पुस्तक समीक्षा/ नटखट बाल कहानियाँ
मौलिकता के अभिनव साँचे में ढली अनुपम कहानियाँ
समीक्षक : राजा चौरसिया
बालवाटिका नवंबर 2019 के संपादकीय 'बालसाहित्य की सिरमौर विधा कहानी' में डॉ. भैरूलाल जी गर्ग के विचार चिरप्रासंगिक हैं। उन्होंने लिखा है-'अब सीधे-साधे उपदेश देने वाली या रहस्य रोमांचयुक्त तिलस्मी या फार्मूलाबद्ध कहानियों का कोई औचित्य नहीं है। आज के बालक के समक्ष जो भविष्य है, वह बड़ा चुनौतियों भरा है। हम उसे केवल फार्मूलाबद्धऔर अत्यंत काल्पनिक कहानियाँ देकर आश्वस्त नहीं कर सकते।' पंचतंत्र और पुरानी नानी के जमाने की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा कहानी, जीवनमूल्यों के सुबोधक तथा मनोरंजक संदेश हेतु संप्रेषण का वह सेतु है, जो भौतिकता की अमरबेल से मुक्त कर नैतिकता को आयुष्मति बनाने की प्रेरणा दे सकती है। उपर्युक्त सत्य को उद्भासित करने की दिशा में कृति 'नटखट बाल कहानियाँ' बीमार वातावरण में अनार की कहावत चरितार्थ कर सकती हैं। इसके रचनाकार सुप्रसिद्ध बालसाहित्यकार डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' हैं, जो सारस्वत मल्टी चैनल हैं। 28 कहानियों के भावों का आभास कराने की दृष्टि से बिटिया सृष्टि के 28 चित्रांकन चाहने व सराहने योग्य हैं। मौलिक कल्पनाओं को सार्थकता से जोड़ने का अनिवार्य कार्य जो डॉ. संजय जी ने किया है, वह अति विशिष्ट उपयोगी है। सुविधाओं के बीच दुविधाओं में छटपटाते बालकों में समस्याओं को मनोबल से हल करने की जाग्रति का संदेश रेखांकनीय है। बालक प्रभान्वित एवं लाभान्वित हो सकते हैं।
स्वयं संग्रह का इंद्रधनुषी कवर, जैसी तस्वीर वैसे फ्रेम के अनुसार चित्ताकर्षक है। पहली कहानी 'खेल-खेल' में बहन नेहा को शैतानों से हलाकान करने का आदी राजू का अंत में अपनी भूल स्वीकारना को सुधारना है। उसका यह कहना-'मम्मी, मैं वादा करता हूँ कि अब कभी भी कोई शैतानी नहीं करूँगा।' गुस्से में रही उसकी सूरत तक न देखने वाली मम्मी को द्रवित कर देता है।
'मैं जाग रहा था' कहानी में बच्चे की नादानी से भी परिवार हँसी-खुशी का माहौल बनाए रखने की सीख है। इसी प्रकार किसी परेशान करने से परेशानी ही भुगतनी पड़ती है। यह सिखाती है, रोचक कहानी 'कहीं ऐसा हो तो !' पारिवारिक संवादों की श्रृंखला की चौथी कड़ी है 'उड़न तश्तरी' जिसमें पृथ्वी से कम हो रहे पेड़ों के कारण ऑक्सीजन की हो रही कमी को अपने पैरों कुल्हाड़ी मारना बताया गया है। सोनू देखे गए सपने को साकार करने के लिए जब अपनी माँ से कहता है, तब माँ उसका माथा चूम लेती है।
होली की मस्ती के मूड में किसी को परेशानी में न डालकर प्यार के रंग घोलने की प्रेरणा 'होली के गुब्बारे' में निहित है। 'ईद मुबारक' अखिल और अकील की दोस्ती दो भिन्न परिवारों में समरसता की मिसाल है। आलस के दलदल में फँसने से नई कुसुमित पीढी को बचाने का उपाय 'लो माला' प्रकट करती है।
इन कहानियों को पढ़ते ही आद्यांत यह आभास होता है कि वही गद्य साहित्य है, जिसमें रोमांचक लालित्य है। सनकी राजा चित्रसेन एक चतुर मूर्तिकार के सामने सिर झुकाकर भविष्य में कलाकारों को प्रोत्साहित करने का बचन देता है। कहानी चतुर मूर्तिकार हृदयपरिवर्तन की घटना को हाईलाइट करती है। ' भाग गए चहे' के बाद 'भूत का दूत' काव्यात्मक शैली में गढी कहानी का निष्कर्ष है-'डर का नाम ही भुत है. डर भगाओ, भूत भाग चूहे कूदे' कहानी के संवाद पढ़कर बच्चे खुशी के मारे चुहिया के बच्चे चुनुआ की तरह ठुमकने व दोहराने लगेगे। 'अपमान का बदला में दूसरों की हँसी उड़ानेकन बिदाइयाले सोनू खरगोश की जान बचाते हुए यह सीख दी गई कि बुराई का बदला भलाई से ही देना चाहिए। आज मंगल के दागाई कि बुराई काटने का दुष्परिणाम भुगतने से बबने की नसीहत मूंगा' में देकर ग्रामवासियों को यह बोध कराया गया है कि पेड़ काटना पाप है।' कहानी 'टेढ़ी खीर' भी इस बात का प्रमाण है कि डॉ. संजय लोकोलियों व मुहावरों के प्रति एक्टिव होकर इस कथ्य को दही की तरह जगाला कि जो अट्रेक्टिव है, वही इफेक्टिव है। उनकी प्रयोगात्मक भागमाएँ नवेली और अलबेली हैं। यह भी उन्हें ध्यान में रहता है कि जो रुचेंगा वही पचेगा। व्यास शैली के स्थान पर समास शैली चुंबकीय है। आज बालमानस में राष्ट्रीयता का संचार करना स्वीकार्य के साथ अनिवार्य भी होना चाहिए। इसका उदाहरण है 'टिल्लू की पतंग' में झंडा-पतंग का आइडिया। कहानी 'शरारत' में किशोर की नीचा दिखाऊ शरारत पर भाई विभोर द्वारा उसे क्षमा कर देना छुटपन के बड़प्पन का प्रतीक है।
'नेहा की दीदी' में नेहा द्वारा चाय के बारे में यह कहना 'टी इज इंज्यूरियस टू हेल्थ' उनका बच्चों को यह सावधानी बरतने की सीख देती है, जिनका रोज सवेरा चाय से ही शुरू होता है। इक्कीसवीं रचना 'नेहा ने माफी माँगी' बताती है कि दूसरों की हवा निकालने से खुद की भी हवा निकल जाती है। 'प्लीज मुझे माफ कर दो' शर्मिंदा होकर ऐसा कहना भविष्य में किसी को परेशान कभी न करने का संकल्प है। गलती स्वीकार करने से ही दिली खुशी का अहसास होता है। जो अपनी गलती स्वीकार करता है, वही सुधार करता है। यह सुबोधक शिक्षा दी गई है, जिस कहानी में उसका नाम 'काल करे सो आज कर' है। नन्हीं चींटी बड़ों के लिए भी प्रेरक संदेश देती है। क्रिसमस डे यानी यीशु का बर्थडे, उसी दिन 25 दिसंबर को जेम्स का भी बर्थ डे है, जो सांताक्लाज की ड्रेस में उपहार के रूप में सबको एक-एक पौधा देता जेम्स का बर्थ डे' में यह संदेश दिया जाता है कि जन्मदिन पर पौधों से बढ़कर कोई गिफ्ट नहीं है। है।'
कहानी 'सच्चाई की जीत' में नए मॉनीटर प्रिंस को यह विश्वास हो जाता है कि अंत में जीत सदा सच्चाई की ही होती है। मौलिकता के अभिनव साँचे में ढली अनुपम कहानियों के अंतिम क्रम में 'शाबाश ! रामकेसन' गवई पिछड़ेपन की केंचुली उतारने अर्थात कूप-मंडूक रहने की परिस्थिति में अपनी मनः स्थिति को संघर्षमय बनाकर मजदूरी कर पाँचवीं पास करने के बाद रामकेसन का भाग्य एक न एक दिन देता अवश्य है। लेखक की यह उक्ति बड़ी कारगर युक्ति है। बच्चों के प्रिय बंदर, खरगोश, जिराफ, चूहे, बिल्ली, हाथी, चींटी आदि पात्र संस्कार को उद्देश्यपरकता को सार्थकता प्रदान करते हैं। डॉ. पांडेयजी रचित ये कहानियाँ पढ़कर बालवृंद धन्य हो जाएँगे। ऐसा भरपूर विश्वास है।
समीक्षक- राजा चौरसिया, कटनी (म.प्र.)
(बाल वाटिका, भीलवाड़ा, फरवरी 2023, पृष्ठ : 55 पर प्रकाशित)
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