बनाना आज के युग की बहुत बड़ी आवश्यकता है। इस दृष्टि से भी विना कोई उपदेश दिए,बालकों में स्वस्थ संस्कारों के अंकुर जमाने में श्री नागेश पांडेय संजय' का यह कहानी संग्रह प्रभावी सिद्ध होगा, ऐसा मेरा. विश्वास है। विश्वास यह भी है कि बालक इन कहानियों को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और स्वस्थ साहित्यिक आनंद प्राप्त करेंगे।

कहानियों की भापा बोल चाल की भाषा है, बालकों जैसी ही सरल है। अभिव्यक्ति में भी लगता है जैसे बालक स्वयं ही बोल रहे हों।

पुस्तक : नेहा ने माफी मांगी (बाल कहानी संग्रह); लेखक : नागेश पांडेय 'संजय'; प्रकाशक : राही प्रकाशन, शाहजहांपुर; मूल्य : दस रुपये 

समीक्षक : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

(यू.एस.एम. पत्रिका/नव.-दिस. 1994, पृष्ठ 74)


(5) अक्षर भारत दैनिक, नई दिल्ली 

(अक्षर भारत, दैनिक 2 सितम्बर 1996)

बच्चों के लिए प्यारी बाल कहानियाँ 

युवा बाल साहित्यकार नागेश पांडेय 'संजय' की छह बाल कहानियों का संग्रह 'नेहा ने माफी मांगी' राही प्रकाशन, 43, चौकसी, शाहजहांपुर (उ.प्र.) से प्रकाशित हुआ है। इसमें कथाकार की प्रतिनिधि बाल कहानियां संग्रहीत हैं।

कहानियों की भाषा अत्यंत सरल है। कहीं भी उपदेश थोपने की गलती नहीं की गयी है। कथाकार में बच्चों की मानसिकता के अनुरूप कथा बुनने की कला है और वह बहुत सहज और प्रभावी ढंग से अपनी बात कहानी के माध्यम से व पिरो देता है। भूमिका में डा. श्रीप्रसाद ने ठीक ही लिखा है 'बाल मानसिकता की उनकी कहानियों में बाल जीवन स्पंदित होता है। यही उनके कहानी लेखन की सफलता है।

विश्वास है दस रुपए वाली इस कथा कृति का बाल पाठकों में स्वागत होगा।

समीक्षक : भगवती प्रसाद द्विवेदी 

(अक्षर भारत, दैनिक 2 सितम्बर 1996)

(6) नवनीत मासिक, मुंबई 

(नवनीत, मासिक, मुंबई, जुलाई 1995, पृष्ठ 25)








नेहा ने माफी मांगी , कथाकार : नागेश पांडेय संजय, राही प्रकाशन, शाहजहांपुर ; मूल्य : दस रुपये मात्र 

समीक्ष्य कृति में बाल साहित्यकार नागेश पांडेय 'संजय' की छह प्रतिनिधि बाल कहानियां संग्रहीत हैं। रचनाकार ने स्वीकारा भी है कि उसने बाल साहित्यकारों और पाठकों की प्रतिक्रियाओं को आधार बनाकर रचनाओं का चयन किया है।

सकारात्मक जीवन की ये कहानियां बाल मनोविज्ञान की बारीकी से पड़ताल करने के बाद सजग होकर लिखी गई हैं। सभी कहानियों के केन्द्र में बालक हैं और उनके जीवन के उतार-चढ़ाव, ईर्ष्या-द्वेष, भटकाव और मनोवृत्ति को रेखांकित करते हुए उन्हें अत्यन्त सहज ढंग से सही राह पर कदम बढ़ाने की प्रेरणा दी गई है।

कहानियों की भाषा अत्यन्त सरल है। कहीं भी उपदेश थोपने की गलती नहीं की गई है। कथाकार में बच्चों की मानसिकता के अनुरूप कथा बुनने की कला है और वह बहुत सहज और प्रभावी ढंग से अपनी बात कहानी के माध्यम से कह देता है

- भगवती प्रसाद द्विवेदी

(नवनीत, मासिक, मुंबई, जुलाई 1995, पृष्ठ 25)




रविवार, 5 अप्रैल 2026

पुस्तक समीक्षा/ चालू लालू, समीक्षक-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना

पुस्तक समीक्षा 

चालू लालू

लेखकः-डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

प्रकाशक- मधु प्रकाशन

बदायूँ (उ.प्र.)

प्रथम संस्करण - 2016

पृष्ठ-16/ मूल्य-रु.10/-

समीक्षक -डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई (उ.प्र.)

 बालसाहित्य के युवा अधिकारी विद्वान डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' जी की 14 शिशु कविताओं का संग्रह है। इनके शीर्षक हैं-आ गौरैया मेरी पीठ खुजाओ, लेख तुम्हारा, चालू लालू, शलजम, दादाजी, टिंकु के दोस्त, मुन्नू का बाजा, डॉक्टर बिल्ली, दीवाली पर दीवाला, आई बँदरिया, भूत, स्वागत, और घोड़े दादा ! सभी रचनाएँ छोटी ? चटपटी और खिलंदड़ेपन से युक्त हैं। हर कविता का अपना मज्जा है और अपना अनोखा अंदाज है। भाषा की सरलता और तुकबंदी इनकी अपनी विशेषता है। उदाहरणार्थ चालू लालू का कमाल देखिए-मूँगफली मैंने दिलवाई/दाने गटक गए/मैने माँगी मूँगफली तो/छिलके पटक गए।' आ गौरैया' में नन्हे मुन्नों को सहज ही गौरैया की याद दिलाई गई है! यथा-'रखा कटोरी में है पानी/अपनी प्यास बुझा गौरैया।' इसी प्रकार कवि ने बच्चों को अपना लेख सुधारने की सलाह इन पंक्तियों में दी है- 'मोती जैसे अक्षर लिखकर/गढ़ो शब्द की माला/इसमें काहे की कंजूसी / काहे का घोटाला !' और हाँ अगर हर बच्चे के पास उसके दादाजी हों तो फिर कथा कहानी सुनाने का क्रम फिर शुरू हो सकता है? यथा- "मेरे प्यारे दादाजी/सबके मन को भाते है/रोज रात, सोने से पहले/सुंदर कथा सुनाते हैं।" सभी शिशुकविताएँ रोचक, प्रेरक और उपयोगी हैं। इन कविताओं को बच्चे तो गाते गुनगुनाते हुए कंठस्थ करेंगे ही, तीन से पाँच वर्ष की आयु वाले शिशुओं को सुनाकर तो उनसे दोहरवाकर उन्हें भी आनंदित किया जा सकता है। इस दृष्टि से पुस्तक नर्सरी और के.जी. के पाठ्यक्रम में भी रखी जा सकती है। सस्ती होने के कारण पुस्तक गरीब अविभावकों की पहुँच में है। वस्तुत-यह शिशुओं के लिए एक उपयोगी, पठनीय एवं संग्रहणीय किताबी खिलौना भी है।

समीक्षक-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई (उ.प्र.)

(बाल वाटिका, मार्च 2018, पृष्ठ 66 पर प्रकाशित)





पुस्तक समीक्षा/बाल साहित्य सृजन और समीक्षा, समीक्षक : योगीन्द्र द्विवेदी

पुस्तक समीक्षा 

बाल वाणी, जनवरी-फरवरी, 2014, पृष्ठ 62

बाल साहित्य सृजन और समीक्षा

समीक्षक : योगीन्द्र द्विवेदी 

इसमें दो राय नहीं कि हिन्दी बाल साहित्य अब प्रौढ़ हो चुका है और इसी अनुपात में इससे सम्बन्धित समीक्षा पुस्तकों की भी कमी नहीं है, तो भी सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ. नागेश पाण्डेय 'संजय' की यह पुस्तक अपनी समूची प्रस्तुति में अलग छाप छोड़ती है। लगभग सौ पृष्ठों की यह पुस्तक 14 अध्यायों में विभाजित है और इनमें अत्यंत संक्षेप और सरल भाषा में सम्बन्धित विषयों को समझाने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इनमें से कुछ अध्याय यहां उल्लेखनीय हैं हिन्दी की पहली बाल कहानी, बाल कविताएं: वाह वाह, किशोर साहित्य: कल और आज, बालिकाओं के लिए साहित्य, बाल पहेलियों के विकास यात्रा, बाल साहित्य में अनुसंधान, बाल साहित्य और इंटरनेट तथा बाल साहित्य के समक्ष चुनौतियां आदि। पुस्तक के कुछ अध्याय यदि न होते जो ज्यादा बेहतर होता, मसलन बाल साहित्य में चौर्यवृत्ति और बाल साहित्य में अनुसंधान आदि। इनकी चर्चा सम्बन्धित अन्य अध्यायों में आसानी से हो सकती थी। समग्रता में पुस्तक 'बाल साहित्य, सृजन और समीक्षा' अत्यंत उपयोगी है और इसके विषय में सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद' ने ठीक ही कहा है कि लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। उल्लेखनीय है कि डॉ. नागेश पाण्डेय 'संजय' के कई बाल कहानी संग्रह, बाल कविता संग्रह, और किशोरों आदि के लिए उपयोगी अनेकानेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। इस सृजनशील परम्परा को यह पुस्तक और आगे बढ़ाती है।

पुस्तक : बाल साहित्य, सृजन और समीक्षा

लेखक : डा. नागेश पाण्डेय 'संजय'

पृष्ठ : 99

मूल्य : रु. 200-00

प्रकाशक विनायक पब्लिकेशन, 53/50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद-211003

समीक्षक : योगीन्द्र द्विवेदी

पुस्तक समीक्षा/ बाल साहित्य का शंखनाद, समीक्षक : डॉ. शकुंतला कालरा

पुस्तक समीक्षा

पुस्तकः बाल साहित्य का शंखनाद (आलोचना)

लेखकः डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

प्रकाशन : अनंत प्रकाशन, 525/624, सेक्टर-ए, महानगर, लखनऊ (उ.प्र.)

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2017

मूल्य : रुपए 450/- मात्र पृष्ठ: 112

बालसाहित्य के अध्ययन और अर्चन का शंखनाद

समीक्षक : डॉ. शकुंतला कालरा 

हिंदी बालसाहित्य के विशाल वटवृक्ष के सृजन क्षेत्र में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, साक्षात्कार, यात्रा-वृत्तांत आदि विविध शाखाओं के साथ-साथ बालसाहित्य-आलोचना विधा भी अपनी पूरी गरिमा के साथ विकसित हो रही है। आलोचना बालसाहित्य की दशा-दिशा का एक खुला चित्र दिखाती है। आज के बालसाहित्य की सही तस्वीर खींच कर अप्रत्यक्ष में बालक और बालमनोविज्ञान का विश्लेषण करती है। गुलाब उसी क्यारी में महकते हैं - जिसकी कटाई-छंटाई होती है। आलोचना बालसाहित्य को महकाने में उसकी सहायता करती है। वह उसकी यथार्थ स्थिति का जायजा लेती है। बदलाव में सहायक सिद्ध होती है। नई दृष्टि के साथ युगानुरूप बालसाहित्य-लेखन की भूमिका आलोचना द्वारा ही निर्मित होगी। यह एक अच्छे आलोचक का काम है कि वह अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए उत्तम बालसाहित्य की कसौटी को उसके प्रतिमानों को व्याख्यायित करे। यह कार्य किया है बालसाहित्य के प्रतिष्ठित एवं चर्चित युवा आलोचक डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' ने। इस क्षेत्र में उनकी अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।' बालसाहित्य के प्रतिमान', 'बालसाहित्य सृजन और समीक्षा' तथा 'बालसाहित्य का शंखनाद' आदि इसके अतिरिक्त उनके छः दर्जन से अधिक स्वतंत्र आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

नागेश की सद्यः प्रकाशित तीसरी पुस्तक 'बालसाहित्य का शंखनाद' है। आज बालसाहित्य में हुई आलोचना की प्रगति से नागेश संतुष्ट दिखाई देते हैं। इसी पुस्तक की भूमिका में उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार किया है कि आज बालसाहित्य में आलोचना विधा पर्याप्त समृद्ध हो चुकी है। उनका वक्तव्य है-'आज बालसाहित्य का आलोचना पक्ष बहुत सबल है। बहुत काम हो गया है। बहुत काम हो रहा है। आज का शोधार्थी बालसाहित्य पर काम करने के लिए भटकने जैसी स्थिति में नहीं है। विविध विषयों पर उत्कृष्ट सामग्री से युक्त महत्त्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं। एक जमाना था, जब आलोचनात्मक सामग्री के अभाव में बालसाहित्य पर अनुसंधान की कल्पना ही दुष्कर थी। विश्वविद्यालय बमुश्किल इस विषय पर कार्य करने की अनुमति प्रदान करते थे। आज तो बालसाहित्य पर संपन्न शोधों की संख्या ही दो सौ को पार कर चुकी है। प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ अब बालसाहित्य पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित करने में गौरव की अनुभूति कर रही हैं। निश्चय ही यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।'

'बालसाहित्य का शंखनाद' प्रस्तुत पुस्तक में आलोचना के अतिरिक्त कुछ बालसाहित्यकारों से जुड़े संस्मरणात्मक आलेख हैं। इस पुस्तक को उन्होंने दो भागों में विभक्त किया है' अध्ययन' और 'अर्चन'। खंड एक यानि 'अध्ययन' के अन्तर्गत बालसाहित्य के क्षेत्र की उपलब्धियों को रेखांकित किया है। खासकर युगीन संदर्भों पर चर्चा की है। सृजित साहित्य में बालक की उपस्थिति और उसकी रुचि को देखने की कोशिश है। बालसाहित्य के चिंतन-मनन से जुड़े नौ आलेख हैं। प्रथम आलेख 'बालसाहित्य का शंखनाद' है जिसमें लेखक ने सूजन और आलोचना के साथ संपादन के क्षेत्र में हुए कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। हिंदी बालसाहित्य से जुड़े सरकारी और स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा दिए गए पुरस्कारों में हुए सुधारों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। विश्वविद्यालय, यू.जी.सी. द्वारा बालसाहित्य को महत्त्व देना, विश्व हिंदी-सम्मेलन में बालसाहित्य का विशेष सत्र रखना, वृहद बालसाहित्य के कोशों का संपादन आदि ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य हैं जिनके आधार पर लेखक ने कहा है कि आज बालसाहित्य का महायज्ञ जारी है और शंखनाद हो रहा है। दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवा आलेख कहानियों से जुड़े हैं जिनमें कहानी के स्वरूप और विविध विषयों की कहानियों की चर्चा है। छठे आलेख 'बालसाहित्य में चित्रांकन' में चित्रों के महत्त्व को दर्शाते हुए इस सच्चाई को स्वीकार किया है कि 'एक कुशल लेखक, समर्थ प्रकाशक वरन् सजग चित्रकार की भी आवश्यकता सिद्ध होती है। तीनों के पारस्परिक समन्वय के बगैर प्रभावी बालसाहित्य का निर्माण असंभव है।' बालसाहित्य के विकास में 'लोकसाहित्य का प्रदेय' शीर्षक के विस्तृत आलेख में नागेश ने सामान्य साहित्य की भांति बालसाहित्य का मूल स्रोत भी लोकसाहित्य को माना है। लेखक ने यह स्वीकार किया है कि बालसाहित्य की नींव को पुख्ता करने की दृष्टि से उसका उल्लेखनीय अवदान है। इसी कारण इसकी अद्भुत संपदा को बचाकर रखना आने वाली पीढ़ी की ईमानदार जिम्मेदारी है। 'बालसाहित्य अकादमी क्यों, कब और कहाँ?' एक अत्यंत संक्षिप्त आलेख है जिसमें लेखक ने सरकार से समस्त लेखकों की ओर से एक निवेदन प्रस्तुत किया है कि 'हिंदी बालसाहित्य अकादमी' बने जिसका मुख्यालय राजधानी में हो। इसमें हर भाषा के बालसाहित्य के जानकार लोग हों। इसका मूल लक्ष्य बालसाहित्य को हर बालक के हाथ में पहुँचाना हो। यहाँ विषय की दृष्टि से अनुपात में तारतम्य का अभाव मुझे थोड़ा खटकता है। पुस्तक में कहानी से जुड़े तो चार आलेख हैं किंतु अन्य विधाएँ बिल्कुल उपेक्षित रही हैं। यदि इस ओर सुधि विद्वान लेखक ध्यान देते तो पुस्तक की पूर्णता में निश्चय ही सहायता मिलती। अगले, संस्करण में इसका संशोधन पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

पुस्तक के दूसरे खंड में लेखक ने बालसाहित्य के कुछ दिवंगत उन बालसाहित्यकारों के साथ अपने संस्मरण साझे किए हैं जिनका बालसाहित्य-सृजन एवं आलोचना के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। ये बालसाहित्यकार हैं नई सोच के धनी डॉ. देवसरे, बहुआयामी कृतित्व के स्वामी: जय प्रकाश भारती, बालसाहित्य के शिखरः डॉ. श्रीप्रसाद, बालसाहित्य के जादूगर डॉ. राष्ट्रबंधु, यादों की खिड़की से झाँकते मनोहर वर्मा। इनके अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त के बालकाव्य तथा सीताराम गुप्त की बालकविता का भी आलोचनात्मक विवेचन किया है।

आलोचना की इस पुस्तक में संकलित सभी आलेखों के विवेचन-विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि डॉ. नागेश एक अच्छे आलोचक हैं। मैथ्यू अर्नल्ड मानते हैं 'आलोचक का कर्तव्य है कि वह संसार के सर्वोच्च ज्ञान और सर्वोत्तम विचारों को जानें, उन्हें सोचें-समझें और फिर उनका सर्वत्रा प्रचार करें।' यही कार्य नागेश ने अपने आलोचना-कर्म के द्वारा किया है चाहे तद्विषयक सूचनाएँ एकत्र करना हो अथवा बालसाहित्यकारों के अवदान को रेखांकित करना हो। आलोचक के तीन गुण होने चाहिए आलोचक पढ़े, समझे और वस्तुओं का यथार्थ रूप देखे। नागेश ने यह कार्य तटस्थ भाव से पूर्वाग्रह से मुक्त रहकर किया है।

एक अच्छे आलोचक का यह भी कर्त्तव्य माना गया है कि उसने जो कुछ सीखा है उससे दूसरों को हस्तांतरित करे। यानि वह रचनात्मक प्रतिभा के लिए उपयुक्त उपजाऊ भूमि तैयार करे। नागेश बहुपठित, बहुज्ञ साहित्यकार हैं। उन्होंने इस आलोचक-कर्म को भी बखूबी निभाया है। बड़े श्रम से वे सूचनाओं को एकत्र करते हैं। स्वयं नई-नई पुस्तकों का ही अध्ययन नहीं करते वरन् पुराने साहित्यकारों की रचनाओं को भी खोज-खोज कर उनका पठन कर पुनः पाठकों को उस ज्ञान से नवाजते हैं और रचना में निहित लेखक के विचारों का अनुसंधान कर उनका प्रतिपादन करते हैं।

निष्कर्षतः सार संक्षेप यह है कि उनके आलेखों में अन्वेषण की नई मौलिकता है। उसमें सतहीपन नहीं है, गंभीरता है। वह रूढ़िबद्ध नहीं ताजापन लिए है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नागेश सृजनात्मक प्रतिभा-संपन्न भी हैं और उनमें आलोचनावृत्ति भी है। सर्जक होते हुए भी उनका मिजाज आलोचनात्मक है। आलोचना, साहित्य का ही एक अंग होती है। पाठक को रचना का पूरा आनंद उसका मर्म समझाने से आलोचना उसकी सहायता करती है। आलोचक वह सजग पाठक होता है जो रचना में निबद्ध संश्लिष्ट अनुभूति का आनंद स्वयं भी लेता है और दूसरों को प्रदान करने में भी उनकी सहायता करता है और यह कार्य नागेश ने बखूबी किया है।

एक वाक्य में उनकी आलोचना में नई तराश, अन्वेषण की मौलिकता के साथ लेखकीय संवेदना भी विद्यमान है। यह ध्यातव्य है कि डॉ. नागेश ने यह पुस्तक 'बालवाटिका' के संपादक डॉ. भैरूंलालगर्ग को समर्पित कर निश्चित ही स्तुत्य कार्य किया है। सचमुच 'बालवाटिका' बालसाहित्य की आलोचना को परिवेश और मंच देकर बालसाहित्य उन्नयन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। बालसाहित्य के सुधि अध्येताओं और अनुसंधित्सुओं के लिए प्रस्तुत पुस्तक पूर्व की दो पुस्तकों की भाँति निश्चय ही उपादेय सिद्ध होगी ऐसा मेरा विश्वास है।

समीक्षकः डॉ. शकुंतला कालरा, दिल्ली

(बालवाटिका, अक्टूबर, 2017, पृष्ठ 60 पर प्रकाशित)


पुस्तक-समीक्षा/रोचक बाल कविताएँ, समीक्षक : डॉ. राकेश चन्द्रा

पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य को समृद्ध करती डॉ. नागेश पांडेय ’संजय’ की रोचक बाल कविताएँ 

-डॉ. राकेश चन्द्रा 

रोचक बाल कविताएँ” डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ का वर्ष 2023 में प्रकाशित बाल कविता संग्रह है जिसके प्रकाशक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली हैं। पुस्तक का आवरण पृष्ठ रंगीन व भीतर के चित्र श्वेत-श्याम हैं। पुस्तक में चित्रांकन सृष्टि पांडेय का है। कुल 98 पृष्ठों की इस पुस्तक में 62 बाल कविताएँ संग्रहीत हैं। इन कविताओं में जहाँ प्रकृति, परिवार, त्योहार जैसे पारंपरिक विषयों को कविता का विषय बनाया गया है वहाँ अनेक नये विषय यथा घर में पुताई, जाम, नई कार व पहाड़ों की सैर व कविताओं की वर्कशाप आदि पर कलम चलाकर कवि ने बाल साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास किया है। 
     संग्रह की प्रथम कविता “तरह-तरह की कविताएँ” उपरोक्त सन्दर्भ में उल्लेखनीय है जिसकी पंक्तियाँ ‘सीप किताबें हैं, कविताएँ मोती हैं,/कविताएँ भी तरह-तरह की होती हैं’, विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। आगे इसी कविता में कवि ने कविताओं के प्रकार का मनोहारी वर्णन करते हुए लिखा है- ‘कुछ कविताएँ मटक-मटक कर पढ़ते हम,/ कुछ कविताएँ अटक-अटक कर पढ़ते हम।/कुछ कविताएँ झूम-झूम हम गाते हैं,/कुछ कविताएँ भूल नहीं हम पाते हैं।’ वस्तुतः, इन कसौटियों पर ही हरेक कवि को अपने कविता-कर्म को परखना चाहिये! विषय अनेक हो सकते हैं पर उनका प्रस्तुतिकरण ही पाठकों को आकर्षित/अनाकर्षित करता है। बाल पाठकों के सन्दर्भ में कवि ने पुन: लिखा है- ‘कविताओं में हम बच्चों की मस्ती है,/कविताओं में जैसे दुनिया बसती है।/ऐसी ही कविताएँ हमको मिला करें,/अगर मिलें ना, तो हम किससे गिला करें?’ कवि ने एक चुनौती खड़ी की है बाल कवियों के समक्ष, इन पंक्तियों के माध्यम से। पर कवियों को अपने शिल्प को धार देने के लिए कोई कार्यशाला भी होना अपेक्षित है। इस परिप्रेक्ष्य में उनकी कविता “कविताओं की वर्कशाप” पठनीय है- ‘कविताओं की वर्कशाप में,/मैंने गीत बनाए जी।/….गीत बनाया बिल्ली जी पर,/गीत बनाया बस्ते पर।/गीत बनाया फिर शिमला के/टेढ़े मेढ़े रस्ते पर।….तीनों गीत सुरीले सुर में,/चहक-चहक कर गाए जी।’ और यदि वर्कशाप के बाद कविता छप जाए तो खुशी कितनी बढ़ जाती है- ‘मजा और भी तब आएगा,/जब कविता छप जाए जी।’ नि:सन्देह, कविता छपने के बाद अनेक पाठकों को आह्लादित कर सकती है। पर विचारणीय प्रश्न यह है कि कविता बनती कैसे है? कवि ने अपनी कविता “दिमाग में कविता” में इसका उत्तर मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते हुए लिखा है- ‘कल मेरे दिमाग में नन्ही/कविता आई जी।/….थोड़ा उछली, थोड़ा कूदी,/थोड़ा थिरकी जी।/और जोर से लगी नाचने,/बनकर फिरकी जी।/……थक कर चूर हो गई तो फिर/ली अंगड़ाई जी,/मन में पलंग बिछाकर लेटी/वह सुस्ताई जी।’ बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं जो यह बताती हैं कि कविता लेखन केवल दिमागी कसरत ही नहीं है, इसके लिए मन और मस्तिष्क का मणिकांचन योग होना आवश्यक है! 
    वैसे तो जाम आज के समय की आम किन्तु विकट समस्या है पर यदि इसे कविता का विषय बना दिया जाए अभिव्यक्ति कुछ इस तरह की होगी- ‘जाम, जाम, जाम।/……भीड़ भड़क्का, धक्कम धक्का,/ठेलम ठेला जी/लगता जैसे लगा सड़क पर,/कोई मेला जी। होने आई शाम,/जाम, जाम, जाम।’ आगे की पंक्तियाँ सोचने को विवश करती हैं- ‘इतने लोग कहाँ से आए?/सोच रही है मुनियाँ।/आबादी के आगे छोटी/लगती है दुनियाँ/क्या होगा अंजाम?/जाम,जाम,जाम।’ (“जाम”) ऐसी ही एक लीक से हटकर कविता है “धीरे चलिए न” जिसकी यह पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं- ‘अरे! ड्राईवर अंकल, थोड़ा/धीरे चलिए न।….यह बच्चों की बस है, कोई/एरोप्लेन नहीं।/इतनी तेज चलाने पर क्या,/कोई बैन नहीं?/बस है या फिर कोई दमकल?/धीरे चलिए न।’ इतने प्रभावी ढंग से बच्चों की इस समस्या को उठाया है कवि ने अपनी रोचक कविता के माध्यम से! इसी प्रकार, घरों में कुछ-कुछ अन्तराल पर पुताई का कार्य होना एक सामान्य बात है. पर एक बालक की दृष्टि में इसे किस रूप में देखा जाता है, वह कवि की इस कविता “मेरे घर में हुई पुताई” से स्पष्ट होता है- ‘मेरे घर में हुई पुताई,/भैया! समझो शामत आई।/पूरे घर में मचा झमेला,/बच्चे-बड़े सभी ने झेला।/….हुआ कहीं गुम मेरा बस्ता,/खोज खोज हालत थी खस्ता।/गद्दे में जब उसको पाया,/चैन तब कहीं जाकर आया।’ आजकल के समय में बच्चों को भारी-भरकम पाठ्यक्रमों से दो-चार होना एक सामान्य बात बन कर रह गई है। इसके बाद भी बच्चों के माता-पिता की अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं है जिसकी मुखर अभिव्यक्ति कविता “कोर्स अगर कुछ कम होता” में इस प्रकार होती है- ‘नहीं नाक में दम होता,/कोर्स अगर कुछ कम होता।/……बातें केवल नंबर की,/यही कहानी हर घर की।/सिर्फ एक बस जाप करो,/टाप करो जी, टाप करो।/जब जी होता, तब पढ़ते/नहीं जरा भी गम होता।’ 
    बच्चों की दुनिया में परिवार का बहुत महत्व होता है। परिवार की सुन्दर व्याख्या करते हुए कवि ने अपनी कविता “परिवार” में लिखा है- ‘ताऊ भोले, ताई भोली,/चाची हैं मिश्री की गोली।/बहुत मेहनती चाचा, दीदी,/भैया अच्छे, भाभी सीधी।/और बुआ जी को सब कहते/हैं बातों का गजब पिटारा।’ कविता “ऊँ! हूँ! दादी” की यह पंक्तियाँ सहज ही ध्यान आकर्षित करती हैं- ‘बिन चश्मे के बाल खींचती,/लगता जैसे खाल खींचती।/बाल उलझते, मैं चिल्लाती;/टूटा देख उन्हें झल्लाती।/…अच्छे खासे बालों का यों,/कचरा कहो कराए कौन?’ परिवार में कुछ अलग किस्म के लोग भी होते हैं जैसे कि “हड़बड़ भैया"- ‘बड़े निराले हड़बड़ भैया।/……गलत शर्ट के बटन लगाते,/छिलके सहित पपीता खाते।/अगर कहो कुछ तो चिढ़ते हैं,/करने लगते बड़-बड़ भैया।’ 
    संग्रह की एक कविता में सिंगल यूज़ प्लास्टिक के प्रयोग से बचने का सामयिक संदेश दिया गया है। कविता “लखमीचंद गए बाजार” की यह पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं- ‘बर्तन अगर नहीं है साथ,/तो लौटोगे खाली हाथ।/दे सकता हूँ भले उधार,/पर पन्नी से तौबा यार।/सिंगल यूज प्लास्टिक बंद,/समझे मिस्टर लखमीचंद?’ एक अन्य कविता “साठ कबूतर” अंकों के खेल में कुछ विशेष बन पड़ी है-’मेरी छत पर साठ कबूतर,/करते रहते ठाठ कबूतर।/तेरह चुगते रहते दाना,/सोलह मिलकर गाते गाना।/…बारह बार-बार उड़ते हैं,/ग्यारह इधर-उधर मुड़ते हैं।…….’ अत्यन्त रोचक कविता! 
    संग्रह की सभी कविताएँ वैविध्यपूर्ण, रोचक व मनोरंजन से परिपूर्ण हैं। कवि ने परम्परागत विषयों से इतर विषय भी अपनी कविताएँ के सृजन हेतु चुने हैं। उनका यह प्रयास सराहनीय है। कविताओं की भाषा-शैली सरल, सुबोध एवं प्रवहमान है। कविताओं मे कहीं-कहीं पर अँग्रेजी भाषा के उन शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनके हिन्दी समानार्थी शब्द उपलब्ध हैं जैसे वर्कशाप, मैगजीन, मैजिक, संडे, एरोप्लेन, टिफिन, ड्राईवर आदि। कतिपय स्थानों पर टंकण त्रुटियाँ हैं जिन्हें आगामी संस्करण में परिमार्जित करना उपयुक्त होगा। कुल मिलाकर, यह पुस्तक बाल साहित्य में कवि का एक महत्वपूर्ण अवदान है।
समीक्षक : डॉ. राकेश चंद्रा 

पुस्तक समीक्षा/टेढ़ा पुल- हरिभूमि दैनिक

पुस्तक समीक्षा 

दो दोस्तों की कहानी : टेढ़ा पुल

यह एक बाल उपन्यास है। इसमें 14 साल के बच्चे गिजू और उसके सहपाठी रोहित की कहानी है। दोनों पढ़ने में तेज हैं, साथ ही मस्ती भी करते हैं। किसी वजह से गिजू अपने पापा से दूर मम्मी के साथ नाना-नानी और मामा के पास रहने लगता है। लेकिन वह अपने पापा के साथ रहना चाहता है। कई उतार चढ़ावों के बाद उसके दादा-दादी और पापा, गिजू और उसकी मम्मी को वापस लेने आ जाते हैं। इस उपन्यास में बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसे पढ़ने में तुम्हें मजा आएगा। स्कूल में होने वाले कार्यक्रम, स्कूल में दोस्तों के साथ होने वाली शरारतें और दुधवा नेशनल पार्क घूमने का रोचक वर्णन भी है। इसे पढ़ना तुम्हें जरूर अच्छा लगेगा।

किताब-टेढ़ा पुल, लेखक-डॉ. नागेश पांडे 'संजय', मूल्य-150 रुपए, प्रकाशक-विभा प्रकाशन, इलाहाबाद

(हरिभूमि, दैनिक की बाल भूमि पत्रिका में 30 जून 2017 को पृष्ठ 12 पर प्रकाशित)

पुस्तक समीक्षा/ टेढ़ा पुल (बाल उपन्यास), समीक्षक : डॉ. दिविक रमेश

पुस्तक समीक्षा 

पुस्तक : टेढ़ा पुल (बाल उपन्यास)

लेखक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

प्रकाशकः विभा प्रकाशन

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2015

मूल्य-150/-

समीक्षक : डॉ. दिविक रमेश

हिन्दी बालसाहित्य का यह सौभाग्य है कि आज उसे समृद्ध करने वाले रचनाकारों की न केवल एक अच्छी-खासी संख्या है बल्कि उसकी अनेक विधाओं को निरन्तर गुणवत्ता प्रदान करने वाले समर्पित और सक्षम रचनाकारों की भी कोई कमी नहीं है। एसे ही रचनाकारों में एक विशेष नाम है डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'। कविता, कहानी, एकांकी, आलोचना, शोध आदि के साथ-साथ उपन्यास जैसी विधा में भी उनकी समर्पित सक्रियता न केवल प्रशंसनीय है बल्कि प्रेरणादायी भी है। उन्होंने संपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया है। मैं ने उनकी रचनाओं को चाव से पढ़ा है और बालसाहित्य के क्षेत्र में उनकी निरन्तर प्रगति के लिए कामना की है।

सुखद संयोग ही कहूंगा कि उनके बाल उपन्यास 'टेढ़ा पुल' का नायक गिजू, उपन्यास के अंत की ओर, दिसंबर, 1990 में प्रकाशित मेरी एक कविता 'सोचा करता से, अपने प्रतिकूल और टेढ़े रास्ते पर ताकत ग्रहण करता नजर आता है। इस कविता की पृष्ठभूमि में किशोर गिजू के द्वन्द्व से उभरते संकल्पित रूप का थोड़ा जायजा लिया जाए- मन को खूबी उलझाने से क्या लभा? समय की अपनी गति है । अच्छा है, वर्तमान को पकड़ा जाए। यद्यपि समय को कौन पकड़ पाया? पर भूत और भविष्य के फेर में वर्तमान को क्यों बिगाड़ा जाए? वैसे भी बीती बातों ने उसे कितना तंग किया है ? भविष्य ने उसे कितना चिंतित किया है। यहां तक कि उसका स्वास्थ्य भी इस कारण अक्सर खराब ही रहता था। नहीं, अब और नहीं। सृजन से प्रेरित हो, आत्ममंथन का सहारा लेकर, अपने खोए आत्मबल को अर्जित और पुष्ट करने की यह लेखकीय दृष्टि निःसंदेह, बालसाहित्य में, नई और जरूरी है। उल्लेखनीय है;कि कृति में अन्य अनेक रचनाकारों की रचनाओं को भी, अलग-अलग संदर्भ में, बखूबी अपनाया गया है जिससे इस बाल उपन्यास को शिल्प के स्तर पर एक अनूठी पहचान मिली है।

'टेढ़ा पुल' का कथ्य आज के जटिल पुरुषसत्तात्मक सामाजिक रिश्तों के परिदृश्य में, पति-पत्नी के रूप में पुरुष और नारी के रिश्तों में आपसी तनावों, बिखरावों और टेढ़ेपन के अनुभवों की बुनियाद पर खड़े रहते हुए, माता-पिता के रूप में बालमन की उलझनों, कड़वाहट और सामाजिक तथा आत्म प्रताडनाओं का रचनात्मक संसार उपस्थित करता है । 'टेढा पुल' शीर्षक वस्तुतः आपसी रिश्तों के बीच के पुल के टेढ़े हो जाने का ही द्योतक है जो लेखक की सकारात्मक दृष्टि के कारण उपन्यास में न केवल अस्तित्वहीन बल्कि अन्ततः सीधा होने को भी बाध्य होता हुआ दिखाया गया है- 'टेढ़ा पुल? पर वह तो बेटे अब नहीं है ।' पापा (राजेन्द्र) थोड़ा रुक कर बोले, 'अब उसे सीधा कर दिया गया है। अब तो वाहन बेधड़क दौड़ते जाते हैं।' वस्तु तो इतनी भर है कि गिजू के मां को अपने पिता के कारण अलग होना पड़ा और गिजू को अपनी मां के साथ अपने नाना-मामा के घर आ कर रहना पड़ा। नाना-मामा के घर आने के लिए उसे टेढ़ा पुल के पास से बस लेनी पड़ी। यहीं से गिजू की बाल मनोदशा के टढ़ेपन का अध्याय भी प्रारम्भ हो जाता है जिसका एक बड़ा भाग उसके स्कूल के प्रागंण में घटित होता है और वही असल में कृति का मूल अथवा प्राण तत्व भी है।

8 अध्यायों में विभाजित इस किशोर- उपन्यास का पहला अध्याय है 'नीपा नेपी गेचलो। शीर्षक ही नहीं बल्कि आगे कि कुछ पंक्तियों को पढ़ कर पाठक को पहले तो उन्हें समझने के कौतूहल से गुजरना होगा। जब समझ में आएगा तो मजा भी खूब आएगा। असल में गिजू और उसके अंतरंग मित्र रोहित के बीच की वह कूट भाषा है जिसके सृजन के लिए शब्द के अंतिम वर्ण को पहले लगाना होता है। अतः नीपा नेपी गेचलो' वस्तुतः 'पानी पीने चलोगे' है। नागेश ने उपन्यास के प्रारम्भ में ही बच्चों के जिज्ञासु मन का ध्यान रखा है । स्कूली जीवन के बहुत ही प्रामाणिक और दिलचस्प अनुभवों से सम्पन्न यह उपन्यास अपने पाठकों को अपनापन देने में समर्थ है। विद्यार्थी के द्वारा अपने अध्यापकों के सकारण अलग नाम रख लेना, अलग अध्यापकों का व्यक्तिव, विद्यार्थियों के बीच के अपने रिश्ते आदि का चित्रण तो हुआ ही है साथ ही बीच-बीच में प्रासंगिक लगने वाली लेकिन जरूरी जानकारियां भी बहुत ही सहज ढंग से साझा की गई हैं, जैसे मुहावरे और लोकोक्तियों का अंतर, विज्ञान की समझ, पुरानी कहानी के प्रति नई सूझ-बूझ की दृष्टि, पढ़ाई का महत्व, अतिथि सत्कार का महत्त्व, बच्चों की बात को भी महत्त्व देने की समझ, ब्रेल का महत्त्व, साहित्य के पढ़ने की जरूरत, सैर का महत्त्व, जानवरों की जानकारी आदि। बच्चों की स्कूली दुनिया की लेखक को गहरी समझ है और वह भी बाल मनोविज्ञान की बुनियाद पर अतः वातावरण का सृजन बहुत ही सहज ढंग से हुआ है। साथ ही बच्चों का बुद्धि विलास भी पढ़ते ही बनता है । बच्चों के बीच के इस प्रश्न-उत्तर के माहोल का आनन्द लीजिए अच्छा दूसरा सवाल पूछता हूं। कौआ उड़ता है आकाश में, मगर रहता कहां? 'पेड पर। मलकीत ने फिर तुरंत जवाब दिया मगर अंकुर फिर हँस रहा था 'गलत। मगर पेड़ पर नहीं, पानी में रहता है जानी। मगर यानी मगरमच्छ। मैं नागेश की भाषा-सामथ्र्य को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहूंगा। भाषा कहीं भी बोझिल नहीं हुई है और न ही कृत्रिम लगती है। कई जगह तो वह अतिरिक्त रूप से आकर्षित हो कर उभरी है । उदाहरण के लिए इस वर्णन को पढ़िए- रोहित की खास बात यह थी कि वह तुरंत नाराजगी को तहाकर रख देता था। उसे ओढ़ता नहीं था। जीवन में गल्तियां किससे नहीं होतीं? पर उन्हें लेकर बैठ जाना और उनको ढोने के चक्कर में अपने जीवन के बाकी सुखों की बलि चढ़ा देना कहां की बुद्धिमानी है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह उपन्यास हिन्दी बालसाहित्य में कुछ जोड़ने का अच्छा काम करेगा और अपने पाठकों का प्रिय सिद्ध होगा।

समीक्षक : डॉ. दिविक रमेश 

(बाल साहित्य समीक्षा, संयुक्तांक जुलाई-दिसम्बर 2016, पृष्ठ 48 पर प्रकाशित)