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मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

पुस्तक-समीक्षा/समकालीन बाल साहित्य की दिशा, समीक्षक : डॉ. मोहम्मद अरशद खान

पुस्तक समीक्षा/समकालीन बाल साहित्य की दिशा : डॉ. शकुंतला कालरा (संपादक : डॉ. नागेश पांडेय संजय)

डॉ. शकुंतला कालरा के अवदान को रेखांकित करने का सच्चा प्रयास

समीक्षक : डॉ. मोहम्मद अरशद खान 

बाल साहित्य जगत में कुछ रचनाकार ऐसे हैं, जो लाभ-लोभ, आग्रह-दुराग्रह से मुक्त निस्पृह रूप से बाल साहित्य संवर्द्धन में रत हैं। डॉ. शकुंतला कालरा ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी सृजनात्मकता ने बाल साहित्य जगत को संवर्द्धित किया है। 

यूँ तो बाल साहित्य के क्षेत्र में शकुंतला जी का आगमन पिछली सदी के अंतिम दशक में हुआ, पर इतने कम समय में उन्होंने जो बाल साहित्य सृजन किया और जो निष्ठा दिखाई वह अद्भुत है। उन्होंने ‘बाल साहित्य का स्वरूप और रचना संसार’(2002), ‘हिंदी बाल साहित्य विमर्श-साहित्यिक साक्षात्कार’(2010), ‘हिंदी बाल साहित्यः विधा-विवेचन’(2014), ‘हिंदी बाल साहित्यः विचार और चिंतन’(2014), ‘हिंदी बाल साहित्यः जिज्ञासाएँ और समाधान’(2017), ‘हिंदी बाल साहित्य आधुनिक परिदृश्य’(2019), ‘हिंदी बाल साहित्य के अनन्य साधक’(2019) बालक और बाल साहित्य(2022) जैसे महत्वपूर्ण आलोचनात्मक ग्रंथ बाल साहित्य जगत को दिए। ‘हिंदी बाल साहित्य की श्रेष्ठ पुस्तकें’ तथा ‘समकालीन बाल साहित्यः सृजनात्मक सर्वेक्षण’ जैसी आलोचनात्मक कृतियाँ अभी प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। आलोचना और समीक्षा के साथ-साथ 7 बाल कहानी संग्रह, 6 बाल कविता संग्रह, तथा 1 बाल उपन्यास एवं 1 बाल नाटक भी बाल साहित्य के भांडार को समृद्ध कर रहे हैं।

प्रकाश मनु जी ठीक ही कहते हैं-‘‘शकुंतला जी का बाल साहित्य में इतना बड़ा काम है, और इतनी विनय, इतनी गहरी लगन, इतनी पवित्र आकांक्षा और समर्पण के साथ उन्होंने बाल साहित्य में बड़े-बड़े ऐतिहासिक महत्व के काम कर दिखाए, कि जब भी मैं सोचता हूँ, चकित और हैरान रह जाता हूँ। साथ ही मेरा मस्तक बड़ी विनम्रता से उनके आगे झुकता है। शायद उनका जन्म ही बाल साहित्य के एक बड़े अभाव को पूरा करने के लिए हुआ। और उन्होंने अपनी ओर से कोई कसर नहीं रखी। उन्होंने जिस तरह अहर्निश काम करके बाल साहित्य की सेवा की है, उसकी कोई दूसरी मिसाल कम से कम हमारे दौर में देखने को नहीं मिलती। बाल साहित्य आलोचना और बाल साहित्यकारों के साक्षात्कार के मामले में तो पूरे बाल साहित्य के इतिहास में कुछ गिनती के साहित्यकारों में उनकी गिनती होती है।’’

डॉ. नागेश पांडे ‘संजय’ जी ने शकुंतला जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को पुस्तक के रूप में लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके संपादन में आई पुस्तक ‘समकालीन साहित्य की दिशाः डॉ0 शकुंतला कालरा’ जो कि 342 पृष्ठों में फैली और 40 मूर्द्धन्य साहित्यकारों से आलेखों से सुसज्जित है, कालरा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को रूपायित करने का सफल प्रयास है, जिसके लिए बाल साहित्य जगत को कृतज्ञ होना ही चाहिए। नागेश जी समकालीन बाल साहित्य के सजग आलोचक एवं समीक्षक हैं। उनकी ‘बाल साहित्य के प्रतिमान’, ‘बाल साहित्यः सृजन और समीक्षा’ तथा ‘बाल साहित्य का शंखनाद’ जैसी पुस्तकें और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित उनके आलोचना-समीक्षा संबंधी आलेख उनकी प्रतिभा, श्रम, सजगता और बाल साहित्य के प्रति अनन्य निष्ठा का प्रमाण हैं।

इस पुस्तक में कुल 36 आलेख और 3 साक्षात्कार सम्मिलित हैं। हिंदी साहित्य के मूर्द्धन्य विद्वानों--बाल स्वरूप राही, डॉ. श्रीप्रसाद, डॉ. श्याम सिंह ‘शशि’, सीताराम गुप्त, डॉ. रत्नलाल शर्मा, डॉ. बालशौरि रेड्डी तथा सूर्यकांत बाली की टिप्पणियाँ भी ‘आशीर्वाद की मणियाँ’ शीर्षक से संकलित हैं।

यदि पुस्तक में प्रकाशित आलेखों का मोटे तौर पर वर्गीकरण किया जाए तो 4 आलेख उनके समग्र साहित्य पर, 5 आलेख बाल कथा साहित्य पर, 6 आलेख बाल कविताओं पर, 4 आलेख आलोचना संबंधी रचनाओं पर, 2 आलेख बाल नाटकों पर, 8 संस्मरण तथा उपन्यास, निबंध, आत्मकथा, विज्ञान साहित्य, साक्षात्कार-अनुवाद, प्रौढ़ साहित्य तथा संपादन कला पर 1-1 आलेख संकलित हैं। अंत में 3 साक्षात्कार भी संकलित किए गए हैं। 

इस वर्गीकरण पर दृष्टि डाली जाए तो संपादक की संपादन कला पर मुग्ध हो जाना पड़ता है कि उन्होंने शकुंतला कालरा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व का कोई पहलू छोड़ा नहीं है। उनके कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व के लगभग सभी आयामों को कमोबेश इस पुस्तक में स्थान दिया गया है।

सबसे अधिक संख्या संस्मरणों की है। इन संस्मरणों के लेखक आदरणीय राष्ट्रबंधु, चक्रधर नलिन, डॉ.अश्वघोष, डॉ.दर्शन सिंह आशट, निर्मला सिंह और चक्रधर शुक्ल जैसे विद्वान हैं। उनके गुरु और भारत भारती से सम्मानित डॉ. रमानाथ त्रिपाठी और शिष्य अनिल कुमार के संस्मरण इस कड़ी को पूर्णता प्रदान करते हैं। निश्चित ही संपादक की दृष्टि की प्रशंसा करनी पड़ेगी कि उन्होंने संस्मरणों के चयन में भी सर्वांगीणता का भरपूर ध्यान रखा है। वास्तव में कालरा जी का व्यक्तित्व ही ऐसा सम्मोहक है, सरलता, सहजता और मातृत्व से भरा हुआ है, कि एक छोटी-सी भेंट भी आपके हृदय पर अमिट छाप छोड़ जाएगी। मेरी उनसे फोन पर तो कई बार बात हुई है, पर सचमुच मिलना एनसीईआरटी की एक पाँच दिवसीय कार्यशाला में हुआ। उस भेंट की कितनी स्मृतियाँ मनोमस्तिष्क में जीवंत हैं, बता नहीं सकता। उनकी वाणी और व्यवहार में ऐसी सरलता, स्नेह, अभिभावकत्व और शहद-सी मिठास है कि आपका हृदय कभी न भूलनेवाली स्मृतियों में तरंगायित होता रहेगा। शायद इसी कारण अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’ जी अपने आलेख में कहते हैं-‘डॉ. शकुंतला कालरा को मैं हिंदी बाल सहित्य की माँ के रूप में देखता हूँ।’ उनके शिष्य डॉ.अनिल कुमार भी उनके वात्सल्य भरे व्यवहार को रेखांकित करते हैं-‘मेरा परिचय गुरु के साथ-साथ एक वात्सल्यमयी माँ के रूप में उनसे हुआ।’ 

संस्मरणों के पश्चात सर्वाधिक आलेख उनकी बाल कविताओं पर हैं। इनके लेखक विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’, डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, कृष्ण शलभ, तारादत्त निर्विरोध, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना और डॉ. मोहम्मद साजिद ख़ान जैसे बाल कविताओं के बड़े हस्ताक्षर हैं, जो उनकी कविताओं के अलग-अलग पक्षों की पड़ताल करते हैं। इन आलेखों में उनके समग्र बाल काव्य संसार से लेकर उनके शिशु गीतों, लोरियों, प्रभातियों, गीतों और बालिका-विमर्श का गहरा विश्लेषण मिलता है।

कालरा जी की कहानियों और उनके आलोचना कर्म को लेकर 5-5 आलेख संकलित हैं।

बाल कहानियों पर विष्णु प्रभाकर, पद्मश्री प्रोफेसर उषा यादव, सुकीर्ति भटनागर, डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान तथा मधुसूदन साहा के आलेख हैं। विष्णु प्रभाकर जी का आलेख उनकी कहानियों में विज्ञान, संस्कृति और बाल मनोविज्ञान का अवगाहन करता है जबकि उषा यादव जी का आलेख बाल साहित्य एवं एक विधा के रूप में बाल कहानियों की विकास यात्र में कालरा जी का स्थान निर्धारित करता है। सुकीर्ति जी उनकी कहानियों में बालकों के स्वरूप का विश्लेषण करती हैं, और अरशद का आलेख उनकी कहानियों में नैतिक मूल्यों को उकेरता है, जबकि मधुसूदन साहा उनकी कहानियों का समग्र मूल्यांकन प्रस्तुत करते हैं।

शकुंतला कालरा जी के बाल साहित्य संबंधी समीक्षात्मक-आलोचनात्मक ग्रंथों पर आलेख डॉ. भगवती प्रसाद गौतम, डॉ. दिविक रमेश, डॉ. भैरूँलाल गर्ग तथा डॉ. नागेश पांडे ‘संजय’ जैसे बाल साहित्य के मर्मज्ञ विचारकों एवं चिंतकों के हैं। दिविक रमेश जी तो उन्हें समकालीन बाल साहित्य आलोचना के शिखर पर स्वीकार करते हैं। भगवती प्रसाद जी बाल साहित्य की सर्जनामूलक प्रवृत्ति और प्रस्थापना की चर्चा करते हैं। डॉ. गर्ग जी ने उनके बाल विमर्श पर प्रकाश डाला है। नागेश पांडे जी का आलेख हिंदी बाल साहित्य की इतिहास लेखन परंपरा की पड़ताल करता हुआ शकुंतला कालरा जी के ‘हिंदी बाल साहित्यः विधा-विवेचन’ की विशिष्टता और महत्व पर प्रकाश डालता है। 

 उनके समग्र व्यक्तित्व-कृतित्व को केंद्र में रखकर 4 आलेख लिखे गए हैं। इनमें से प्रकाश मनु जी का आलेख तो अपने आप में संपूर्ण है, जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की गहराई और पूरी संवेदना के साथ पड़ताल करता है। चक्रधर नलिन, नीलम राकेश और गोविंद शर्मा के आलेख भी कालरा जी के समग्र रचनात्मक प्रदेय और बहुआयामी व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर रचे गए हैं।

शकुंतला जी के एकांकी संग्रह ‘देर आए-दुरुस्त आए’ पर प्रताप सहगल और मंजुरानी जैन के आलेख हैं। प्रताप सहगल जी जहाँ बाल एकांकियों और नाटकों के परिदृश्य में मूल्यांकन करते हैं वहीं मंजुरानी जैन जी उनकी पुस्तक की विशद विवेचना प्रस्तुत करती हैं। 

डॉ. विकास दवे, वेदमित्र शुक्ल और आशीष द्वारा लिए गए साक्षात्कार भी पुस्तक में संकलित हैं। इनके अतिरिक्त बाल उपन्यास पर डॉ. अमिता दुबे (बाल उपन्यास की दिशा में अपूर्व प्रस्तुतिः मिठ्ठी की चिठ्ठी) निबंधों पर डॉ.रवि शर्मा (डॉ. शकुंतला कालरा के बाल-मनोवैज्ञानिक निबंध) आत्मकथा पर देवेंद्र मेवाड़ी (समकालीन बाल साहित्य में आत्मकथा-लेखन का अन्यतम प्रयोगः एक स्त्री द्वारा लिखित एक बालिका की संवेदनात्मक आत्मकथा) बाल विज्ञान साहित्य पर सृष्टि पांडेय (बाल विज्ञान साहित्य को डॉ. शकुंतला कालरा का प्रदेय) प्रौढ़ साहित्य पर घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ (बालसाहित्य को समर्पित प्रौढ़ साहित्य-लेखिका: डॉ. शकुंतला कालरा) संपादन कला पर संतोष खन्ना (डॉ.शकुंतला कालरा की बाल साहित्य संपादन-कला) के आलेख संकलित हैं, जो इस पुस्तक को पूर्णता और समग्रता प्रदान करते हैं। 

कुल मिलाकर पुस्तक ‘समकालीन बाल साहित्य की दिशाः डॉ. शकुंतला कालरा’ उनके व्यक्तित्व और कृतत्व को हृदयंगम कराने के लिए किया गया अद्भुत प्रयास है। इसके लिए संपादक सहित वे लेखक भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने भावपूर्ण किंतु निष्पक्ष रूप से बाल साहित्य में उनके प्रदेय को रेखांकित किया है।

(बाल वाटिका, मासिक, जनवरी 2025, पृष्ठ : 53)


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