पुस्तक समीक्षा
पुस्तक : टेढ़ा पुल (बाल उपन्यास)
लेखक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
प्रकाशकः विभा प्रकाशन
संस्करण: प्रथम संस्करण, 2015
मूल्य-150/-
समीक्षक : डॉ. दिविक रमेश
हिन्दी बालसाहित्य का यह सौभाग्य है कि आज उसे समृद्ध करने वाले रचनाकारों की न केवल एक अच्छी-खासी संख्या है बल्कि उसकी अनेक विधाओं को निरन्तर गुणवत्ता प्रदान करने वाले समर्पित और सक्षम रचनाकारों की भी कोई कमी नहीं है। एसे ही रचनाकारों में एक विशेष नाम है डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'। कविता, कहानी, एकांकी, आलोचना, शोध आदि के साथ-साथ उपन्यास जैसी विधा में भी उनकी समर्पित सक्रियता न केवल प्रशंसनीय है बल्कि प्रेरणादायी भी है। उन्होंने संपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया है। मैं ने उनकी रचनाओं को चाव से पढ़ा है और बालसाहित्य के क्षेत्र में उनकी निरन्तर प्रगति के लिए कामना की है।
सुखद संयोग ही कहूंगा कि उनके बाल उपन्यास 'टेढ़ा पुल' का नायक गिजू, उपन्यास के अंत की ओर, दिसंबर, 1990 में प्रकाशित मेरी एक कविता 'सोचा करता से, अपने प्रतिकूल और टेढ़े रास्ते पर ताकत ग्रहण करता नजर आता है। इस कविता की पृष्ठभूमि में किशोर गिजू के द्वन्द्व से उभरते संकल्पित रूप का थोड़ा जायजा लिया जाए- मन को खूबी उलझाने से क्या लभा? समय की अपनी गति है । अच्छा है, वर्तमान को पकड़ा जाए। यद्यपि समय को कौन पकड़ पाया? पर भूत और भविष्य के फेर में वर्तमान को क्यों बिगाड़ा जाए? वैसे भी बीती बातों ने उसे कितना तंग किया है ? भविष्य ने उसे कितना चिंतित किया है। यहां तक कि उसका स्वास्थ्य भी इस कारण अक्सर खराब ही रहता था। नहीं, अब और नहीं। सृजन से प्रेरित हो, आत्ममंथन का सहारा लेकर, अपने खोए आत्मबल को अर्जित और पुष्ट करने की यह लेखकीय दृष्टि निःसंदेह, बालसाहित्य में, नई और जरूरी है। उल्लेखनीय है;कि कृति में अन्य अनेक रचनाकारों की रचनाओं को भी, अलग-अलग संदर्भ में, बखूबी अपनाया गया है जिससे इस बाल उपन्यास को शिल्प के स्तर पर एक अनूठी पहचान मिली है।
'टेढ़ा पुल' का कथ्य आज के जटिल पुरुषसत्तात्मक सामाजिक रिश्तों के परिदृश्य में, पति-पत्नी के रूप में पुरुष और नारी के रिश्तों में आपसी तनावों, बिखरावों और टेढ़ेपन के अनुभवों की बुनियाद पर खड़े रहते हुए, माता-पिता के रूप में बालमन की उलझनों, कड़वाहट और सामाजिक तथा आत्म प्रताडनाओं का रचनात्मक संसार उपस्थित करता है । 'टेढा पुल' शीर्षक वस्तुतः आपसी रिश्तों के बीच के पुल के टेढ़े हो जाने का ही द्योतक है जो लेखक की सकारात्मक दृष्टि के कारण उपन्यास में न केवल अस्तित्वहीन बल्कि अन्ततः सीधा होने को भी बाध्य होता हुआ दिखाया गया है- 'टेढ़ा पुल? पर वह तो बेटे अब नहीं है ।' पापा (राजेन्द्र) थोड़ा रुक कर बोले, 'अब उसे सीधा कर दिया गया है। अब तो वाहन बेधड़क दौड़ते जाते हैं।' वस्तु तो इतनी भर है कि गिजू के मां को अपने पिता के कारण अलग होना पड़ा और गिजू को अपनी मां के साथ अपने नाना-मामा के घर आ कर रहना पड़ा। नाना-मामा के घर आने के लिए उसे टेढ़ा पुल के पास से बस लेनी पड़ी। यहीं से गिजू की बाल मनोदशा के टढ़ेपन का अध्याय भी प्रारम्भ हो जाता है जिसका एक बड़ा भाग उसके स्कूल के प्रागंण में घटित होता है और वही असल में कृति का मूल अथवा प्राण तत्व भी है।
8 अध्यायों में विभाजित इस किशोर- उपन्यास का पहला अध्याय है 'नीपा नेपी गेचलो। शीर्षक ही नहीं बल्कि आगे कि कुछ पंक्तियों को पढ़ कर पाठक को पहले तो उन्हें समझने के कौतूहल से गुजरना होगा। जब समझ में आएगा तो मजा भी खूब आएगा। असल में गिजू और उसके अंतरंग मित्र रोहित के बीच की वह कूट भाषा है जिसके सृजन के लिए शब्द के अंतिम वर्ण को पहले लगाना होता है। अतः नीपा नेपी गेचलो' वस्तुतः 'पानी पीने चलोगे' है। नागेश ने उपन्यास के प्रारम्भ में ही बच्चों के जिज्ञासु मन का ध्यान रखा है । स्कूली जीवन के बहुत ही प्रामाणिक और दिलचस्प अनुभवों से सम्पन्न यह उपन्यास अपने पाठकों को अपनापन देने में समर्थ है। विद्यार्थी के द्वारा अपने अध्यापकों के सकारण अलग नाम रख लेना, अलग अध्यापकों का व्यक्तिव, विद्यार्थियों के बीच के अपने रिश्ते आदि का चित्रण तो हुआ ही है साथ ही बीच-बीच में प्रासंगिक लगने वाली लेकिन जरूरी जानकारियां भी बहुत ही सहज ढंग से साझा की गई हैं, जैसे मुहावरे और लोकोक्तियों का अंतर, विज्ञान की समझ, पुरानी कहानी के प्रति नई सूझ-बूझ की दृष्टि, पढ़ाई का महत्व, अतिथि सत्कार का महत्त्व, बच्चों की बात को भी महत्त्व देने की समझ, ब्रेल का महत्त्व, साहित्य के पढ़ने की जरूरत, सैर का महत्त्व, जानवरों की जानकारी आदि। बच्चों की स्कूली दुनिया की लेखक को गहरी समझ है और वह भी बाल मनोविज्ञान की बुनियाद पर अतः वातावरण का सृजन बहुत ही सहज ढंग से हुआ है। साथ ही बच्चों का बुद्धि विलास भी पढ़ते ही बनता है । बच्चों के बीच के इस प्रश्न-उत्तर के माहोल का आनन्द लीजिए अच्छा दूसरा सवाल पूछता हूं। कौआ उड़ता है आकाश में, मगर रहता कहां? 'पेड पर। मलकीत ने फिर तुरंत जवाब दिया मगर अंकुर फिर हँस रहा था 'गलत। मगर पेड़ पर नहीं, पानी में रहता है जानी। मगर यानी मगरमच्छ। मैं नागेश की भाषा-सामथ्र्य को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहूंगा। भाषा कहीं भी बोझिल नहीं हुई है और न ही कृत्रिम लगती है। कई जगह तो वह अतिरिक्त रूप से आकर्षित हो कर उभरी है । उदाहरण के लिए इस वर्णन को पढ़िए- रोहित की खास बात यह थी कि वह तुरंत नाराजगी को तहाकर रख देता था। उसे ओढ़ता नहीं था। जीवन में गल्तियां किससे नहीं होतीं? पर उन्हें लेकर बैठ जाना और उनको ढोने के चक्कर में अपने जीवन के बाकी सुखों की बलि चढ़ा देना कहां की बुद्धिमानी है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह उपन्यास हिन्दी बालसाहित्य में कुछ जोड़ने का अच्छा काम करेगा और अपने पाठकों का प्रिय सिद्ध होगा।
समीक्षक : डॉ. दिविक रमेश
(बाल साहित्य समीक्षा, संयुक्तांक जुलाई-दिसम्बर 2016, पृष्ठ 48 पर प्रकाशित)



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