पुस्तक परख
पुस्तक : यदि ऐसा हो जाए (बाल कविता संग्रह)
रचनाकार : डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’
प्रकाशक :अनंत प्रकाशन ए-569, इंदिरा नगर, लखनऊ
मूल्य :150/- रुपये, पृ. 96
आज का बालक उपभोक्तावादी समाज का हिस्सा बन गया है। उसका सर्वाधिक प्रेम और लगाव मशीनों (टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल) से है। पढ़ाई के बोझ में दबे होने से साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के लिए उसके पास न तो समय है और न रुचि लेकिन इसके बाद भी बाल कहानियों और कविताओं के प्रभाव और क्षमता ने उसे अपनी ओर आकर्षित कर रखा है।
नागेश पांडेय ‘संजय‘ बाल साहित्य की रचनाशीलता में अग्रगण्य हैं। चल मेरे घोडे, अपलम चपलम और लारी लप्पा के बाद पिछले दिनों उनकी 51 बाल कविताओं का संग्रह यदि ऐसा हो जाए प्रकाशित हुआ है। संग्रह की कविताएँ आज के बाल परिवेश के सर्वथा अनुकूल हैं। जहां अत्याधुनिक विषय मोबाइल, रोबोट, पर्यावरण, चुनाव और सरकार पर इसमें रोचक कविताएँ हैं, वहीं प्रकृति, समाज, देश, शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और नीति पर भी बड़ी ही चुस्त और सधी हुयी रचनाएँ संकलित की गईं हैं। रचनाकार ने पुस्तक की भूमिका में लिखा भी है-"मैं मानता हूं कि तुम्हारी कविताएं-तुम्हारी अपनी भाषा में होनी चाहिए और उनमें तुम पूरी तरह जीते-जागते, उछलते-कूदते, ठुमकते-थिरकते, चहकते-खेलते भी नजर आओ, यह तो बहुत जरूरी है। दूसरी बात-कविता मन से उपजी हुई चीज है। ऐसा होता है, तभी वह मन को छूती है। इन कविताओं को पढ़ोगे तो उपर्युक्त बातों को जरूर महसूस करोगे। कविताओं में तुम्हारी अपनी सोच है। तुम्हारे अपने विचार है-तुम्हारी कल्पना है और तुम्हारे जीवन को सच भी। तुम्हारे आस-पास की चीजों को मैंने तुम्हारी निगाह से देखने-तुम्हारे दिल से महसूस करने और तुम्हारी अपनी शैली में कहने की कोशिस की है।"
पहली कविता में कल्पना भी है और आत्मबोध भी -इम्तहान को दिए बिना ही,अगली कक्षा जाएँ। बिना कुछ किए, सारे जग में ऊँचा नाम कमाएँ। यदि ऐसा हो जाए तो सच मजा बड़ा आएगा। पर भइया बिन मेहनत फल कुछ रास नहीं आएगा।
मोबाइल पर बाल मन की अभिव्यक्ति भी प्रशंसनीय है-
जहाँ कही भी जाता, तुमको हरदम रखता साथ। चिट्ठी का क्या काम, कि फौरन हो जाती है बात। लेकिन ‘विजी’ बोलते हो जब, तो उठती है खीझ।
चिड़ियाघर का मुख्य प्रयोजन बालकों का पशु पक्षियों से रिश्ता कायम करना है- बाघ, भेड़िये और लोमड़ी देख - देख हर्षाए, पर देखा जब हुक्कू बंदर फूले नहीं समाए। मजा आ गया उसके संग मे हुक्कू-हुक्कू दोहराकर। मैंने देखा चिड़ियाघर
शाब्दिक पुनरावृत्ति के चलते यह कविता बच्चों को विशेष रुप से मन भाएगी- भूख लगी है,कब तक कब तक? खाना-पानी, दें ना नानी जब तक जब तक, तब तक तब तक।
उड़न खटोला पर कविता संभवतः अपने विषय पर पहली कविता है-उफ! कितनी ऊँचाई थी,नीचे गहरी खाई थी। लोग बजाते थे सीटी, लगते थे जैसे चींटी।
चुनाव कविता किशोर मन के अधिक निकट है-यहां सभी को हैं सब प्यारे यहां नहीं गिरतीं सरकारें,नहीं पेंच या दाँव हमारे विद्यालय में। मम्मी हुआ चुनाव हमारे विद्यालय में।
धूप का मानवीकरण और फिर बालक का संवेदित मन इस कविता में सहज उदघाटित हुआ है-धूप न निकली आज,कहीं बीमार तो नहीं ? सुबह-सुबह आ जाती थी,इतराती-इठलाती थी,माखन बन मुस्काती थी,मिसरी बन शरमाती थी। कभी आग बरसाती थी,जो हो, मन को भाती थी। किए बेतुके काज, मगर हर बार तो नहीं।
दादा-दादी चुप क्यों रहते ? कविता मार्मिक है जो पौत्र के बहाने उनका अकेलापन बयां करती है और वृद्धों की दशा पर बड़ों को सोचने पर मजबूर भी करती है।
कुल मिलाकर प्रभावान्विति और प्रयोजनशीलता की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत उपयोगी और विशिष्ट है।
समीक्षक : प्रो. हौसिला प्रसाद सिंह, इलाहाबाद
(बाल वाटिका, भीलवाड़ा, राज. के सितम्बर 2013 अंक में पृष्ठ 47 पर प्रकाशित)

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