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सोमवार, 17 मई 2021

बाल कहानी : भय का भूत- डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

भय का भूत
बाल कहानी : डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

सुंदरवन के पूरब में था एक छोटा सा घर। घर में रहता था टोनू खरगोश  और उसका छोटा सा परिवार। परिवार में पता है कौन-कौन था? टोनू की पत्नी और उसके दो बच्चे। बच्चों के नाम थे टिंकू और रिमझिम। टिंकू बड़ा और रिमझिम छोटी थी।  

रिमझिम छोटी जरूर थी मगर थी दिलेर। सब उसके साहसी स्वभाव की तारीफ करते। हां, टिंकू था नंबर एक का अंधविश्वासी और डरपोक। कहीं जरा सी आवाज भी क्या होती कि जा दुबकता मम्मी के पास। डर उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ था।  

तो एक बार की बात है। मम्मी-पापा किसी काम से बाहर गए हुए थे। घर पर टिंकू और रिमझिम अकेले थे। शाम हो रही थी और मम्मी-पापा अभी तक वापस नहीं लौटे थे। यों वे कहकर गए थे कि षाम होने से पहले ही लौट आएंगे। धीरे-धीरे रात घिर आई। घुप्प अंधेरा छा गया। सुंदरवन  में आज बिजली भी नहीं आई थी। टिंकू को डर लगने लगा। वह कांपते हुए रिमझिम से बोला-

अंधकार छाया जमकर,

और अकेले हम घर पर।

कहीं आ गया भूत अगर,

हाय! लग रहा मुझको डर।

रिमझिम ने टिंकू की हिम्मत बंधाई-

डरो न भैया! डरो न भैया!

डरने की कुछ बात नहीं।

भूत-वूत कुछ भी न होता,

यूं घबड़ाओ आप नहीं।

मैं तो कितनी छोटी पर,

मुझे न लगता बिल्कुल डर।

रिमझिम की बात पर टिंकू थोड़ा गुस्से से बोला-

तू पगली है क्या जानें,

भूत-वूत को क्या मानें।

भूत अकेले में आते,

मार डालते-ले जाते।

हाय! कहीं जो आया भूत?

क्या होगी उसकी करतूत!

टिंकू की बात पर रिमझिम मन ही मन हंसी। उसने दोबारा समझाया-

बीता जो कहलाता भूत,

बीता क्या फिर आता है?

वर्तमान की बात करो जब

वर्तमान से नाता है।

बढ़िया-बढ़िया बातें कर,

सो जाएं हम खा-पीकर।

हो सकता है कुछ पल में 

मम्मी-पापा आ जाएं,

लेकिन क्या यह अच्छा है?

बेमतलब हम घबड़ाएं?

तुम बैठो, मैं जाती हूं,

अभी किचन से आती हूं। 

लेकर के बढ़िया खाना,

खाना खाना सो जाना। 

रिमझिम किचन में चली जाती है। उसके समझाने का टिंकू पर कोई असर नहीं पड़ता। वह भगवान की मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर कहता है-

क्या होगा अब हे भगवान?

है मुश्किल  में अपनी जान। 

रक्षा करना भूतों से,

भूतों की करतूतों से। 

घर में चोरी करने के इरादे से बाहर खड़ा कड़कू सुअर सारी बातें सुन रहा होता है। इधर रिमझिम किचन से खाना लेकर आती है और कड़कू सुअर कालबेल बजाकर गुर्राता है-

हो हो हो मैं आया भूत,

बड़े-बड़े भूतों का दूत।

आया हूं यमलोक से,

अभी मारता तुम दोनों को,

मैं भाले की नोक से।

खोल गेट, अंदर आऊँ,

तुम दोनों को खा जाऊँ। 

बस, फिर क्या था। बेचारा टिंकू, उसकी तो कंपकपी ही छूट जाती है। जिसका डर था, वही हो गया। 

उसने रोते हुए प्रार्थना की-

हाय भूत जी जाओ तुम,

गेट नहीं खुलवाओ तुम। 

हाय न तुम अंदर आओ,

अरे! तरस कुछ तो खाओ।

भूत बना सुअर डरावनी हंसी हंसते हुए कहता है-

तरस नहीं मैं खाता हूं,

मैं तो मांस चबाता हूं।

पीता खून, फोड़ता पेट,

खोलो-खोलो जल्दी गेट। 

टिंकू की घिघ्घी बंध जाती है। रिमझिम धीरे से उसके कान में कहती है- भैया! मत डर। जरूर दाल में कुछ काला है। मैं कुछ करती हूं। 

रिमझिम ने दरवाजे के पास जाकर कांपते हुए बोली-

हाय! भूत जी, मानो तुम,

हमको बच्चा जानो तुम। 

हमें छोड़ जो भी चाहो,

उसको फौरन ले जाओ। 

भूत बना कड़कू चोर चहक कर तुरंत बोल उठा-

तुम दोनों ही बच्चे हो, 

दोनों बच्चे अच्छे हो। 

अच्छा, तुम्हें न खाऊँगा,

पर रुपया ले जाऊँगा,

सूटकेस रुपयोंवाला,

मुझको झट दे जाओ तुम,

अपनी जान बचाओ तुम।

टिंकू ने जब भूत की दया भरी बातें सुनीं तो खुश  हो गया। जल्दी से सूटकेस उठाने चला। रिमझिम ने उसे रोका-

रुक भैया! कुछ गड़बड़ है,

ये सब तेरी हड़बड़ है।

मुझे हो रहा है आभास,

  है कोई यह ठग-बदमाश ।

जाती हूं छत के ऊपर,

इसको मारूंगी पत्थर।

रिमझिम के चलते ही टिंकू जोर-जोर से रोने लगता है-

रुक जा रिमझिम,

रुक, मत जा, 

भूत क्रोध में आएगा,

अभी हमें खा जाएगा।

तू मेरी प्यारी बहना,

हाय! मान भी ले कहना।

भूत बना कड़कू सुअर समझता है कि टिंकू रिमझिम को सूटकेस लाने से रोक रहा है। उसे और गुस्सा आ जाता है। वह दांत पीसता है-

मूर्ख इसे तू आने दे,

सूटकेस दे जाने दे।

सूटकेस यदि पाऊँगा,

तो तुमका ना खाऊँगा।

रिमझिम टिंकू को लेकर जल्दी से छत के ऊपर पहुंचती है। उसे चुप रहने को कहकर एक पत्थर का टुकड़ा उसकी ओर फेंकती है। पत्थर कड़कू सुअर के सिर पर लगता है। वह दर्द से तड़प उठता है-

हाय! मर गया, हाय मरा,

फूट गया सर हाय मरा।

अरे! बचाओ, जल्दी आओ,

अस्पताल मुझको ले जाओ।

उसी वक्त गश्त  लगाते इंस्पेक्टर हाथी दादा अपने सिपाहियों के साथ वहां आ पहुंचते हैं। कड़कू चोर को देखते ही वे समझ जाते हैं कि ये यहां क्यों आया होगा। तुरंत उसे पकड़ लेते हैं।

 सारी बात जानकर वे बहुत खुश होते हैं। रिमझिम को शाबासी देते हैं। टिंकू को समझाते हैं-बेटे! कभी भी अंधविश्वास मत करो। भूत होते ही नहीं। डर का नाम ही भूत है। डर भगाओ, भूत भाग जाएगा। 

बात टिंकू के समझ में आ जाती है। वह कहता है-

दादा बात आपकी ठीक,

जो बच्चे होते निर्भीक।

वे कुछ कर दिखलाते हैं,

वे ही नाम कमाते हैं। 

कहता हूं मैं सीना ठोक,

नहीं रहूंगा अब डरपोेक।

तब तक मम्मी पापा आ जाते हैं। सारी बात सुन वे फूले नहीं समाते। वे हाथी दादा को भी धन्यवाद देते हैं। हाथी दादा कड़कू सुअर को लेकर चले जाते हैं। 

सभी घर में घुसते हैं। 

अचानक खट की आवाज होती है। टिंकू चौंककर पूछता है- कौन?

मैं हूँ भूत का दूत -रिमझिम डरावनी आवाज में बोलती है। 

धत, यह तो रिमझिम की आवाज है अब नहीं डरने वाला मैं....

सब हंस पड़ते हैं। 


चम्पू शैली की यह  बाल कहानी अमर उजाला रविवासरीय परिशिष्ट में 13.10.96 को प्रकाशित हुई थी. यह लेखक की बाल कहानियों की पुस्तक 'भाग गये चूहे ' (1997) में भी संकलित है.

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

बाल कहानी/नाट्य रूपक : चूहे के पेट में चूहे कूदे - डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’

 चूहे के पेट में चूहे कूदे
- डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’



(चम्पू शैली की इस कहानी को नाटक के रूप में भी खेला जा सकता है।  नाट्य रूपक में केवल 4 पात्र रहेंगे । नेपथ्य में उदघोषक कथा को प्रस्तुत करेंगे और पात्र उनके कथनानुसार अनुकरण/ अभिनय करेंगे। संवाद बच्चे भी बोल सकते हैं अथवा वाचक ही संवादों को भी बोलते रहेंगे और बच्चे उसके अनुरूप अभिनय करते रहेगे।)

स्थान - बरगद का पेड़। उसके नीचे एक घर। (यह दृश्य परदे के माध्यम से भी सम्भव है। पेड़ कोई और भी हो सकता है। जैसी सुविधा रहे। मंच की सज्जा अपनी सुविधानुसार की जा सकती है ।)
पात्र -  1.चुनुआ- नन्हा चूहा 2.चुहिया- चुनुआ की मम्मी 3.बिल्ला- धूर्त 4.कुत्ते दादा-पडोसी(पात्रों की वेशभूषा के लिए मुखौटों का प्रयोग किया जाएगा)  
समय- दोपहर 

बरगद के पेड़ के नीचे एक बिल था। उसमें एक चुहिया रहती थी। उसका नन्हा-सा एक बच्चा था। बच्चे का नाम था चुनुआ। चुनुआ था बड़ा जिद्दी और जल्दबाज।

हाँ, तो एक बार की बात है। चुहिया खाना बना रही थी। चुनुआ को जोरों की
भूख लगी थी। वह जल्दबाज तो था ही, मचाने लगा उधम-लगा रोने और चिल्लाने -

चुनुआ- अम्मां मुझको भूख लगी है, जल्दी दो कुछ खाने को।

कल तुम जो पपड़ी लाईं थीं, लाओ मुझे चबाने को।।

चुहिया ने उसे समझाया। कहा - बेटे, पपड़ी तो कल ही खत्म हो गई थी। अभी
खाना बना जाता है, मजे से खाना।

चुनुआ ठहरा जिद्दी। वह नहीं माना। रोने लगा कसकर ।

चुनुआ- देर मत करो जल्दी लाओ, पेट हमारा देखो तो।

इसमें चूहे कूद रहें हैं, जल्दी कुछ खाने को दो।।

चुनुआ रो रहा था, तभी वहां से एक बिल्ला गुजरा। 

जब उसने सुना कि चुनुआ के पेट में चूहे कूद रहे हैं तो फूला नहीं समाया। उसने सोचा, ‘अरे वाह! चूहे के पेट में चूहे। आज तो एक ही चूहा खाने से मेरा पेट भर जाएगा। बिल्ला मक्कार तो होता ही है। वह आवाज बदल कर गाने लगा -


बिल्ला- बिन पैसे मैं लड्डू बांटू, जिसको खाना हो आए।
जितने खा पाए खा जाए, चाहे तो घर ले जाए।।
रुन्नुक झुन्ना रुन्नुक झुन, झुन्नुक झुन्ना झुन्नुक झुन।।

लड्डू का नाम सुनकर चुनुआ उछलने लगा। वह चुहिया से बोला -

चुनुआ- अम्मां लड्डू वाला आया, मैं तो बाहर जाऊंगा।

हप-हप लड्डू, गप-गप लड्डू, आज पेट भर खाऊंगा।।

ताक लग गई झम्मक झम, लड्डू खाऊं छम्मक छम।।

चुहिया ने उसे रोका, ‘‘नहीं चुनुआ, बाहर मत जाना। यह जरूर कोई चालबाज ठग
है।’’ लेकिन चुनुआ भला क्यों मानता। वह तेजी से भागते हुए बोला -

चुनुआ- अब न सुनूं बात मैं कोई,
 लड्डू मुझको खाने दो।

भूख लगी है मुझको भारी,
 मुझको भूख मिटाने दो।।

चुनुआ बाहर गया। लेकिन वहां तो कोई नहीं था। चुनुआ आगे बढ़ा, और आगे बढ़ा ... ... और बढ़ा ... फिर लार टपकाते हुए बोला -

चुनुआ- आहा लड्डू, वाहा लड्डू , 
लड्डू वाले आओ न।

मैं लड्डू खाने आया हूँ, 
लड्डू मुझे खिलाओ न।।

बिल्ला झाड़ी में छिपा बैठा था। आवाज बदल कर वह बोला -

बिल्ला- आंख बंद कर लो पहले तुम, 
लड्डू तभी खिलाऊंगा।

पांच किलो लड्डू हैं ये सब, 
अभी तुम्हें दे जाऊंगा।।

चुनुआ ने तुरंत आंखें बंद कर लीं। 
मारे खुशी के वह ठुमकने लगा -

चुनुआ- चप्पर-चप्पर, चपर-चपर, 
लड्डू खाऊं हपर-हपर।

आंख बंद कर लीं हैं मैंने, 
जल्दी कर अब जल्दी कर।।

इधर चुनुआ ने आंखें बंद की और उधर बिल्ला ने लपक कर उसे धर पकड़ा। 
अपने पंजे उसके शरीर मे गड़ाते हुए वह हँसा -
बिल्ला- न्यारा चूहा हाथ लगा, प्यारा चूहा हाथ लगा,

पेट में इसके चूहे हैं, खूब बेचारा हाथ लगा,

अब मैं इसको खाऊंगा, बड़ा मजा पाऊंगा।

मारे दर्द के चुनुआ तड़पने लगा। रोते हुए वह चिल्लाया-

चुनुआ- मुझे न खाओ, मुझे न खाओ, हाए मैं मर जाऊंगा,

मुझको छोड़ो, मुझको छोड़ो, मैं न लड्डू खाऊंगा।

छोड़ो छोड़ जल्दी छोड़ो, मुझे बचाओ कोई दौड़ो।।

तब तक चुनुआ को खोजते-खोजते चुहिया वहां आ गई। चुनुआ की हालत देख वह बिलख उठी। सौभाग्य से वहीं पर कुत्ते दादा का घर था। 
चुहिया ने जोर से चिल्लाते हुए उन्हें पुकारा -

चुहिया- कुत्ते दादा, कुत्ते दादा, जल्दी दौड़ो जल्दी आओ,

चुनुआ को बिल्ला ने पकड़ा, आओ जल्दी इसे छुड़ाओ।

चीख सुनकर कुत्ते दादा तुरंत आए। 

बिल्ले को देखकर वह भौंके-

कुत्ते दादा- भौं-भौं बिल्ले ओ रे बिल्ले, 
चुनुआ को तू छोड़ फटाफट,

मार तुझे डालूंगा वर्ना, 
पी जाऊंगा खून गटागट।।

बिल्ला डर गया। उसने चुनुआ को छोड़ा और दुम दबाकर भागा। 
चुनुआ की जान में जान आई। चुहिया ने कुत्ते दादा का आभार व्यक्त किया।
 चुनुआ अपनी करनी पर बहुत दुखी था। वह रोते हुए बोला -

चुनुआ- अम्मां मैंने मनमानी की, कितनी गंदी शैतानी की।

शैतानी का फल पाया, देखो खून निकल आया।।

अम्मां माफ मुझे कर दो, दादा माफ मुझे कर दो,

कर दो माफ मुझे दादा, लो करता हूँ मैं वादा -

बात बड़ों की मानूंगा, कभी नहीं जिद ठानूंगा,

धैर्य सदा अपनाऊंगा, लालच में न आऊंगा।

चुनुआ की बात सुनकर चुहिया और कुत्ते दादा बहुत खुश हुए।

 चुहिया बोली-चल, तुझे खाना खिलाऊं।

चुनुआ- माँ दादा को भी तो साथ ले चलो। आज हम सब साथ-साथ खाना खाएंगे।

सब खुश होकर चल दिए।

(समाप्त)
यह कहानी बालहंस अक्टूबर प्रथम 1995 अंक में प्रकाशित हुई थी तथा यह लेखक की पुस्तक 'अमरूद खट्टे हैं'में संकलित है.