पुस्तक समीक्षा
चालू लालू
लेखकः-डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'प्रकाशक- मधु प्रकाशन
बदायूँ (उ.प्र.)
प्रथम संस्करण - 2016
पृष्ठ-16/ मूल्य-रु.10/-
समीक्षक -डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई (उ.प्र.)
बालसाहित्य के युवा अधिकारी विद्वान डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' जी की 14 शिशु कविताओं का संग्रह है। इनके शीर्षक हैं-आ गौरैया मेरी पीठ खुजाओ, लेख तुम्हारा, चालू लालू, शलजम, दादाजी, टिंकु के दोस्त, मुन्नू का बाजा, डॉक्टर बिल्ली, दीवाली पर दीवाला, आई बँदरिया, भूत, स्वागत, और घोड़े दादा ! सभी रचनाएँ छोटी ? चटपटी और खिलंदड़ेपन से युक्त हैं। हर कविता का अपना मज्जा है और अपना अनोखा अंदाज है। भाषा की सरलता और तुकबंदी इनकी अपनी विशेषता है। उदाहरणार्थ चालू लालू का कमाल देखिए-मूँगफली मैंने दिलवाई/दाने गटक गए/मैने माँगी मूँगफली तो/छिलके पटक गए।' आ गौरैया' में नन्हे मुन्नों को सहज ही गौरैया की याद दिलाई गई है! यथा-'रखा कटोरी में है पानी/अपनी प्यास बुझा गौरैया।' इसी प्रकार कवि ने बच्चों को अपना लेख सुधारने की सलाह इन पंक्तियों में दी है- 'मोती जैसे अक्षर लिखकर/गढ़ो शब्द की माला/इसमें काहे की कंजूसी / काहे का घोटाला !' और हाँ अगर हर बच्चे के पास उसके दादाजी हों तो फिर कथा कहानी सुनाने का क्रम फिर शुरू हो सकता है? यथा- "मेरे प्यारे दादाजी/सबके मन को भाते है/रोज रात, सोने से पहले/सुंदर कथा सुनाते हैं।" सभी शिशुकविताएँ रोचक, प्रेरक और उपयोगी हैं। इन कविताओं को बच्चे तो गाते गुनगुनाते हुए कंठस्थ करेंगे ही, तीन से पाँच वर्ष की आयु वाले शिशुओं को सुनाकर तो उनसे दोहरवाकर उन्हें भी आनंदित किया जा सकता है। इस दृष्टि से पुस्तक नर्सरी और के.जी. के पाठ्यक्रम में भी रखी जा सकती है। सस्ती होने के कारण पुस्तक गरीब अविभावकों की पहुँच में है। वस्तुत-यह शिशुओं के लिए एक उपयोगी, पठनीय एवं संग्रहणीय किताबी खिलौना भी है।
समीक्षक-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई (उ.प्र.)
(बाल वाटिका, मार्च 2018, पृष्ठ 66 पर प्रकाशित)


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