रचनाकार : नागेश पांडेय 'संजय'
प्रकाशक : साहित्य सहकार, नई दिल्ली
मूल्य : पंद्रह रुपए।
पृष्ठ : बत्तीस ।
समीक्षक : रावेंद्र कुमार रवि
विष्णु प्रभाकरजी ने 'छोटे मास्टरजी' को बच्चों और नवसाक्षरों के लिए श्रेष्ठ नाट्य कृति का प्रमाण-पत्र दे रखा है, जो पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित है। मुझे भी यह बताते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी में सृजनात्मक लेखन डिप्लोमा(इग्नू) के लिए जिस लेखन सामग्री ने मुझे स्वर्ण पदक तक पहुँचाया, उसमें गैर कथात्मक पुस्तक की समीक्षा के रूप में 'छोटे मास्टरजी' की समीक्षा सम्मिलित थी। कम ही सही, पर 'छोटे मास्टरजी' बालसाहित्य में अच्छे नाटकों की पूर्ति करती है। इस पुस्तक ने अपने सर्जक को इसी वर्ष उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से युवा लेखन में आठ हजार रुपए का 'सर्जना पुरस्कार' भी दिलवाया है।
इस पुस्तक में तीन नाटक शामिल हैं-
1. छोटे मास्टरजी
2. मजे आ गए गाँव में और
3. हुर्रे ! हुर्रे ! दीवाली है।
ये नाटक बालसाहित्य की दुनिया के जाने-माने हस्ताक्षर नागेश पांडेय 'संजय' द्वारा लिखे गए हैं। वे मुख्यतः बाल कहानियाँ लिखते हैं। उन्होंने बच्चों के लिए कुछ कविताएँ, नाटक और संस्मरण भी लिखे हैं। विभिन्न विधाओं में बच्चों के लिए उनकी दर्जनभर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। समय-समय पर उनके समीक्षा व आलोचना से संबंधित आलेख भी पढ़ने को मिलते रहते हैं।
संपादन कार्यों में तो वे लगे ही रहते हैं। उनके द्वारा संपादित 'किशोरों के लिए श्रेष्ठ कहानियाँ' विशेष उल्लेखनीय है। एक बात मैं अभी से बता देना चाहता हूँ कि शीघ्र ही वे नव किशोरियों को बहुत ही अच्छी कहानियों का एक संकलन देनेवाले हैं। सौभाग्यवश इस संकलन की कुछ कहानियाँ मुझे प्रकाशन से पहले ही पढ़ने को मिल गई, जो वास्तव में उन सबके लिए बहुत उपयोगी हैं, जिनके लिए ये लिखी गई है।
'छोटे मास्टरजी' में एक अनपढ़ नौकर कल्लू और पाँचवी कक्षा में पढ़नेवाले छात्र मोनू की कहानी है। सरल कविताओं के द्वारा इसे रोचकता प्रदान की गई है। यह नाटक साक्षर बनने की प्रेरणा देता है।
'मजे आ गए गाँव में' में गाँव और शहर के अंतर को बहुत मजे से समझाया गया है। यह अंतर उन बच्चों के जरिए समझाया गया है, जो छुट्टियाँ बिताने शहर से गाँव आए है। शहर के उन बच्चों को यह नाटक बहुत अच्छा लगेगा, जो कभी गाँव नहीं गए।
'हुरे ! हुरे ! हुरे ! दीवाली है' एक घमंडी और एक सीधे-सादे लड़के के आचार-विचारों पर आधारित है। इस नाटक में घमंडी लड़के का हृदय-परिवर्तन कराया गया है। अमीर और गरीब बच्चों को बराबरी का दर्जा दिलवाने का अद्भुत प्रयास है यह नाटक।
चूँकि यह पुस्तक बच्चों व नवसाक्षरों के लिए लिखी गई है। अतः इसकी प्रासंगिकता समाप्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। सभी नाटक आसानी से मंचित किए जाने योग्य हैं। इस पुस्तक का आवरण रंगीन व आकर्षक और अंदर श्याम-श्वेत चित्रों सहित सुंदर छपाई है।
उल्लिखित सभी कारण इस पुस्तक को पठनीय बनाते हैं। दिसंबर के दूसरे रविवार को मनाए जानेवाले अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस पर यह पुस्तक बच्चों के लिए एक अच्छा उपहार साबित हो सकती है।
- समीक्षक : रावेंद्रकुमार रवि
(बाल वाटिका, मासिक, दिसम्बर 2005, पृष्ठ : 48 पर प्रकाशित)


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