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शनिवार, 4 अप्रैल 2026

पुस्तक-समीक्षा : नटखट बाल कहानियाँ , समीक्षक : डॉ. राकेश चन्द्रा

डा. नागेश पांडेय 'संजय' की 'नटखट बाल कहानियाँ'

-डा. राकेश चन्द्रा

"नटखट बाल कहानियाँ", वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा. नागेश पांडेय 'संजय ' का वर्ष 2021 में प्रकाशित बाल कहानियों का संग्रह है जिसके प्रकाशक अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली हैं। पुस्तक का आवरण पृष्ठ रंगीन व भीतर के चित्र श्वेत-श्याम हैं। चित्रांकन सृष्टि पांडेय का है। कुल 135 पृष्ठों की इस पुस्तक में 28 कहानियाँ संग्रहीत हैं। इन कहानियों में तीज-त्यौहार, घरेलू पशु-पक्षी, घर-परिवार, विद्यालय, दोस्त एवं अन्य इतर विषयों को केन्द्रित करते हुए बच्चों के इर्द-गिर्द घूमने वाले जीवन के इन्द्रधनुषी रंगों को मनोरंजक ढंग से उकेरा गया है। उदाहरण स्वरूप कतिपय कहानियाँ दृष्टव्य हैं। सर्वप्रथम, कहानी "कहीं ऐसा हो तो?" में बच्चों के हकलाने की आदत का सुन्दर समाधान प्रस्तुत करते हुए यह भी स्पष्ट रुप से इंगित किया गया है कि यदि कोई दूसरा बच्चा चिढ़ाने के उद्देश्य से बार-बार किसी बच्चे की नकल करता है तो वह भी कुछ समयोपरान्त हकलाहट का शिकार हो सकता है। इस कहानी में कक्षाध्यापक ही उसे बोलने की कोशिश करने हेतु प्रेरित करते हैं ताकि उसकी हकलाहट दूर हो सके। कहानी सकारात्मक सोच का सुन्दर उदाहरण है। कहानी "उड़न तश्तरी" में सोनू खरगोश को स्वप्न में एक उड़न तश्तरी दिखाई पड़ती है। उड़न तश्तरी के ज़मीन पर उतरते ही उसमें से कुछ 'विचित्र मानव' निकलते हैं जो तत्काल वैज्ञानिक परीक्षण प्रारम्भ कर देते हैं। सोनू जब यह कहता है कि 'काश! हमारी पृथ्वी पर भी ऐसा होता!' तो इसके प्रतिउत्तर में वो लोग कहते हैं कि पृथ्वीलोक में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि वहाँ लोगों को लड़ने-भिड़ने से ही फुर्सत नहीं है! अर्थात हमारी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है! यह एक विचारोत्तेजक कहानी है जो सभी पाठकों को सोचने पर विवश करेगी। इस कहानी में पृथ्वी पर होने वाली पर्यावरणीय क्षति की ओर भी ध्यान आकृष्ट करते हुए बताया गया है कि पेड़ों की लगातार कटान से आक्सीजन की कमी हो रही है जो मानव के अस्तित्व के लिए खतरनाक है। कहानी "ईद मुबारक " हमारे पारस्परिक सद्भाव को मनोहारी ढंग से निरूपित करता है और यह संदेश देती है कि मानव धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। कहानी के अन्त में 'दो गज दूरी' का जो संकेत दिया गया है वह कहानी को समकालीन संदर्भों से भी जोड़ता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कोरोना जैसी महामारी का प्रकोप एकदम से समाप्त नहीं हुआ है। संग्रह की एक अन्य कहानी "लो माला" भी पठनीय है। फैंटेसी का सुन्दर प्रयोग करते हुए इसमें बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया गया है कि अतिशय कामनाएँ व इच्छाएँ सिर्फ नुकसान ही पहुँचाती हैं। संयमित व अनुशासित जीवन ही अभीष्ट है। इस संग्रह में कहानी "भूत का दूत" में रोचकता में वृद्धि लाने की दृष्टि से संवादों में गद्य व कविता की मिश्रित शैली का प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ, 'टिंकू डर गया-"रिमझिम कहीं भूत तो नहीं आ गया?"/उधर कड़कू सुअर को गुस्सा आ रहा था। वह गुर्राते हुए बोला-हो हो हो मैं आया भूत,/बड़े-बड़े भूतों का दूत।/आया हूँ मैं यमलोक से,/अभी मारता तुम दोनों को,/मैं भाले की नोक से।/खोल गेट, अंदर आऊँ,/तुम दोनों को खा जाऊँ।" यही प्रयोग कविता "चूहे के पेट में चूहे कूदे" में किया गया है "अरे वाह! चूहे के पेट में चूहे। आज तो एक ही चूहा खाने से मेरा पेट भर जाएगा।" बिल्ला मक्कार तो होता ही है। वह आवाज बदल कर गाने लगा-"बिन पैसे में लड्डू बाँटा, जिसको खाना हो वह आए।/जितने खा पाए खा जाए, चाहे तो घर ले जाए।/ रुन्नुक झुन्ना रुन्नुक झुन, झुन्नुक झुन्ना झुन्नुक झुन।" कहानी में कविता का पुट निश्चय ही बाल पाठकों को आनन्दित करेगा। उल्लेखनीय है कि कविताओं की भाषा सरल एवं गेय है। दैनंदिन जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ हमारा पाला ऐसे लोगों से पड़ता है जिनके पास सवालों का अंबार होता है। कहानी "टेढ़ी खीर " में कथानायक का नाम सवाली राम है जो सर्वथा उपयुक्त है। उसके कभी न खत्म होने वाले सवालों से न केवल बच्चे वरन बड़े भी परेशान रहते हैं। कहानी का अंत बहुत मनोरंजक ढंग से किया गया है। इसी प्रकार की एक अन्य कहानी "यस सर! नो सर!" है। अक्सर हमारा सामना ऐसे लोगों से हो जाता है जो हमेशा हड़बड़ी में रहते हैं। कथानायक अमित भी इसी श्रेणी में आता है जो अध्यापकों द्वारा पूछे गये सवालों को पूरा सुने बिना जवाब दे दिया करता था और हँसी का पात्र बनता था। पर अपने एक अध्यापक की पहल पर वह अपनी आदत छोड़ने का प्रयास करता है और संकल्पित भी होता है। कहानी "काल करे सो आज कर" अत्यंत प्रेरक है और बच्चों के सन्दर्भ में तो इसकी उपादेयता और भी बढ़ जाती है। चींटियों के माध्यम से श्रम, अनुशासन तथा समय की ऊङैउपहारों की बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है। उपहारों की प्रकृति एवं प्रकार भी प्राय: पूर्वनिर्धारित होते हैं। पर यदि उपहार के रूप में कोई दोस्त किसी गणमान्य लेखक को उनकी लिखी पुस्तकों सहित ले आए तो बच्चे के लिए इससे बड़ा उपहार और क्या हो सकता है? कहानी की विशेषता इसकी सुन्दर भावाभिव्यक्ति है। कहानी "टिल्लू की पतंग" राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत-प्रोत है जिसमें कथानायक टिल्लू अपने चाचा से ऐसी पतंग बनवाता है जिसमें हमारे राष्ट्रीय ध्वज के तीनों रंग हों तथा बीच में चक्र भी हो! इतना ही नहीं, वह उसमें तगड़ा मंझा भी बँधवाता है ताकि उसकी पतंग आसानी से न कट सके। पतंग उड़ाते समय टिल्लू और उसके साथी ये पंक्तियाँ दोहराना नहीं भूलते-"झंडा उड़ता रहे हमारा।/झंडा ऊँचा रहे हमारा।" बच्चों में राष्ट्र प्रेम जगाती यह कहानी विशेष रूप से पठनीय है। 

     संग्रह की सभी कहानियाँ रोचक एवं पठनीय बन पड़ी हैं। उनकी भाषा सरल एवं सुबोध है। इन कहानियों में नई सोच भी झलकती है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कहानियों को संक्षिप्त रखा गया है और अनावश्यक विस्तार देने का प्रयास नहीं किया गया है। बाल पाठक इसे निश्चित रूप से पसंद करेंगे। यह पुस्तक उनके मन-मस्तिष्क में स्थान बनाने में सफल होगी, ऐसी आशा की जा सकती है। 

समीक्षक : डा. राकेश चन्द्रा, लखनऊ

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