पुस्तक समीक्षा
रोचक, मनोरंजक और संदेशपरक बाल उपन्यास :
टेढ़ा पुल
समीक्षक : निर्मला सिंह
डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' पिछले कई दशकों से अनवरत बाल साहित्य की सेवा में लगे हैं। गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में उनकी पकड़ है और शोध समीक्षा के क्षेत्र में भी उनका काम बहुत ही महत्वपूर्ण है। पिछले दिनों प्रकाशित उनका बाल उपन्यास टेढ़ा पुल एक तरह से पारिवारिक रिश्तों की दूरबीन है जिसके द्वारा बालकों के जीवन के अनेक सुलझे और अनसुलझे दृश्यों को देखा जा सकता है। उपन्यास का कथानक नवीनता से ओतप्रोत है। कई बार बड़ों की कुछ चूकों के कारण बच्चों के जीवन पर ग्रहण लग जाता है। फूलों-सा कोमल उनका मन मुरझाने लगता है। सामने एक के बाद एक परीक्षा मुँह बाए खड़ी होती है और तब बच्चों के लिए ऐसी हर परीक्षा में उत्तीर्ण होना बहुत बड़ी चुनौती होती है। उपन्यास के फ्लेप पर लिखा है-मुख्य पात्र गिजू जैसे ढेरों बच्चे इस दुनिया में हैं जो माता-पिता के आपसी मनमुटाव की सजा बेवजह भोगते हैं। एक समय के बाद अगर सुलह हो भी जाए और माता-पिता फिर से एक हो जाएँ तो क्या बच्चों को उनका खोया हुआ बचपन वापस मिल सकता है? उनकी खुशियाँ-उनके अरमान जो तिल-तिल कर होम होते रहे हैं, क्या उनकी भरपाई हो सकती है?
निश्चित ही यह प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसी प्रश्न की अकुलाहट में शायद इस उपन्यास की रचना हुई है, जिसके लिए नागेशजी बधाई के पात्र हैं। उपन्यास की कथा आठ अध्याय में विभक्त है जिनके शीर्षक हैं नीपा नेपी गेचलो, बट मींस लेकिन तो व्हाट मींस क्या?, आलसी के लड्डू, ये क्या हुआ ?, आए हैं लेकर शूलों का हार, समय का रथ, गिलहरी उड़, मन के पहाड़ पर मीठे झरने।
हर अध्याय एक नई जिज्ञासा और कौतूहल लेकर आता है और सहज-सरल भाषा और रोचक शैली में पाठकों को बाँधे रहता है। पूरे उपन्यास में एक स्वाभाविक गति है। कहीं भी अबरोध नहीं है। एक नदी की तरह बहता हुआ यह उपन्यास अत्यंत हृदयस्पर्शी है। बच्चे और बड़े इसे चाव से पढ़ेंगे। उपन्यास में मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों को शिक्षा भी दी गई है और किस तरह संघर्ष करते हुए सफलता प्राप्त कर सकते हैं, यह भी अत्यंत कुशलता से अभिव्यक्त किया गया है।
सारी कथा नायक गिजू के इर्द गिर्द घूमती है। माता पिता की दूरियों के कारण वह कुंठाग्रस्त हो जाता है। उसका हँसता खेलता बचपन मायूसी की चादर ओढ़ लेता है। उसका मन मुरझाने लगता है और फिर वह सामान्य बालक नहीं रह पाता। ऐसे में गिजू और रोहित की दोस्ती का भावनात्मक वर्णन है और साथ ही उसके शिक्षक तिवारीजी एक रोलमाडल की भूमिका निभाते हैं और इन सबके सहयोग से न केवल उसकी सोच बल्कि उसका जीवन ही बदलाव की ओर अग्रसर हो जाता है।
गिजू और रोहित की भाषा बड़ी मजेदार है। वे कोड भाषा में बात करते हैं, जिसे समझना पहले तो कठिन लगता है। वे क्या हुआ को याक् आहु और पानी पीने चलोगे को नीपा नेपी गेचलो बोलते हैं। मतलब शब्द का आखिरी अक्षर पहले लगाकर उन्होंने कोड भाषा गढ़ ली जिसे समझने के लिए सारी कक्षा बेचैन रहती है। उपन्यास में पारिवारिक संबंधों के अतिरिक्त पशु-पक्षियों तथा प्राकृक्तिक और भौगोलिक ज्ञान भी दिया गया है। शैक्षिक टूर के माध्यम से दुधवा नेशनल पार्क का सजीव वर्णन है। इससे अनेक पशु-पक्षियों की जानकारी मिलती है। जैसे एक नई बात पता चलती हैं कि उड़नेवाली गिलहरी भी होती है। ऊँचे ऊँचे पेड़ों पर बने मकानों और एक ही पुल से बस और ट्रेन के गुजरने जैसे प्रसंगों से उपन्यास को पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है।
उपन्यास में एक और भी नए तरह का, एकदम अलग हटकर प्रयोग किया गया है। लेखक ने इसमें स्कूल में कवि दरबार में बच्चों को आधुनिक बालसाहित्यकारों जैसे आनंदप्रकाश जैन, राष्ट्रबंधु, काका हाथरसी, प्रकाश मनु, रमेश तैलंग के रूप में प्रस्तुत किया है। आशा है कि अन्य बच्चे भी इससे प्रेरणा लेकर अपने स्कूलों में ऐसे कवि दरबार आयोजित करेंगे।
लेखक ने माता-पिता के बिगड़े रिश्तों की तुलना टेढ़ा पुल से की है, इसीलिए जब एक रोचक घटनाक्रम में उसके माता-पिता पुनः एक होकर साथ-साथ रहने का वादा करते हैं तो गिजू खुश होकर कहता है कि अब तो मेरा भी टेढ़ा पुल सीधा हो गया है। मतलब अब उसके जीवन के कठिन रास्ते सरल हो गए हैं।
निश्चित रूप से यह उपन्यास बाल किशोरों के साथ साथ बड़ों के लिए भी पठनीय है। पुस्तक की छपाई सुंदर है और मुखपृष्ठ भी आकर्षक है। मोहम्मद शोयेब फराज के बनाए चित्र भी बहुत लुभावने हैं। इस पारिवारिक, सामाजिक और शैक्षिक किशोर उपन्यास के लिए मैं डॉ. नागेश पांडेय और पुस्तक के प्रकाशक को बधाई देती हूँ।
समीक्षक : निर्मला सिंह, बरेली (उ.प्र.)
(बाल वाटिका, अगस्त 2017 अंक के पृष्ठ 59 पर प्रकाशित)


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