पुस्तक समीक्षा
बालकहानी संग्रह : 'अमरूद खट्टे हैं'
समीक्षक: डॉ. शोभनाथ लाल
पचास साल पहले जो लोकप्रियता बाल कविताओं को प्राप्त थी, वही लोकप्रियता आज बाल कहानियों को मिली हुई है। स्वातन्त्र्योत्तर काल में बालकों के लिए यद्यपि हर विधा में प्रभूत साहित्य-सृजन हुआ है तथापि कथा-साहित्य ने नन्हें पाठकों को अपेक्षाकृत अधिक आकृष्ट किया है। पूर्व की परी कथाओं की जगह शिल्प-शैली की दृष्टि से विकसित कहानियों ने ले ली है। बाल कविताओं के साथ खूब बाल कहानियाँ प्रकाशित हो रही हैं। पर, प्रकाशनों की भीड़-भाड़ में जब कोई स्वस्थ, रचनात्मक, उपयोगी बालकथा की पुस्तक हाथ लग जाती है तो उस पर सहज ही निगाह टिक जाती है। उदीयमान बाल साहित्यकार श्री नागेश पाण्डेय 'संजय' का बालकहानी संग्रह 'अमरूद खट्टे हैं' एक ऐसी ही सार्थक कृति है।इस संग्रह में युवा कहानीकार की कुल आठ बाल-कहानियाँ संग्रहीत हैं। सभी कहानियाँ उद्देश्यपूर्ण हैं। भाषा की सरलता, भावों की सहजता, शैली तथा शिल्प की बोधगम्यता इसकी विशेषताएँ हैं। कहानीकार बाल पाठकों के मनोरंजन के साथ अपनी ओजपूर्ण प्रस्तुति में प्रत्येक कहानी की एक 'शिक्षा' अनजाने ही बालमन पर छोड़ जाता है। और वह 'शिक्षा' पाठक की नसों में प्रवाहित होने लग जाती है। बाल-मनोविज्ञान की सहज पकड ने पूरे संग्रह की सामग्री को पठनीय और रोचक बना दिया है।
संग्रह की पहली कहानी 'खों-खों बन्दर की होली' है। होली की हुड़दंग में बन्दर जी ने खरगोश जी के हाथ की दवा की शीशी का सत्यानाश कर दिया। वह अपनी माँ के लिए दवा लिये जा रहा था। यह छोटी सी घटना न केवल बन्दर जी में पाश्चाताप और आत्मग्लानि के भाव भरती है प्रत्युत पुनः दवा के बदले भुगतान करने हेतु खरगोश जी में रचनात्मक दृष्टि भी पैदा करती है। 'उड़न तश्तरी' नामक दूसरी कहानी की प्रस्तुति अत्यन्त रोचक है। इसमें दिखाया गया है कि उड़न तश्तरियों के जरिए किस प्रकार अन्य ग्रहों से आकर लोग यहाँ से आक्सीजन बनाना बड़ा खर्चीला होता है। तीसरी कहानी 'चूहे के पेट में चूहे कूद' में जिद्दी चुनुआ चूहा कैसे काल के गाल के गाल में जाते-जाते बचा, दिखाया गया है।
चुनुआ ने अपना स्वभाव बदल डाला और हठ करना छोड़ दिया। चौथौ कहानी 'आजादी का अर्थ' संयमित रहकर आजादी मनाने का संदेश देती है।
इसी प्रकार पाँचवीं कहानी 'अनोखे कार्ड', ग्रीटिंग काडों पर अनावश्यक अपव्यय रोककर शिक्षाप्रद साहित्य भेजने-भिजवाने की प्रेरणा देती है। छठवीं कहानी 'मेहनत और किस्मत' भाग्य के भरोसे लाटरी टिकट के ऊपर परिश्रम से कमाई के कठोर सत्य को स्थापित करती है। एक झूठ को छिपाने के वास्ते कई-कई जट बोलने पड़ जाते हैं। किन्तु कोई भी झूठ कभी सत्य हो नहीं सकता। इसलिए शुरू में ही झूठ का आश्रय नहीं लेना चाहिए। इसी सच्छाई को सातवीं कहानी 'अमरूद खट्टे हैं' में बड़ी बारीकी से उजागर किया गया है। घर में बच्चे आँख बचाकर अनेक चीजे खा लिया करते हैं। नटखट नट्टू ने पेट भर रसदृल्ले खा लिए । नमकीन खाने का मन हुआ तो नमक के बदले कास्टिक सोडा मुंह में डाल लिया। लालच और चोरी का नतीजा मुह ही जख्मी हो गया। आठवीं कहानी में 'नद्दू बिल्ला यों सुधरा' । कहानी संग्रह में सभी पात्र जानवरों के बच्चे आये हैं। मुद्रण साफ-सुथरा और एक-दो प्रूफ की त्रुटियों को छोड़, आकर्षक तथा रंगीन आवरण-पृष्ठ नयनाभिराम है ।
आधार प्रकाशन, 372-सेक्टर-17, पंचकला (हरियाणा) द्वारा 1995 में प्रकाशित इस बाल पोथी का मूल्य पन्द्रह रुपये है ।
समीक्षक : डॉ. शोभनाथ लाल


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