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सोमवार, 28 सितंबर 2026

पुस्तक समीक्षा : समकालीन बाल साहित्य की दिशा समीक्षक : संतोष खन्ना

डॉ. शकुन्तला कालरा पर केंद्रित पठनीय पुस्तक है ‘समकालीन बाल साहित्य की दिशा' 

समीक्षक : सन्तोष खन्ना 

डॉ.नागेश पांडेय संजय एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं जिन्होंने बाल साहित्य के क्षेत्र में बाल साहित्य आलोचना से लेकर अन्य अनेक पुस्तकों का प्रणयन किया है। यही नहीं, पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से वह ‘बाल प्रभा’ पत्रिका का संपादन भी कर रहे हैं । इधर बाल साहित्य पर उनकी एक नई पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है ‘ समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा।’ डॉ नागेश ने इस पुस्तक का संपादन किया है जो वस्तुत: वर्तमान समय की बाल साहित्य की प्रतिष्ठित हस्ताक्षर डॉ. शकुंतला कालरा के व्यक्तित्व और बाल क्षेत्र में उनके कृतित्व का अगर संपूर्ण नहीं तो विस्तृत लेखा-जोखा तो है। डॉ .शकुंतला कालरा की बाल साहित्य की चार दर्जन से अधिक पुस्तकों को देश के नामी गिरामी साहित्यकारों ने गहराई से खंगाल कर उनमें प्रस्तुत नवनीत को पाठकों के समक्ष लाने का पुनीत कार्य किया है । डॉ.शकुंतला कालरा के बाल साहित्य के अध्ययन के माध्यम से बाल साहित्य की अतीत और वर्तमान परंपरा भी इसमें सजीव हो उठी है। यही नहीं, बाल साहित्य के अध्ययन से उनके सहज,सरल, संवेदनशील, विनम्र और पांडित्यपूर्ण व्यक्तित्व की भी भरपूर झांकी सुलभ होती है, साथ ही उनके बाल साहित्य सृजन के दौरान उनका संघर्ष भी मुखर हो उठता है ।

इस दुर्लभ ग्रंथ में कुल मिलाकर 41 आलेख है जिसमें डॉ. विकास दवे, वेदमित्र शुक्ल तथा आशीष जैसे प्रबुद्ध साहित्यकारों द्वारा डॉ. शकुंतला कालरा से लिए गए साक्षात्कार भी शामिल हैं। इस ग्रंथ में शामिल आलेख देश के उन 38 लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों द्वारा रचित है जो स्वयं बाल साहित्यकार तो हैं ही, उनका साहित्य में अन्यथा भी विपुल योगदान है । इनमें बाल साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में प्रकाश मनु, पदमश्री प्रो. उषा यादव, विष्णु प्रभाकर, रमानाथ त्रिपाठी से लेकर डॉ. प्रताप सहगल, डॉ. चक्रधर नलिन, डॉ. दर्शन सिंह आशट, डॉ. भैरुंलाल गर्ग आदि अनेक साहित्यकार शामिल हैं। 

डॉ शकुन्तला कालरा के बाल साहित्य पर इन रचनाकारों के अवदान को रेखांकित करते हुए इस ग्रंथ के संपादक डॉ नागेश पांडेय ‘संजय’ ने इसके संपादकीय में लिखा है कि ‘समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ.शकुंतला कालरा को समर्पित संपादित ग्रंथ है जिसमें उनको केंद्र में रखते हुए बाल साहित्य के अनेकानेक उद्घाटित -अनउद्घाटित पक्षों का असामान्य विवेचन किया गया है। असामान्य इसलिए इस अर्थ में है कि इसके विश्लेषक साहित्य जगत के सुविज्ञ हैं मर्मज्ञ हैं, उनका विवेचन केवल डॉ. शकुंतला कालरा के साहित्य तक सीमित न रहकर बाल साहित्य के व्यापक फलक का संस्पर्श करता है । अस्तु, इस ग्रंथ को पढ़ते हुए आप समकालीन बाल साहित्य के विशद परिदृश्य से जुड़ाव अनुभव करेंगे।’


वैसे तो यह समूचा ग्रंथ डॉ. शकुंतला कालरा पर लिखा गया एक समीक्षात्मक ग्रंथ है और समूचे ग्रंथ में डॉ. शकुंतला कालरा के व्यक्तित्व और कृतित्व की प्रामाणिक रूप से व्याख्या करता चलता है परंतु इस संबंध में डॉ. नागेश ने भी अपने शब्दों में उनके बाल साहित्य के अवदान पर टिप्पणी करते हुए लिखा है,’ सुखद है कि डॉ. शकुंतला कालरा नवोन्मेषी पथ की निर्मात्री हैं, भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा की स्वामिन। सृजन में समर्थ और समीक्षा में निष्णात ।वे अपनी जगह अकेली हैं। डॉ. शकुंतला कालरा की तुलना डॉ. शकुंतला कालरा से ही की जा सकती है। वह गद्य और पद्य में दोनों में ही प्रतिनिधि विधाओं की लेखिका हैं। साथ ही आलोचना उनका प्रिय विषय है। वह तत्वाभिनिवेशी आलोचक हैं। 

 आलोचक भी वह सर्वोत्तम कोटि की हैं। वह इतिहासकार भी हैं और संपादक भी ।

बाल साहित्यकारों के सर्वाधिक साक्षात्कार लेने का श्रेय उनको ही जाता है । बाल साहित्यकारों में डॉ.शकुंतला का अन्यतम स्थान है।’

इस ग्रंथ में उस समय के हिंदी साहित्य के वरिष्ठ सुप्रसिद्ध साहित्यकार और उनके उपन्यास ‘अर्द्ध नारीश्वर’ केंद्रीय साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित श्री विष्णु प्रभाकर जी ने डॉ. शकुंतला कालरा की बाल कहानियों की ‘विज्ञान, संस्कृति और बाल मनोविज्ञान को सहज भाव से रेखांकित करती बाल कहानियां ‘ शीर्षक से एक संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित समीक्षा लिखी है और इस पुस्तक के फ्लेप पर उसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है,’डाॅ. शकुंतला कालरा जी एक जानी-मानी लेखिका हैं बाल साहित्य क्षेत्र में उन्होंने विशेष सफलता पाई है।’ 

इसी प्रकार वरिष्ठता के क्रम में प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार प्रकाश मनु जी ने डॉ शकुन्तला कालरा की भूरि -भूरि प्रशंसा की है। इस ग्रंथ का प्रथम आलेख बाल साहित्य के उस जाने-माने लेखक प्रकाश मनु जी ने लिखा है । यही इस ग्रंथ का सबसे लंबा आलेख है।उनका चालीस पृष्ठों का यह आलेख डॉ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य सहित उनके समूचे साहित्यिक अवदान को रेखांकित तो करता है ही , परंतु उसके माध्यम से वह डॉ. शकुंतला कालरा के रूप में एक संवेदनशील लेखिका से पाठकों का परिचय भी कराते हैं जिन्हें उन्होंने स्वयं उनके एक अविस्मरणीय संस्मरण के माध्यम से जाना और पहचाना कि वास्तव में बाल साहित्य क्षेत्र में विपुल योगदान देने वाली डॉ. शकुंतला कालरा का वास्तविक अवदान उस अविस्मरणीय संस्मरण के माध्यम से प्रस्फुटित हो पाया है । उन्होंने लिखा कि उस अविस्मरणीय संस्मरण को पढ़ने से पहले उन्होंने डॉ. कालरा की कई कृतियां देखी और पड़ी पर मैंने उन्हें गंभीरता से कभी नहीं लिया यह सोचकर कि आजकल सभी लिख रहे हैं और अगर वह भी लिख रही हैं तो ठीक है बस लिख रही हैं । उनके उस संस्मरण को पढ़कर वह इतने भाव-विह्वल हो गए थे कि वह उस संस्मरण को पढ़ते जा रहे थे और रोते जा रहे थे और रोते जा रहे थे और पढ़ते जा रहे थे क्योंकि उस संस्मरण ने उनके अंतर्मन को छू लिया था। वह लिखते हैं ‘शकुंतला के भीतर दबी एक और शकुंतला थी जिसे मैंने पहली बार देखा और नहीं जानता था कि यही शकुंतला जी कुछ आगे चलकर मेरी प्यारी शकुंतला दीदी बनने वाली थीं। उनकी बहुत सारी उत्कृष्ट रचनाएं मेरी निगाह में आना बाक़ी थीं और ख़ासकर बाल साहित्य आलोचना और साक्षात्कारों के बाद क्षेत्र में तो उनका काम धीरे-धीरे इतने विशाल पर्वताकार रूप में मेरे सामने आने को था कि उनकी इस भास्वर शब्द- साधना को मै मन ही मन प्रणाम भी करने लगा।’

इसी अविस्मरणीय संस्मरण के बारे में वह यह भी बताते चलते हैं कि उन्होंने डॉ. शकुन्तला कालरा के उस संस्मरण की प्रशंसा करते हुए उन्हें और संस्मरण लिखने के लिए कहा बल्कि उन संस्मरणों को लेकर आत्मकथा लिखने का आग्रह तक कर दिया, इसके बारे में वह लिखते हैं कि’ मैंने उनसे आग्रह किया कि शकुंतला देवी आप सारे काम छोड़कर पहले अपनी आत्मकथा लिखें, कुछ और नहीं तो आप मेरे लिए ही लिखें, मैं उसे पढ़ना चाहता हूं। मुझे लगता है आपका सबसे महत्वपूर्ण काम यही होगा। मेरा आग्रह है कि आप थोड़ा व्यापक मिशन के साथ लिखें ताकि आपके परिवार की स्थितियां तो सामने आए ही वह पूरे परिवेश और समय की कथा भी सामने आए जिसमें अकेला आपका परिवार नहीं हजारों लोग मुसीबतों का सामना कर रहे थे।’ प्रकाश मनु जी का यह आग्रह सुखद परिणाम सामने लाया। डॉ. शकुन्तला कालरा ने ‘मेरा बचपन’शीर्षक से इस नायाब आत्मकथा को विखा जिसे मैंने भी पढ़ा और उसपर लिखा भी। उनकी यह आत्म कथा बहुत संवेदनशीलता के साथ लिखी गई है।’

उनकी यह आत्मकथा परंपरागत रूप से आत्मकथा में से नहीं है बल्कि यह केवल उनके शैशव‌ से लेकर बचपन तक की आत्मकथा है और इस आत्मकथा का महत्व इस बात में भी है इसमें 1947 में भारत की विभाजन त्रासदी के दंश को अत्यंत यथार्थपरक संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।


प्रकाश मनु जी डाॅ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्यकारों के लिए साक्षात्कार संबंधी कार्य से भी खासे प्रभावित थे। उन का कहना है कि कालरा जी से पहले इस प्रकार का कार्य कभी किसी साहित्यकार ने नहीं किया था। उनके बाल साहित्यकारों के साक्षात्कारों पर लिखते हुए वह कह उठते हैं, ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि डॉ शकुंतला जी ने बाल साहित्यकारों के साक्षात्कारों के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान रच दिया है। बाल साहित्य में इस क्षेत्र में वह अग्रणी नहीं, बल्कि एकमात्र साहित्यकार हैं और दूर-दूर तक कोई और नहीं है जिससे उनकी तुलना की जा सके ना पचास सौ वर्ष पहले और ना आज।’

प्रकाश मनु जी ने इसी आलेख में डाॅ.शुकुंतला कालरा जी की बाल कविताओं, कहानियों और बाल उपन्यासों का विवेचनात्मक विश्लेषण कर उन्हें भी सराहा है और उनके बाल साहित्य के साथ साथ उनकी बाल साहित्य पर आलोचना संबंधी अवदान में इस ग्रंथ के फ्लैप पर लिखा है, ‘बाल साहित्य में समीक्षा और आलोचना के क्षेत्र में जितना बड़ा योगदान शकुंतला जी का है उतना हमारे दौर में से किसी और का नहीं है उनके आसपास ऐसा कोई नहीं है जिसने उन जैसा अवदान दिया हो। 


पदमश्री (प्रोफेसर) उषा यादव का आलेख ‘बाल बाल साहित्य की गौरवशाली यात्रा और बाल कहानियों के इंद्रधनुषी रंग इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उसमें डॉ. शकुंतला कालरा के आलोचना कर्म को पिछले 50 वर्षों की कालावधि में लिखी गई आलोचना की पुस्तकों के परिपेक्ष में रखकर देखा गया है इस प्रकार के बाल साहित्य आलोचना के तुलनात्मक मूल्यांकन से डॉ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य में उनका आलोचना में उनके स्थान की कोई उपेक्षा कर ही नहीं सकता । उनके बाल साहित्य में आलोचना कर्म के विपुल अवदान को रेखांकित करते हुए विदुषी लेखिका यादव लिखती हैं,’ पचास वर्ष के बाल साहित्य आलोचना कर्म के परिपेक्ष में डॉ. शकुंतला कालरा के बहुमुखी व्यक्तित्व को ज्यादा संजीदगी से समझा जा सकता है। 21वीं शती में बाल साहित्य को उसका वांछित गौरव और पहचान दिलाने की जो कोशिश सामने आ रही है, शकुंतला जी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । साक्षात्कार विधा पर उनका काम ‘ एकला चलो की’ उस धुन का साक्षी है जिसके साथ समूह स्वत: जुड़ जाता है । बाल साहित्यकारों के प्रदेय को सामने लाने के लिए भी वह इतनी कृतसंकल्प हैं कि श्री जयप्रकाश भारती, डॉ. राष्ट्र बंधु, डॉ. दर्शन सिंह आशट डॉ. दिविक रमेश जैसे चर्चित हस्ताक्षरों पर उनकी संपादित पुस्तकें हमारे सामने हैं । उनका मौलिक लेखन बाधित होता है पर बाल साहित्य की श्री वृद्धि के लिए उनके ये प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं।’


प्रो. उषा यादव ने डॉ शकुन्तला कालरा की बाल कहानियों के गहन अध्ययन के बाद अपने निष्कर्ष में उनकी बाल मनोविज्ञान को परखने वाली उनकी कहानियों के महत्व को भी रेखांकित किया है और वह कहतीं हैं कि ‘डाॅ. शकुंतला कालरा को बाल मन को परखने की महारत हासिल है। यही नहीं, वह उनकी बाल कहानियों के बारे में कहती हैं,’उनकी कहानियां यदि बच्चों को ऊंगली पकड़कर परी लोक में घूमाने में सक्षम हैं तो विज्ञान की प्रगति से अवगत कराने में भी पीछे नहीं हैं। इस प्रकार इन कहानियों का चित्रफलक अत्यंत व्यापक है और बाल जीवन और बल संसार के समग्र समाहार ने इन्हें अनूठा इंद्रधनुषी वैभव दे दिया है।’

जहां तक डा शकुंतला कालरा की बाल कहानियों का संबंध है, अगले आलेखों में सुकीर्ति भटनागर,एवं डाॅ मो.अरशद खान ने भी उन्हीं पर लिखा है। सुकीर्ति भटनागर उनके दो कहानी संग्रह ‘मेरी प्रिय, कहानियां’ और ‘मोती जोती’ की कहानियों का अध्ययन कर लिखती हैं कि ‘सभी कहानियां सोद्देश्यपूर्ण और युग बोध कराने वाली हैं। साथ ही अपनी संस्कृति से भी जोड़ती हैं । सुखद बात तो यह है कि कहानियों की सरल और सुंदर शब्दावली और उनके सहज अभिव्यक्ति ही बच्चों को सब कुछ समझा देने के लिए प्रयाप्त है कहीं भी उन्हें डांट- फटकार कर या उपदेशात्मकता रूप से समझाने की चेष्टा नहीं की गई है।’इसी प्रकार, डॉ मो. अरशद खान उनकी जिन कहानियों का उल्लेख कर रहे हैं उनकी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए वह लिखते हैं, ‘वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ शकुंतला कालरा की कहानियां का पाठ एक सुख एहसास देता है। उनकी कहानियां जिन विशेषताओं के कारण सहज ही हमारा ध्यान खींचती हैं वह आम जीवन से उठाए गए विषय, रोचक कथावस्तु, जीते -जागते पात्र, नैतिक मूल्यों का अविरल अंत:प्रवाह और सहज संप्रेषणीयता । नैतिक मूल्य उनकी कहानियों में इस प्रकार व्यंजित होते हैं कि पाठक न केवल उन्हें सहजता से ग्रहण कर लेता है बल्कि अपने मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव भी महसूस करता है। डॉ. शकुन्तला कालरा इस तथ्य से पूरी तरह सचेत हैं कि उपदेश के रूप में थोपे गये नैतिक मूल्य न केवल कहानी की रोचकता बाधित करते हैं बल्कि उनकी संप्रेषणीयता को भी पर प्रभावित करते हैं।’


मधुसुदन साहा के डा. शकुंतला कालरा के ‘बालकथा साहित्य का सिंहावलोकन ‘ आलेख में उनके समग्र बालकथा साहित्य का विवेचन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि ‘उनके समस्त बाल कहानियों को चार भाग में विभक्त किया जा सकता है (1)आधुनिक भाव बोध की कहानियां, (2) पौराणिक कहानियां (3) परी कथाएं और (4) विज्ञान कथाएं। इन कहानियों को पढ़ने पर एक बात आइने की तरह स्पष्ट है कि लेखिका की सोच सदैव जमीन से जुड़ी लगती है उन्होंने हमेशा बाल मन को केंद्र में रखकर कहानियों का ताना-बाना बुना है। वे यदि पौराणिक कथा सूत्रों से कथा बिंदु का तलाश कर कहानी लिखती हैं तो उनका ध्यान आधुनिक बोध और प्रासंगिक कथ्य की ओर अवश्य रहता है।वे जब परियों की कल्पनालोक में विचरण करती हैं तो उनकी दृष्टि जमीन पर भी टिकी रहती है। इसलिए मैं उन्हें जीवणबोध की कहानीकार मानता हूं । सरलता, सहजता, रोचकता एवं कथा प्रवाह के कारण उनकी कहानियां बच्चों के सभी वर्गों द्वारा पसंद की जाती हैं।’


डा. अमिता दुबे ने ‘ बाल उपन्यास की दिशा में अपूर्व प्रस्तुति:मिठ्ठी की चिट्ठी ‘ आलेख में डाॅ शकुंतला कालरा के इसी शीर्षक से 88-पृष्ठीय बाल उपन्यास का विशद विवेचन किया है । उनके अनुसार डॉ शकुन्तला कालरा बाल मनोविज्ञान की कुशल चितेरी हैं। उन्होंने इस उपन्यास के माध्यम से एक बेटी मिठ्ठी के मन में मां से संवाद करते हुए मां की छत्रछाया में जीवन जीने का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है जिसमें मिठ्ठी की चिट्ठी में वह चांद सितारों को संबोधित कर मां से संवाद करती है।इस बाल उपन्यास का शिल्प नया है कथ्य नया है, पत्रों के माध्यम से छोटी-छोटी घटनाओं को महत्वपूर्ण बनाते हुए बाल मन की गांठे खोलने का सफल प्रयास किया गया है। उनके अनुसार कुल मिलाकर डॉ शकुन्तला कालरा के इस बाल उपन्यास में सुंदर ढंग से विन्यस्त कथानक,सहज सरल प्रवाह मयी भाषा शैली में लिखा यह एक रोचक एवं पठनीय बाल उपन्यास है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की उपन्यास संबंधित धारणा है,’ मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मानता हूं ।मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्याओं को खोलना ही उपन्यास का मूल तथ्य है। मुंशी प्रेमचंद की इस परिभाषा के आलोक में यह बाल उपन्यास भी मिठ्ठी की चिट्ठियों के माध्यम से सार्थक सिद्ध होगा।


शकुंतला कालरा ने बाल एकांकी नाटक भी लिखे हैं। उनके बाल एकांकी नाटक ‘देर आयद दुरूस्त आयद’ शीर्षक से प्रकाशित हैं । इनमें ‘देर आयद दुरुस्त आयद ‘, ‘लाॅकडाउन खुल गया ‘ और ‘बच्चे बदल गये हैं ‘ शीर्षक से तीन बाल एकांकी नाटक हैं। इस ग्रंथ में डॉ.प्रताप सहगल तथा मंजू रानी जैन ने इन्हीं बाल एकांकी नाटकों पर अपने आलेख लिखे हैं। इन दोनों ने इन तीनों एकांकियों के कथ्य, कथोपकथन,संदेश और भाषा शैली के दृष्टिकोण से इनका विवेचन किया है। इनका नाटकों के विवेचन पढ़ने से आपको नाटकों के परिवेश और कहानी का पता चलता है ,इनमे सम्मलित संदेश से भी आपका परिचय होता है।


       डॉ.प्रताप सहगल ने इन बाल नाटकों के बारे में लिखा है कि ‘यद्यपि बाल साहित्य में बाल कहानियां , बाल कविताएं और कुछ सीमा तक बाल उपन्यास भी लिखे गए हैं परंतु हिंदी बाल साहित्य में बाल नाटक बहुत कम लिखे गए हैं । डॉ. शकुंतला कालरा के यह बाल एकांकी नाटक कुछ सीमा तक उस कमी को पूरा करते हैं। इन तीनों नाटकों के विषय अलग हैं, संदेश भी अलग हैं परंतु तीनों शिक्षाप्रद नाटक हैं। यह बच्चों के लिए जरूरी भी है कि बच्चे नाटक पढ़ते देखते हुए कुछ सीखें । तीनों नाटकों में पात्रों का विन्यास लगभग एक जैसा ही है, हां कहीं-कहीं संगीत शामिल किया जाता तो अच्छा था । बच्चों को गीत संगीत बहुत भाता है।,’ इसी प्रकार मंजू रानी जैन ने भी इन नाटकों पर प्रकाश डालते हुए लिखा हैं कि यह तीनों नाटक संदेशात्मक है, तीनों में आमतौर पर चली आ रही परिवारों की समस्याओं को सामने रखकर उनके समाधान भी सुझाए गए हैं । सरल भाषा में लिखे यह तीनों एकांकी पहली बार दर्शकों के समक्ष आएंगे। विषम परिस्थितियों में दर्शकों को सकारात्मक की ओर ले जाने का लेखिका का प्रयास बेहद सराहनीय है।’


 इस ग्रंथ में सबसे अधिक आलेख डॉ. शकुंतला कालरा की बाल कविताओं को लेकर लिखे गए हैं विनोद चंद्र पांडे ‘विनोद’ ने डॉ. शकुंतला द्वारा रचित विविध विषयक बाल कविताएं,’, डॉ. रोहितश्व अस्थाना का आलेख ‘समग्र बाल साहित्य की कविताएं’, डॉ मोहम्मद साजिद खान का ‘बाल कविताएं और बालिका विमर्श’, कृष्ण शलभ का ‘ठुमकती हुई बाल कविताएं’ तारा दत्त निर्विरोध का ‘समग्र बाल संसार की कविताएं’ आलेख शामिल किए गए हैं। विनोद चंद्र पांडेय ‘वविनोद’ ने डॉ.शकुंतला कालरा की बाल कविताओं की विशेषता उनका विषय- वैविध्य माना है। उनका कहना है कि ‘बाल साहित्य के क्षेत्र में विदुषी लेखिका, संवेदनशील 

कवयित्री कालरा जी का योगदान रेखांकित करने योग्य है। वे बाल मनोविज्ञान की विशेषज्ञ हैं । उन्होंने बालकों की रुचि, और स्वभाव को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग आयु वर्ग के लिए रोचक, मनोरंजक, ज्ञानवर्धक, प्रेरक बाल साहित्य का सृजन किया है।’ 

डा. रोहिताश्व अस्थाना ने डॉ शकुन्तला कालरा के ‘फुलवारी’ बाल कविता संग्रह में संकलित 32 कविताओं में से अनेक उदाहरण देते हुए उनकी बाल कविताओं को रेखांकित करते हुए लिखा है,’निश्चय ही बाल काव्य के क्षेत्र में डॉ. शकुंतला कला का प्रदेय असाधारण और महत्वपूर्ण है। हिंदी बाल साहित्य के इतिहास में अपनी रचनाओं के लिए वे हमेशा जानी, मानी और पहचानी जाती रहेंगी। उनकी बाल यात्रा सौ सौ बसंतों तक पुष्प -पलवित होती हुई निरंतर गतिशील और ऊर्ध्वगामी बनी रहे, यही मां सरस्वती से प्रार्थना है।’


कृष्ण शलभ ने डॉ शकुन्तला कालरा की उनके समूचे कैनवास पर फैले ्विविध प्रकार के बाल साहित्य विशैष रुप से बाल कविताओं के बारे में विवेचन करते हुए कहा है ‘ चेतना और चिंतन, सर्जनात्मक उत्साह और उदात्त दृष्टि, सृजन का बहुरंगी रूप -अनुभूति का उफान और उसके तीव्रतर संवेग की रचनात्मक स्थितियां तक ले जाने का गंभीर प्रयास। यह सारे आयाम एक साथ संतुलित और समुचित रूप में जिस व्यक्ति में घुले -मिले दिखाई देते हैं उसका नाम है डॉ. शकुंतला कालरा।’ वैसे तो भी लेखकों ने डॉ शकुन्तला कालरा की बाल कविताओं पर लिखते हुए उनकी रचित लोरियों की भी भूरि -भूरि प्रशंसा की है किन्तु डा. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ ने ‘लोक संस्कृति का अंग :लोरी और प्रभाती ‘ आलेख में उनकी लोरी विधा पर विस्तार से लिखा है। वैसे डॉ शकुन्तला कालरा ने डा सरोजिनी कुलश्रेष्ठ की इसी विधा पर उनके अवदान पर भी कार्य किया है, उनके द्वारा रचित लोरियों और प्रभातियों का भी महत्व कम नहीं है। डॉ कालरा ने अपनी पुस्तक ‘ममता की छांव में ‘ की भूमिका में बताया है कि लोरी संस्कृत के ‘लोल’ शब्द का अपभ्रंश रूप है और उन्होंने लोरी और प्रभाती दोनों में अंतर को रेखांकित करते हुए कहा है कि ,’लोरी की भांति प्रभातिया लोक संस्कृति का ही अंग है दोनों में मां की ममता निहित है दोनों में मां और बच्चों का भावनात्मक जुड़ाव है इसमें लोरियां बच्चों को सुलाने और प्रभातिया उन्हें जगाने के लिए गाई जाती हैं इसलिए प्रभातियों को जागरण गीत भी कहते हैं। इन गीतों में माता के हृदय का वात्सल्य ही नहीं, प्रभात का वर्णन भी होता है।”


डॉ सरोजिनी कुलश्रेष्ठ ने बोरियों की रचनाकारों के नामों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि डॉ. शकुन्तला कालरा ने इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस विधा को लुप्त होने से बचाया है।’ डॉ कालरा की लोरियो की एक महत्वपूर्ण विशेषता का उल्लेख करते हुए लेखिका ने लिखा है कि डॉ शकुन्तला कालरा का मातृह्दय वात्सल्य के सुख का जैसा अनुभव पुत्र की लोरी देकर सुलाने में करता है वैसा ही सुख पुत्री को भी लोरी गाकर सुनाने में प्राप्त करता है । उनकी लोरियों में बिटिया को भी बेटे के समान दर्जा प्राप्त है। आज से चार दशक पूर्व बेटी बेटे का लेकर समाज में भले ही द्वंद की स्थिति थी और कुछ प्रांतों में आज भी है किंतु डॉ. कालरा की लोरियों में उसे समानता का दर्जा मिला है। लेखिका डॉ शकुन्तला कालरा के र्लोरियों की रचना में उनके अवदान की इसी समदृष्टि को रेखांकित करते हुए उन्होंने डॉ. मोहम्मद साज़िद ख़ान के सौजन्य से कहा है ‘कि प्राय लोरियां बालक को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं किंतु डॉ. कालरा ने

  लोरिया लिखते समय बालिकाओं को विस्तृत नहीं किया है और उन पर समान रूप से लेखनी चलाई है और इस प्रकार बेटियों को भी समानता का दर्जा मिला है।’ लेखिका ने डॉ कालरा की इस चिंता को भी स्वर देते हुए कहा कि ‘आज आधुनिकता की अंधी दौड़ नै लोरियां और प्रभातियों की विरासत को संकट में डाल दिया है आधुनिक जमाने में कोई भी मां लोरी सुनाती नज़र नहीं आती और ना ही प्रभाती गाकर उसे जगाती नज़र आती है। अगर यही स्थिति रही तो लोरियों और लोकगीतों का यह भंडार विलुप्त हो जाएगा। ‘ 

इसी बात को आगे बढ़ाती हुई लेखिका ने लिखा है कि संयुक्त परिवार की प्रथा को फिर से प्राथमिकता दें। बच्चों को मां की गोदी दें। इसके साथ मां के स्पर्श की उष्णता भरी थपथपाहट उसे मिले। मां की गुनगुनाहट और लोरी बच्चों को अवश्य निद्रा लोक और सुंदर सपनों की दुनिया में ले जाएगी और उसे आगे आने वाली कई समस्याओं से निजात दिलवाएगी।’

डॉ शकुन्तला कालरा ने बाल साहित्य विमर्श पर बहुत काम किया है जिसका उल्लेख हम आरंभ में प्रकाश मनु के सौजन्य से कर चुके हैं। इस आयाम को इस ग्रंथ में कई रचनाकारों ने रेखांकित किया है। डॉ दिविक रमेश ने उनके इस संबंध में रचित पुस्तकों की चर्चा करते हुए निष्कर्ष पर यह खुल कर लिखा है कि इसमें संदेह नहीं है कि डॉ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य से आलोचना का बहुत और विशिष्ट भला हुआ है। मैं नम्रतापूर्ण कहूंगा कि वह सबसे ऊपर हैं शिखर पर हैं।’ 

डॉ भैरुलाल गर्ग ने बाल साहित्य विमर्श और डॉ शकुन्तला कालरा के बाल साहित्य विमर्श संबंधी अवदान के विषय को और आगे बढ़ाते हुए अपने एक 15-पृठीय लंबे और विद्वतापूर्ण आलेख में शकुन्तला कालरा के बाल साहित्य विमर्श पर विस्तार से लिखा है। उन्होंने बाल साहित्य विमर्श से संबंधित सभी पुस्तकों का उल्लेख तो किया ही है उन्होंने उनके द्वारा प्रकाशित बाल वाटिका पत्रिका में कालरा जी के समय समय-समय पर दिये अवदान पर विस्तार से लिखा है। बाल वाटिका पत्रिका के लगभग हर अंक में उनका बाल साहित्य पर कुछ न कुछ प्रकाशित होता रहा है साथ ही इस पत्रिका के विशैषांकों में बाल साहित्यकारों पर केंद्रित अंकों में डाॅ. कालरा का विशेष योगदान रहा है जिसका डाॅ. भेरूलाल गर्ग ने न केवल अकादमिक और शोधात्मक दृष्टि से विशद विवेचन किया है अपितु उनके इस विद्वतापूर्ण आलेख से बाल साहित्य संबंधी इतिहास की निर्मिति भी हुई है क्योंकि इस आलेख के माध्यम से दो ढाई दशक के बाल साहित्य की परम्परा,दर्शन,सृजन और बाल साहित्य विमर्श के आयाम स्पष्ट हुए हैं।

इस आलेख के अंत में डाॅ. भैरूलाल गर्ग लिखते हैं कि’ मुझे विश्वास है कि इससे डॉ. शकुंतला कालरा का मंतव्य तो स्पष्ट हुआ ही है यह बात भी सामने आई है कि सचमुच बाल साहित्य विमर्श कितना महत्वपूर्ण है। हमें बाल साहित्य को प्रतिष्ठा दिलानी है तो इसके विमर्श पर बहुत काम करना होगा क्योंकि यही एक सशक्त आधार है जो लोगों को स्वत: बाल साहित्य की और प्रेरित कर उसके महत्व को स्वीकारने के लिए एक अभीष्ट धरातल तैयार कर सकेगा. इस नई सदी में यह कार्य प्रमुखता से किया जा रहा है और ऐसे प्रमुख विमर्शकारों में डॉ. शकुंतला कालरा का नाम भी सम्मान के साथ लेते हुए हम हर्ष और गर्व की अनुभूति कर रहे हैं।’


अखिलेश श्रीवास्तव चमन ने अपने आलेख ‘हिंदी बाल साहित्य की मूक साधिका डॉ. शकुंतला कालरा’ में कालरा जी के समग्र बाल साहित्य और बाल साहित्य अवदान पर विशद विवेचन करते हुए उनकालिखा है, ‘कहा जा सकता है कि डॉ. कालरा उन साहित्य साधकों में से हैं जिनकी साहित्यिक प्रतिभा एक साथ सृजन और आलोचना दोनों रूपों में उद्भाषित हुई है। इन दोनों क्षेत्रों के अतिरिक्त डॉ कालरा का रचनात्मक सहयोग जिस विधा को सर्वाधिक प्राप्त हुआ, वह है साक्षात्कार विधा। इस विधा के द्वारा उन्होंने बाल साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व के विशिष्ट पहलुओं पर प्रकाश डालने का अभूतपूर्व कार्य किया जिनकी सतत साधना ने बाल साहित्य को नई पहचान दी। बाल साहित्य उन्नयन की दिशा में यह अभिनव कार्य ऐतिहासिक कदम कहा जाएगा।’

डॉ रवि शर्मा ने डॉ शकुन्तला कालरा के बाल मनोविज्ञानिक निबंधों पर एक आलेख में इन निबंधों के महत्व पर लिखते हुए डॉ कालरा की प्रशंसा की है कि ‘बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी, प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार डॉ शकुंतला कालरा ने बाल मनोविज्ञान का सहारा लेतै हुए आज के दौर में बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का सही दिशा निर्देश किया है। बाल मनोविज्ञान की सही जानकारी के अभाव में प्रायः ही माता पिता बच्चों की इच्छाओं, भावात्मक परिवर्तन, मानसिक उलझनों, समवयस्कों के दवाबों को नहीं समझ पाते और वे बिना सोचे समझे अपनी अधूरी उच्चाकांक्षाओं के दवाब में हताश होकर कई बार बच्चे निराश, कुंठित, विद्रोही, उद्दंड तथा कभी कभी अपने जीवन को निरर्थक मान कर उसे समाप्त करने की सोचने लगते हैं । अनजाने में ही माता -पिता कितना हानिकारक कार्य कर जाते हैं,जिसके दुष्परिणाम न केवल उन्हें बल्कि पूरे समाज को भुगतने पड़ते हैं। इनसे बचाने तथा ऐसी ही। विभिन्न समस्याओं से निपटनै में डाॅ.शकुंतला कालरा के बाल मनोविज्ञान विषयक यह निबंध बहुत सहायक हैं। बाल विज्ञान संबंधी लेखिका का लंबा अनुभव और साहित्यिक लेखन क्षमता के कारण बाल मनोविज्ञान विषयक यह निबंध आज के माता-पिता,शिक्षक और बाल साहित्यकार सबके लिए समान रूप से उपयोगी और सार्थक सिद्ध हो सकते हैं।

डाॅ. शकुंतला कालरा का बाल साहित्य के क्षेत्र उनका एक ओर उल्लेखनीय अवदान उनकी आत्मकथात्मक कृति ‘मेरा बचपन, उड़ान की चिह में’ है जिसके बारे में प्रकाश मनु ने विस्तार से उस पर प्रकाश डाला है। उसी कृति पर देवेन्द्र मेवाड़ी का एक आलेख ‘समकालीन बाल साहित्य में आत्मकथा लेखन का अन्यतम प्रयोग:एक स्त्री द्वारा लिखित एक बालिका की संवेदनात्मक आत्मकथा ‘ शीर्षक से लिखा गया है।हम सब जानते हैं कि यह आत्म कथा वर्ष 1947 की विभाजन त्रासदी से उत्पन्न दारुण स्थितियों के संदर्भ में एक बालिका की कथा है। देवेंद्र मेवाड़ी ने अपने आलेख में इस आत्मकथा में सम्मिलित हर आयाम का विवेचन किया है । साथ ही उन्होंने पिछले साठ पैंसठ वर्षों में महिला साहित्यकारों द्वारा रचित आत्मकथाओं का ब्योरा देते हुए यह बताया है कि महिला रचनाकारों की यह आत्यकथाएं अपने समाज और परिवेश को स्वर देती हुई स्त्री पुरुष संबंधों को उजागर करती हैं विशेष रूप से 21सदी की आत्यकथाएं ‘नारी और पारिवारिक रिश्ते, स्त्री और नौकरी, स्त्री स्वतंत्रता और समानता, स्त्री स्वाभिमान, स्त्री अस्मिता आदि अनेक पहलू हैं जिनपर यह आत्म कथाएं केंद्रित है। डॉ शकुन्तला कालरा की आत्मकथा उस अर्थ में एक स्त्री की आत्मकथा नहीं है,वह एक स्त्री द्वारा लिखित एक बालिका की आत्मकथा है।’,कुल मिलाकर,’मेरा बचपन, उड़ान की चाह में’ उपर्युक्त विषयों से बिल्कुल अलग हटकर है।आत्मकथाकार ने अपनी जन्मभूमि से विस्थापित शरणार्थी परिवार के बच्चे के रूप में आत्ज्ञकथा लिखी है जो एक बेहद पठनीय और प्रेरणादायक आत्मकथा है।’


डॉ नागेश पांडेय ‘संजय’ का इस ग्रंथ में एक आलेख है, ‘हिंदी बाल साहित्य इतिहास लेखन की परंपरा और विकास।’ इस चौदह - पृष्ठीय आलेख में डाॅ. शकुंतला कालरा के बाल साहित्य विमर्श संबंधी विपुल अवदान का अन्य रचनाकारों की बाल साहित्य विमर्श पर रचित पुस्तकों के संदर्भ में विवेचन-विश्लेषण भी किया है जिससे हम बाल साहित्य विमर्श की दशा और दिशा के बारे में परिचित होते हैं। 

इसी क्रम में एक और महत्वपूर्ण आलेख का भी यहां उल्लेख वांछनीय है क्योंकि इस आलेख में डाॅ. कालरा के बाल साहित्य के जिस अवदान पक्ष पर यह केंद्रित है उसके महत्व को रेखांकित किये बिना उनके कृतित्व को संपूर्णता से नहीं आंका जा सकता है। पंद्रह -पृष्ठ का यह विस्तृत आलेख डॉ. शकुन्तला कालरा की बाल साहित्य की संपादन कला को समर्पित है और जिसकी रचनाकार हैं सन्तोष खन्ना। उन्होंने डॉ शकुन्तला के व्यक्तित्व और कृतित्व पर सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘डाॅ. शकुंतला कालरा एक सशक्त साहित्यकार, प्रखर समालोचक एवं गंभीर अनुसंधाता तो है ही, बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने वर्षों पहले अपनी गरिमापूर्ण उपस्थिति दर्ज करा ली थी अब वह बात साहित्य में अपनी अनोखी मौलिकता, संवेदनशीलता एवं नई सोच के कारण कई सोपान लांगती एक बहुत ऊंचे पायदान पर खड़ी हैं जहां से उनके बाल साहित्य के रचना संसार के कई कीर्तिमान देखे जा सकते हैं।’

डॉ. शकुंतला कालरा ने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों विशेष रूप से बाल साहित्य पर पुस्तकें तथा कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। उन्होंने दर्जन से अधिक पुस्तकों का संपादन किया है। इस आलेख में सन्तोष खन्ना ने उनकी संपादन कला के क्षेत्र में अवदान के महत्व के सही आकलन के लिए उनकी हर पुस्तक की कथ्य और विशेषताओं की चर्चा करते हुए कहा है कि ‘डॉ शकुंतला द्वारा संपादित बाल साहित्य पर पुस्तकें बाल साहित्य के परिदृश्य में एक संपूर्ण दस्तावेज की तरह हैं जिससे आम पाठक का ज्ञान वर्द्धन तो होगा ही, बाल साहित्य के शोधार्थियों के लिए तो यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी । इन कृतियों को आधार बनाकर कई प्रकार के शोध संपन्न किया जा सकते हैं। सर्वजन और शोधकर्ताओं के लाभ के लिए इन सब पुस्तकों का संक्षेप में विवेचना किया गया है जिसके अध्धयन से बाल साहित्य और बाल साहित्य विमर्श की इतिहासिकता और दर्शन और सोच से परिचित हुआ जा सकता है। इस सभी संपादित कृतियों से हिंदी बाल साहित्य की मंजूषा में श्री वृद्धि हुई है और इनके माध्यम से यह भी जाना जा सकता है कि इन बृहद ग्रंथों कै संपादन में डाॅ. शकुंतला कालरा का कितना अकूत श्रम लगा होगा। समग्रता कहा जा सकता है कि संपादन के क्षेत्र में कई आयाम स्थापित करने वाली डॉ. शकुंतला कालरा पुस्तकों के माध्यम से बाल साहित्य के एक अप्रतिम नक्षत्र के रूप में उभर कर सामने आई हैं।’


डाॅ. राष्ट्रबंधु का ‘प्रशंसा से बहुत आगे’, डाॅ. अश्वधोष का बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी डॉ शकुंतला कालरा’, निर्मला सिंह का बाल साहित्य की ज्योतिपुंज से यादगार मुलाकात’, और डॉ. अनिल कुमार का आलेख ‘शिष्य बनने में मुझे गौरवानुभूति हो रही है’ जैसे समृद्ध आलेख अत्यंत पठनीय और श्लाधनीय हैं। इस ग्रंथ में और भी बहुत कुछ है जो डाॅ. शकुंतला कालरा की बाल साहित्यिक अवदान पर ध्यान आकर्षित करता है। वस्तुत: यह समूचा ग्रंथ ही उनके बाल साहित्य सृजनात्मकता के फल पल का हिसाब रखता हुआ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि इन पर्वताकार उपलब्धियां के पीछे कितना परिश्रम, त्याग, तप साधना की गई होगी। आजकल साहित्यकारों की सृजनात्मक उपलब्धियों को सामने लाने के लिए उन पर प्रायः पत्रिकाओं के पूरे के पूरे अंक उनके साहित्य को समर्पित प्रकाशित किए जा रहे हैं। पिछले वर्ष अर्थात् वर्ष 2023 में भेरुंलाल गर्ग संपादित बाल वाटिका का संपूर्ण अंक डाॅ.शकुंतवा कालरा पर व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाशित किया। गया था जिसका लोकार्पण 12 मार्च,2023 को हिंदी भवन में विधि भारती परिषद् के एक भव्य सम्मान समारोह और पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में किया गया था और साथ ही विधि भारती परिषद् की ओर से डाॅ.शकुंतला कालरा को। उनकी बाल साहित्य तथा प्रौढ़ साहित्य सृजन उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय स्तर का राष्ट्र भारती सम्मान प्रदान किया गया था। विधि भारती परिषद् का राष्ट्र भारती सम्मान वर्ष 2008 में आरंभ किया गया था। राष्ट्र भारती सम्मान देश के उन विभूतियों को प्रदान किया जाता है जो अपनी सतत साधना से देश और समाज को अपने प्रेरक अवदान की गंगा से आप्लावित करते हैं।।


अनेक साहित्यकारों पर आयु विशेष के पड़ाव पर अभिनंदन ग्रंथ भी प्रकाशित किए जाते हैं। डॉ नागेश पांडेय 'संजय ' द्वारा डॉ शकुन्तला कालरा पर संपादित इस ग्रंथ का महत्व किसी भी अभिनंदन ग्रंथ से अधिक है क्योंकि अभिनंदन ग्रंथ में औपचारिकता और आदर का भाव अधिक रहता है और साहित्यकार विशेष के अवदान का गंभीर मूल्यांकन नहीं हो पाता है। डॉ शकुन्तला कालरा पर केंद्रित इस ग्रंथ में न केवल लेखिका के बाल साहित्य के क्षेत्र में अवदान का प्रमाणिक रूप रुप से मूल्यांकन तो हुआ है बल्कि साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत की बाल साहित्य परम्परा का भी विवेचन हुआ है। हिंदी के बाल साहित्य के छात्र और शोधकर्ताओं के लिए यह ग्रंथ बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।

समीक्षक : संतोष खन्ना 

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