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रविवार, 28 नवंबर 2010

पुस्तक-समीक्षा/ नेहा ने माफी मांगी, समीक्षक : सूर्यकुमार पांडेय

पुस्तक समीक्षा/नेहा ने माफी मांगी
आज के समाज और परिवेश से जुड़ी कहानियाँ 
समीक्षक : सूर्यकुमार पांडेय

पुस्तक : 'नेहा ने माफी मांगी' (बाल कहानी संग्रह)
लेखक : नागेश पांडेय 'संजय'; प्रकाशक : राही प्रकाशन, 43 चौकसी, शाहजहांपुर 242001; पृष्ठ: 30; मूल्य दस रुपये मात्र। 
प्रकाशन वर्ष: 1994

श्री नागेश पांडेय 'संजय' ने अपनी रचनात्मक प्रतिभा के बल पर हिन्दी बाल साहित्य में अपना स्थान बड़ी तेजी से बनाया है। श्री 'संजय' बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं। बाल-साहित्य की लगभग समस्त प्रमुख विधाओं जैसे कविता, कहानी, नाटक और आलोचना में उनका कार्य सराहनीय रहा है। उन्होंने संपादन के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का भरपूर प्रदर्शन किया है। श्री 'संजय' की रचनाएं पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनका बाल कहानी इसमें उनकी कुल 6 संगह मेरे समक्ष है। कहानियाँ संग्रहीत हैं।
'खेल खेल में' (पृष्ठ- 7) एक नटखट बच्चे के पश्चाताप की कहानी है। अनजाने में बच्चों द्वारा की जाने वाली शरारतों के दुष्परिणाम को इस कहानी में उकेरा गया है। 'अंधेरा हट गया' (पृष्ट-11) में बाल मित्रों के प्रयास से एक दुर्घटना ग्रस्त बच्चे की आंखों की रोशनी वापस लाने की सार्थक सफलता को चित्रित किया गया है। 'देखा तो चौंकी' (पृष्ठ 17) में एक धनी और एक निर्धन सहपाठी बालिकाओं के सहज प्रेम को दर्शाया गया है। इस कहानी के नाटकीय मोड़ में एक लड़की अपनी ईर्ष्या छोड़कर दूसरी लड़की को अपना मित्र बना लेती है।
'जल्दी चलिए वहाँ' (पृष्ठ 20) में एक बच्चे की प्रत्युत्तपन्नमति और सूझ-बूझ के चलते दो लुटेरों के पकड़े जाने की कथा है। वर्तमान समय में बढ़ती लूटपाट की घटनाओं को इस कहानी की विषय-वस्तु बनाया गया है। 'नेहा ने माफी मांगी' (पृष्ठ-23) नामक कहानी को ही श्री 'संजय' ने अपने संकलन का शीर्षक बनाया है। इस कहानी के माध्यम से एक शरारती लड़की को उसकी गलत आदतें छुड़वाने का संदेश दिया गया है। इस कहानी में पश्चाताप भाव को सुंदर और रचनात्मक तरीके से अंकित किया गया है। संकलन की अंतिम कहानी 'मैं जान गया हूं' (पृष्ठ-26) में मध्यमवर्गीय परेशानियों के निराकरण में बच्चों की सहभागिता, सूझबूझ और सहयोग को रेखांकित किया गया है।
श्री नागेश पांडेय 'संजय' की कहानियों को पढ़ने से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि उन्हें बाल मनोविज्ञान की अच्छी समझ है। उनकी सारी बाल कहानियों के मुख्य चरित्र बालक-बालिकाएं हैं। कहानियों में एक उद्देश्य है और प्रत्येक कहानी संदेश प्रधान है। यह बाल साहित्य की एक अनिवार्य शर्त है जो श्री 'संजय' की कहानियों में प्रमुख रूप से सामने आई है। 'नेहा ने माफी मांगी' की कहानियाँ आज के समाज और परिवेश से जुड़ी हुई कहानियाँ हैं। यथार्थ इन कहानियों का मूल तत्व है। कहानियों में कल्पनाशीलता भले ही अधिक न हो किन्तु पलायनवादी भावनाएं छू तक नहीं गई हैं। इन कहानियों की भाषा बच्चों के अनुकूल है। कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। संवाद चुटीले हैं और असंगतियाँ तथा अशुद्धियाँ लेशमात्र भी नहीं हैं।
'नेहा ने माफी मांगी', बाल पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। यह संकलन श्री नागेश पांडेय 'संजय' की भावी रचनाधर्मिता के प्रति पूर्णरूपेण आश्वस्त करता है।'
समीक्षक : सूर्यकुमार पांडेय
(बालवाणी, मासिक, लखनऊ, अप्रैल मई, 1995, पृष्ठ 54 पर प्रकाशित)

(सूर्यकुमार पांडेय जी द्वारा लिखित यह समीक्षा अमर उजाला रविवासरीय, मेरठ के 28 मई 1995 अंक के पृष्ठ 3 पर भी प्रकाशित हुई थी।)











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