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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

पुस्तक समीक्षा : ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, समीक्षक : गोविंद शर्मा

पुस्तक - ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां

संपादक -  डा. नागेश पांडेय संजय

प्रकाशक- राष्ट्रीय प्रकाशन मंदिर,लखनऊ

मूल्य -500/-

वर्ष - 2016

समीक्षक : गोविंद शर्मा 

एक वह समय भी था जब बालकथाएं शुरू होती थी-एक था किसान या फलां गांव के रहने वाले....। आज के बालसाहित्य के लिये गुरूओं का यह कहना है कि उनमें वैज्ञानिकता होनी चाहिए और वे आज के बच्चे की आवश्यकता के अनुसार होनी चाहिए। आज के बच्चे की आवश्यकता क्या है- यह तय करने के लिये आप नेट पर सर्च करिए, विदेशी भाषा का बालसाहित्य पढिए और बच्चों से जरा दूर रहिए। क्योंकि यह बच्चों का काम नहीं है।

डा. नागेश पांडेय संजय स्थापित बालसाहित्य रचनाकार है। उन्होंने विपुल मात्रा में बालसाहित्य रचा है और दूसरों को पढा भी है। शायद इसी लिये उन्हें लगा कि बालसाहित्य से ग्रामीण परिवेश विदा हो गया है या विदा हो रहा है। उन्होंने बालकहानियों में ग्रामीण परिवेश तलाशना शुरू किया। फलस्वरूप रोचक कहानियों की पुस्तक ‘ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां’ पाठकों को उपलब्ध हुई। डा. नागेश पांडेय संजय द्वारा संपादित इस संग्रह में हिंदी के पन्द्रह बाल साहित्य रचनाकारों की 25 कहानियां हैं। डा.उषा यादव की ‘दादी अम्मा का खजाना’ और ‘आगिया वैताल की कथा’, गोविंद शर्मा की ‘अपना काम करेंगे’, और ‘मेहनत का मंत्र’, डा. जाकिर अली रजनीश की ‘सेमरा का शेर’ और ‘सपनों का गांव’ , डा. दिविक रमेश की ‘किस्सा चाचा तरकीबूराम का’,  डा.नागेश पांडेय संजय की ‘गौतर’ एवं ‘मन का डर’, प्रकाश मनु की ‘तुम भी पढोगे जस्सु’, और ‘जमुना दादी’, मुरलीधर वैष्णव की ‘हबपब टोली’, डा.मोहम्मद साजिद खान की ‘बैल खुल गये’ एंव ‘बरगदी गांव’, रमाशंकर की ‘कायाकल्प’ और ‘शत्र्तो के सहारे- आई बहारें’, रावेन्द्र कुमार रवि की ‘मिल गई मां-, डा. श्री प्रसाद की ‘काला हाथ’ और ‘यह सच हंै’, संजीव जायसवाल संजय की ‘लोहार का बेटा’, डा.सुनीता की ‘सींक वाली ताई’, एवं ‘करमू चाचा का तांगा’, डा. हेमंत कुमार की ‘आलस्य का फल’, बाल कहानियां है।

सभी कहानियां रोचक हैं और लगता है कथाकारों ग्रामीण परिवेश देखा है। अधिकांश कहानियां संस्मरणात्मक हैं। कुछ की रचना शिक्षा देने या मनोरंजन करने के लिये की गई है। फिर भी किसी में भी रोचकता की कमी नहीं रहीं। संग्रह ग्रामीण परिवेश की बालकहानियों का है। पर नगरीय परिवेश के बाल पाठकों के लिये भी उपयोगी है। वे इन्हें पढकर जान सकेंगे कि गांव से शहर आये उनके माता-पिता किस माहौल में बड़े हुए, कैसे पढे, उनका बचपन कैसा था और कैसे अभावों का सामना कर अपने आपको इस योग्य बनाया कि तुम्हारे लिये हर तरह की सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं।

हां, पुस्तक के कवर प्रकाशन, भीतर की छपाई और कागज की क्वालिटी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था। मूल्य पांच सौ रूपये ज्यादा लगता है। कहानियों के साथ रेखाचित्र चित्र भी नहीं हें। बालसाहित्य में चित्रांकन का अपना महत्व होता है। तथापि, डा.नागेश पांडेय संजय इस महत्वपूण कार्य के लिये बधाई के पात्र है। 

समीक्षक - गोविंद शर्मा, 

ग्रामोत्थान विद्यापीठ 

संगरिया- 335063 (राजस्थान)







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