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रविवार, 5 अप्रैल 2026

पुस्तक समीक्षा/बाल साहित्य के प्रतिमान, समीक्षक : डॉ. शकुंतला कालरा

पुस्तक-समीक्षा
बाल साहित्य के प्रतिमान
समीक्षक : शकुंतला कालरा 
प्रस्तुत पुस्तक में बालकों की वयानुसार बालसाहित्य को विविध रूपों-शिशु साहित्य, बालसाहित्य और किशोरसाहित्य में विभक्त करते हुए अलग-अलग विधाओं के विषय और भाषागत प्रतिमानों का सोदाहरण विश्लेषणात्मक विवेचन किया है।
पुस्तक के तीन महत्त्वपूर्ण खंड हैं-प्रथम खंड-अभिज्ञान, द्वितीय खंड-प्रतिमान, तृतीय खंड अनुमान। तीनों खंडों में आलोचक की अंतर्भेदक दृष्टि का परिचय मिलता है। शोध करते हुए वे विस्तार और गहराई दोनों में गए हैं। इसमें जो श्रम हुआ है, वह इस पुस्तक में आद्यन्त मूर्त हो उठा है।
प्रथम खंड-अभियान में लेखक ने बालसाहित्य और उसकी समीक्षा को परिभाषित करते हुए उसके विकासक्रम की विश्लेषणात्मक विवेचना की है। इसी अध्याय में उन विद्वान आलोचकों एवं मनीषियों के योगदान को भी रेखांकित किया है।
पुस्तक में समीक्षा के महत्त्व को दर्शाते हुए लेखक ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि बालसाहित्य समीक्षा द्वारा साधारण और उच्चकोटि की पुस्तकों को चुना जा सकता है। दूसरा इससे बालसाहित्य के रचनाकार को भी उचित स्थान मिलता है। तीसरा इससे बालसाहित्य के प्रसार में भी सहायता मिलेगी।
इसी खंड में बालसाहित्य के दायित्वों पर भी चर्चा की है। लेखक ने इसके लिए समीक्षक का बालमनोविज्ञान का सफल अध्येता होना अनिवार्य माना है। दूसरा, बालकों के साथ सीधे जुड़ाव भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। तीसरा, समीक्षक को पूर्वाग्रह से मुक्त हो तटस्थभाव से कृति का गुण-दोषसहित मूल्यांकन करना चाहिए। रचनाकार के प्रभाव से सर्वथा दूर रहकर निर्भीक होकर आलोचना करनी चाहिए। इसी खंड में बालसाहित्य समीक्षा के प्रमुख स्तंभों की अलग से चर्चा की है। बालसाहित्य के दिशाबोधक लल्लीप्रसाद पांडेय, बालसाहित्य पर प्रथम आलेख रचयिता जहूर बख्श, हिंदी बालसाहित्य समीक्षा के प्रोत्साहक कृष्णविनायक फड़के, हिंदी बालसाहित्य की प्रथम शोधकर्ता ज्योत्स्ना द्विवेदी, बालसाहित्य की सर्वप्रथम शोध उपाधिधारक आशा गंगोपाध्याय, बालसाहित्य समीक्षा के भगीरथ-निरंकार देव सेवक, पहले बालसाहित्य विशेषांक के संपादक-मनोहर वर्मा, बालसाहित्य के शास्त्रीय अध्येता-डॉ. मस्तराम कपूर 'उर्मिल', बालसाहित्य की एकमात्र समीक्षा-पत्रिका के संस्थापक-संपादक डॉ. राष्ट्रबंधु, बालसाहित्य में नए नारों के प्रवर्तक जयप्रकाश भारती, बालभावनाओं के मर्मज्ञ-विष्णुकांत पांडेय, बालसाहित्य के विवरणात्मक आलोचक डॉ. चक्रधर 'नलिन', बालसाहित्यकारों की जीवनी लेखक डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, बालसाहित्य के गंभीर आलोचक डॉ. प्रकाश मनु, विमर्श के प्रोत्साहक डॉ. ओमप्रकाश सिंघल, सूचनाओं के धनी-डॉ. सुरेंद्र विक्रम, समीक्षा को नई दिशा देने वाले-डॉ. रत्नलाल शर्मा, समीक्षा को शासकीय प्रोत्साहन देने वाले-विनोदचंद्र पांडेय 'विनोद', महिला आलोचक-डॉ. शकुंतला कालरा आदि के योगदान का आकलन करते हुए अध्येताओं हेतु समीक्षा क्षेत्र में हुए कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।
दूसरे खंड 'प्रतिमान' में बालकाव्य का वय, विषय और शिल्प के आधार पर वर्गीकरण करते हुए शिशुकाव्य के, बालकाव्य के एवं किशोरकाव्य के पृथक-पृथक प्रतिमान स्वीकार करते हुए विस्तार से उदाहरण सहित चर्चा की है। इसी प्रकार 'बालकथा साहित्य के प्रतिमान' के अंतर्गत कहानी और उपन्यास विधा के वयानुसार प्रतिमानों का विवेचन किया है। इनके प्रमुख तत्त्वों की चर्चा है। बालनाटकों के प्रतिमान की अलग से चर्चा की गई है। इसी में बालनाटक और एकांकी में अंतर को रेखांकित किया है। तीसरे खंड के अंत में लेखक ने संक्षेप में 'अन्य विधाओं के प्रतिमान' के अंतर्गत निबंध, जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, यात्रावृत्त, साक्षात्कार, डायरी तथा पत्र साहित्य आदि विधाओं के सिद्धांतों पर विचार किया है। अंतिम खंड 'अनुमान' पुस्तक का अत्यंत संक्षिप्त मात्र पाँच पृष्ठों का खंड है जिसमें लेखक ने 'बालसाहित्य का भविष्य' पर विविध दृष्टियों से चर्चा की है। लेखक का बड़ों के ऐसे लेखकों के प्रति गहरा आक्रोश है जो यह कहते हैं कि हिंदी में श्रेष्ठ बालसाहित्य का अभाव है, साथ ही ऐसे लेखकों के प्रति सम्मान भी व्यक्त किया है जिन्होंने बच्चों के लिए भी लिखा। टॉलस्टॉय, प्रेमचंद, टैगोर, निराला, बच्चन, महादेवी वर्मा, सोहनलाल द्विवेदी, रामनरेश त्रिपाठी, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और विष्णु प्रभाकर आदि ऐसे ही लेखक हैं जिन्होंने दायित्त्वबोध से प्रेरित होकर इस जरूरत को समझा। लेखक, अभिभावक, शिक्षक और साहित्यकार तीनों से इस बात की अपेक्षा रखनी है कि वे बालक की भूख को समझें और उन्हें अच्छा बालसाहित्य दें जिससे उनका मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास हो। अंत में लेखक ने बालसाहित्य के उज्ज्वल भविष्य की तस्वीर प्रस्तुत की है। साथ में इस खतरे से भी आगाह किया है कि यदि बालसाहित्य नहीं रहा तो संस्कृति भी नहीं रहेगी और शायद मानवता भी।
कुल-मिलाकर इस पुस्तक के माध्यम से लेखक के वक्तव्य तटस्थभाव से पाठकों तक पहुँचे हैं। लेखक की शोधदृष्टि व्यापक है। हर विधा के अलग-अलग प्रतिमानों के संदर्भ में अब तक हुए तमाम कार्यों की जानकारी भी दी है। 'बालसाहित्य के प्रतिमान' अपनी इस पुस्तक के प्रदेय से बालसाहित्य क अध्ययन एवं शोध करनेवालों में नागेश पांडेय 'संजय' ने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है। ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए कि बालसाहित्य के पाठक नागेशजी की इस पुस्तक का अवलोकन कर निश्चय ही लाभान्वित होंगे। 
समीक्षक : डॉ. शकुंतला कालरा, दिल्ली
(बालवाटिका, भीलवाड़ा,  जुलाई 2009, पृष्ठ: 47 पर प्रकाशित)

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