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रविवार, 5 अप्रैल 2026

पुस्तक-समीक्षा/रोचक बाल कविताएँ, समीक्षक : डॉ. राकेश चन्द्रा

पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य को समृद्ध करती डॉ. नागेश पांडेय ’संजय’ की रोचक बाल कविताएँ 

-डॉ. राकेश चन्द्रा 

रोचक बाल कविताएँ” डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ का वर्ष 2023 में प्रकाशित बाल कविता संग्रह है जिसके प्रकाशक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली हैं। पुस्तक का आवरण पृष्ठ रंगीन व भीतर के चित्र श्वेत-श्याम हैं। पुस्तक में चित्रांकन सृष्टि पांडेय का है। कुल 98 पृष्ठों की इस पुस्तक में 62 बाल कविताएँ संग्रहीत हैं। इन कविताओं में जहाँ प्रकृति, परिवार, त्योहार जैसे पारंपरिक विषयों को कविता का विषय बनाया गया है वहाँ अनेक नये विषय यथा घर में पुताई, जाम, नई कार व पहाड़ों की सैर व कविताओं की वर्कशाप आदि पर कलम चलाकर कवि ने बाल साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास किया है। 
     संग्रह की प्रथम कविता “तरह-तरह की कविताएँ” उपरोक्त सन्दर्भ में उल्लेखनीय है जिसकी पंक्तियाँ ‘सीप किताबें हैं, कविताएँ मोती हैं,/कविताएँ भी तरह-तरह की होती हैं’, विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। आगे इसी कविता में कवि ने कविताओं के प्रकार का मनोहारी वर्णन करते हुए लिखा है- ‘कुछ कविताएँ मटक-मटक कर पढ़ते हम,/ कुछ कविताएँ अटक-अटक कर पढ़ते हम।/कुछ कविताएँ झूम-झूम हम गाते हैं,/कुछ कविताएँ भूल नहीं हम पाते हैं।’ वस्तुतः, इन कसौटियों पर ही हरेक कवि को अपने कविता-कर्म को परखना चाहिये! विषय अनेक हो सकते हैं पर उनका प्रस्तुतिकरण ही पाठकों को आकर्षित/अनाकर्षित करता है। बाल पाठकों के सन्दर्भ में कवि ने पुन: लिखा है- ‘कविताओं में हम बच्चों की मस्ती है,/कविताओं में जैसे दुनिया बसती है।/ऐसी ही कविताएँ हमको मिला करें,/अगर मिलें ना, तो हम किससे गिला करें?’ कवि ने एक चुनौती खड़ी की है बाल कवियों के समक्ष, इन पंक्तियों के माध्यम से। पर कवियों को अपने शिल्प को धार देने के लिए कोई कार्यशाला भी होना अपेक्षित है। इस परिप्रेक्ष्य में उनकी कविता “कविताओं की वर्कशाप” पठनीय है- ‘कविताओं की वर्कशाप में,/मैंने गीत बनाए जी।/….गीत बनाया बिल्ली जी पर,/गीत बनाया बस्ते पर।/गीत बनाया फिर शिमला के/टेढ़े मेढ़े रस्ते पर।….तीनों गीत सुरीले सुर में,/चहक-चहक कर गाए जी।’ और यदि वर्कशाप के बाद कविता छप जाए तो खुशी कितनी बढ़ जाती है- ‘मजा और भी तब आएगा,/जब कविता छप जाए जी।’ नि:सन्देह, कविता छपने के बाद अनेक पाठकों को आह्लादित कर सकती है। पर विचारणीय प्रश्न यह है कि कविता बनती कैसे है? कवि ने अपनी कविता “दिमाग में कविता” में इसका उत्तर मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते हुए लिखा है- ‘कल मेरे दिमाग में नन्ही/कविता आई जी।/….थोड़ा उछली, थोड़ा कूदी,/थोड़ा थिरकी जी।/और जोर से लगी नाचने,/बनकर फिरकी जी।/……थक कर चूर हो गई तो फिर/ली अंगड़ाई जी,/मन में पलंग बिछाकर लेटी/वह सुस्ताई जी।’ बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं जो यह बताती हैं कि कविता लेखन केवल दिमागी कसरत ही नहीं है, इसके लिए मन और मस्तिष्क का मणिकांचन योग होना आवश्यक है! 
    वैसे तो जाम आज के समय की आम किन्तु विकट समस्या है पर यदि इसे कविता का विषय बना दिया जाए अभिव्यक्ति कुछ इस तरह की होगी- ‘जाम, जाम, जाम।/……भीड़ भड़क्का, धक्कम धक्का,/ठेलम ठेला जी/लगता जैसे लगा सड़क पर,/कोई मेला जी। होने आई शाम,/जाम, जाम, जाम।’ आगे की पंक्तियाँ सोचने को विवश करती हैं- ‘इतने लोग कहाँ से आए?/सोच रही है मुनियाँ।/आबादी के आगे छोटी/लगती है दुनियाँ/क्या होगा अंजाम?/जाम,जाम,जाम।’ (“जाम”) ऐसी ही एक लीक से हटकर कविता है “धीरे चलिए न” जिसकी यह पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं- ‘अरे! ड्राईवर अंकल, थोड़ा/धीरे चलिए न।….यह बच्चों की बस है, कोई/एरोप्लेन नहीं।/इतनी तेज चलाने पर क्या,/कोई बैन नहीं?/बस है या फिर कोई दमकल?/धीरे चलिए न।’ इतने प्रभावी ढंग से बच्चों की इस समस्या को उठाया है कवि ने अपनी रोचक कविता के माध्यम से! इसी प्रकार, घरों में कुछ-कुछ अन्तराल पर पुताई का कार्य होना एक सामान्य बात है. पर एक बालक की दृष्टि में इसे किस रूप में देखा जाता है, वह कवि की इस कविता “मेरे घर में हुई पुताई” से स्पष्ट होता है- ‘मेरे घर में हुई पुताई,/भैया! समझो शामत आई।/पूरे घर में मचा झमेला,/बच्चे-बड़े सभी ने झेला।/….हुआ कहीं गुम मेरा बस्ता,/खोज खोज हालत थी खस्ता।/गद्दे में जब उसको पाया,/चैन तब कहीं जाकर आया।’ आजकल के समय में बच्चों को भारी-भरकम पाठ्यक्रमों से दो-चार होना एक सामान्य बात बन कर रह गई है। इसके बाद भी बच्चों के माता-पिता की अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं है जिसकी मुखर अभिव्यक्ति कविता “कोर्स अगर कुछ कम होता” में इस प्रकार होती है- ‘नहीं नाक में दम होता,/कोर्स अगर कुछ कम होता।/……बातें केवल नंबर की,/यही कहानी हर घर की।/सिर्फ एक बस जाप करो,/टाप करो जी, टाप करो।/जब जी होता, तब पढ़ते/नहीं जरा भी गम होता।’ 
    बच्चों की दुनिया में परिवार का बहुत महत्व होता है। परिवार की सुन्दर व्याख्या करते हुए कवि ने अपनी कविता “परिवार” में लिखा है- ‘ताऊ भोले, ताई भोली,/चाची हैं मिश्री की गोली।/बहुत मेहनती चाचा, दीदी,/भैया अच्छे, भाभी सीधी।/और बुआ जी को सब कहते/हैं बातों का गजब पिटारा।’ कविता “ऊँ! हूँ! दादी” की यह पंक्तियाँ सहज ही ध्यान आकर्षित करती हैं- ‘बिन चश्मे के बाल खींचती,/लगता जैसे खाल खींचती।/बाल उलझते, मैं चिल्लाती;/टूटा देख उन्हें झल्लाती।/…अच्छे खासे बालों का यों,/कचरा कहो कराए कौन?’ परिवार में कुछ अलग किस्म के लोग भी होते हैं जैसे कि “हड़बड़ भैया"- ‘बड़े निराले हड़बड़ भैया।/……गलत शर्ट के बटन लगाते,/छिलके सहित पपीता खाते।/अगर कहो कुछ तो चिढ़ते हैं,/करने लगते बड़-बड़ भैया।’ 
    संग्रह की एक कविता में सिंगल यूज़ प्लास्टिक के प्रयोग से बचने का सामयिक संदेश दिया गया है। कविता “लखमीचंद गए बाजार” की यह पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं- ‘बर्तन अगर नहीं है साथ,/तो लौटोगे खाली हाथ।/दे सकता हूँ भले उधार,/पर पन्नी से तौबा यार।/सिंगल यूज प्लास्टिक बंद,/समझे मिस्टर लखमीचंद?’ एक अन्य कविता “साठ कबूतर” अंकों के खेल में कुछ विशेष बन पड़ी है-’मेरी छत पर साठ कबूतर,/करते रहते ठाठ कबूतर।/तेरह चुगते रहते दाना,/सोलह मिलकर गाते गाना।/…बारह बार-बार उड़ते हैं,/ग्यारह इधर-उधर मुड़ते हैं।…….’ अत्यन्त रोचक कविता! 
    संग्रह की सभी कविताएँ वैविध्यपूर्ण, रोचक व मनोरंजन से परिपूर्ण हैं। कवि ने परम्परागत विषयों से इतर विषय भी अपनी कविताएँ के सृजन हेतु चुने हैं। उनका यह प्रयास सराहनीय है। कविताओं की भाषा-शैली सरल, सुबोध एवं प्रवहमान है। कविताओं मे कहीं-कहीं पर अँग्रेजी भाषा के उन शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनके हिन्दी समानार्थी शब्द उपलब्ध हैं जैसे वर्कशाप, मैगजीन, मैजिक, संडे, एरोप्लेन, टिफिन, ड्राईवर आदि। कतिपय स्थानों पर टंकण त्रुटियाँ हैं जिन्हें आगामी संस्करण में परिमार्जित करना उपयुक्त होगा। कुल मिलाकर, यह पुस्तक बाल साहित्य में कवि का एक महत्वपूर्ण अवदान है।
समीक्षक : डॉ. राकेश चंद्रा 

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