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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

पुस्तक समीक्षा/दीदी का निर्णय, समीक्षक : डॉ. विनय कुमार मालवीय

एक शिक्षाप्रद बाल लघुकथा संग्रह : दीदी का निर्णय 
समीक्षक : 
विनय कुमार मालवीय

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' का विभिन्न विषयों पर आधारित बारह बाल लघु कथाओं का यह एक अनुपम एवं आकर्षक संग्रह है।
प्रायः जब कोई घर से बाहर जाने लगता है अथवा कोई कार्य प्रारंभ करने लगता है और ऐसे समय में यदि कहीं से छींकने की आवाज सुनाई पड़ती है तो उसके मन में एक आशंका उत्पन्न हो जाती है। घर के लोग उसे बाहर जाने से मना करने लगते हैं। जबकि कभी-कभी जान बूझकर घर के बच्चे छींक देते हैं। यह छींक स्वाभाविक नहीं होती। लेकिन बच्चे को बाहर जाने से जरूर रोक दिया जाता है। संग्रह की प्रथम कहानी' ऑक छी' में इस घटना को बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
गर्मी में जब स्कूल-कॉलेज बंद हो जाते हैं तब बच्चों के पास केवल खेलना ही रहता है। घर में छोटे भाई बहिन आपस में लड़ते हैं झगड़ते हैं, खेलते हैं, फिर एक हो जाते हैं। अपनी गलती को दूसरों के ऊपर डाल देते हैं। उनकी शरारतों से माता-पिता का गुस्सा खत्म हो जाता है। 'मैं जाग रहा था' ऐसी ही कहानी से संबंधित है।
बच्चों को स्पष्टवादिता बनने एवं निर्भीकता से बिना हिचक अपनी बात कहने की प्रेरणा स्कूल से मिलती है। इसमें अंत्याक्षरी प्रतियोगिता की अहम् भूमिका होती है। स्कूलों में सप्ताह में एक दिन वाद-विवाद, अंत्याक्षरी भी होती है। इससे बच्चों को आपस में खुलकर बोलने की सीख मिलती है। यह सीख भविष्य में उनके लिए सहायक सिद्ध होती है। बड़ी ही सरल भाषा में 'अंत्याक्षरी' शीर्षक कहानी में प्रस्तुत किया है।
हमसे जब कोई गलती हो जाती है तो हम उसे किसी को नहीं बताते। इसी तरह घर में जब कोई सामान टूट जाता है तो उसके बारें में किसी को नहीं बताते। मन में डर रहता है कि अगर बता दूँगा तो डॉट पड़ेगी, मार पड़ेगी। लेकिन अगर हम ऐसी घटनाओं को छुपाने के बजाय दूसरों को बता दें तो वह सजग हो जाएगा और उसे नुकसान नहीं होगा। ऐसी घटनाएँ लगभग सभी घरों में घटित होती रहती है। जब हमसे काँच का कोई सामान गिरने से टूटता तो उठाता है तो वह टूट नहीं बल्कि चिटक जाता है और जब उसे कोई दूसरा जाता है। इससे उसे चोट लग जाती है। स्वाभाविकता व सामाजिकता से भरपूर इस घटना को 'बता देता तो' कहानी में बड़े नपे-तुले शब्दों में वर्णित किया है।
बच्चों में लेख लिखने एवं उसमें अपने मन की बातों को वर्णित करने की प्रेरणा स्कूल से मिलती है। हमारे विचारों व आचरणों की झलक हमारे लेखों में अवश्य दिखायी देती है। दीदी ने जब बच्चों से एक लेख लिखकर लाने के लिए कहा तो बच्चे उसे खुशी-खुशी घर से लिखकर ले आए और दीदी को दे दिया। दूसरे दिन दीदी ने एक सरसरी सी नजर उनके लेखों पर डाली। फिर बोलीं- 'लेख प्रतियोगिता में सारिका प्रथम, पीयूष द्वितीय और अंकित को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ है'। यह सुनकर बच्चों को बड़ी हैरानी हुई कि दीदी ने लेख को ठीक से बिना देखो ही नंबर दे दिया है। बच्चे नाराज होने लगे। इस पर दीदी ने उन्हें हँसते हुए बताया कि जो जैसा होता है वैसी बातें कहता है। वैसा ही उसका हाव-भाव होता है। हमें दूसरों को समझाने से पहले स्वयं भी वैसा बनना चाहिए, वैसा आचरण करना चाहिए तभी हमारी बातें सार्थक होंगे। इस आशय को कहानी 'दीदी का निर्णय' में बड़ी रोचकता से प्रस्तुत किया है।
संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ बच्चों के लिए प्रेरक, शिक्षाप्रद एवं ज्ञानवर्धक है। सरल, सहज व बोलचाल की भाषा-शैली में लिखी गई कहानियाँ बच्चों को पसंद आएगी।
पुस्तक :  दीदी का निर्णय (बाल लघुकथा संग्रह)
लेखक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय
प्रकाशकः दीपक पब्लिकेशन
5, ताशकंद मार्ग, इलाहाबाद
मूल्य : 25 रुपए 
समीक्षकः डॉ. विनयकुमार मालवीय
(बालवाटिका, भीलवाड़ा (राजस्थान), नवंबर 2011, पृष्ठ : 47 पर प्रकाशित)


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