पुस्तक परिचय
नेहा ने माफी मांगी [कहानी संग्रह]
कहानीकार : नागेश पांडेय संजय
प्रकाशक : राही प्रकाशन
शाहजहांपुर उ० प्र०
संस्करण : प्रथम, वर्ष 1994
समीक्षक : चक्रधर नलिन
समीक्ष्य कृति हिन्दी बाल साहित्य के यशस्वी रचनाकार नागेश पांडेय की आधुनिक बोध की छः बाल कहानियों का संग्रह है। क्रम और शीर्षक की दृष्टि से 'खेल खेल में', 'अँधेरा हट गया', 'देखा तो चौंकी', 'जल्दी चलिए वहाँ', 'नेहा ने माफी माँगी', 'मैं जान गया हूं" कहानियाँ रोचक, मनोरंजन के साथ हो पाठकों को विचारणा के शीर्षक बिन्दु तक ले जाती हैं। इन सोद्दश्यपरक कहानियों में बाल चांचल्य, उत्सुकता तथा पर्याप्त जीवन्तता है। 'मैं जान गया हूं", कहानी सच्चा-सुख व्यक्त करते हुए परिश्रम तथा आत्म निर्भरता के प्रति हमारा ध्यान खींचती है। शैतानी की सजा बाल अभिव्यक्ति देने वाली कहानी प्रेरक तथा शिक्षाप्रद है। 'जल्दी चलिये वहाँ' बाल साहसिकता तथा कर्तव्य निष्ठा के प्रति पाठकों को प्रोत्साहित करती है। 'देखा तो चौकी' में रचनाकार ने बाल-संवेदना के सूक्ष्म और प्रभावी स्वरूप की सफलतापूर्वक झांकी प्रस्तुत की है जिसमें एक धनी परिवार की बालिका तथा उसी की नौकरानी की पुत्री के बीच को जोड़ने का प्रयत्न है जो बाल मनोवैज्ञानिक दृष्टि से एक आदर्श है। आंखों का प्रकाश बनी बाल-कथा 'अंधेरा हट गया' विश्व बालक-बालिकाओं की अद्भुत सूझ-बूझ, त्याग, सहायता तथा सफलता दर्शाने वाली उच्च बाल-मूल्य-उद्घाटिनी है। 'खेल खेल में इस संग्रह की पहली कथा है जिसमें शैतानी की बाल-सुलभता में बदलती परिस्थितियों तथा परिदृश्यों को सहजता से दिखाया गया है। शैतान बच्चे ऐसे घटनात्मक मोड़ पर सुधरते ही नहीं भविष्य का आलोक बनते हैं। पात्र, कथावस्तु, संवाद, काल परिस्थिति, युग तथा चिन्तन की दृष्टि से रचनाकार ने निर्विवाद सफलता प्राप्त की है। कृति की भाषा सहज, सरल तथा प्रकाशमय है ओर कहानियाँ पठनीयता की दृष्टि से बाल-जीवन को नई गति तथा दिशा देती हैं।
कृति पठनीय, सराहनीय, संग्रहणीय, उपयोगी तथा प्रेरक है। आशा है कि इसे बच्चे और बूढ़े, युवा और प्रौढ़ सभी पसन्द करेगे।
समीक्षक : चक्रधर नलिन
(बाल साहित्य समीक्षा,मासिक, कानपुर, अगस्त 1994, पृष्ठ 28)


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