पुस्तक समीक्षा
पुस्तकः बाल साहित्य का शंखनाद (आलोचना)लेखकः डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
प्रकाशन : अनंत प्रकाशन, 525/624, सेक्टर-ए, महानगर, लखनऊ (उ.प्र.)
संस्करण: प्रथम संस्करण, 2017
मूल्य : रुपए 450/- मात्र पृष्ठ: 112
बालसाहित्य के अध्ययन और अर्चन का शंखनाद
समीक्षक : डॉ. शकुंतला कालरा
हिंदी बालसाहित्य के विशाल वटवृक्ष के सृजन क्षेत्र में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, साक्षात्कार, यात्रा-वृत्तांत आदि विविध शाखाओं के साथ-साथ बालसाहित्य-आलोचना विधा भी अपनी पूरी गरिमा के साथ विकसित हो रही है। आलोचना बालसाहित्य की दशा-दिशा का एक खुला चित्र दिखाती है। आज के बालसाहित्य की सही तस्वीर खींच कर अप्रत्यक्ष में बालक और बालमनोविज्ञान का विश्लेषण करती है। गुलाब उसी क्यारी में महकते हैं - जिसकी कटाई-छंटाई होती है। आलोचना बालसाहित्य को महकाने में उसकी सहायता करती है। वह उसकी यथार्थ स्थिति का जायजा लेती है। बदलाव में सहायक सिद्ध होती है। नई दृष्टि के साथ युगानुरूप बालसाहित्य-लेखन की भूमिका आलोचना द्वारा ही निर्मित होगी। यह एक अच्छे आलोचक का काम है कि वह अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए उत्तम बालसाहित्य की कसौटी को उसके प्रतिमानों को व्याख्यायित करे। यह कार्य किया है बालसाहित्य के प्रतिष्ठित एवं चर्चित युवा आलोचक डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' ने। इस क्षेत्र में उनकी अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।' बालसाहित्य के प्रतिमान', 'बालसाहित्य सृजन और समीक्षा' तथा 'बालसाहित्य का शंखनाद' आदि इसके अतिरिक्त उनके छः दर्जन से अधिक स्वतंत्र आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।
नागेश की सद्यः प्रकाशित तीसरी पुस्तक 'बालसाहित्य का शंखनाद' है। आज बालसाहित्य में हुई आलोचना की प्रगति से नागेश संतुष्ट दिखाई देते हैं। इसी पुस्तक की भूमिका में उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार किया है कि आज बालसाहित्य में आलोचना विधा पर्याप्त समृद्ध हो चुकी है। उनका वक्तव्य है-'आज बालसाहित्य का आलोचना पक्ष बहुत सबल है। बहुत काम हो गया है। बहुत काम हो रहा है। आज का शोधार्थी बालसाहित्य पर काम करने के लिए भटकने जैसी स्थिति में नहीं है। विविध विषयों पर उत्कृष्ट सामग्री से युक्त महत्त्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं। एक जमाना था, जब आलोचनात्मक सामग्री के अभाव में बालसाहित्य पर अनुसंधान की कल्पना ही दुष्कर थी। विश्वविद्यालय बमुश्किल इस विषय पर कार्य करने की अनुमति प्रदान करते थे। आज तो बालसाहित्य पर संपन्न शोधों की संख्या ही दो सौ को पार कर चुकी है। प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ अब बालसाहित्य पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित करने में गौरव की अनुभूति कर रही हैं। निश्चय ही यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।'
'बालसाहित्य का शंखनाद' प्रस्तुत पुस्तक में आलोचना के अतिरिक्त कुछ बालसाहित्यकारों से जुड़े संस्मरणात्मक आलेख हैं। इस पुस्तक को उन्होंने दो भागों में विभक्त किया है' अध्ययन' और 'अर्चन'। खंड एक यानि 'अध्ययन' के अन्तर्गत बालसाहित्य के क्षेत्र की उपलब्धियों को रेखांकित किया है। खासकर युगीन संदर्भों पर चर्चा की है। सृजित साहित्य में बालक की उपस्थिति और उसकी रुचि को देखने की कोशिश है। बालसाहित्य के चिंतन-मनन से जुड़े नौ आलेख हैं। प्रथम आलेख 'बालसाहित्य का शंखनाद' है जिसमें लेखक ने सूजन और आलोचना के साथ संपादन के क्षेत्र में हुए कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। हिंदी बालसाहित्य से जुड़े सरकारी और स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा दिए गए पुरस्कारों में हुए सुधारों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। विश्वविद्यालय, यू.जी.सी. द्वारा बालसाहित्य को महत्त्व देना, विश्व हिंदी-सम्मेलन में बालसाहित्य का विशेष सत्र रखना, वृहद बालसाहित्य के कोशों का संपादन आदि ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य हैं जिनके आधार पर लेखक ने कहा है कि आज बालसाहित्य का महायज्ञ जारी है और शंखनाद हो रहा है। दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवा आलेख कहानियों से जुड़े हैं जिनमें कहानी के स्वरूप और विविध विषयों की कहानियों की चर्चा है। छठे आलेख 'बालसाहित्य में चित्रांकन' में चित्रों के महत्त्व को दर्शाते हुए इस सच्चाई को स्वीकार किया है कि 'एक कुशल लेखक, समर्थ प्रकाशक वरन् सजग चित्रकार की भी आवश्यकता सिद्ध होती है। तीनों के पारस्परिक समन्वय के बगैर प्रभावी बालसाहित्य का निर्माण असंभव है।' बालसाहित्य के विकास में 'लोकसाहित्य का प्रदेय' शीर्षक के विस्तृत आलेख में नागेश ने सामान्य साहित्य की भांति बालसाहित्य का मूल स्रोत भी लोकसाहित्य को माना है। लेखक ने यह स्वीकार किया है कि बालसाहित्य की नींव को पुख्ता करने की दृष्टि से उसका उल्लेखनीय अवदान है। इसी कारण इसकी अद्भुत संपदा को बचाकर रखना आने वाली पीढ़ी की ईमानदार जिम्मेदारी है। 'बालसाहित्य अकादमी क्यों, कब और कहाँ?' एक अत्यंत संक्षिप्त आलेख है जिसमें लेखक ने सरकार से समस्त लेखकों की ओर से एक निवेदन प्रस्तुत किया है कि 'हिंदी बालसाहित्य अकादमी' बने जिसका मुख्यालय राजधानी में हो। इसमें हर भाषा के बालसाहित्य के जानकार लोग हों। इसका मूल लक्ष्य बालसाहित्य को हर बालक के हाथ में पहुँचाना हो। यहाँ विषय की दृष्टि से अनुपात में तारतम्य का अभाव मुझे थोड़ा खटकता है। पुस्तक में कहानी से जुड़े तो चार आलेख हैं किंतु अन्य विधाएँ बिल्कुल उपेक्षित रही हैं। यदि इस ओर सुधि विद्वान लेखक ध्यान देते तो पुस्तक की पूर्णता में निश्चय ही सहायता मिलती। अगले, संस्करण में इसका संशोधन पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
पुस्तक के दूसरे खंड में लेखक ने बालसाहित्य के कुछ दिवंगत उन बालसाहित्यकारों के साथ अपने संस्मरण साझे किए हैं जिनका बालसाहित्य-सृजन एवं आलोचना के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। ये बालसाहित्यकार हैं नई सोच के धनी डॉ. देवसरे, बहुआयामी कृतित्व के स्वामी: जय प्रकाश भारती, बालसाहित्य के शिखरः डॉ. श्रीप्रसाद, बालसाहित्य के जादूगर डॉ. राष्ट्रबंधु, यादों की खिड़की से झाँकते मनोहर वर्मा। इनके अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त के बालकाव्य तथा सीताराम गुप्त की बालकविता का भी आलोचनात्मक विवेचन किया है।
आलोचना की इस पुस्तक में संकलित सभी आलेखों के विवेचन-विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि डॉ. नागेश एक अच्छे आलोचक हैं। मैथ्यू अर्नल्ड मानते हैं 'आलोचक का कर्तव्य है कि वह संसार के सर्वोच्च ज्ञान और सर्वोत्तम विचारों को जानें, उन्हें सोचें-समझें और फिर उनका सर्वत्रा प्रचार करें।' यही कार्य नागेश ने अपने आलोचना-कर्म के द्वारा किया है चाहे तद्विषयक सूचनाएँ एकत्र करना हो अथवा बालसाहित्यकारों के अवदान को रेखांकित करना हो। आलोचक के तीन गुण होने चाहिए आलोचक पढ़े, समझे और वस्तुओं का यथार्थ रूप देखे। नागेश ने यह कार्य तटस्थ भाव से पूर्वाग्रह से मुक्त रहकर किया है।
एक अच्छे आलोचक का यह भी कर्त्तव्य माना गया है कि उसने जो कुछ सीखा है उससे दूसरों को हस्तांतरित करे। यानि वह रचनात्मक प्रतिभा के लिए उपयुक्त उपजाऊ भूमि तैयार करे। नागेश बहुपठित, बहुज्ञ साहित्यकार हैं। उन्होंने इस आलोचक-कर्म को भी बखूबी निभाया है। बड़े श्रम से वे सूचनाओं को एकत्र करते हैं। स्वयं नई-नई पुस्तकों का ही अध्ययन नहीं करते वरन् पुराने साहित्यकारों की रचनाओं को भी खोज-खोज कर उनका पठन कर पुनः पाठकों को उस ज्ञान से नवाजते हैं और रचना में निहित लेखक के विचारों का अनुसंधान कर उनका प्रतिपादन करते हैं।
निष्कर्षतः सार संक्षेप यह है कि उनके आलेखों में अन्वेषण की नई मौलिकता है। उसमें सतहीपन नहीं है, गंभीरता है। वह रूढ़िबद्ध नहीं ताजापन लिए है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नागेश सृजनात्मक प्रतिभा-संपन्न भी हैं और उनमें आलोचनावृत्ति भी है। सर्जक होते हुए भी उनका मिजाज आलोचनात्मक है। आलोचना, साहित्य का ही एक अंग होती है। पाठक को रचना का पूरा आनंद उसका मर्म समझाने से आलोचना उसकी सहायता करती है। आलोचक वह सजग पाठक होता है जो रचना में निबद्ध संश्लिष्ट अनुभूति का आनंद स्वयं भी लेता है और दूसरों को प्रदान करने में भी उनकी सहायता करता है और यह कार्य नागेश ने बखूबी किया है।
एक वाक्य में उनकी आलोचना में नई तराश, अन्वेषण की मौलिकता के साथ लेखकीय संवेदना भी विद्यमान है। यह ध्यातव्य है कि डॉ. नागेश ने यह पुस्तक 'बालवाटिका' के संपादक डॉ. भैरूंलालगर्ग को समर्पित कर निश्चित ही स्तुत्य कार्य किया है। सचमुच 'बालवाटिका' बालसाहित्य की आलोचना को परिवेश और मंच देकर बालसाहित्य उन्नयन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। बालसाहित्य के सुधि अध्येताओं और अनुसंधित्सुओं के लिए प्रस्तुत पुस्तक पूर्व की दो पुस्तकों की भाँति निश्चय ही उपादेय सिद्ध होगी ऐसा मेरा विश्वास है।
समीक्षकः डॉ. शकुंतला कालरा, दिल्ली
(बालवाटिका, अक्टूबर, 2017, पृष्ठ 60 पर प्रकाशित)


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें