मनोरंजन और प्रेरणा से भरपूर बाल कहानियां
समीक्षक : डॉ. रोहिताश्व अस्थाना
आज मीडिया ने बच्चों के मानसिक स्तर को उनकी आयु से दस वर्ष बड़ा कर दिया है। बच्चों की जानकारी, उनकी जिज्ञासा और तर्क शक्ति पहले की अपेक्षा अत्यधिक विकसित हो चुकी है। अतः बत्त्वों को लिए दादी और नानी की कहानियों, परीकथाओं एवं गप्पों में पहले जैसी रुचि नहीं रह गयी है। आज का बाल पाठक बाल केंद्रित एवं बाल परिवेश से संबद्ध कहानियां पढ़ना पसंद करता है। इन कहानियों में प्रायः चालक ही सक्रिय चरित्र का निर्वाह करते हुए सफलता साहस एवं प्रेरणा बिदु पर पहुंचते हैं।
इसीलिए बाल कहानियों का कथ्य, शिल्प एवं स्वरूप बदलता जा रहा है। समीक्ष्य बाल कथा कृति 'नेहा ने माफी मांगी' ऐसी ही छह कहानियों का संग्रह है।
मूर्धन्य बाल साहित्यकार एवं समालोचक डॉ. श्रीप्रसाद, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी एवं भगवती प्रसाद द्विवेदी का आशीर्वाद पुस्तक में संकलित है।
पहली कहानी 'खेल-खेल में राजु की शैतानियों पर आधारित है। वह अपनी बहन नेहा की चप्पले गुड़हल के पेड़ के नीचे छिपा देता है। जब नेहा चप्पले उठाने जाती है तब साप को देखकर बेहोश हो जाती है। डाक्टरों के उपचार से वह बच जाती है और राजू अपनी शैतानियों के लिए माफी मागता है।
दूसरी कहानी अंधेरा हट गया' राजीव, पीयूष और नेहा की परोपकार भावना पर आधारित है। वे अपना जेब खर्च बचाकर, लोगों से चंदा एकत्र कर और जिलाधिकारी से सहयोग लेकर अपने गरीब मित्र मोहनीश की आखों का आपरेशन कराकर उसे फिर से नयी रोशनी प्रदान करते हैं।
तीसरी कहानी 'देखा तो चौकी' में पिंकी की सहेलियां उसकी गरीब कितु तीव्र बुद्धि सहेली रिंकी के विरुद्ध भड़काती रहती है। उधर पिंकी अपनी महरी चाची की अनदेखी पुत्री को अपनी फ्रॉक दे देती है और वही फ्रॉक जब अगले दिन रिकी पहन कर स्कूल आती है तो पिंकी उसे देखकर चौंक पडती है। सारा हाल जानकर वह उसे गले लगा लेती है।
चौथी कहानी 'जल्दी चलिए वहां' में चतुर और साहसी बालक मोहनीश की सूचना पर पुलिस दो कुख्यात लुटेरों को बस लूटते हुए रंगे हाथों पकड़ लेती है।
पाचवी कहानी 'नेहा ने 'माफी मागी' में नेहा की शैतानियों की कथा है। वह कक्षा में ही चुपके से मनीषा और ममता की चोटियां आपस में बांध देती है, जिससे वे दोनों चलने पर गिर पड़ती है। जया ने यह देख लिया। कुछ दिन बाद चित्रकारी और प्रतियोगिता में जाते समय जया, मनीषा और ममता ने मिलकर नेहा की साइकिल की हवा निकाल दी। नेहा ने क्रोध से पूछा-कि हवा किसने निकाली तो सभी ने उससे पूछा - 'ममता मनीषा की चोटियां किसने बांधी।' नेहा को प्रतियोगिता में पहुंचने की देर हो रही थी। अब उसे अपनी शैतानियों पर अफसोस हो रहा था। उसने सभी सहेलियों से माफी मांगी। तब ममता उसे अपनी साइकिल पर बिठा लेती है।
संकलन की अंतिम कहानी 'मै जान गया हूं' में आदर्श अपने गरीब पिता जी से होली पर हठपूर्वक रंग गुलाल और फव्वारे के लिए पचास रुपये मांगता है तो विवश पिताजी घरेलू खर्च में से पचास रुपये दे देते है। आदर्श बाजार जाता है तो वहां अपने मित्र पीयूष को रंग गुलाल और फब्बारे की दुकान चलाते देखता है। फिर क्या था आदर्श भी साझीदार बन जाता है। रंगों की बिक्री से कमाये गये रुपये आदर्श अपने पिताजी को देता है। अगले दो दिनों की कमाई से वह होली का सामान ले आता है। इस प्रकार हठी आदर्श मेहनत की महिमा और अपने काम में शर्म न करने की शिक्षा पाता है।
सभी कहानियां सहज स्वाभाविक और बच्चों के जीवन के अंतरंग क्षणों पर आधारित हैं। कहानी कहने का ढंग प्रभावशाली एवं मनोरंजक है। बाल पाठक इन कहानियों से कहीं न कहीं अपना जुड़ाव अनुभव करते है। पत्र-पत्रिकाओं में पूर्व प्रकाशित यह कहानियां निश्छल बालमन की सहज अभिव्यक्तियां है। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है। हां, पात्रों के चयन और नामकरण में नवीनता का ध्यान रखना चाहिए था। उदाहरण हेतु नेहा एक कहानी में सीधी सादी बालिका है तो दूसरी में शैतान। मोहनीश, पीयूष आदि पात्रों की कई कहानियों में पुनरावृत्ति हुई है। एक ही बाल कथा संकलन में हर पात्र का नया नाम रखन से पाठक भ्रम में पड़ने से बच जाता।
कुल मिलाकर नागेश पांडेय संजय की प्रस्तुत बालकथा कृति आकर्षक, पठनीय एवं संग्रहणीय है तथा आश्वस्त करती है कि वे आगे चलकर इस क्षेत्र में नयी उपलब्धिया अर्जित करते रहेंगे।
नेहा ने माफी मांगी (बाल कथा संग्रह), लेखक नागेश पांडेय 'संजय' प्रकाशक राही प्रकाशन, चौकसी शाहजहांपुर (उ.प्र.) मूल्य- दस रुपये, प्रकाशन वर्ष : 1994
समीक्षक : डा. रोहिताश्व अस्थाना
(राष्ट्रीय सहारा, दैनिक, लखनऊ, बचपन, 20 अगस्त 1994, पृष्ठ : 3)


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