डा. नागेश पांडेय 'संजय' का बाल उपन्यास टेढ़ा पुल
समीक्षक : डा. राकेश चन्द्रा
'टेढ़ा पुल' वरिष्ठ बाल साहित्यकार, डा. नागेश पांडेय 'संजय' का वर्ष 2015 में प्रकाशित बाल उपन्यास है जिसके प्रकाशक विभा प्रकाशन, इलाहाबाद हैं. पुस्तक का आकर्षक मुखपृष्ठ रंगीन एवं भीतर के सभी चित्र श्वेत-श्याम हैं जिनका चित्रांकन मो. शोयेब फराज द्वारा किया गया है. कुल 64 पृष्ठों की इस पुस्तक की पृष्ठभूमि में टेढ़ा पुल है जो गाँव में रहने वाले कथानायक बालक गिजू के घर से लगभग एक किलोमीटर दूर है. गाँव से शहर को जोड़ने वाली पक्की सड़क पर पहुँचने के लिये इस पुल को पार करना आवश्यक है. बालक गिजू के जीवन में अपनी माता एवं नाना के साथ इस पुल को पार करना वह भी अपने पिता से दूर होकर एक ऐसा अनुभव था जिसे आजीवन भुलाया जाना सम्भव नहीं था. ऐसे कितने ही बच्चे हमारे समाज में रह रहे हैं जिनके जीवन की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों के बीच इस प्रकार के टेढ़े पुल तिर्यक रेखाओं के मानिंद उभर कर स्थायी रूप ले चुके हैं और जिनको तोड़ा जाना फिलहाल संभव नहीं दिखता है. पर इस उपन्यास में बालक गिजू को अपने अध्यापक तिवारी सर के रूप में एक ऐसे खेवनहार मिल जाते हैं जो गिजू के जीवन से इस टेढ़े पुल को हमेशा के लिये तोड़ने में कामयाब होते हैं. लेखक ने हमारे समाज की उस एक विद्रूपता की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है जिस ओर माता-पिता व परिवार का ध्यान अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ नहीं जाता है. परिणामस्वरूप अनेक बच्चे आजीवन कुंठा का शिकार रहते हैं और एक अच्छे नागरिक बनने से वंचित रह जाते हैं. कथानक की पृष्ठभूमि में एक विद्यालय है जहाँ इसी प्रकार की त्रासदी से दो-चार हो रहा बालक माजिद है जिसके पिता बड़े डाक्टर हैं और उसी शहर में रहते हैं.हैं. पर बालक माजिद अपनी माँ के साथ अलग से एक किराये के मकान में रहता है. उसे भी किसी तिवारी सर की ज़रूरत है. बाल मनोविज्ञान की पड़ताल करते हुए लेखक ने बच्चों से जुड़े हुए एक ऐसे विषय को उठाया है जो सबको सोचने पर विवश करेगा. आखिर माँ-बाप के आपसी झगड़ों के बीच नन्हें बच्चे क्यों पिसें? क्या ऐसी परिस्थितियों में समाज का कोई दायित्व नहीं है? इस दृष्टि से यह उपन्यास हिन्दी बाल साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
इस उपन्यास में विद्यालय जीवन का सुन्दर चित्रण किया गया है. किस प्रकार बच्चे अपने इष्ट-मित्रों व अध्यापकों का उपनाम रखते हैं जिनमें सहज हास्य का पुट होता है व कभी-कभी कुछ बच्चे कविताओं व गीतों की पैरोडी बनाकर सबका मनोरंजन करते हैं इसका प्रस्तुतिकरण लेखक द्वारा रोचक अंदाज में किया गया है. कक्षा के दौरान तिवारी सर व बच्चों के मध्य चलने वाले संवाद भी पाठक को आकर्षित करते हैं. इस क्रम में विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम के दिन एक अनूठा कवि सम्मेलन आयोजित किया जाता है जिसकी विशेषता यह है कि इसमें भाग लेने वाले बच्चे स्वयं अपनी रचनाओं को पढ़ने के स्थान पर बाल साहित्य के स्वनामधन्य साहित्यकारों की कविताओं का वाचन करते हैं. कविवर रमेश तैलंग, प्रकाश मनु, आनन्द प्रकाश जैन, डा. राष्ट्रबंधु के अतिरिक्त काका हाथरसी जैसे महान हास्य कवि की मनमोहक रचनाओं से श्रोताओं को सराबोर किया जाता है. आगे एक अन्य स्थान पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार दिविक रमेश की कविता का भी उल्लेख किया गया है. लेखक का यह प्रयास अत्यन्त सराहनीय है क्योंकि बाल्यावस्था में ही उन्हें बाल साहित्य के पुरोधाओं को जानने का अवसर मिलता है. यह बाल साहित्य के प्रति बालकों में संस्कार बीज डालने का श्लाघनीय प्रयास है. डा. राष्ट्रबन्धु की एक कविता विशेष रूप से उल्लेखनीय है जो बच्चों द्वारा काफी पसंद की जाती है "काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे/लड्डू बरसें खेत में, बच्चे हरषें रेत में/…". बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये गये स्वागत गीत, नाटक, जादुई करतब, समूह गान आदि की परम्परा आज भी जीवन्त है जिसका अनुसरण प्राय: हर शिक्षण संस्था में किया जाता है. लेखक ने इसको मनोरंजक ढंग से कागज़ पर उतार कर अपने लेखन कौशल को अभिव्यक्त किया है. उपन्यास के केन्द्र में एक विद्यालय है जहाँ की दैनन्दिन क्रिया-कलापों को बहुत ही सुन्दर ढंग से एक निरन्तर चलने वाली कथा का रूप प्रदान किया गया है जिसे लेखकीय उपलब्धि के रूप में चिन्हांकित किया जा सकता है. यहाँ तक कि विद्यालय द्वारा आयोजित किये जाने वाले पर्यटन स्थलों की यात्रा जो बच्चों के लिये न केवल मनोरंजक वरन ज्ञानवर्धक भी होती है का भी समावेश लेखक ने दुधवा नेशनल पार्क को सम्मिलित करके किया है. इस यात्रा के दौरान एक बार फिर से कथानायक को अपने बीते हुए दिनों के टेढ़े पुल से जुड़ने का अवसर मिलता है पर वह पुल भी अब सीधा हो चुका है.
उपन्यास की भाषा सरल एवं प्रवहमान है जो बच्चों को अवश्य ही रुचिकर लगेगी. एक गंभीर विषय को एक विद्यालय के सीमित दायरे में रखकर लेखक ने एक ऐसी कृति को जन्म दिया है जो मनोरंजक होने के साथ-साथ विचारोत्तेजक भी है. आशा की जा सकती है कि बाल साहित्य जगत में इस उपन्यास का स्वागत होगा. इस प्रकार के अनूठे प्रयोगों से बाल साहित्य निश्चित ही समृद्ध होगा.
(यह समीक्षा डॉ. राकेश चंद्रा की पुस्तक वर्तमान बाल साहित्य समीक्षा के आइने में (2023), प्रकाशक : अद्विक प्रकाशन, नई दिल्ली के पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी।)


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