हमारे सम्मान्य समर्थक... हम जिनके आभारी हैं .

शनिवार, 3 सितंबर 2011

पुस्तक समीक्षा/ इन्द्रधनुषी बाल कहानियाँ, समीक्षक : शकुंतला कालरा

पुस्तक समीक्षा 
इंद्रधनुष के विविध रंग
समीक्षक : डॉ. शकुंतला कालरा 

प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर अपनी कलम के जादू से प्रभावित करनेवाले रचनाकार डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' ने सृजन और आलोचना के साथ-साथ संपादन के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। इससे पूर्व उनकी तीन पुस्तकें 'किशोरों की श्रेष्ठ कहानियाँ, 'बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियाँ' और 'न्यारे गीत हमारे' उनकी संपादन कला को उजागर कर चुकी है। इसी श्रृंखला की कड़ी के रूप में उनका अगला संग्रह 'इंद्रधनुषी बालकहानियाँ' आया है जिसमें शीर्षक के अनुकूल बालमन के विविध रूप रंग से सुसज्जित चालीस कहानियाँ हैं। इसमें परंपरा भी है और आधुनिकता भी। इसमें इतिहास भी है और पुराण भी। यथार्थ भी है और कल्पना भी। पुराना शिल्प भी और नए प्रयोग भी। इसमें लंबी कहानियाँ भी हैं और लघुकथाएँ भी। इसमें वरिष्ठ बालकहानीकार भी हैं और उदीयमान रचनाकार भी। कुल मिलकर इसमें इन्द्रधनुष के विविध रंग हैं। टेलीविजन और इंटरनेट के कारण साहित्य से कटते जा रहे बच्चों को मौलिक और नवीन विषयों एवं अपने अतीत के सुंदर मार्गदर्शक रूप से सजी ऐसी कहानियाँ इस संकलन में रखी गयीं हैं जो बच्चों को विभोर कर देंगी। बाल कहानियाँ आज खूब लिखी जा रही हैं जिनमें रचनात्मकता का नितांत अभाव है। आज आवश्यकता है बच्चों को कहानी-कविता आदि सभी विधाओं में ऐसा साहित्य दिया जाए जो उन्हें पुस्तकों की दुनियाँ में वापस ले आए। निश्चय ही बच्चे ऐसी पुस्तक का स्वागत करेंगे। इनमें उन्हें मौलिक एवं अनूदित, देशी एवं विदेशी, शिशु, बाल एवं किशोर सभी के लिए अनूठे विषयों की इंद्रधनुषी कहानियाँ मिलेंगी। संपादक ने इन्हें बच्चों की सुविधा के लिए निम्न भागों में वर्गीकृत किया है-

1. वयगत कहानियाँ

2. उद्देश्यगत कहानियाँ

3. रचनागत कहानियाँ

4. विषयगत कहानियाँ

(क) काल्पनिक कहानियाँ (ख) यथार्थ कहानियाँ

(ग) शैलीगत कहानियाँ

'तितली और बाबू' संकलन की पहली कहानी अलका पाठक द्वारा लिखी एक शिशु कथा है जो सरल भाषा में लिखी छोटे-छोटे वाक्यों से गुँथी पर्यावरण संरक्षण की बड़ी प्यारी कहानी है, जिसके पात्र हैं बाबू, गुलाब, तितली, चिड़िया, तोता, पेड़ आदि। बाबू नटखट शरारती लड़‌का है जो पेड़, पौधे, फूल, तितली के दर्द को नहीं समझता। पूरी कहानी शिशुओं में संवेदना जगानेवाली अत्यंत सशक्त कहानी है।

'पश्चाताप' संग्रह की दूसरी बालकथा है, जिसमें लेखक विनय कुमार मालवीय ने बच्चों को अपनी भूल पर पश्चाताप करने का संदेश दिया है। तीसरी कहानी वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु की 'फा' एक किशोर कथा है। फा सब बच्चों का प्यारा फादर है जो असहाय बच्चों की हर प्रकार से सहायता करता है। वह बाल समाज में सांता क्लाज की तरह मशहूर है।

संग्रह की कहानियाँ शिक्षाप्रद भी हैं और मनोरंजक भी। सत्य कथाएँ भी हैं और काल्पनिक भी। बाल परिवेश की कथाएँ हैं और बाल मन की, यानि बच्चों का बाह्य जगत भी है और अंतर्जगत भी।

'नाचूँ मैं नाचो तुम' क्षमा शर्मा की कल्पना प्रधान कथा है तो 'बेबिका का सपना' उषा यादव की सत्य कथा है। 'बवंडर' (मो. अरशद) एक खूबसूरत साहसिक कथा है, तो 'फँस गए खर्चीले लाल' (रमाशंकर) बच्चों को गुदगुदानेवाली हास्य कथा है। बाल मनोविज्ञान पर आधारित भगवतीप्रसाद दिवेदी की 'मन का चोर' तथा श्रीप्रसाद की 'मनीषी' कहानियाँ हैं। क्षमता से.रा. यात्री की सामाजिक कथा है तो 'शिक्षा' शीर्षक कहानी रामदरश मिश्र की राजा-रानी कथा है।

इसी तरह इंद्रधनुष के अन्य रंगों में रंगी कहानियों में ऐतिहासिक (अखिलेश श्रीवास्तव चमन की 'बिंबसार का न्याय'), जासूसी (देशबंधु शाहजहाँपुरी की 'जासूस छोटू'), तंत्र-मंत्र कथा ('चमत्कारी ताबीज'-बुलाकी शर्मा), जादू कथा ('जादुई अक्षरों का कमाल' नीलम राकेश), विज्ञान कथा ('समाधान' राजीव सक्सेना), परी कथा ('रात में दिन'-शकुन्तला कालरा) तथा लोक कथा ('शिलांग देवता' श्याम सिंह शशि) के भी चटकते हुए रंग हैं।

शैलीगत विविधता पर आधारित कहानियों में मालती बसंत की 'नयी माँ' (आत्मकथा शैली), मो. साजिद खान की 'सूना मैदान' (संस्मरण शैली), अमिताभशंकर राय चौधरी की 'एलबम' (संवाद शैली), अनंत कुशवाहा की 'दस डिग्री ऊपरः दस डिग्री नीचे' (पत्र शैली) अमर गोस्वामी की 'डायरीजी नमस्ते' (डायरी शैली), दिनेश पाठक शशि की 'पुस्तकों की हड़ताल' (स्वप्न शैली), निर्मला सिंह की 'क्या बर्फभी पिघलती है' (प्रश्नोत्तर शैली) श्यामलाकांत वर्मा की 'कौवा कान ले गया' (कहावत शैली), नागेश पांडेय संजय की 'चूहे के पेट में चूहे कूदे' (चंपू शैली), जाकिर अली 'रजनीश' की 'समय के साथ' (फंतासी शैली), रामवचन सिंह' आनंद' की 'बाबा और बिच्छु' (पद्यकथा शैली), चंद्रपाल सिंह यादव 'मयंक' की 'नैनीताल की सैर' (यात्रा शैली) तथा विष्णु प्रभाकर की 'बनिए की तराजू' (वर्णनात्मक शैली) की कहानियाँ हैं। संपादक ने विभिन्न शैलियों के पुष्पों के गुलदस्ते को संकलन के रूप में पाठकों को भेंट किया है। यह गुलदस्ता बच्चों की लायब्रेरी की शोभा बनेगा और उनके मन को भी सुवासित करेगा।
बच्चों के लिए कहानी सर्वाधिक आकर्षक विधा है। रोचक, रोमांचक और जादुई हो तो कहना ही क्या ! इस संकलन में बच्चों को हर स्वाद की कहानियाँ मिलेंगी जो उनकी साहित्यिक भूख को तृप्त भी करेगी और बढ़ाएँगी भी। विषय और रचना शैली के अनुरूप कहानियों का वर्गीकरण संपादक के संपादन कौशल को दर्शाता है। संकलन का संपादकीय भी कहानी के प्रारंभिक रूप से आधुनिक रूप तक की दशा को प्रस्तुत करता है। बच्चों से सीधे संवाद करते इस संपादकीय में संपादक ने संकलन के मूल उद्देश्य को बच्चों का मनोरंजन एवं जीवन जीने की कला का संदेश भी साथ-साथ माना है, जो निश्चय ही किसी भी रचना की सफलता का प्रमुख गुण है।

कुल मिलाकर प्रस्तुत संग्रह न केवल पठनीय है वरन संग्रहणीय भी है।

पुस्तक : इंद्रधनुषी बालकहानियाँ
संपादकः डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
प्रकाशकः अर्जित पब्लिशर्स,
43, अमीनाबाद रोड, लखनऊ
मूल्य : 250 रुपए
संस्करण: 2011
समीक्षकः डा. शकुंतला कालरा, दिल्ली

(बाल वाटिका, जून 2012, पृष्ठ 47 पर प्रकाशित)



2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

अच्‍छा होता कि आप इसमें यह भी बताते कि इसमें कौन कौन से लेखको की कहानियां और कौन कौन सी। अन्‍यथा यह सिर्फ आत्‍मप्रचार ही लग रहा है।

डॉ. नागेश पांडेय संजय ने कहा…

बेनामी भाई , अच्‍छा होता आप अपना नाम भी बताते तो हम आपको संबोधित करते हुए हार्दिक आभार प्रकट करते, फ़िलहाल समयाभाव के कारण संक्षेप में जानकारी दी गयी थी. अब इसे आपके सुझाव के अनुसार विस्तृत कर दिया गया है. पुन : आभार- धन्यवाद.