समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा
पुस्तक का नाम : समकालीन बालसाहित्य दिशा डॉ. शकुंतला कालरा
संपादक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय',
प्रकाशन : नमन प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2023
मूल्य : रु 950/- (सजिल्द)
पृष्ठ : 342
समीक्षक : डॉ. आर. पी. सारस्वत
पुस्तक के शीर्षक देखकर भ्रम की स्थिति बन जाती है ऐसा प्रतीत होता है कि पुस्तक डॉ. शकुंतला कालरा जी ने ही लिखी है, पर आगे जब सम्पादक पर निगाह पड़ती है तो पता चलता है कि शीर्षक के साथ आर्थात शीर्षक में ही डॉ. शकुंतला कालरा जी हैं। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह हुआ कि समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ. शकुंतला कालरा जी हैं। और हों क्यों नहीं बालसाहित्य की प्रत्येक विधा पर डॉ. कालरा जी अपनी लेखनी न केवल चलाई है अपितु इससे प्रत्येक विधा को समुचित धार प्रदान की है- इसी कारण डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' को यह शर्षक पुस्तक का रखना पड़ा है जिसके लिए डॉ. पांडेय को बधाई !
यदि मैं यानी कि आम पाठक यह कहूँ कि मेरे पास ऐसे कोई टूल्स नहीं हैं जिनसे मैं सृजन की भरपूर जाँच-पड़ताल कर अपनी आख्या दे सकूँ तो भाई मेरे सभी टूल्स, रिर्पोटर्स उपलब्ध करा दी हैं- डॉ नागेश पांडेय 'संजय' ने तो उनका अध्ययन कर और अपनी राय बनाकर उन्हीं के आधार पर अपने विवेक एवं शब्द-चातुर्य के साथ लिख डाली है अपनी विवेचना तो वही मैं कर रहा हूँ, इस पुस्तक में डॉ संजय ने स्वयं विभिन्न साहित्यकार - विद्वानों से उनके ही टूल्स का प्रयोग कर उनसे ही रिर्पोट्स प्राप्त कर संपादन कर यह ग्रंथ-अनुपम ग्रंथ हमारे साहित्य जगत को सौंपा है जो कि एक महान एवं ऐतिहासिक ग्रंथ है जिसकी चर्चा आने वाले समय में सम्मान के साथ होगी तथा किसी भी विवेचनात्मक आलेख में इसका जिक्र अवश्य होगा ऐसा मेरा मानना है।
अपनी-अपनी लेखनी से निःसृत शब्द-पुंज ग्रंथ में बाल साहित्य-जगत के मूर्धन्य विद्वान यथा प्रकाश मनु पद्मश्री ऊषा यादव, विष्णु प्रभाकर, सुकीर्ति भटनागर, डॉ. अमिता दुबे, डॉ. मो० अरशद खान, मधुसूदन साहा, विनोदचन्द पांडेय विनोद, डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, कृष्ण शलभ, डॉ तारादत्त निर्विरोध, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, डॉ. मोहम्मद साजिद खान, प्रताप सहगल, मंजुरानी जैन, डॉ. रवि शर्मा, देवेन्द्र मेवाडी, सृष्टि पांडेय, पद्मा चौगांवकर, घनश्याम मैथिल 'अमृत', भगवती प्रसाद गौतम, दिविक रमेश, डॉ. भैरूलाल गर्ग, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, डॉ. नागेश पांडेय संजय, संतोष खन्ना, डॉ. दर्शनसिंह आशट, डॉ. राष्ट्रबंधु, डॉ. चक्रधर नलिन, डॉ. अश्वघोष, गोविन्द शर्मा, निर्मला सिंह, नीलम राकेश, डॉ. रमानाथ त्रिपाठी, डॉ. अनिल कुमार, चक्रधर शुक्ल तथा विशेष रूप से डॉ. विकास दवे, वेद मित्र शुक्ल एवं आशीष जिनके संयमित साक्षात्कारों से साहित्यकार डॉ. शकुंतला कालरा के विस्तृत भाव जगत से रू-ब-रू होना सुनिश्चित हुआ। लगभग आधे से भी ज्यादा - समसामयिक बाल साहित्य की दुनिया की साहित्यकारों ने इस ग्रंथ केपूर्ण होने में अपनी-अपनी आहुति दी है तब कहीं यह साहित्यक ग्रंथ पूर्ण हुआ है। मेरा सौभाग्य है - इस बहाने में इन सभी के सद्विचारों प्रयासो से जुड़ सका तथा जान पाया कि आदरणीय कालरा जी मेरी ही नहीं अपितु बाल साहित्यकारों की प्रिय हैं। सभी बहन शकुंतला कालरा कह कर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। करे भी क्यों नहीं इतना प्यार दुलार जो - उनसे मिलता रहता है हर कोई उनका बनकर रह जाता है। फोन पर वार्तालाप शुरू होते ही कैसे हो? - वीणा जी कैसी हैं मिसिज शलभ जी से कब मिले उनकी कुशलता लेना, यह उनका प्रथम काम होता है जो उन्हें अन्य से अलग करता है।
जैसा हम सब को मालूम है बहन डॉ. शकुंतला कालरा जी ने बाल साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी लेखनी बखूबी चलाई है क्या बाल - कविताएँ, क्या बाल नाटक, बाल उपन्यास, बाल कहानियाँ, आत्म कथा, साक्षात्कार, निबन्धात्मक शैली में लिखे बालकोपयोगी आलेख सबकुछ साहित्य - का सृजन किया है- वह भी प्रचुर मात्रा में सृजन, समीक्षा, संपादन, सबकुछ तथा प्रचार से बाल साहित्य अपने पारिवारिक दायित्वों के निवर्हन के बावजूद अपनी महती भूमिका उन्होंने निभाई है।
इस ग्रंथ के अवगाहन से हमें उनकी इस असाधारण प्रतिमा का भान हो जाता है, लगता है कि कितनी श्रम-साधना के उपरान्त उनका यह लेखन, सृजन हमारे सम्मुख आकार लेकर हमें अभिभूत कर रहा है। और इस सब के लिए बधाई के पात्र हैं डॉ नागेश पांडेय 'संजय' जिनके अथक प्रयास - से गम्भीर संपादकीय - कृत्य से इतने सारे साहित्यक व्यक्तियों को जोड़कर अपना अभीष्ट हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया है। इससे पता चलता है कि साहित्यजीवी कितना एक-दूसरे से तारतम्य बनाए हुए हैं तथा कितना एक दूसरे के-सृजन पर अपनी पैनी दृष्टि लगाए हुए हैं। आज के समय में इतना के साहित्य- कार्य भी करना कोई सरल नहीं है। दूसरे के कार्य को सराहना तथा प्रतिक्रया स्वरूप आलेख तैयार करना कोई कम कार्य नहीं। इतना कार्य डॉ. संजय ने करा लिया उनके लिए भी वे बधाई के पात्र हैं। कारण डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' स्वयं सरल एवं सीधे व्यक्तिव के धनी हैं। विद्वान बाल साहित्यकार हैं जो अपने कार्य में पूरी ईमानदारी एवं तल्लीनता से लगे रहते हैं तथा चुपके-चुपके ही विस्फोट कर देते हैं और सभी को चकित भी यह ग्रंथ भी उनका ऐसा ही चमत्कृत करने वाला कार्य है।
समकालीन बाल साहित्य को दिशा देने वाली डॉ. शकुंतला कालरा जी को ऐसे ही नहीं कहा जाता है - यह उनके विपुल बाल साहित्य के सृजित संसार की बदौलत है जो उनकी निरंतर साहित्य साधना का द्योतक भी है, चाहे इनके बाल कहनी संग्रह-मोती जोती 1998 सुनाओ वही कथा 2006, चमत्कार का रहस्य 2006, रात में दिन 2006, अपना घर आधुनिक भावबोध 2006, मेरी प्रिय कहानियाँ 2006 माँ का उपहार 2009 या फिर बाल उपन्यास मिट्टी - की चिट्ठी चंदा के नाम 2021, या बाल नाटक देर आए दुरूस्त आए और - फिर बाल कविता संग्रह करे तमाशा प्यारी मुनिया 1998, फुलवारी 2007. हँसते- महकते फूल 2012, जय जय भारत प्यारा 2012, ममता की छाँव में 2012, क्यों रूठी गौरैया 2008, या फिर निबंध संग्रह - बच्चों का व्यक्तिव - विकास कैसे हो? या फिर संपादित पुस्तकें बाल विकास का स्वरूप और रचना संसार 2002, बाल साहित्य के युग निर्माता 2006, बालकथा सुमनमाला - भाग 1, भाग2, बालकथा - सुमनमाला - भाग-2-2002 डॉ.दर्शन सिंह आशट उनका बाल साहित्य 2012 मीठी-मीठी लोरियाँ एवं प्रभातियाँ 2012. हिन्दी बाल साहित्य विघा विवेचन 2014 आलोचना के क्षेत्र में उनका लेखन सराहनीय एवं अद्वितीय है हिंदी बाल साहित्य के अनन्य साधक •2019, बालक और बाल साहित्य 2022 साक्षात्कार जो उनके द्वारा लिए गये हैं - कम रोचक नहीं हैं हिन्दी बाल साहित्य-विमर्श (साहित्यिक साक्षात्कार 2010), हिन्दी बाल साहित्यः समस्याएँ और समाधान 2017 इस तरह हम देखते हैं कि मौन साधक के रूप में साहित्य जगत को अपना योगदान अप्रितम, श्रेष्ठ योगदान डॉ. कालरा जी निरंतर प्रदान कर रही हैं। उनके अनेकानेक साहित्य-प्रेमी उनके इस स्तुतनीय कार्य की प्रशंसा करते हैं, यह में स्वयं उनमें पुस्तकों के लोकार्पण समारोह में शामिल होकर गवाह बना हूँ उनका सरल एवं सीधा सा व्यक्तित्व प्रत्येक को अपनी ओर आकर्षित सहज ही कर लेता है, यह उनके चुंबकीय व्यक्तिव का ही परिणाम है। चाहे फिर व प्रकाशमनु जी हो या बालस्वरूप राही जी अथवा दिविक रमेश, पद्मश्री डॉ. उषा यादव, पदमश्री डॉ. श्याम सिंह, डॉ. श्री प्रसाद, डॉ. रतन लाल शर्मा, सीताराम गुप्त, के. डॉ. बालशौरी रेड्डी, सूर्यकांत बाली, भैरूलाल गर्ग, डॉ. विकास दवे, डॉ. रामनाथ त्रिपाठी, गोविन्द शर्मा, डॉ. अश्वघोष, डॉ. राष्ट्रबंधु जी या उनके शिष्य डॉ. अनिल कुमार सभी उनकें मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे हैं।
इस ग्रंथ में एक उपलब्धि और है वह है- डॉ. शकुंतला कालरा जी में के दिए हुए साक्षात्कार पहला साक्षात्कार शीर्षक समकालीन बाल साहित्य - में परंपरा और आधुनिक भावबोध दोनों का सुंदर समन्वय है- डॉ. विकास दवे निदेशक, साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश एवं संपादक साक्षात्कार पत्रिका - जिसमें तमाम गूढ़ रहस्यों का जो बाल साहित्य से संबंधित है-का विवेचन बडी ही गहराई के साथ किया गया है जो वास्तव में पढ़ने-समझने लायक है। समझने लायक इसलिए कि वह डॉ. कालरा जी के गहन अध्ययन और बाल साहित्य के प्रति उनमे लगाव को दर्शाता है- डॉ. दवे ने बड़े ही सार्थक प्रश्नों को उनके सम्मुख रखा है जो उनकी विद्वता को प्रदर्शित करता है 17 पृष्ठीय इस साक्षात्कार जिसका अंत उन्होंने इस प्रकार किया है :-
"संकल्प शुभ रखें और उसे ईश्वर को समर्पित कर दें बस।" यह उनकी सात्विक सोच का परिचायक है।
दूसरा साक्षात्कार वेदमित्र शुक्ल - सहायक प्रोफेसर राजधानी कॉलेज, अंग्रेजी विभाग के शीर्षक सहज बचपन जीवन-यात्रा का सबसे - खूबसूरत पड़ाव होता है जिसके अंतर्गत उन्होनें उत्कृष्ट बाल कविता किसे कहेंगें पर अपना वक्तव्य इस प्रकार दिया है मेरी दृष्टि में उत्कृष्ट बाल कविता की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसमें बच्चों का नटखट संसार हो। उसमें लुभावनापन हो, रसीलापन ऐसा हो कि बालकों के साथ बड़े भी आनंद विभोर हो उठे। मनोविज्ञान का स्पर्श हो। बच्चों में उल्लास, चुलबुलाहट, और मौज-मस्ती का भाव पैदा करने वाली हों। बच्चों में मीठे सपने, उनमें बालहट, उनकी बालसुलभ चेष्टाएँ, शैतानियाँ, रूठना-मनाना, खेलकूद समाहित हो । कल्पना की उड़ान हो। सरसता, सहृदयता हो. जिज्ञासा, उत्सुकता हो । विंबात्मकता, मौलिकता हो।"
इससे उनके मानसिक स्तर के विस्तृत फलक का दर्शन किया जा सकता है जो उनके सजन में गाहे-बगाहे परिलक्षित होता है।
तीसरा साहित्यक-साक्षात्कार - आशीष बाल संपादक- 'अभिनव बालमन" अलीगढ़ का है जिसमें एक प्रश्न के जवाब में यह स्वीकारा है कि "काव्य - प्रतिभा जन्मजात होती है। ईश्वर प्रदत्त होती है। रचनाकार की संवेदना उसमें भाव, उसकी कल्पना, उसकी अभिव्यजना शक्ति और उसका भाषा पर अधिकार ही उसे साहित्यकार बनाता है।"
इस तरह प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य, बाल साहित्य-परक सामग्री तथा बाल साहित्य पर विवेचनात्मक जानकारी इस ग्रंथ में देकर संपादक डॉ.नागेश पांडेय 'संजय' ने बड़ा भारी कार्य किया है तथा जिज्ञासु पाठकों को डॉ. शकुंतला कालरा के बहाने ही सही बाल साहित्य के प्रति अनेकानेक खिड़कियाँ खोल दी हैं • इनसे बाहर या अंदर झाँक कर स्वविवेकानुसार हमारे - बाल साहित्यकार बंधु कुछ ग्रहण कर सकते हैं, आत्म चिंतन-मनन कर सकते हैं और हमारे समाज को उनसे प्रेरणा लेकर सात्विक, सार्थक सृजन कर सकते हैं ऐसा मेरा मानना है।
मेरी बहन डॉ. कालरा जी से स्नेह भरा लगाव है वे हमारी संस्था समन्वय, सहारनपुर की सम्मानित आजीवन सदस्य हैं- उनका आर्शीवाद समय-समय पर मिलता रहता है और आगे भी मिलता रहेगा - ऐसा मेरा मानना है।
मैं संस्था सचिव के नाते उनके उज्ज्वल साहित्यिक संसार के सृजन के लिए शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ और डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' के इस अनुपम प्रदेय के लिए आभार व्यक्त करता हूँ।
डा. आर.पी. सारस्वत
सचिव, 'समन्वय', सहारनपुर
नीरजा स्मृति बाल साहित्य न्यास
सहारनपुर 247001 -
मो० ना - 9557828950

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें