पुस्तक समीक्षा
टेढ़ा पुल (बाल उपन्यास) : लेखक –डॉ. नागेश पाण्डेय ‘संजय'
समीक्षक : अरविन्द पथिक
बाल साहित्य अधिकार पूर्वक लिखना, साथ ही उसे रोचक और बोधगम्य बनाये रखना निश्चित ही बेहद कठिन और चुनौती पूर्ण कार्य है। यदि रोचकता और संदेश देने को बाल साहित्य लेखन की सफलता की कसौटी माना जाए तो डॉ. नागेश पाण्डेय संजय हमारे दौर के सर्वाधिक सफल बाल साहित्यकार हैं। उन्होंने अपनी नवीनतम कृति ‘टेढ़ा पुल’ का लेखन कर एक बार फिर इस बात को प्रमाणित किया है। उपन्यास का प्रारम्भ जिस रोचक अंदाज़ में होता है, वह लेखक के सफल शिक्षक और बाल मनोविज्ञान का अध्येता होना सिद्ध करता है। उपन्यास की प्रारम्भिक पंक्तियों से ही जो उत्सुकुता और रोचकता उत्पन्न होती है वह अंतिम पंक्तियों तक बनी रहती है।
उपन्यास का मुख्य पात्र ‘गिजू’ माता पिता के आपसी अलगाव की आंच में झुलसते बचपन और उसके अन्तर्द्वद्व को बार बार अभिव्यक्त करता है और पाठक को यह सोचने को मजबूर करता है कि आखिर माता पिता के आपसी विवाद ,कलह और अलगाव के दुष्परिणाम बच्चे क्यों झेलें ? बच्चों का कोड भाषा गढ़ना ,अपने शिक्षकों के उपनाम रखना, पिता के सान्निध्य को लालायित होना, स्कूल में शिक्षण ना होने पर भीतर ही भीतर कुढना जैसे मनोभावों को ‘टेढ़ा पुल ‘ में बहुत बारीकी और सहजता से डॉ. नागेश पाण्डेय संजय ने चित्रित किया है। उनकी कलम का कमाल इन पंक्तियों में देखिये -----मलकीत चिल्ला रहा था –"ओए,मैं फूल नहीं हूँ। आई एम नाट ए फूल। आई एम इंटेलीजेंट।"
"अच्छा तो एक सवाल का जबाव दोगे ?"
"पूछो।"
"बट मीन्स लेकिन तो व्हाट मीन्स क्या ?"
"क्या।" मलकीत ने तुरंत जबाव दिया।
अंकुर हंसा –"तुम बताओ"
"बताया तो... क्या ?"
"कहाँ बता पा रहे हो ? क्या क्या कर रहे हो।"
इस तरह बच्चों के आपस में चुहल करने की अनेक घटनाएँ ‘टेढ़ा पुल’ को सरस बनाये रखती हैं। इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष जो इसे पाठ्यक्रमोपयोगी बनाता है, वह है बहुत सहज सरल ढंग से मुहावरों और लोकोक्तियों के बारे में जानकारी देना। जिस तरह बाल साहित्य के जनक विष्णुगुप्त बच्चों को खेल-खेल में शिक्षा देने में निष्णात थे, उसी तरह टेढ़ा पुल का लेखक भी कहानी सुनाते सुनाते समय कब बच्चों को मुहावरे और लोकोक्तियों में फर्क करना,उनका अर्थ ग्रहण करना ,पर्यायवाची लिखना सिखा देता है पता ही नहीं चलता। पंक्तियाँ देखिये –
“ तिवारी सर, सख्त तो बहुत थे पर हिंदी बहुत अच्छी पढाते थे। मुहावरे और लोकोक्ति की पहचान का बहुत अच्छा तरीका उन्होंने बताया था कि मुहावरे के अंत में ‘ना’ आता है और लोकोक्ति पूरा कथन होती है। जैसे ‘हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या ? लोकोक्ति है तो आँखे दिखाना ,’नौ दो ग्यारह होना’ मुहावरा है। ----एक दिन उन्होंने बताया जल के पर्यायवाची याद कर लो, उनमे ‘द’ जोड़ दोगे तो बादल ,’ज’ जोड़ दोगे तो कमल और ‘धि’ जोड़ दोगे तो समुद्र के पर्यायवाची हो जायेंगे। जैसे जलद,वारिद ,तोयद आदि बादल के पर्यायवाची हैं।”
उपन्यास का शीर्षक ‘टेढ़ा पुल’’ गिजू के मनोमस्तिष्क पर अंत तक चिपका रहता है। लेखक शीर्षक को अपने अंत में अपने इस कथन के साथ उपयुक्त सिद्ध करने में सफल होता है –“वेरी गुड! अब मैं भी बेधडक दौड़ सकूंगा। मेरा टेढ़ा पुल भी सीधा हो गया है।”
दुधवा नेशनल पार्क की यात्रा, छात्रों का फिल्म देखने जाना समेत अनेक ऐसी घटनाएँ हैं जो बाल मन की स्वाभाविक जिज्ञासा को निरंतर उत्प्रेरित करती हैं। एक मात्र खटकने वाली बात यदि खोजी जाए तो इस उपन्यास में एक ही प्रतीत होती है वह है-- गिजू के पिता के अस्पताल में भर्ती होने के घटनाक्रम के साथ ही ‘गिजू’ के माता पिता के सुलह की संभावना निश्चित हो जाना। रहस्य का जो वातावरण कथा के प्रति निरंतर रोचकता और उत्सुकुता जगाए रखने के लिए आवश्यक था वह समय से पूर्व ही खुल गया है और कोई भी अस्पताल में गिजू के नाना नानी और मामा द्वारा गिजू के पिता की सेवा सुश्रुषा से निष्कर्ष निकाल सकता है कि इस उपन्यास का समापन गिजू के माता पिता के मिलन या अलगाव समाप्त होने के साथ होगा। इस बिंदु पर लेखक किसी घटनाक्रम को जोड़कर रहस्य को अंत तक बनाये रख सकता था परन्तु यह कोई ऐसा विषय नहीं है जिसके लिए इस ‘टेढ़ा पुल’ के सबल पक्षों को भुला या नकार दिया जाए। आकर्षक सजिल्द कलेवर 150 रूपये मूल्य का 64 पृष्ठों का विभा प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित ‘टेढ़ा पुल’ बाल उपन्यास डॉ. नागेश पाण्डेय ‘संजय‘ की रचना यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
समीक्षक : अरविंद पथिक
(समकालीन चौथी दुनिया, नई दिल्ली, जनवरी , 2018 में प्रकाशित)


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