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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020
बुधवार, 15 अप्रैल 2020
कविता 'हारेगा कोरोना'
हारेगा कोरोना
कविता : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
हारेगा कोरोना बिल्कुल
हारेगा कोरोना।
सच है, कोरोना के आगे
बनी हुई लाचारी।
सारी दुनियाँ कोशिश पर
कोशिश करके है हारी।
लेकिन आशावान रहे हम,
मन से आहत हो ना
धोकर हाथ चलो अब इसके
पीछे हम पड़ जाए।
इसको विफल करेंगे मिलकर,
हम सब अब अड़ जाएं।
ध्यान रहे अपने हाथों को
बार बार है धोना।
कोरोना को नहीं पता है,
जाति धर्म मजहब क्या?
यह तो जीवन का दुश्मन है,
समझ गए हो अब क्या?
इसको अवसर अगर दिया तो,
बहुत पड़ेगा रोना।
मन के हारे हार सदा है,
मन के जीते जीत।
मन के तारों से हम छेड़े,
जीवन का संगीत।
मन उपवन में आशाओं के,
सुमन हजारों बोना।
रहें सजग हम, सावधान हम,
दुश्मन बहुत बली है।
एक बड़ी आबादी इसने,
पल भर में निगली है।
कैसे यह कमजोर बने अब,
शपथ हृदय से लो ना।
घर पर रहें, व्यर्थ मत निकले,
बात भली यह माने।
इसकी चैन न बनने देंगे
हम सब मन में ठाने।
जो गलती जग करता आया,
वह गलती अब हो ना।
सब आरोग्य सेतु को निश्चित
डाउनलोड करेंगे।
कहीं न पैनिक फैले बिल्कुल
इसका ध्यान धरेंगे।
सजग नागरिक बनकर इसको
सब कमजोर करो ना।
है हमको विश्वास साथियों,
होगी जीत हमारी।
कोरोना हारेगा देखेगी,
यह दुनिया सारी।
फिर से सबके ही दिन बहुरें,
महके कोना कोना।
हारेगा कोरोना, बिल्कुल
हारेगा कोरोना।
डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
प्राध्यापक एवम
विभागाध्यक्ष,
शिक्षक शिक्षा विभाग,
आर. पी. कालेज, मीरगंज, बरेली
शनिवार, 1 सितंबर 2012
राम ! ऐसी बेटियां सबको मिलें
बेटी सृष्टि के जवाहर नवोदय विद्यालय में चयन/प्रवेश होने पर
कविता : नागेश पांडेय 'संजय'
राम ! ऐसी बेटियां सबको मिलें
लाडली जो है बहुत भोली-भली,
लाडली जो प्यार से घर में पली.
लाडली जो हम सभी की शान है,
लाडली जो हम सभी की जान है
लाडली पर हम सभी को नाज है,
लाडली वह दूर हमसे आज है.
गयी पहली बार घर से दूर वह,
हाँ, मगर उत्साह से भरपूर वह.
स्वप्न को साकार करना जानती,
पूर्ण करती लक्ष्य जो भी ठानती.
सफलता की है सहज अधिकारिणी,
लाडली है हर्ष की संचारिणी.
लाडली को कर्म में विश्वास है,
निरंतरता का उसे अभ्यास है.
नहीं रूकती, नहीं थकती है कभी,
भाग्य को भी नहीं तकती है कभी.
सीखने की ओर अद्भुत चाह है,
और .. गढ़ती स्वयं अपनी राह है.
लाडली, जिसको नवोदय भा गया,
सहजता से नाम उसका आ गया.
लाडली अब हर्ष से अभिभूत है,
और उसका मन बहुत मजबूत है.
देखकर उसकी सहज एकाग्रता,
हम सुखी कितने, नहीं सकते बता.
लाडली सबकी हमारी सृष्टि है,
कर रही सब पर सुखों की वृष्टि है.
राम ! ऐसी बेटियां सबको मिलें,
और सबके ही ह्रदय सुख से खिलें.
लक्ष्य की खातिर गयी जो दूर अब,
आप सब आशीष दें भरपूर अब.
सोमवार, 23 जनवरी 2012
जय जय सुभाष ! जय जय सुभाष !
किशोर - कविता : नागेश पांडेय 'संजय'
जय जय सुभाष ! जय जय सुभाष !
जब भारत में था अंधकार,
गोरे करते थे कुटिल राज.
थी फूट यहाँ ,थी लूट यहाँ
था विवश यहाँ सारा समाज.
तब तुमने नयी चेतना का,
फूँका जन-जन में त्याग-मंत्र.
'तुम मुझे खून दो, मैं दूँगा ,
मित्रों, तुमको भारत स्वतंत्र.
तब ही, हो पाएगा विकास'.
जय जय सुभाष ! जय जय सुभाष !
सब मचल पड़े, सब निकल पड़े
आजाद हिंद तब फ़ौज बनी,
क्या युवक-युवतियाँ, क्या बालक !
तब जंग सभी की मौज बनीं.
जो बढ़ा काफिला, रुका नहीं,
था लक्ष्य एक, बस आजादी.
छिड़ गया युद्ध फिर घमासान,
गोरों ने देखी बर्बादी.
वे थे हताश, वे थे निराश.
जय जय सुभाष ! जय जय सुभाष !
था तुम में बल, साहस अटूट,
थी अद्भुत ही संकल्प शक्ति.
तुम रहे न, लेकिन जगा गए,
जन-जन के मन में राष्ट्र-भक्ति.
तुम क्रांतिवीर, पर शांत, धीर,
तुम धरती के सच्चे सपूत.
थे मोह, प्रीति से विमुख, सजग,
तुम क्रांति-समर के अग्रदूत.
तुमसे जग ने पाया प्रकाश.
जय जय सुभाष ! जय जय सुभाष !
यह कविता कक्षा पाँच की हिंदी पाठ्य पुस्तक 'आलोक भारती' में विगत बारह वर्षों से संकलित है.
चित्र साभार गूगल खोज बुधवार, 26 अक्टूबर 2011
कैसे दीपावली मनाऊं?
किशोर - कविता : डा. नागेश पांडेय 'संजय'
कैसे दीपावली मनाऊं?
पास नहीं अम्मा के पैसे,
बापू की तबियत खराब है।
हुई उधारी बंद हर जगह,
कर्जे का भारी दबाव है।
घर के बर्तन बेच-बाचकर
कल का खाना गया बनाया।
जिसको हम लोगों ने मिलकर-
गिन-गिनकर कौरों में खाया।
अम्मा भूखी सोयीं बोलीं-
‘‘मुझे भूख ना, मैं ना खाऊँ।’’
कैसे दीपावली मनाऊँ?
नहीं मदरसे जा पाएँगे
भइया, उनका नाम कट गया।
दादी, को कम दिखता, उनका
बुनने का था काम, हट गया।
दीवाली के दीप बनाकर,
मैंने पैसे चार कमाए।
आशाओं के पुष्प खिले थे-
मन में, जितने, सब मुरझाए।
अपने आँगन भी दमकेंगे-
दीप ख़ुशी के मन झुँठलाऊं
कैसे दीपावली मनाऊँ?
मंगलवार, 25 जनवरी 2011
सारे जग से न्यारा देश - नागेश पांडेय 'संजय'
सारे जग से न्यारा देश,
है आँखों का तारा देश,
प्यारा देश, दुलारा देश ,
हिंदुस्तान हमारा देश .
हमें देश पर नाज है,
देश हमारा ताज है .
हमें देश पर गर्व अपार,
हम सब इसके पहरेदार.
इसको खूब सँवारेंगे,
तन-मन इस पर वारेंगे .
जगर-मगर कर चमके देश,
हीरे जैसा दमके देश,
यह अपनी अभिलाषा है,
लेकिन कष्ट जरा सा है,
झगड़े-लफड़े छोड़ें हम,
सबसे नाता जोड़ें हम,
बने एकता अपना धर्म ,
बने एकता अपना कर्म .
मिलकर गाए सारा देश,
हिंदुस्तान हमारा देश।
रणबाँके हम वीर बड़े,
हटे न पीछे जहाँ अड़े।
हमें न झुकना भाता है,
हमें न रुकना आता है,
हम हैं अद्भुत सेनानी,
हार नहीं अब तक मानी,
हमने कैसा पाठ पढ़ा,
है इतिहास गवाह खड़ा
हम तो आगे आएँगे।
हम तो कदम बढ़ाएँगे।
प्रतिपल बढ़ते जाएँगे
ऊँचे चढ़ते जाएँगे।
बढ़ना अपनी आन है,
चढ़ना अपनी शान है।
सुख की निर्मल धारा देश
हिंदुस्तान हमारा देश।
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
नया वर्ष फिर आया है
अडिग लगन उत्साह अगर है ,
मन में सच्ची चाह अगर है .
तो सपने होंगे साकार ,
खुशियाँ खुद आएँगी द्वार .
यह संदेसा लाया है .
नया वर्ष फिर आया है .
बाधा के आगे झुक जाते ,
प्रगति - राह में वे रुक जाते .
चलना जिसकी आन शान है ,
उसे विजय का मिला मान है .
उसके यश का गान समय ने ,
युगों - युगों तक गाया है .
नया वर्ष फिर आया है .
जो आँधी में दीप जलाते ,
काँटो में रहकर मुस्काते .
कभी निराश नहीं होते जो .
कभी उदास नहीं होते जो .
परहित कष्ट उठाया है ,
वे ही आगे बढे शान से ,
मनचाहा सब पाया है .
नया वर्ष फिर आया है .
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