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रविवार, 5 अप्रैल 2026

पुस्तक समीक्षा/ टेढ़ा पुल, समीक्षक : डॉ. अमिता दुबे

पुस्तक समीक्षा 
किशोर उपन्यास
टेढ़ा पुल
समीक्षक : डॉ. अमिता दुबे 
कृतिकार : डॉ. नागेश पाण्डेय 'संजय', 
प्रकाशक विभा प्रकाशन, 50 शाहचन्द जीरो रोड, इलाहाबाद-211003, 
मूल्य: रु0
150, 
पृष्ठ सं० : 64

02 जुलाई, 1974 को खुटार, शाहजहाँपुर में जन्में डॉ० नागेश पाण्डेय 'संजय' राजेन्द्र प्रसाद स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मीरगंज, बरेली में प्राध्यापक एवं शिक्षा विभागाध्यक्ष के पद पर कार्य करते हुए सृजनशील रचनाकार रहे हैं।
उनके बाल कहानी संग्रहों में नेहा ने माफी मांगी, आधुनिक बाल कहानियाँ, अमरूद खट्टे हैं, मोती झरे टप-टप, अपमान का बदला, भाग गए चूहे, दीदी का निर्णय, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस सर, नो सर, सूझ-बूझ आदि।
डॉ० नागेश पाण्डेय 'संजय' के बाल कहानी संग्रह 'यदि ऐसा हो जाए, चित्र पुस्तक 'कद्दू की दावत' उनके बाल एकांकी संग्रह 'छोटे मास्टरजी' तथा बाल पहेलियाँ 'जो बूझे वह चतुर सुजान', शिशुगीत संग्रह 'चल मेरे घोड़े', अपलम, 'लारी लप्पा' आदि हैं।विभा प्रकाशन इलाहाबाद से आपका बाल उपन्यास 'टेढ़ा पुल' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास 08 उपशीर्षकों में विभाजित है नीपा नेपी गेचलो, बट मींस लेकिन तो व्हाट मींस क्या?, आलसी के लड्डू, ये क्या हुआ?, आए हैं लेकर शूलों का हार, समय का रथ, गिलहरी उड़, मन के पहाड़ पर मीठे झरने। इस उपन्यास की कहानी रोहित और गिजू के चारों ओर घूमती है। गिजू और रोहित आपस में कोड भाषा में बात करते हैं और दूसरों को अचरज में डाल देते हैं। यह उपन्यास बाल मनोविज्ञान को दृष्टिगत रखते हुए उनकी जिज्ञासाओं, समस्यायों, उत्साह एवं परस्पर स्पर्धा को केन्द्रित करता है। उपन्यास की भाषा सहज-सरल है। बच्चों के मनोभावों का दर्शाने वाली है। बीच-बीच में आने वाले मुहावरे भाषा को और अधिक रोचक बनाते हैं 'अब तो शैतानियों का बेताज बादशाह कहा जाने वाला अंकुर भी बोलने के लिए हाथ खड़ा करने लगा था। आज उसने बताया- मैं साइकिल से आता हूँ सर। रास्ते में पुल पड़ता है। मैं साइकिल चढ़ाते हुए थक जाता हूँ पसीने छूटते हैं सर। पर जब बीच में पहुँचता हूँ तो लगता है कि जैसे कोई किला फतह कर लिया हो। फिर ढलान आ जाता है। साइकिल खुद-ब-खुद दौड़ती है।'
संवाद शैली इस उपन्यास की महत्त्पूर्ण विशेषता है। छोटे-छोटे संवादों के माध्यम से कथानक को आगे बढ़ाया गया है उस पर तो जैसे टेढ़ा पुल छप-सा गया है।
क्यों लगता है कि वह वहीं बैठा है अब भी? साथ में माँ है। नाना हैं।
क्यों लगता है, जैसे पापा आने ही वाले हैं। क्यों लगता है कि वे कहेंगे-चलो। घर लौट चलो।
टेढ़ा पुल कहीं नहीं छूटा। उसे लगता कि जैसे अब उसका जीवन ही टेढ़ा पुल जैसा हो गया है।
रास्ते सीधे सपाट हों तो मंजिल कितनी आसान हो
जाती है लेकिन.....।
गिजू हड़बड़ा गया। जैसे किसी चोर को रंगे हाथ पकड़ लिया गया हो। तिवारी सर उसके ठीक सामने खड़े थे - 'क्या सोच रहे हो?'
'कु... कुछ नहीं । कुछ भी नहीं। .. सारी.. सारी सर'।
समग्रतः यह उपन्यास बाल पाठकों के लिए तो उपयोगी है ही बाल मनोविज्ञान के प्रति जिज्ञासा रखने वालों के लिए भी रुचिकर है।

समीक्षक : डॉ. अमिता दुबे
(साहित्य भारती त्रैमासिक, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, अक्टूबर-दिसम्बर, 2018, पृष्ठ : 134)







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