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सोमवार, 28 सितंबर 2026

पुस्तक समीक्षा : समकालीन बाल साहित्य की दिशा समीक्षक : संतोष खन्ना

डॉ. शकुन्तला कालरा पर केंद्रित पठनीय पुस्तक है ‘समकालीन बाल साहित्य की दिशा' 

समीक्षक : सन्तोष खन्ना 

डॉ.नागेश पांडेय संजय एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं जिन्होंने बाल साहित्य के क्षेत्र में बाल साहित्य आलोचना से लेकर अन्य अनेक पुस्तकों का प्रणयन किया है। यही नहीं, पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से वह ‘बाल प्रभा’ पत्रिका का संपादन भी कर रहे हैं । इधर बाल साहित्य पर उनकी एक नई पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है ‘ समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा।’ डॉ नागेश ने इस पुस्तक का संपादन किया है जो वस्तुत: वर्तमान समय की बाल साहित्य की प्रतिष्ठित हस्ताक्षर डॉ. शकुंतला कालरा के व्यक्तित्व और बाल क्षेत्र में उनके कृतित्व का अगर संपूर्ण नहीं तो विस्तृत लेखा-जोखा तो है। डॉ .शकुंतला कालरा की बाल साहित्य की चार दर्जन से अधिक पुस्तकों को देश के नामी गिरामी साहित्यकारों ने गहराई से खंगाल कर उनमें प्रस्तुत नवनीत को पाठकों के समक्ष लाने का पुनीत कार्य किया है । डॉ.शकुंतला कालरा के बाल साहित्य के अध्ययन के माध्यम से बाल साहित्य की अतीत और वर्तमान परंपरा भी इसमें सजीव हो उठी है। यही नहीं, बाल साहित्य के अध्ययन से उनके सहज,सरल, संवेदनशील, विनम्र और पांडित्यपूर्ण व्यक्तित्व की भी भरपूर झांकी सुलभ होती है, साथ ही उनके बाल साहित्य सृजन के दौरान उनका संघर्ष भी मुखर हो उठता है ।

इस दुर्लभ ग्रंथ में कुल मिलाकर 41 आलेख है जिसमें डॉ. विकास दवे, वेदमित्र शुक्ल तथा आशीष जैसे प्रबुद्ध साहित्यकारों द्वारा डॉ. शकुंतला कालरा से लिए गए साक्षात्कार भी शामिल हैं। इस ग्रंथ में शामिल आलेख देश के उन 38 लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों द्वारा रचित है जो स्वयं बाल साहित्यकार तो हैं ही, उनका साहित्य में अन्यथा भी विपुल योगदान है । इनमें बाल साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में प्रकाश मनु, पदमश्री प्रो. उषा यादव, विष्णु प्रभाकर, रमानाथ त्रिपाठी से लेकर डॉ. प्रताप सहगल, डॉ. चक्रधर नलिन, डॉ. दर्शन सिंह आशट, डॉ. भैरुंलाल गर्ग आदि अनेक साहित्यकार शामिल हैं। 

डॉ शकुन्तला कालरा के बाल साहित्य पर इन रचनाकारों के अवदान को रेखांकित करते हुए इस ग्रंथ के संपादक डॉ नागेश पांडेय ‘संजय’ ने इसके संपादकीय में लिखा है कि ‘समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ.शकुंतला कालरा को समर्पित संपादित ग्रंथ है जिसमें उनको केंद्र में रखते हुए बाल साहित्य के अनेकानेक उद्घाटित -अनउद्घाटित पक्षों का असामान्य विवेचन किया गया है। असामान्य इसलिए इस अर्थ में है कि इसके विश्लेषक साहित्य जगत के सुविज्ञ हैं मर्मज्ञ हैं, उनका विवेचन केवल डॉ. शकुंतला कालरा के साहित्य तक सीमित न रहकर बाल साहित्य के व्यापक फलक का संस्पर्श करता है । अस्तु, इस ग्रंथ को पढ़ते हुए आप समकालीन बाल साहित्य के विशद परिदृश्य से जुड़ाव अनुभव करेंगे।’


वैसे तो यह समूचा ग्रंथ डॉ. शकुंतला कालरा पर लिखा गया एक समीक्षात्मक ग्रंथ है और समूचे ग्रंथ में डॉ. शकुंतला कालरा के व्यक्तित्व और कृतित्व की प्रामाणिक रूप से व्याख्या करता चलता है परंतु इस संबंध में डॉ. नागेश ने भी अपने शब्दों में उनके बाल साहित्य के अवदान पर टिप्पणी करते हुए लिखा है,’ सुखद है कि डॉ. शकुंतला कालरा नवोन्मेषी पथ की निर्मात्री हैं, भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा की स्वामिन। सृजन में समर्थ और समीक्षा में निष्णात ।वे अपनी जगह अकेली हैं। डॉ. शकुंतला कालरा की तुलना डॉ. शकुंतला कालरा से ही की जा सकती है। वह गद्य और पद्य में दोनों में ही प्रतिनिधि विधाओं की लेखिका हैं। साथ ही आलोचना उनका प्रिय विषय है। वह तत्वाभिनिवेशी आलोचक हैं। 

 आलोचक भी वह सर्वोत्तम कोटि की हैं। वह इतिहासकार भी हैं और संपादक भी ।

बाल साहित्यकारों के सर्वाधिक साक्षात्कार लेने का श्रेय उनको ही जाता है । बाल साहित्यकारों में डॉ.शकुंतला का अन्यतम स्थान है।’

इस ग्रंथ में उस समय के हिंदी साहित्य के वरिष्ठ सुप्रसिद्ध साहित्यकार और उनके उपन्यास ‘अर्द्ध नारीश्वर’ केंद्रीय साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित श्री विष्णु प्रभाकर जी ने डॉ. शकुंतला कालरा की बाल कहानियों की ‘विज्ञान, संस्कृति और बाल मनोविज्ञान को सहज भाव से रेखांकित करती बाल कहानियां ‘ शीर्षक से एक संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित समीक्षा लिखी है और इस पुस्तक के फ्लेप पर उसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है,’डाॅ. शकुंतला कालरा जी एक जानी-मानी लेखिका हैं बाल साहित्य क्षेत्र में उन्होंने विशेष सफलता पाई है।’ 

इसी प्रकार वरिष्ठता के क्रम में प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार प्रकाश मनु जी ने डॉ शकुन्तला कालरा की भूरि -भूरि प्रशंसा की है। इस ग्रंथ का प्रथम आलेख बाल साहित्य के उस जाने-माने लेखक प्रकाश मनु जी ने लिखा है । यही इस ग्रंथ का सबसे लंबा आलेख है।उनका चालीस पृष्ठों का यह आलेख डॉ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य सहित उनके समूचे साहित्यिक अवदान को रेखांकित तो करता है ही , परंतु उसके माध्यम से वह डॉ. शकुंतला कालरा के रूप में एक संवेदनशील लेखिका से पाठकों का परिचय भी कराते हैं जिन्हें उन्होंने स्वयं उनके एक अविस्मरणीय संस्मरण के माध्यम से जाना और पहचाना कि वास्तव में बाल साहित्य क्षेत्र में विपुल योगदान देने वाली डॉ. शकुंतला कालरा का वास्तविक अवदान उस अविस्मरणीय संस्मरण के माध्यम से प्रस्फुटित हो पाया है । उन्होंने लिखा कि उस अविस्मरणीय संस्मरण को पढ़ने से पहले उन्होंने डॉ. कालरा की कई कृतियां देखी और पड़ी पर मैंने उन्हें गंभीरता से कभी नहीं लिया यह सोचकर कि आजकल सभी लिख रहे हैं और अगर वह भी लिख रही हैं तो ठीक है बस लिख रही हैं । उनके उस संस्मरण को पढ़कर वह इतने भाव-विह्वल हो गए थे कि वह उस संस्मरण को पढ़ते जा रहे थे और रोते जा रहे थे और रोते जा रहे थे और पढ़ते जा रहे थे क्योंकि उस संस्मरण ने उनके अंतर्मन को छू लिया था। वह लिखते हैं ‘शकुंतला के भीतर दबी एक और शकुंतला थी जिसे मैंने पहली बार देखा और नहीं जानता था कि यही शकुंतला जी कुछ आगे चलकर मेरी प्यारी शकुंतला दीदी बनने वाली थीं। उनकी बहुत सारी उत्कृष्ट रचनाएं मेरी निगाह में आना बाक़ी थीं और ख़ासकर बाल साहित्य आलोचना और साक्षात्कारों के बाद क्षेत्र में तो उनका काम धीरे-धीरे इतने विशाल पर्वताकार रूप में मेरे सामने आने को था कि उनकी इस भास्वर शब्द- साधना को मै मन ही मन प्रणाम भी करने लगा।’

इसी अविस्मरणीय संस्मरण के बारे में वह यह भी बताते चलते हैं कि उन्होंने डॉ. शकुन्तला कालरा के उस संस्मरण की प्रशंसा करते हुए उन्हें और संस्मरण लिखने के लिए कहा बल्कि उन संस्मरणों को लेकर आत्मकथा लिखने का आग्रह तक कर दिया, इसके बारे में वह लिखते हैं कि’ मैंने उनसे आग्रह किया कि शकुंतला देवी आप सारे काम छोड़कर पहले अपनी आत्मकथा लिखें, कुछ और नहीं तो आप मेरे लिए ही लिखें, मैं उसे पढ़ना चाहता हूं। मुझे लगता है आपका सबसे महत्वपूर्ण काम यही होगा। मेरा आग्रह है कि आप थोड़ा व्यापक मिशन के साथ लिखें ताकि आपके परिवार की स्थितियां तो सामने आए ही वह पूरे परिवेश और समय की कथा भी सामने आए जिसमें अकेला आपका परिवार नहीं हजारों लोग मुसीबतों का सामना कर रहे थे।’ प्रकाश मनु जी का यह आग्रह सुखद परिणाम सामने लाया। डॉ. शकुन्तला कालरा ने ‘मेरा बचपन’शीर्षक से इस नायाब आत्मकथा को विखा जिसे मैंने भी पढ़ा और उसपर लिखा भी। उनकी यह आत्म कथा बहुत संवेदनशीलता के साथ लिखी गई है।’

उनकी यह आत्मकथा परंपरागत रूप से आत्मकथा में से नहीं है बल्कि यह केवल उनके शैशव‌ से लेकर बचपन तक की आत्मकथा है और इस आत्मकथा का महत्व इस बात में भी है इसमें 1947 में भारत की विभाजन त्रासदी के दंश को अत्यंत यथार्थपरक संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।


प्रकाश मनु जी डाॅ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्यकारों के लिए साक्षात्कार संबंधी कार्य से भी खासे प्रभावित थे। उन का कहना है कि कालरा जी से पहले इस प्रकार का कार्य कभी किसी साहित्यकार ने नहीं किया था। उनके बाल साहित्यकारों के साक्षात्कारों पर लिखते हुए वह कह उठते हैं, ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि डॉ शकुंतला जी ने बाल साहित्यकारों के साक्षात्कारों के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान रच दिया है। बाल साहित्य में इस क्षेत्र में वह अग्रणी नहीं, बल्कि एकमात्र साहित्यकार हैं और दूर-दूर तक कोई और नहीं है जिससे उनकी तुलना की जा सके ना पचास सौ वर्ष पहले और ना आज।’

प्रकाश मनु जी ने इसी आलेख में डाॅ.शुकुंतला कालरा जी की बाल कविताओं, कहानियों और बाल उपन्यासों का विवेचनात्मक विश्लेषण कर उन्हें भी सराहा है और उनके बाल साहित्य के साथ साथ उनकी बाल साहित्य पर आलोचना संबंधी अवदान में इस ग्रंथ के फ्लैप पर लिखा है, ‘बाल साहित्य में समीक्षा और आलोचना के क्षेत्र में जितना बड़ा योगदान शकुंतला जी का है उतना हमारे दौर में से किसी और का नहीं है उनके आसपास ऐसा कोई नहीं है जिसने उन जैसा अवदान दिया हो। 


पदमश्री (प्रोफेसर) उषा यादव का आलेख ‘बाल बाल साहित्य की गौरवशाली यात्रा और बाल कहानियों के इंद्रधनुषी रंग इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उसमें डॉ. शकुंतला कालरा के आलोचना कर्म को पिछले 50 वर्षों की कालावधि में लिखी गई आलोचना की पुस्तकों के परिपेक्ष में रखकर देखा गया है इस प्रकार के बाल साहित्य आलोचना के तुलनात्मक मूल्यांकन से डॉ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य में उनका आलोचना में उनके स्थान की कोई उपेक्षा कर ही नहीं सकता । उनके बाल साहित्य में आलोचना कर्म के विपुल अवदान को रेखांकित करते हुए विदुषी लेखिका यादव लिखती हैं,’ पचास वर्ष के बाल साहित्य आलोचना कर्म के परिपेक्ष में डॉ. शकुंतला कालरा के बहुमुखी व्यक्तित्व को ज्यादा संजीदगी से समझा जा सकता है। 21वीं शती में बाल साहित्य को उसका वांछित गौरव और पहचान दिलाने की जो कोशिश सामने आ रही है, शकुंतला जी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । साक्षात्कार विधा पर उनका काम ‘ एकला चलो की’ उस धुन का साक्षी है जिसके साथ समूह स्वत: जुड़ जाता है । बाल साहित्यकारों के प्रदेय को सामने लाने के लिए भी वह इतनी कृतसंकल्प हैं कि श्री जयप्रकाश भारती, डॉ. राष्ट्र बंधु, डॉ. दर्शन सिंह आशट डॉ. दिविक रमेश जैसे चर्चित हस्ताक्षरों पर उनकी संपादित पुस्तकें हमारे सामने हैं । उनका मौलिक लेखन बाधित होता है पर बाल साहित्य की श्री वृद्धि के लिए उनके ये प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं।’


प्रो. उषा यादव ने डॉ शकुन्तला कालरा की बाल कहानियों के गहन अध्ययन के बाद अपने निष्कर्ष में उनकी बाल मनोविज्ञान को परखने वाली उनकी कहानियों के महत्व को भी रेखांकित किया है और वह कहतीं हैं कि ‘डाॅ. शकुंतला कालरा को बाल मन को परखने की महारत हासिल है। यही नहीं, वह उनकी बाल कहानियों के बारे में कहती हैं,’उनकी कहानियां यदि बच्चों को ऊंगली पकड़कर परी लोक में घूमाने में सक्षम हैं तो विज्ञान की प्रगति से अवगत कराने में भी पीछे नहीं हैं। इस प्रकार इन कहानियों का चित्रफलक अत्यंत व्यापक है और बाल जीवन और बल संसार के समग्र समाहार ने इन्हें अनूठा इंद्रधनुषी वैभव दे दिया है।’

जहां तक डा शकुंतला कालरा की बाल कहानियों का संबंध है, अगले आलेखों में सुकीर्ति भटनागर,एवं डाॅ मो.अरशद खान ने भी उन्हीं पर लिखा है। सुकीर्ति भटनागर उनके दो कहानी संग्रह ‘मेरी प्रिय, कहानियां’ और ‘मोती जोती’ की कहानियों का अध्ययन कर लिखती हैं कि ‘सभी कहानियां सोद्देश्यपूर्ण और युग बोध कराने वाली हैं। साथ ही अपनी संस्कृति से भी जोड़ती हैं । सुखद बात तो यह है कि कहानियों की सरल और सुंदर शब्दावली और उनके सहज अभिव्यक्ति ही बच्चों को सब कुछ समझा देने के लिए प्रयाप्त है कहीं भी उन्हें डांट- फटकार कर या उपदेशात्मकता रूप से समझाने की चेष्टा नहीं की गई है।’इसी प्रकार, डॉ मो. अरशद खान उनकी जिन कहानियों का उल्लेख कर रहे हैं उनकी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए वह लिखते हैं, ‘वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ शकुंतला कालरा की कहानियां का पाठ एक सुख एहसास देता है। उनकी कहानियां जिन विशेषताओं के कारण सहज ही हमारा ध्यान खींचती हैं वह आम जीवन से उठाए गए विषय, रोचक कथावस्तु, जीते -जागते पात्र, नैतिक मूल्यों का अविरल अंत:प्रवाह और सहज संप्रेषणीयता । नैतिक मूल्य उनकी कहानियों में इस प्रकार व्यंजित होते हैं कि पाठक न केवल उन्हें सहजता से ग्रहण कर लेता है बल्कि अपने मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव भी महसूस करता है। डॉ. शकुन्तला कालरा इस तथ्य से पूरी तरह सचेत हैं कि उपदेश के रूप में थोपे गये नैतिक मूल्य न केवल कहानी की रोचकता बाधित करते हैं बल्कि उनकी संप्रेषणीयता को भी पर प्रभावित करते हैं।’


मधुसुदन साहा के डा. शकुंतला कालरा के ‘बालकथा साहित्य का सिंहावलोकन ‘ आलेख में उनके समग्र बालकथा साहित्य का विवेचन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि ‘उनके समस्त बाल कहानियों को चार भाग में विभक्त किया जा सकता है (1)आधुनिक भाव बोध की कहानियां, (2) पौराणिक कहानियां (3) परी कथाएं और (4) विज्ञान कथाएं। इन कहानियों को पढ़ने पर एक बात आइने की तरह स्पष्ट है कि लेखिका की सोच सदैव जमीन से जुड़ी लगती है उन्होंने हमेशा बाल मन को केंद्र में रखकर कहानियों का ताना-बाना बुना है। वे यदि पौराणिक कथा सूत्रों से कथा बिंदु का तलाश कर कहानी लिखती हैं तो उनका ध्यान आधुनिक बोध और प्रासंगिक कथ्य की ओर अवश्य रहता है।वे जब परियों की कल्पनालोक में विचरण करती हैं तो उनकी दृष्टि जमीन पर भी टिकी रहती है। इसलिए मैं उन्हें जीवणबोध की कहानीकार मानता हूं । सरलता, सहजता, रोचकता एवं कथा प्रवाह के कारण उनकी कहानियां बच्चों के सभी वर्गों द्वारा पसंद की जाती हैं।’


डा. अमिता दुबे ने ‘ बाल उपन्यास की दिशा में अपूर्व प्रस्तुति:मिठ्ठी की चिट्ठी ‘ आलेख में डाॅ शकुंतला कालरा के इसी शीर्षक से 88-पृष्ठीय बाल उपन्यास का विशद विवेचन किया है । उनके अनुसार डॉ शकुन्तला कालरा बाल मनोविज्ञान की कुशल चितेरी हैं। उन्होंने इस उपन्यास के माध्यम से एक बेटी मिठ्ठी के मन में मां से संवाद करते हुए मां की छत्रछाया में जीवन जीने का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है जिसमें मिठ्ठी की चिट्ठी में वह चांद सितारों को संबोधित कर मां से संवाद करती है।इस बाल उपन्यास का शिल्प नया है कथ्य नया है, पत्रों के माध्यम से छोटी-छोटी घटनाओं को महत्वपूर्ण बनाते हुए बाल मन की गांठे खोलने का सफल प्रयास किया गया है। उनके अनुसार कुल मिलाकर डॉ शकुन्तला कालरा के इस बाल उपन्यास में सुंदर ढंग से विन्यस्त कथानक,सहज सरल प्रवाह मयी भाषा शैली में लिखा यह एक रोचक एवं पठनीय बाल उपन्यास है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की उपन्यास संबंधित धारणा है,’ मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मानता हूं ।मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्याओं को खोलना ही उपन्यास का मूल तथ्य है। मुंशी प्रेमचंद की इस परिभाषा के आलोक में यह बाल उपन्यास भी मिठ्ठी की चिट्ठियों के माध्यम से सार्थक सिद्ध होगा।


शकुंतला कालरा ने बाल एकांकी नाटक भी लिखे हैं। उनके बाल एकांकी नाटक ‘देर आयद दुरूस्त आयद’ शीर्षक से प्रकाशित हैं । इनमें ‘देर आयद दुरुस्त आयद ‘, ‘लाॅकडाउन खुल गया ‘ और ‘बच्चे बदल गये हैं ‘ शीर्षक से तीन बाल एकांकी नाटक हैं। इस ग्रंथ में डॉ.प्रताप सहगल तथा मंजू रानी जैन ने इन्हीं बाल एकांकी नाटकों पर अपने आलेख लिखे हैं। इन दोनों ने इन तीनों एकांकियों के कथ्य, कथोपकथन,संदेश और भाषा शैली के दृष्टिकोण से इनका विवेचन किया है। इनका नाटकों के विवेचन पढ़ने से आपको नाटकों के परिवेश और कहानी का पता चलता है ,इनमे सम्मलित संदेश से भी आपका परिचय होता है।


       डॉ.प्रताप सहगल ने इन बाल नाटकों के बारे में लिखा है कि ‘यद्यपि बाल साहित्य में बाल कहानियां , बाल कविताएं और कुछ सीमा तक बाल उपन्यास भी लिखे गए हैं परंतु हिंदी बाल साहित्य में बाल नाटक बहुत कम लिखे गए हैं । डॉ. शकुंतला कालरा के यह बाल एकांकी नाटक कुछ सीमा तक उस कमी को पूरा करते हैं। इन तीनों नाटकों के विषय अलग हैं, संदेश भी अलग हैं परंतु तीनों शिक्षाप्रद नाटक हैं। यह बच्चों के लिए जरूरी भी है कि बच्चे नाटक पढ़ते देखते हुए कुछ सीखें । तीनों नाटकों में पात्रों का विन्यास लगभग एक जैसा ही है, हां कहीं-कहीं संगीत शामिल किया जाता तो अच्छा था । बच्चों को गीत संगीत बहुत भाता है।,’ इसी प्रकार मंजू रानी जैन ने भी इन नाटकों पर प्रकाश डालते हुए लिखा हैं कि यह तीनों नाटक संदेशात्मक है, तीनों में आमतौर पर चली आ रही परिवारों की समस्याओं को सामने रखकर उनके समाधान भी सुझाए गए हैं । सरल भाषा में लिखे यह तीनों एकांकी पहली बार दर्शकों के समक्ष आएंगे। विषम परिस्थितियों में दर्शकों को सकारात्मक की ओर ले जाने का लेखिका का प्रयास बेहद सराहनीय है।’


 इस ग्रंथ में सबसे अधिक आलेख डॉ. शकुंतला कालरा की बाल कविताओं को लेकर लिखे गए हैं विनोद चंद्र पांडे ‘विनोद’ ने डॉ. शकुंतला द्वारा रचित विविध विषयक बाल कविताएं,’, डॉ. रोहितश्व अस्थाना का आलेख ‘समग्र बाल साहित्य की कविताएं’, डॉ मोहम्मद साजिद खान का ‘बाल कविताएं और बालिका विमर्श’, कृष्ण शलभ का ‘ठुमकती हुई बाल कविताएं’ तारा दत्त निर्विरोध का ‘समग्र बाल संसार की कविताएं’ आलेख शामिल किए गए हैं। विनोद चंद्र पांडेय ‘वविनोद’ ने डॉ.शकुंतला कालरा की बाल कविताओं की विशेषता उनका विषय- वैविध्य माना है। उनका कहना है कि ‘बाल साहित्य के क्षेत्र में विदुषी लेखिका, संवेदनशील 

कवयित्री कालरा जी का योगदान रेखांकित करने योग्य है। वे बाल मनोविज्ञान की विशेषज्ञ हैं । उन्होंने बालकों की रुचि, और स्वभाव को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग आयु वर्ग के लिए रोचक, मनोरंजक, ज्ञानवर्धक, प्रेरक बाल साहित्य का सृजन किया है।’ 

डा. रोहिताश्व अस्थाना ने डॉ शकुन्तला कालरा के ‘फुलवारी’ बाल कविता संग्रह में संकलित 32 कविताओं में से अनेक उदाहरण देते हुए उनकी बाल कविताओं को रेखांकित करते हुए लिखा है,’निश्चय ही बाल काव्य के क्षेत्र में डॉ. शकुंतला कला का प्रदेय असाधारण और महत्वपूर्ण है। हिंदी बाल साहित्य के इतिहास में अपनी रचनाओं के लिए वे हमेशा जानी, मानी और पहचानी जाती रहेंगी। उनकी बाल यात्रा सौ सौ बसंतों तक पुष्प -पलवित होती हुई निरंतर गतिशील और ऊर्ध्वगामी बनी रहे, यही मां सरस्वती से प्रार्थना है।’


कृष्ण शलभ ने डॉ शकुन्तला कालरा की उनके समूचे कैनवास पर फैले ्विविध प्रकार के बाल साहित्य विशैष रुप से बाल कविताओं के बारे में विवेचन करते हुए कहा है ‘ चेतना और चिंतन, सर्जनात्मक उत्साह और उदात्त दृष्टि, सृजन का बहुरंगी रूप -अनुभूति का उफान और उसके तीव्रतर संवेग की रचनात्मक स्थितियां तक ले जाने का गंभीर प्रयास। यह सारे आयाम एक साथ संतुलित और समुचित रूप में जिस व्यक्ति में घुले -मिले दिखाई देते हैं उसका नाम है डॉ. शकुंतला कालरा।’ वैसे तो भी लेखकों ने डॉ शकुन्तला कालरा की बाल कविताओं पर लिखते हुए उनकी रचित लोरियों की भी भूरि -भूरि प्रशंसा की है किन्तु डा. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ ने ‘लोक संस्कृति का अंग :लोरी और प्रभाती ‘ आलेख में उनकी लोरी विधा पर विस्तार से लिखा है। वैसे डॉ शकुन्तला कालरा ने डा सरोजिनी कुलश्रेष्ठ की इसी विधा पर उनके अवदान पर भी कार्य किया है, उनके द्वारा रचित लोरियों और प्रभातियों का भी महत्व कम नहीं है। डॉ कालरा ने अपनी पुस्तक ‘ममता की छांव में ‘ की भूमिका में बताया है कि लोरी संस्कृत के ‘लोल’ शब्द का अपभ्रंश रूप है और उन्होंने लोरी और प्रभाती दोनों में अंतर को रेखांकित करते हुए कहा है कि ,’लोरी की भांति प्रभातिया लोक संस्कृति का ही अंग है दोनों में मां की ममता निहित है दोनों में मां और बच्चों का भावनात्मक जुड़ाव है इसमें लोरियां बच्चों को सुलाने और प्रभातिया उन्हें जगाने के लिए गाई जाती हैं इसलिए प्रभातियों को जागरण गीत भी कहते हैं। इन गीतों में माता के हृदय का वात्सल्य ही नहीं, प्रभात का वर्णन भी होता है।”


डॉ सरोजिनी कुलश्रेष्ठ ने बोरियों की रचनाकारों के नामों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि डॉ. शकुन्तला कालरा ने इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस विधा को लुप्त होने से बचाया है।’ डॉ कालरा की लोरियो की एक महत्वपूर्ण विशेषता का उल्लेख करते हुए लेखिका ने लिखा है कि डॉ शकुन्तला कालरा का मातृह्दय वात्सल्य के सुख का जैसा अनुभव पुत्र की लोरी देकर सुलाने में करता है वैसा ही सुख पुत्री को भी लोरी गाकर सुनाने में प्राप्त करता है । उनकी लोरियों में बिटिया को भी बेटे के समान दर्जा प्राप्त है। आज से चार दशक पूर्व बेटी बेटे का लेकर समाज में भले ही द्वंद की स्थिति थी और कुछ प्रांतों में आज भी है किंतु डॉ. कालरा की लोरियों में उसे समानता का दर्जा मिला है। लेखिका डॉ शकुन्तला कालरा के र्लोरियों की रचना में उनके अवदान की इसी समदृष्टि को रेखांकित करते हुए उन्होंने डॉ. मोहम्मद साज़िद ख़ान के सौजन्य से कहा है ‘कि प्राय लोरियां बालक को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं किंतु डॉ. कालरा ने

  लोरिया लिखते समय बालिकाओं को विस्तृत नहीं किया है और उन पर समान रूप से लेखनी चलाई है और इस प्रकार बेटियों को भी समानता का दर्जा मिला है।’ लेखिका ने डॉ कालरा की इस चिंता को भी स्वर देते हुए कहा कि ‘आज आधुनिकता की अंधी दौड़ नै लोरियां और प्रभातियों की विरासत को संकट में डाल दिया है आधुनिक जमाने में कोई भी मां लोरी सुनाती नज़र नहीं आती और ना ही प्रभाती गाकर उसे जगाती नज़र आती है। अगर यही स्थिति रही तो लोरियों और लोकगीतों का यह भंडार विलुप्त हो जाएगा। ‘ 

इसी बात को आगे बढ़ाती हुई लेखिका ने लिखा है कि संयुक्त परिवार की प्रथा को फिर से प्राथमिकता दें। बच्चों को मां की गोदी दें। इसके साथ मां के स्पर्श की उष्णता भरी थपथपाहट उसे मिले। मां की गुनगुनाहट और लोरी बच्चों को अवश्य निद्रा लोक और सुंदर सपनों की दुनिया में ले जाएगी और उसे आगे आने वाली कई समस्याओं से निजात दिलवाएगी।’

डॉ शकुन्तला कालरा ने बाल साहित्य विमर्श पर बहुत काम किया है जिसका उल्लेख हम आरंभ में प्रकाश मनु के सौजन्य से कर चुके हैं। इस आयाम को इस ग्रंथ में कई रचनाकारों ने रेखांकित किया है। डॉ दिविक रमेश ने उनके इस संबंध में रचित पुस्तकों की चर्चा करते हुए निष्कर्ष पर यह खुल कर लिखा है कि इसमें संदेह नहीं है कि डॉ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य से आलोचना का बहुत और विशिष्ट भला हुआ है। मैं नम्रतापूर्ण कहूंगा कि वह सबसे ऊपर हैं शिखर पर हैं।’ 

डॉ भैरुलाल गर्ग ने बाल साहित्य विमर्श और डॉ शकुन्तला कालरा के बाल साहित्य विमर्श संबंधी अवदान के विषय को और आगे बढ़ाते हुए अपने एक 15-पृठीय लंबे और विद्वतापूर्ण आलेख में शकुन्तला कालरा के बाल साहित्य विमर्श पर विस्तार से लिखा है। उन्होंने बाल साहित्य विमर्श से संबंधित सभी पुस्तकों का उल्लेख तो किया ही है उन्होंने उनके द्वारा प्रकाशित बाल वाटिका पत्रिका में कालरा जी के समय समय-समय पर दिये अवदान पर विस्तार से लिखा है। बाल वाटिका पत्रिका के लगभग हर अंक में उनका बाल साहित्य पर कुछ न कुछ प्रकाशित होता रहा है साथ ही इस पत्रिका के विशैषांकों में बाल साहित्यकारों पर केंद्रित अंकों में डाॅ. कालरा का विशेष योगदान रहा है जिसका डाॅ. भेरूलाल गर्ग ने न केवल अकादमिक और शोधात्मक दृष्टि से विशद विवेचन किया है अपितु उनके इस विद्वतापूर्ण आलेख से बाल साहित्य संबंधी इतिहास की निर्मिति भी हुई है क्योंकि इस आलेख के माध्यम से दो ढाई दशक के बाल साहित्य की परम्परा,दर्शन,सृजन और बाल साहित्य विमर्श के आयाम स्पष्ट हुए हैं।

इस आलेख के अंत में डाॅ. भैरूलाल गर्ग लिखते हैं कि’ मुझे विश्वास है कि इससे डॉ. शकुंतला कालरा का मंतव्य तो स्पष्ट हुआ ही है यह बात भी सामने आई है कि सचमुच बाल साहित्य विमर्श कितना महत्वपूर्ण है। हमें बाल साहित्य को प्रतिष्ठा दिलानी है तो इसके विमर्श पर बहुत काम करना होगा क्योंकि यही एक सशक्त आधार है जो लोगों को स्वत: बाल साहित्य की और प्रेरित कर उसके महत्व को स्वीकारने के लिए एक अभीष्ट धरातल तैयार कर सकेगा. इस नई सदी में यह कार्य प्रमुखता से किया जा रहा है और ऐसे प्रमुख विमर्शकारों में डॉ. शकुंतला कालरा का नाम भी सम्मान के साथ लेते हुए हम हर्ष और गर्व की अनुभूति कर रहे हैं।’


अखिलेश श्रीवास्तव चमन ने अपने आलेख ‘हिंदी बाल साहित्य की मूक साधिका डॉ. शकुंतला कालरा’ में कालरा जी के समग्र बाल साहित्य और बाल साहित्य अवदान पर विशद विवेचन करते हुए उनकालिखा है, ‘कहा जा सकता है कि डॉ. कालरा उन साहित्य साधकों में से हैं जिनकी साहित्यिक प्रतिभा एक साथ सृजन और आलोचना दोनों रूपों में उद्भाषित हुई है। इन दोनों क्षेत्रों के अतिरिक्त डॉ कालरा का रचनात्मक सहयोग जिस विधा को सर्वाधिक प्राप्त हुआ, वह है साक्षात्कार विधा। इस विधा के द्वारा उन्होंने बाल साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व के विशिष्ट पहलुओं पर प्रकाश डालने का अभूतपूर्व कार्य किया जिनकी सतत साधना ने बाल साहित्य को नई पहचान दी। बाल साहित्य उन्नयन की दिशा में यह अभिनव कार्य ऐतिहासिक कदम कहा जाएगा।’

डॉ रवि शर्मा ने डॉ शकुन्तला कालरा के बाल मनोविज्ञानिक निबंधों पर एक आलेख में इन निबंधों के महत्व पर लिखते हुए डॉ कालरा की प्रशंसा की है कि ‘बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी, प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार डॉ शकुंतला कालरा ने बाल मनोविज्ञान का सहारा लेतै हुए आज के दौर में बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का सही दिशा निर्देश किया है। बाल मनोविज्ञान की सही जानकारी के अभाव में प्रायः ही माता पिता बच्चों की इच्छाओं, भावात्मक परिवर्तन, मानसिक उलझनों, समवयस्कों के दवाबों को नहीं समझ पाते और वे बिना सोचे समझे अपनी अधूरी उच्चाकांक्षाओं के दवाब में हताश होकर कई बार बच्चे निराश, कुंठित, विद्रोही, उद्दंड तथा कभी कभी अपने जीवन को निरर्थक मान कर उसे समाप्त करने की सोचने लगते हैं । अनजाने में ही माता -पिता कितना हानिकारक कार्य कर जाते हैं,जिसके दुष्परिणाम न केवल उन्हें बल्कि पूरे समाज को भुगतने पड़ते हैं। इनसे बचाने तथा ऐसी ही। विभिन्न समस्याओं से निपटनै में डाॅ.शकुंतला कालरा के बाल मनोविज्ञान विषयक यह निबंध बहुत सहायक हैं। बाल विज्ञान संबंधी लेखिका का लंबा अनुभव और साहित्यिक लेखन क्षमता के कारण बाल मनोविज्ञान विषयक यह निबंध आज के माता-पिता,शिक्षक और बाल साहित्यकार सबके लिए समान रूप से उपयोगी और सार्थक सिद्ध हो सकते हैं।

डाॅ. शकुंतला कालरा का बाल साहित्य के क्षेत्र उनका एक ओर उल्लेखनीय अवदान उनकी आत्मकथात्मक कृति ‘मेरा बचपन, उड़ान की चिह में’ है जिसके बारे में प्रकाश मनु ने विस्तार से उस पर प्रकाश डाला है। उसी कृति पर देवेन्द्र मेवाड़ी का एक आलेख ‘समकालीन बाल साहित्य में आत्मकथा लेखन का अन्यतम प्रयोग:एक स्त्री द्वारा लिखित एक बालिका की संवेदनात्मक आत्मकथा ‘ शीर्षक से लिखा गया है।हम सब जानते हैं कि यह आत्म कथा वर्ष 1947 की विभाजन त्रासदी से उत्पन्न दारुण स्थितियों के संदर्भ में एक बालिका की कथा है। देवेंद्र मेवाड़ी ने अपने आलेख में इस आत्मकथा में सम्मिलित हर आयाम का विवेचन किया है । साथ ही उन्होंने पिछले साठ पैंसठ वर्षों में महिला साहित्यकारों द्वारा रचित आत्मकथाओं का ब्योरा देते हुए यह बताया है कि महिला रचनाकारों की यह आत्यकथाएं अपने समाज और परिवेश को स्वर देती हुई स्त्री पुरुष संबंधों को उजागर करती हैं विशेष रूप से 21सदी की आत्यकथाएं ‘नारी और पारिवारिक रिश्ते, स्त्री और नौकरी, स्त्री स्वतंत्रता और समानता, स्त्री स्वाभिमान, स्त्री अस्मिता आदि अनेक पहलू हैं जिनपर यह आत्म कथाएं केंद्रित है। डॉ शकुन्तला कालरा की आत्मकथा उस अर्थ में एक स्त्री की आत्मकथा नहीं है,वह एक स्त्री द्वारा लिखित एक बालिका की आत्मकथा है।’,कुल मिलाकर,’मेरा बचपन, उड़ान की चाह में’ उपर्युक्त विषयों से बिल्कुल अलग हटकर है।आत्मकथाकार ने अपनी जन्मभूमि से विस्थापित शरणार्थी परिवार के बच्चे के रूप में आत्ज्ञकथा लिखी है जो एक बेहद पठनीय और प्रेरणादायक आत्मकथा है।’


डॉ नागेश पांडेय ‘संजय’ का इस ग्रंथ में एक आलेख है, ‘हिंदी बाल साहित्य इतिहास लेखन की परंपरा और विकास।’ इस चौदह - पृष्ठीय आलेख में डाॅ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य विमर्श संबंधी विपुल अवदान का अन्य रचनाकारों की बाल साहित्य विमर्श पर रचित पुस्तकों के संदर्भ में विवेचन-विश्लेषण भी किया है जिससे हम बाल साहित्य विमर्श की दशा और दिशा के बारे में परिचित होते हैं। 

इसी क्रम में एक और महत्वपूर्ण आलेख का भी यहां उल्लेख वांछनीय है क्योंकि इस आलेख में डाॅ. कालरा के बाल साहित्य के जिस अवदान पक्ष पर यह केंद्रित है उसके महत्व को रेखांकित किये बिना उनके कृतित्व को संपूर्णता से नहीं आंका जा सकता है। पंद्रह -पृष्ठ का यह विस्तृत आलेख डॉ. शकुन्तला कालरा की बाल साहित्य की संपादन कला को समर्पित है और जिसकी रचनाकार हैं सन्तोष खन्ना। उन्होंने डॉ शकुन्तला के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘डाॅ. शकुंतला कालरा एक सशक्त साहित्यकार, प्रखर समालोचक एवं गंभीर अनुसंधाता तो है ही, बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने वर्षों पहले अपनी गरिमापूर्ण उपस्थिति दर्ज करा ली थी अब वह बात साहित्य में अपनी अनोखी मौलिकता, संवेदनशीलता एवं नई सोच के कारण कई सोपान लांगती एक बहुत ऊंचे पायदान पर खड़ी हैं जहां से उनके बाल साहित्य के रचना संसार के कई कीर्तिमान देखे जा सकते हैं।’

डॉ. शकुंतला कालरा ने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों विशेष रूप से बाल साहित्य पर पुस्तकें तथा कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। उन्होंने दर्जन से अधिक पुस्तकों का संपादन किया है। इस आलेख में सन्तोष खन्ना ने उनकी संपादन कला के क्षेत्र में अवदान के महत्व के सही आकलन के लिए उनकी हर पुस्तक की कथ्य और विशेषताओं की चर्चा करते हुए कहा है कि ‘डॉ शकुंतला द्वारा संपादित बाल साहित्य पर पुस्तकें बाल साहित्य के परिदृश्य में एक संपूर्ण दस्तावेज की तरह हैं जिससे आम पाठक का ज्ञान वर्द्धन तो होगा ही, बाल साहित्य के शोधार्थियों के लिए तो यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी । इन कृतियों को आधार बनाकर कई प्रकार के शोध संपन्न किया जा सकते हैं। सर्वजन और शोधकर्ताओं के लाभ के लिए इन सब पुस्तकों का संक्षेप में विवेचना किया गया है जिसके अध्धयन से बाल साहित्य और बाल साहित्य विमर्श की इतिहासिकता और दर्शन और सोच से परिचित हुआ जा सकता है। इस सभी संपादित कृतियों से हिंदी बाल साहित्य की मंजूषा में श्री वृद्धि हुई है और इनके माध्यम से यह भी जाना जा सकता है कि इन बृहद ग्रंथों कै संपादन में डाॅ. शकुंतला कालरा का कितना अकूत श्रम लगा होगा। समग्रता कहा जा सकता है कि संपादन के क्षेत्र में कई आयाम स्थापित करने वाली डॉ. शकुंतला कालरा पुस्तकों के माध्यम से बाल साहित्य के एक अप्रतिम नक्षत्र के रूप में उभर कर सामने आई हैं।’


डाॅ. राष्ट्रबंधु का ‘प्रशंसा से बहुत आगे’, डाॅ. अश्वधोष का बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी डॉ शकुंतला कालरा’, निर्मला सिंह का बाल साहित्य की ज्योतिपुंज से यादगार मुलाकात’, और डॉ. अनिल कुमार का आलेख ‘शिष्य बनने में मुझे गौरवानुभूति हो रही है’ जैसे समृद्ध आलेख अत्यंत पठनीय और श्लाधनीय हैं। इस ग्रंथ में और भी बहुत कुछ है जो डाॅ. शकुंतला कालरा की बाल साहित्यिक अवदान पर ध्यान आकर्षित करता है। वस्तुत: यह समूचा ग्रंथ ही उनके बाल साहित्य सृजनात्मकता के फल पल का हिसाब रखता हुआ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि इन पर्वताकार उपलब्धियां के पीछे कितना परिश्रम, त्याग, तप साधना की गई होगी। आजकल साहित्यकारों की सृजनात्मक उपलब्धियों को सामने लाने के लिए उन पर प्रायः पत्रिकाओं के पूरे के पूरे अंक उनके साहित्य को समर्पित प्रकाशित किए जा रहे हैं। पिछले वर्ष अर्थात् वर्ष 2023 में भेरुंलाल गर्ग संपादित बाल वाटिका का संपूर्ण अंक डाॅ.शकुंतवा कालरा पर व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाशित किया। गया था जिसका लोकार्पण 12 मार्च,2023 को हिंदी भवन में विधि भारती परिषद् के एक भव्य सम्मान समारोह और पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में किया गया था और साथ ही विधि भारती परिषद् की ओर से डाॅ.शकुंतला कालरा को। उनकी बाल साहित्य तथा प्रौढ़ साहित्य सृजन उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय स्तर का राष्ट्र भारती सम्मान प्रदान किया गया था। विधि भारती परिषद् का राष्ट्र भारती सम्मान वर्ष 2008 में आरंभ किया गया था। राष्ट्र भारती सम्मान देश के उन विभूतियों को प्रदान किया जाता है जो अपनी सतत साधना से देश और समाज को अपने प्रेरक अवदान की गंगा से आप्लावित करते हैं।।


अनेक साहित्यकारों पर आयु विशेष के पड़ाव पर अभिनंदन ग्रंथ भी प्रकाशित किए जाते हैं। डॉ नागेश पांडेय 'संजय ' द्वारा डॉ शकुन्तला कालरा पर संपादित इस ग्रंथ का महत्व किसी भी अभिनंदन ग्रंथ से अधिक है क्योंकि अभिनंदन ग्रंथ में औपचारिकता और आदर का भाव अधिक रहता है और साहित्यकार विशेष के अवदान का गंभीर मूल्यांकन नहीं हो पाता है। डॉ शकुन्तला कालरा पर केंद्रित इस ग्रंथ में न केवल लेखिका के बाल साहित्य के क्षेत्र में अवदान का प्रमाणिक रूप रुप से मूल्यांकन तो हुआ है बल्कि साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत की बाल साहित्य परम्परा का भी विवेचन हुआ है। हिंदी के बाल साहित्य के छात्र और शोधकर्ताओं के लिए यह ग्रंथ बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।

समीक्षक : संतोष खन्ना 

सोमवार, 31 अगस्त 2026

पुस्तक समीक्षा : समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा , समीक्षक : डॉ. आर. पी. सारस्वत

समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा 

पुस्तक का नाम : समकालीन बालसाहित्य दिशा डॉ. शकुंतला कालरा

संपादक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय',

प्रकाशन : नमन प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष : 2023

मूल्य :  रु 950/- (सजिल्द) 

पृष्ठ : 342

समीक्षक :  डॉ. आर. पी. सारस्वत 

पुस्तक के शीर्षक देखकर भ्रम की स्थिति बन जाती है ऐसा प्रतीत होता है कि पुस्तक डॉ. शकुंतला कालरा जी ने ही लिखी है, पर आगे जब सम्पादक पर निगाह पड़ती है तो पता चलता है कि शीर्षक के साथ आर्थात शीर्षक में ही डॉ. शकुंतला कालरा जी हैं। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह हुआ कि समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा जी हैं। और हों क्यों नहीं बालसाहित्य की प्रत्येक विधा पर डॉ. कालरा जी अपनी लेखनी न केवल चलाई है अपितु इससे प्रत्येक विधा को समुचित धार प्रदान की है- इसी कारण डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' को यह शर्षक पुस्तक का रखना पड़ा है जिसके लिए डॉ. पांडेय को बधाई !


यदि मैं यानी कि आम पाठक यह कहूँ कि मेरे पास ऐसे कोई टूल्स नहीं हैं जिनसे मैं सृजन की भरपूर जाँच-पड़ताल कर अपनी आख्या दे सकूँ तो भाई मेरे सभी टूल्स, रिर्पोटर्स उपलब्ध करा दी हैं- डॉ नागेश पांडेय 'संजय' ने तो उनका अध्ययन कर और अपनी राय बनाकर उन्हीं के आधार पर अपने विवेक एवं शब्द-चातुर्य के साथ लिख डाली है अपनी विवेचना तो वही मैं कर रहा हूँ, इस पुस्तक में डॉ संजय ने स्वयं विभिन्न साहित्यकार - विद्वानों से उनके ही टूल्स का प्रयोग कर उनसे ही रिर्पोट्स प्राप्त कर संपादन कर यह ग्रंथ-अनुपम ग्रंथ हमारे साहित्य जगत को सौंपा है जो कि एक महान एवं ऐतिहासिक ग्रंथ है जिसकी चर्चा आने वाले समय में सम्मान के साथ होगी तथा किसी भी विवेचनात्मक आलेख में इसका जिक्र अवश्य होगा ऐसा मेरा मानना है।

अपनी-अपनी लेखनी से निःसृत शब्द-पुंज ग्रंथ में बाल साहित्य-जगत के मूर्धन्य विद्वान यथा प्रकाश मनु पद्मश्री ऊषा यादव, विष्णु प्रभाकर, सुकीर्ति भटनागर, डॉ. अमिता दुबे, डॉ. मो० अरशद खान, मधुसूदन साहा, विनोदचन्द पांडेय विनोद, डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, कृष्ण शलभ, डॉ तारादत्त निर्विरोध, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, डॉ. मोहम्मद साजिद खान, प्रताप सहगल, मंजुरानी जैन, डॉ. रवि शर्मा, देवेन्द्र मेवाडी, सृष्टि पांडेय, पद्मा चौगांवकर, घनश्याम मैथिल 'अमृत', भगवती प्रसाद गौतम, दिविक रमेश, डॉ. भैरूलाल गर्ग, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, डॉ. नागेश पांडेय संजय, संतोष खन्ना, डॉ. दर्शनसिंह आशट, डॉ. राष्ट्रबंधु, डॉ. चक्रधर नलिन, डॉ. अश्वघोष, गोविन्द शर्मा, निर्मला सिंह, नीलम राकेश, डॉ. रमानाथ त्रिपाठी, डॉ. अनिल कुमार, चक्रधर शुक्ल तथा विशेष रूप से डॉ. विकास दवे, वेद मित्र शुक्ल एवं आशीष जिनके संयमित साक्षात्कारों से साहित्यकार डॉ. शकुंतला कालरा के विस्तृत भाव जगत से रू-ब-रू होना सुनिश्चित हुआ। लगभग आधे से भी ज्यादा - समसामयिक बाल साहित्य की दुनिया की साहित्यकारों ने इस ग्रंथ केपूर्ण होने में अपनी-अपनी आहुति दी है तब कहीं यह साहित्यक ग्रंथ पूर्ण हुआ है। मेरा सौभाग्य है - इस बहाने में इन सभी के सद्विचारों प्रयासो से जुड़ सका तथा जान पाया कि आदरणीय कालरा जी मेरी ही नहीं अपितु बाल साहित्यकारों की प्रिय हैं। सभी बहन शकुंतला कालरा कह कर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। करे भी क्यों नहीं इतना प्यार दुलार जो - उनसे मिलता रहता है हर कोई उनका बनकर रह जाता है। फोन पर वार्तालाप शुरू होते ही कैसे हो? - वीणा जी कैसी हैं मिसिज शलभ जी से कब मिले उनकी कुशलता लेना, यह उनका प्रथम काम होता है जो उन्हें अन्य से अलग करता है।


जैसा हम सब को मालूम है बहन डॉ. शकुंतला कालरा जी ने बाल साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी लेखनी बखूबी चलाई है क्या बाल - कविताएँ, क्या बाल नाटक, बाल उपन्यास, बाल कहानियाँ, आत्म कथा, साक्षात्कार, निबन्धात्मक शैली में लिखे बालकोपयोगी आलेख सबकुछ साहित्य - का सृजन किया है- वह भी प्रचुर मात्रा में सृजन, समीक्षा, संपादन, सबकुछ तथा प्रचार से बाल साहित्य अपने पारिवारिक दायित्वों के निवर्हन के बावजूद अपनी महती भूमिका उन्होंने निभाई है।


इस ग्रंथ के अवगाहन से हमें उनकी इस असाधारण प्रतिमा का भान हो जाता है, लगता है कि कितनी श्रम-साधना के उपरान्त उनका यह लेखन, सृजन हमारे सम्मुख आकार लेकर हमें अभिभूत कर रहा है। और इस सब के लिए बधाई के पात्र हैं डॉ नागेश पांडेय 'संजय' जिनके अथक प्रयास - से गम्भीर संपादकीय - कृत्य से इतने सारे साहित्यक व्यक्तियों को जोड़कर अपना अभीष्ट हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया है। इससे पता चलता है कि साहित्यजीवी कितना एक-दूसरे से तारतम्य बनाए हुए हैं तथा कितना एक दूसरे के-सृजन पर अपनी पैनी दृष्टि लगाए हुए हैं। आज के समय में इतना के साहित्य- कार्य भी करना कोई सरल नहीं है। दूसरे के कार्य को सराहना तथा प्रतिक्रया स्वरूप आलेख तैयार करना कोई कम कार्य नहीं। इतना कार्य डॉ. संजय ने करा लिया उनके लिए भी वे बधाई के पात्र हैं। कारण डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' स्वयं सरल एवं सीधे व्यक्तिव के धनी हैं। विद्वान बाल साहित्यकार हैं जो अपने कार्य में पूरी ईमानदारी एवं तल्लीनता से लगे रहते हैं तथा चुपके-चुपके ही विस्फोट कर देते हैं और सभी को चकित भी यह ग्रंथ भी उनका ऐसा ही चमत्कृत करने वाला कार्य है।


समकालीन बाल साहित्य को दिशा देने वाली डॉ. शकुंतला कालरा जी को ऐसे ही नहीं कहा जाता है - यह उनके विपुल बाल साहित्य के सृजित संसार की बदौलत है जो उनकी निरंतर साहित्य साधना का द्योतक भी है, चाहे इनके बाल कहनी संग्रह-मोती जोती 1998 सुनाओ वही कथा 2006, चमत्कार का रहस्य 2006, रात में दिन 2006, अपना घर आधुनिक भावबोध 2006, मेरी प्रिय कहानियाँ 2006 माँ का उपहार 2009 या फिर बाल उपन्यास मिट्टी - की चिट्ठी चंदा के नाम 2021, या बाल नाटक देर आए दुरूस्त आए और - फिर बाल कविता संग्रह करे तमाशा प्यारी मुनिया 1998, फुलवारी 2007. हँसते- महकते फूल 2012, जय जय भारत प्यारा 2012, ममता की छाँव में 2012, क्यों रूठी गौरैया 2008, या फिर निबंध संग्रह - बच्चों का व्यक्तिव - विकास कैसे हो? या फिर संपादित पुस्तकें बाल विकास का स्वरूप और रचना संसार 2002, बाल साहित्य के युग निर्माता 2006, बालकथा सुमनमाला - भाग 1, भाग2, बालकथा - सुमनमाला - भाग-2-2002 डॉ.दर्शन सिंह आशट उनका बाल साहित्य 2012 मीठी-मीठी लोरियाँ एवं प्रभातियाँ 2012. हिन्दी बाल साहित्य विघा विवेचन 2014 आलोचना के क्षेत्र में उनका लेखन सराहनीय एवं अद्वितीय है हिंदी बाल साहित्य के अनन्य साधक •2019, बालक और बाल साहित्य 2022 साक्षात्कार जो उनके द्वारा लिए गये हैं - कम रोचक नहीं हैं हिन्दी बाल साहित्य-विमर्श (साहित्यिक साक्षात्कार 2010), हिन्दी बाल साहित्यः समस्याएँ और समाधान 2017 इस तरह हम देखते हैं कि मौन साधक के रूप में साहित्य जगत को अपना योगदान अप्रितम, श्रेष्ठ योगदान डॉ. कालरा जी निरंतर प्रदान कर रही हैं। उनके अनेकानेक साहित्य-प्रेमी उनके इस स्तुतनीय कार्य की प्रशंसा करते हैं, यह में स्वयं उनमें पुस्तकों के लोकार्पण समारोह में शामिल होकर गवाह बना हूँ उनका सरल एवं सीधा सा व्यक्तित्व प्रत्येक को अपनी ओर आकर्षित सहज ही कर लेता है, यह उनके चुंबकीय व्यक्तिव का ही परिणाम है। चाहे फिर व प्रकाशमनु जी हो या बालस्वरूप राही जी अथवा दिविक रमेश, पद्मश्री डॉ. उषा यादव, पदमश्री डॉ. श्याम सिंह, डॉ. श्री प्रसाद, डॉ. रतन लाल शर्मा, सीताराम गुप्त, के. डॉ. बालशौरी रेड्डी, सूर्यकांत बाली, भैरूलाल गर्ग, डॉ. विकास दवे, डॉ. रामनाथ त्रिपाठी, गोविन्द शर्मा, डॉ. अश्वघोष, डॉ. राष्ट्रबंधु जी या उनके शिष्य डॉ. अनिल कुमार सभी उनकें मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे हैं।


इस ग्रंथ में एक उपलब्धि और है वह है- डॉ. शकुंतला कालरा जी में के दिए हुए साक्षात्कार पहला साक्षात्कार शीर्षक समकालीन बाल साहित्य - में परंपरा और आधुनिक भावबोध दोनों का सुंदर समन्वय है- डॉ. विकास दवे निदेशक, साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश एवं संपादक साक्षात्कार पत्रिका - जिसमें तमाम गूढ़ रहस्यों का जो बाल साहित्य से संबंधित है-का विवेचन बडी ही गहराई के साथ किया गया है जो वास्तव में पढ़ने-समझने लायक है। समझने लायक इसलिए कि वह डॉ. कालरा जी के गहन अध्ययन और बाल साहित्य के प्रति उनमे लगाव को दर्शाता है- डॉ. दवे ने बड़े ही सार्थक प्रश्नों को उनके सम्मुख रखा है जो उनकी विद्वता को प्रदर्शित करता है 17 पृष्ठीय इस साक्षात्कार जिसका अंत उन्होंने इस प्रकार किया है :-

"संकल्प शुभ रखें और उसे ईश्वर को समर्पित कर दें बस।" यह उनकी सात्विक सोच का परिचायक है।


दूसरा साक्षात्कार वेदमित्र शुक्ल - सहायक प्रोफेसर राजधानी कॉलेज, अंग्रेजी विभाग के शीर्षक सहज बचपन जीवन-यात्रा का सबसे - खूबसूरत पड़ाव होता है जिसके अंतर्गत उन्होनें उत्कृष्ट बाल कविता किसे कहेंगें पर अपना वक्तव्य इस प्रकार दिया है मेरी दृष्टि में उत्कृष्ट बाल कविता की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसमें बच्चों का नटखट संसार हो। उसमें लुभावनापन हो, रसीलापन ऐसा हो कि बालकों के साथ बड़े भी आनंद विभोर हो उठे। मनोविज्ञान का स्पर्श हो। बच्चों में उल्लास, चुलबुलाहट, और मौज-मस्ती का भाव पैदा करने वाली हों। बच्चों में मीठे सपने, उनमें बालहट, उनकी बालसुलभ चेष्टाएँ, शैतानियाँ, रूठना-मनाना, खेलकूद समाहित हो । कल्पना की उड़ान हो। सरसता, सहृदयता हो. जिज्ञासा, उत्सुकता हो । विंबात्मकता, मौलिकता हो।"


इससे उनके मानसिक स्तर के विस्तृत फलक का दर्शन किया जा सकता है जो उनके सजन में गाहे-बगाहे परिलक्षित होता है।

तीसरा साहित्यक-साक्षात्कार - आशीष बाल संपादक- 'अभिनव बालमन" अलीगढ़ का है जिसमें एक प्रश्न के जवाब में यह स्वीकारा है कि "काव्य - प्रतिभा जन्मजात होती है। ईश्वर प्रदत्त होती है। रचनाकार की संवेदना उसमें भाव, उसकी कल्पना, उसकी अभिव्यजना शक्ति और उसका भाषा पर अधिकार ही उसे साहित्यकार बनाता है।"


इस तरह प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य, बाल साहित्य-परक सामग्री तथा बाल साहित्य पर विवेचनात्मक जानकारी इस ग्रंथ में देकर संपादक डॉ.नागेश पांडेय 'संजय' ने बड़ा भारी कार्य किया है तथा जिज्ञासु पाठकों को डॉ. शकुंतला कालरा के बहाने ही सही बाल साहित्य के प्रति अनेकानेक खिड़कियाँ खोल दी हैं • इनसे बाहर या अंदर झाँक कर स्वविवेकानुसार हमारे - बाल साहित्यकार बंधु कुछ ग्रहण कर सकते हैं, आत्म चिंतन-मनन कर सकते हैं और हमारे समाज को उनसे प्रेरणा लेकर सात्विक, सार्थक सृजन कर सकते हैं ऐसा मेरा मानना है। 


मेरी बहन डॉ. कालरा जी से स्नेह भरा लगाव है वे हमारी संस्था समन्वय, सहारनपुर की सम्मानित आजीवन सदस्य हैं- उनका आर्शीवाद समय-समय पर मिलता रहता है और आगे भी मिलता रहेगा - ऐसा मेरा मानना है।


मैं संस्था सचिव के नाते उनके उज्ज्वल साहित्यिक संसार के सृजन के लिए शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ और डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' के इस अनुपम प्रदेय के लिए आभार व्यक्त करता हूँ।


डा. आर.पी. सारस्वत

सचिव, 'समन्वय', सहारनपुर

नीरजा स्मृति बाल साहित्य न्यास

सहारनपुर 247001 -

मो० ना - 9557828950

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

पुस्तक समीक्षा : ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, समीक्षक : गोविंद शर्मा

पुस्तक - ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां

संपादक -  डा. नागेश पांडेय संजय

प्रकाशक- राष्ट्रीय प्रकाशन मंदिर,लखनऊ

मूल्य -500/-

वर्ष - 2016

समीक्षक : गोविंद शर्मा 

एक वह समय भी था जब बालकथाएं शुरू होती थी-एक था किसान या फलां गांव के रहने वाले....। आज के बालसाहित्य के लिये गुरूओं का यह कहना है कि उनमें वैज्ञानिकता होनी चाहिए और वे आज के बच्चे की आवश्यकता के अनुसार होनी चाहिए। आज के बच्चे की आवश्यकता क्या है- यह तय करने के लिये आप नेट पर सर्च करिए, विदेशी भाषा का बालसाहित्य पढिए और बच्चों से जरा दूर रहिए। क्योंकि यह बच्चों का काम नहीं है।

डा. नागेश पांडेय संजय स्थापित बालसाहित्य रचनाकार है। उन्होंने विपुल मात्रा में बालसाहित्य रचा है और दूसरों को पढा भी है। शायद इसी लिये उन्हें लगा कि बालसाहित्य से ग्रामीण परिवेश विदा हो गया है या विदा हो रहा है। उन्होंने बालकहानियों में ग्रामीण परिवेश तलाशना शुरू किया। फलस्वरूप रोचक कहानियों की पुस्तक ‘ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां’ पाठकों को उपलब्ध हुई। डा. नागेश पांडेय संजय द्वारा संपादित इस संग्रह में हिंदी के पन्द्रह बाल साहित्य रचनाकारों की 25 कहानियां हैं। डा.उषा यादव की ‘दादी अम्मा का खजाना’ और ‘आगिया वैताल की कथा’, गोविंद शर्मा की ‘अपना काम करेंगे’, और ‘मेहनत का मंत्र’, डा. जाकिर अली रजनीश की ‘सेमरा का शेर’ और ‘सपनों का गांव’ , डा. दिविक रमेश की ‘किस्सा चाचा तरकीबूराम का’,  डा.नागेश पांडेय संजय की ‘गौतर’ एवं ‘मन का डर’, प्रकाश मनु की ‘तुम भी पढोगे जस्सु’, और ‘जमुना दादी’, मुरलीधर वैष्णव की ‘हबपब टोली’, डा.मोहम्मद साजिद खान की ‘बैल खुल गये’ एंव ‘बरगदी गांव’, रमाशंकर की ‘कायाकल्प’ और ‘शत्र्तो के सहारे- आई बहारें’, रावेन्द्र कुमार रवि की ‘मिल गई मां-, डा. श्री प्रसाद की ‘काला हाथ’ और ‘यह सच हंै’, संजीव जायसवाल संजय की ‘लोहार का बेटा’, डा.सुनीता की ‘सींक वाली ताई’, एवं ‘करमू चाचा का तांगा’, डा. हेमंत कुमार की ‘आलस्य का फल’, बाल कहानियां है।

सभी कहानियां रोचक हैं और लगता है कथाकारों ग्रामीण परिवेश देखा है। अधिकांश कहानियां संस्मरणात्मक हैं। कुछ की रचना शिक्षा देने या मनोरंजन करने के लिये की गई है। फिर भी किसी में भी रोचकता की कमी नहीं रहीं। संग्रह ग्रामीण परिवेश की बालकहानियों का है। पर नगरीय परिवेश के बाल पाठकों के लिये भी उपयोगी है। वे इन्हें पढकर जान सकेंगे कि गांव से शहर आये उनके माता-पिता किस माहौल में बड़े हुए, कैसे पढे, उनका बचपन कैसा था और कैसे अभावों का सामना कर अपने आपको इस योग्य बनाया कि तुम्हारे लिये हर तरह की सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं।

हां, पुस्तक के कवर प्रकाशन, भीतर की छपाई और कागज की क्वालिटी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था। मूल्य पांच सौ रूपये ज्यादा लगता है। कहानियों के साथ रेखाचित्र चित्र भी नहीं हें। बालसाहित्य में चित्रांकन का अपना महत्व होता है। तथापि, डा.नागेश पांडेय संजय इस महत्वपूण कार्य के लिये बधाई के पात्र है। 

समीक्षक - गोविंद शर्मा, 

ग्रामोत्थान विद्यापीठ 

संगरिया- 335063 (राजस्थान)







शुक्रवार, 22 मई 2026

पुस्तक-समीक्षा : बालिकाओं की रोचक कहानियाँ , समीक्षक : नीलम राकेश

तुम्हारे लिए नई किताब / नीलम राकेश

बालिकाओं की रोचक कहानियाँ 

बच्चों के लिए नागेश पांडेय 'संजय' के कई कहानी संग्रह आ चुके हैं। इनके संपादन में तुम्हारे लिए एक और कहानी संग्रह आया है - 'बालिकाओं की रोचक कहानियां'। इसमें उन्होंने देश के कई जाने-माने बाल साहित्यकारों की कहानियां संकलित की हैं, जो बालिकाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। ये कहानियां रोचक तो हैं ही, प्रेरक भी हैं।

क्षमा शर्मा की कहानी 'दिवाली के दिन' में किशोरियों को यह समझ दी गई है कि माता-पिता और भाई ही उनके असली शुभचिंतक होते हैं। दिविक रमेश ने बालिकाओं पर जरूरत से ज्यादा नियंत्रण को लेकर 'रितु के पापा' शीर्षक से एक कहानी लिखी है। प्रकाश मनु की मनोरंजक कहानी 'खीर खाई टेडी बीयर ने' पढ़कर तुम्हें खूब मजा आएगा। शकुंतला कालरा की कहानी 'मदर्स डे' में यह संदेश है कि भावनाएं अमूल्य होती हैं, भावनाओं की कीमत को भावनाओ से ही चुकाया जा सकता है। सूर्यनाथ सिंह की कहानी 'नानू का ननिहाल' में बच्चों को सैर-सपाटे का आनंद तो मिलेगा ही, अंधविश्वासों से सतर्क रहने की शिक्षा भी मिलेगी। समीर गांगुली की कहानी 'फूलों की खोज' बताती है, हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए। देवेंद्र कुमार की कहानी 'झुमकी का सपना' पढ़कर तुम झुमकी की तरह किसी लड़की का सपना पूरा करने के लिए प्रेरित होगे। उषा यादव की कहानी 'समय की कीमत' का संदेश है, हमें हमेशा समय का महत्व समझना चाहिए। इस कहानी संकलन में संपादक नागेश पांडेय 'संजय की भी एक कहानी 'मुझे कोई प्यार नहीं करता' पढ़ने को मिलेगी, जिसमें बताया गया है, अपने से छोटों को मिलते प्यार से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।

इनके अलावा इस किताब में संकलित अन्य लेखकों की कहानियां पढ़कर भी तुम्हें अच्छी सीखें मिलेंगी। 

किताब: बालिकाओं की रोचक कहानियां, 

संपादक: डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' मूल्य: 230 रुपए,

 प्रकाशक: लवकुश प्रकाशन, लखनऊ



गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

पुस्तक-समीक्षा : टेढ़ा पुल , समीक्षक: अरविंद पथिक

पुस्तक समीक्षा 

टेढ़ा पुल (बाल उपन्यास) : लेखक –डॉ. नागेश पाण्डेय ‘संजय'

समीक्षक  : अरविन्द पथिक 

  बाल साहित्य अधिकार पूर्वक लिखना, साथ ही उसे रोचक और बोधगम्य बनाये रखना निश्चित ही बेहद कठिन और चुनौती पूर्ण कार्य है। यदि रोचकता और संदेश देने को बाल साहित्य लेखन की सफलता की कसौटी माना जाए तो डॉ. नागेश पाण्डेय संजय हमारे दौर के सर्वाधिक सफल बाल साहित्यकार हैं। उन्होंने अपनी नवीनतम कृति ‘टेढ़ा पुल’ का लेखन कर एक बार फिर इस बात को प्रमाणित किया है। उपन्यास का प्रारम्भ जिस रोचक अंदाज़ में होता है, वह लेखक के सफल शिक्षक और बाल मनोविज्ञान का अध्येता होना सिद्ध करता है। उपन्यास की प्रारम्भिक पंक्तियों से ही जो उत्सुकुता और रोचकता उत्पन्न होती है वह अंतिम पंक्तियों तक बनी रहती है।

        उपन्यास का मुख्य पात्र ‘गिजू’ माता पिता के आपसी अलगाव की आंच में झुलसते बचपन और उसके अन्तर्द्वद्व को बार बार अभिव्यक्त करता है और पाठक को यह सोचने को मजबूर करता है कि आखिर माता पिता के आपसी विवाद ,कलह और अलगाव के दुष्परिणाम बच्चे क्यों झेलें ? बच्चों का कोड भाषा गढ़ना ,अपने शिक्षकों के उपनाम रखना, पिता के सान्निध्य को लालायित होना, स्कूल में शिक्षण ना होने पर भीतर ही भीतर कुढना जैसे मनोभावों को ‘टेढ़ा पुल ‘ में बहुत बारीकी और सहजता से डॉ. नागेश पाण्डेय संजय ने चित्रित किया है। उनकी कलम का कमाल इन पंक्तियों में देखिये -----मलकीत चिल्ला रहा था –"ओए,मैं फूल नहीं हूँ। आई एम नाट ए फूल। आई एम इंटेलीजेंट।"

"अच्छा तो एक सवाल का जबाव दोगे ?"

"पूछो।"

"बट मीन्स लेकिन तो व्हाट मीन्स क्या ?"

"क्या।" मलकीत ने तुरंत जबाव दिया।

अंकुर हंसा –"तुम बताओ"

"बताया तो... क्या ?"

"कहाँ बता पा रहे हो ? क्या क्या कर रहे हो।"

इस तरह बच्चों के आपस में चुहल करने की अनेक घटनाएँ ‘टेढ़ा पुल’ को सरस बनाये रखती हैं। इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष जो इसे पाठ्यक्रमोपयोगी बनाता है, वह है बहुत सहज सरल ढंग से मुहावरों और लोकोक्तियों के बारे में जानकारी देना। जिस तरह बाल साहित्य के जनक विष्णुगुप्त बच्चों को खेल-खेल में शिक्षा देने में निष्णात थे, उसी तरह टेढ़ा पुल का लेखक भी कहानी सुनाते सुनाते समय कब बच्चों को मुहावरे और लोकोक्तियों में फर्क करना,उनका अर्थ ग्रहण करना ,पर्यायवाची लिखना सिखा देता है पता ही नहीं चलता। पंक्तियाँ देखिये –

“ तिवारी सर, सख्त तो बहुत थे पर हिंदी बहुत अच्छी पढाते थे। मुहावरे और लोकोक्ति की पहचान का बहुत अच्छा तरीका उन्होंने बताया था कि मुहावरे के अंत में ‘ना’ आता है और लोकोक्ति पूरा कथन होती है। जैसे ‘हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या ? लोकोक्ति है तो आँखे दिखाना ,’नौ दो ग्यारह होना’ मुहावरा है। ----एक दिन उन्होंने बताया जल के पर्यायवाची याद कर लो, उनमे ‘द’ जोड़ दोगे तो बादल ,’ज’ जोड़ दोगे तो कमल और ‘धि’ जोड़ दोगे तो समुद्र के पर्यायवाची हो जायेंगे। जैसे जलद,वारिद ,तोयद आदि बादल के पर्यायवाची हैं।”

उपन्यास का शीर्षक ‘टेढ़ा पुल’’ गिजू के मनोमस्तिष्क पर अंत तक चिपका रहता है। लेखक शीर्षक को अपने अंत में अपने इस कथन के साथ उपयुक्त सिद्ध करने में सफल होता है –“वेरी गुड! अब मैं भी बेधडक दौड़ सकूंगा। मेरा टेढ़ा पुल भी सीधा हो गया है।”

दुधवा नेशनल पार्क की यात्रा, छात्रों का फिल्म देखने जाना समेत अनेक ऐसी घटनाएँ हैं जो बाल मन की स्वाभाविक जिज्ञासा को निरंतर उत्प्रेरित करती हैं। एक मात्र खटकने वाली बात यदि खोजी जाए तो इस उपन्यास में एक ही प्रतीत होती है वह है-- गिजू के पिता के अस्पताल में भर्ती होने के घटनाक्रम के साथ ही ‘गिजू’ के माता पिता के सुलह की संभावना निश्चित हो जाना। रहस्य का जो वातावरण कथा के प्रति निरंतर रोचकता और उत्सुकुता जगाए रखने के लिए आवश्यक था वह समय से पूर्व ही खुल गया है और कोई भी अस्पताल में गिजू के नाना नानी और मामा द्वारा गिजू के पिता की सेवा सुश्रुषा से निष्कर्ष निकाल सकता है कि इस उपन्यास का समापन गिजू के माता पिता के मिलन या अलगाव समाप्त होने के साथ होगा। इस बिंदु पर लेखक किसी घटनाक्रम को जोड़कर रहस्य को अंत तक बनाये रख सकता था परन्तु यह कोई ऐसा विषय नहीं है जिसके लिए इस ‘टेढ़ा पुल’ के सबल पक्षों को भुला या नकार दिया जाए। आकर्षक सजिल्द कलेवर 150 रूपये मूल्य का 64 पृष्ठों का विभा प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित ‘टेढ़ा पुल’ बाल उपन्यास डॉ. नागेश पाण्डेय ‘संजय‘ की रचना यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध होगा।

समीक्षक : अरविंद पथिक

(समकालीन चौथी दुनिया, नई दिल्ली, जनवरी , 2018 में प्रकाशित)




बुधवार, 15 अप्रैल 2026

पुस्तक-समीक्षा, यदि ऐसा हो जाए (बाल कविता संग्रह), समीक्षक : प्रो. हौसिला प्रसाद सिंह

पुस्तक परख

पुस्तक : यदि ऐसा हो जाए (बाल कविता संग्रह)

रचनाकार : डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ 

प्रकाशक :अनंत प्रकाशन ए-569, इंदिरा नगर, लखनऊ

मूल्य :150/- रुपये, पृ. 96 

आज का बालक उपभोक्तावादी समाज का हिस्सा बन गया है। उसका सर्वाधिक प्रेम और लगाव मशीनों (टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल) से है। पढ़ाई के बोझ में दबे होने से साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के लिए उसके पास न तो समय है और न रुचि लेकिन इसके बाद भी बाल कहानियों और कविताओं के प्रभाव और क्षमता ने उसे अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। 

नागेश पांडेय ‘संजय‘ बाल साहित्य की रचनाशीलता में अग्रगण्य हैं। चल मेरे घोडे, अपलम चपलम और लारी लप्पा के बाद पिछले दिनों उनकी 51 बाल कविताओं का संग्रह यदि ऐसा हो जाए प्रकाशित हुआ है। संग्रह की कविताएँ आज के बाल परिवेश के सर्वथा अनुकूल हैं। जहां अत्याधुनिक विषय मोबाइल, रोबोट, पर्यावरण, चुनाव और सरकार पर इसमें रोचक कविताएँ हैं, वहीं प्रकृति, समाज, देश, शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और नीति पर भी बड़ी ही चुस्त और सधी हुयी रचनाएँ संकलित की गईं हैं। रचनाकार ने पुस्तक की भूमिका में लिखा भी है-"मैं मानता हूं कि तुम्हारी कविताएं-तुम्हारी अपनी भाषा में होनी चाहिए और उनमें तुम पूरी तरह जीते-जागते, उछलते-कूदते, ठुमकते-थिरकते, चहकते-खेलते भी नजर आओ, यह तो बहुत जरूरी है। दूसरी बात-कविता मन से उपजी हुई चीज है। ऐसा होता है, तभी वह मन को छूती है। इन कविताओं को पढ़ोगे तो उपर्युक्त बातों को जरूर महसूस करोगे। कविताओं में तुम्हारी अपनी सोच है। तुम्हारे अपने विचार है-तुम्हारी कल्पना है और तुम्हारे जीवन को सच भी। तुम्हारे आस-पास की चीजों को मैंने तुम्हारी निगाह से देखने-तुम्हारे दिल से महसूस करने और तुम्हारी अपनी शैली में कहने की कोशिस की है।"

 पहली कविता में कल्पना भी है और आत्मबोध भी -इम्तहान को दिए बिना ही,अगली कक्षा जाएँ। बिना कुछ किए, सारे जग में ऊँचा नाम कमाएँ। यदि ऐसा हो जाए तो सच मजा बड़ा आएगा। पर भइया बिन मेहनत फल कुछ रास नहीं आएगा। 

मोबाइल पर बाल मन की अभिव्यक्ति भी प्रशंसनीय है-

जहाँ कही भी जाता, तुमको हरदम रखता साथ। चिट्ठी का क्या काम, कि फौरन हो जाती है बात। लेकिन ‘विजी’ बोलते हो जब, तो उठती है खीझ।

चिड़ियाघर का मुख्य प्रयोजन बालकों का पशु पक्षियों से रिश्ता कायम करना है- बाघ, भेड़िये और लोमड़ी देख - देख  हर्षाए, पर देखा जब हुक्कू बंदर फूले नहीं समाए। मजा आ गया उसके संग मे हुक्कू-हुक्कू दोहराकर। मैंने देखा चिड़ियाघर

शाब्दिक पुनरावृत्ति के चलते यह कविता बच्चों  को विशेष रुप से मन भाएगी- भूख लगी है,कब तक कब तक? खाना-पानी, दें ना नानी जब तक जब तक, तब तक तब तक।

उड़न खटोला पर कविता संभवतः अपने विषय पर पहली कविता है-उफ! कितनी ऊँचाई थी,नीचे गहरी खाई थी। लोग बजाते थे सीटी, लगते थे जैसे चींटी।

चुनाव कविता किशोर मन के अधिक निकट है-यहां सभी को हैं सब प्यारे यहां नहीं गिरतीं सरकारें,नहीं पेंच या दाँव हमारे विद्यालय में। मम्मी हुआ चुनाव हमारे विद्यालय में।

धूप का मानवीकरण और फिर बालक का संवेदित मन इस कविता में सहज उदघाटित हुआ है-धूप न निकली आज,कहीं बीमार तो नहीं ? सुबह-सुबह आ जाती थी,इतराती-इठलाती थी,माखन बन मुस्काती थी,मिसरी बन शरमाती थी। कभी आग बरसाती थी,जो हो, मन को भाती थी। किए बेतुके काज, मगर हर बार तो नहीं।

दादा-दादी चुप क्यों रहते ? कविता मार्मिक है जो पौत्र के बहाने उनका अकेलापन बयां करती है और वृद्धों की दशा पर बड़ों को सोचने पर मजबूर भी करती है।

कुल मिलाकर प्रभावान्विति और प्रयोजनशीलता की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत उपयोगी और विशिष्ट है।

समीक्षक : प्रो. हौसिला प्रसाद सिंह, इलाहाबाद

(बाल वाटिका, भीलवाड़ा, राज. के सितम्बर 2013 अंक में पृष्ठ 47 पर प्रकाशित)






बुधवार, 8 अप्रैल 2026

पुस्तक-समीक्षा,नटखट बाल कहानियाँ, समीक्षक : राजकुमार जैन राजन

बालमन को प्रभावित करती 'नटखट बाल कहानियाँ'

समीक्षक : राजकुमार जैन राजन

समीक्ष्य कृति : 'नटखट बाल कहानियाँ'  

लेखक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' 

प्रकाशक : अनुराग प्रकाशन, 4760-61, द्वितीय तल, 23-अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002 

संस्करण : 2021  

         दूध, भोजन, खेल व जीवन रक्षक दवाएँ बालकों के लिए जितनी आवश्यक होती है उतनी ही आवश्यक होती हैं पुस्तकें। बच्चों का मन एक कोरे कागज जैसा होता है जिसपर लिखी गई इबारत को आसानी से नहीं मिटाया जा सकता है इसी तरह बाल मन पर जो कुछ अंकित हो जाता है वह अमिट स्थान बना लेता है। आज के परिवेश में बच्चे की जिज्ञासा का क्षितिज चाहे जितना बड़ा हो गया हो पर उसकी प्रारंभिक जिज्ञासा मूल रूप में अपरिवर्तित है। इसके लिए बालक के मनोविज्ञान को समझते हुए उसकी शिक्षा, दीक्षा, पठन, पाठन में बड़ी सावधानी रखनी चाहिए। बालकों के सुदृढ जीवन निर्माण में बाल साहित्य का प्रमुख स्थान है। विश्व के हर देश और हर भाषा में बाल साहित्य बहुतायत से लिखा जा रहा है। आज जो बच्चे अच्छा बाल साहित्य पढेंगें; वे ही कल इंजीनियर, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, सैनिक, व्यापारी, अधिकारी, साहित्यकार आदि बनेंगे।  जिस प्रकार के आदर्श और नैतिक मूल्य हम उनके सामने रखेंगे, भविष्य में वही फलित होंगे। यदि हम बच्चों को श्रेष्ठ बाल साहित्य ही देंगे तो उन्हें अनेक दुष्प्रभावों से मुक्त रख सकते हैं। 

        अच्छी पुस्तकें बालकों के मानसिक क्षतिज को बढ़ाने में सहायक होती है तो दूसरी ओर उनकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता में भी नए आयाम जोड़ती है। बच्चों के सम्यक विकास में स्वस्थ, मनोरंजक, सुरुचिपूर्ण, संस्कार सम्पन्न्न, ज्ञानवर्धक बाल साहित्य की उपादेयता एवं उपयोगिता निर्विवाद है। बाल साहित्य के ख्यातनाम रचनाकार डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' का 

बेहतरीन बाल कहानी संग्रह " नटखट बाल कहानियाँ " प्रकाशित हुआ है  जो उपरोक्त कसौटियों पर खरा उतरता है। 

              आज के बालक की रुचि, रुझान और बाल मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ रखने वाले शाहजहाँपुर निवासी डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' के बच्चों के लिए अनेक कहानी, कविता, एकांकी, पहेली संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ; जिनमें 'आधुनिक बाल कहानियाँ', 'मोती झरे टप-टप', 'नेहा ने माफी मांगी', 'दीदी का निर्णय', 'छोटे मास्टर जी', 'कद्दू की दावत', 'अपलम चपलम', 'पीठ पर बस्ता', 'जो बुझे वो चतुर सुजान' आदि प्रमुख हैं। आपकी कई रचनाओं का पंजाबी, कन्नड़, गुजराती, मराठी, उड़िया, राजस्थानी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। आपकी कई रचनाओं को स-सम्मान शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में भी सम्मिलित किया गया है। बाल साहित्य में शोध/आलोचना के क्षेत्र में भी आपने कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है। 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान', ' चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट, इंडिया', 'नेपाल बाल साहित्य समाज', ' भारतीय बाल कल्याण संस्थान', ' राजकुमार जैन राजन फाउंडेशन', 'साहित्य मण्डल', 'बाल साहित्य शोध केंद्र' जैसी अनेक ख्यातनाम संस्थाओं द्वारा श्रेष्ठ बाल साहित्य सृजन के लिए डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' सम्मानित किया हैं। 

          " नटखट बाल कहानियाँ "  बाल कहानी संग्रह में डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' की बालकों को जीवन का पाठ  पढ़ाती 28 प्रतिनिधि बाल कहानियों को संजोया गया है। 'खेल-खेल में' कहानी में बताया गया है कि बेमतलब किसी को परेशान नहीं करना चाहिए अन्यथा कभी भी मुसीबत खड़ी हो सकती है। 'मैं जाग रहा था' एक मनोरंजक कहानी है जो बालमन के नटखटपन को दर्शाती है।किसी मे यदि कोई शारीरिक कमी हो तो बार-बार उसका मजाक बनाने, चिढ़ाने से वही स्वयं की आदत बन जाती है। 'कहीं ऐसा हो तो?' कहानी में नीरव की हकलाने की आदत को लेकर प्रणव उसकी मजाक बनाता रहता और स्वयं हकलाते हुए बोलता। धीरे-धीरे यह उसकी आदत ही बन गई जो ठीक नहीं हो पाई और नीरव ने लगातार प्रयास कर अपनी हकलाहट को खत्म कर दिया और धारा प्रवाह बोलने लगा। 'उड़न तश्तरी' कहानी को इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी कहना चाहूंगा जो पर्यावरण संरक्षण के साथ ही मानवता का सन्देश किस उत्कृष्ट अंदाज़ में देती है। इस कहानी का एक संवाद देखिए।एलियन सोनू को कहता है, *'क्योकि पृथ्वीवासियों को लड़ने -भिड़ने से ही फुर्सत कहाँ? आए दिन तो यहाँ दंगे-फसाद होते हैं।लोग खाली बैठ कर गप्पें लड़ाते हैं।एक दूसरे की बुराइयाँ खोजते हैं। जाति और धर्म के नाम पर जूझते हैं। हमारे ग्रह के हर वैज्ञानिक को खूब सुविधाएं हैं। ....  आपकी पृथ्वी की तरह हमारे यहाँ ढेरों भगवान नहीं हैं। हमारे यहाँ सिर्फ एक ही भगवान है- विज्ञान। हम सब उसके बारे में ही सोचते हैं और कर्म को  पूजा मानते हैं ...  हमारे ग्रह पर पृथ्वी की तरह मानवों की जातियाँ भी नहीं होती .. हमारे यहाँ तो बस ...  मानव जाति, पशु जाति, पक्षी जाति.. यह जरूर होता है ... आपकी  आपकी पृथ्वी पर ऐसा कहाँ?'* 

        'काल करे सो आज कर' कहानी श्रम व समय की महत्ता बताती है तो 'नेहा ने माफी मांगी'एक नटखट बालिका की कहानी है जो अपनी हरकतों से सबको परेशान किया करती थी।एक दिन नेहा को ऐसा सबक मिलता है कि वह शरारतों से तौबा कर लेती है और अपनी गलतियों के लिए माफी मांगती है। इसी तरह इस संग्रह की सभी कहानियाँ एक से बढ़कर एक श्रेष्ठ हैं। लेखक बालकों को सीधे सीधे कोई सीख नहीं देता है बल्कि स्वयं निर्देशक बनता है है और चरित्रों को उसी दिशा में मोडता जाता है, जिससे पाठक अपने आप कहानी के मन्तव्य को ग्रहण कर लेता है।इन कहानियों की भाषा सहज एवं सरल है जिनमें बाल सुलभ मस्ती है, रोमांच है, संवेदनाएं हैं, राष्ट्रीयता की भावना है विज्ञान का ज्ञान है, पर्यावरण संरक्षण की बातें हैं, कहानियों में कविताएँ हैं, सामाजिकता है, रिश्तों की महक है, जागरूकता है और है कोमल हृदय को प्रभावित करने वाली निर्मलता भी। कुल मिलाकर देखें तो 28 ही कहानियों में उतने ही मन भावन रंग हैं। ये कहानियाँ बच्चों का मनोरंजन ही नहीं करेगी बल्कि उनके शारीरिक व मानसिक विकास में भी सहायता करेगी। पुस्तक खूबसूरत सजिल्द आवरण पृष्ठ के साथ सुंदर चित्रों सहित प्रकाशित की गई है। सबकुछ उत्कृष्टतम होते हुए भी 136 पृष्ठ की किताब का मूल्य 450 रुपये रखना गले नहीं उतरता है। बहरहाल, इस खूबसूरत बाल कहानी संग्रह के लिए डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' को हार्दिक बधाई । यह पुस्तक बाल साहित्य जगत व पाठकों में सम्मान प्राप्त कर बाल साहित्य जगत में श्रीवृद्धि करेगी, मंगलकामनाएं ! 

◆  समीक्षक : राजकुमार जैन राजन 

(दैनिक "दस्तक प्रभात", पटना, 13/02/2022)