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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

पुस्तक समीक्षा/अपमान का बदला, समीक्षक : अंजली दीक्षित इंदु

पुस्तक समीक्षा 
पुस्तक का नाम-अपमान का बदला
लेखक-नागेश पांडेय 'संजय' 
प्रकाशक-अविराम प्रकाशन, ई-29/62 गली नं.-११, विश्वास नगर, दिल्ली। मूल्य - 15/- मात्र
पृष्ठ : 24
प्रथम संस्करण : 1996

अपमान का बदला उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह
समीक्षक : अंजली दीक्षित 'इंदु'
हिन्दी साहित्य में भले ही अभी बाल साहित्य को अपना लक्ष्य प्राप्त न हो पाया हो किंतु यह सत्य है कि अब बाल साहित्य में अच्छी पुस्तकों की कमी नहीं है। वैसे तो आए दिन एक के बाद एक संग्रह निकलते रहते हैं किन्तु बच्चों की दृष्टि से सभी रुचिकर नहीं होते हैं। बच्चे भी चूंकि अलग-अलग आयु वर्ग के होते हैं इस कारण उनकी रूचि भिन्न होती है। सामान्य तौर पर 12 से 15 आयु वर्ग का बालक उन किताबों को पसंद नहीं करता जो 7 से 6 वर्ष आयु का बालक पसंद करेगा
संग्रह में लेखक ने जिस प्रकार की छोटी-छोटी उपदेशात्मक कहानियों को लिया है, वह छोटे बालकों के लिए ज्ञान उपयोगी होने के साथ ही रुचिकर भी हैं। इन सभी कहानियों को जानवरों के माध्यम से उनके द्वारा ज्ञान देने का प्रयत्न किया गया है।
संग्रह में अपमान का बदला, काल करे सो आज कर', 'सच्चा दोस्त', सब्र का फल', 'जल्दी का काम शैतान का' नामक पांच कहानियां हैं। 'अपमान का बदला' शीर्षक कहानी सोनू नामक शैतान खरगोश की है। जिसकी शैतानी के बावजूद भी हाथी का बच्चा उसे बचाकर कहता है - 'तुम्हें बचा कर मैने अपमान का बदला ले लिया है। क्या तुम्हारी नजरों में मेरे लिए सम्मान नहीं उमड़ रहा है ? अरे तुम्हें न बचाता तो. मेरे और तुम्हारे स्वभाव में  ही क्या रह जाता ?'
'काल करे सो आज करें में भी चीटियों के माध्यम से समय के महत्व को समझाया गया है।
'सच्चा दोस्त' चीनू खरगोश और मीकू घोड़े की दोस्ती पर आधारित है जो सिखाती है कि दोस्त सच्चा वही होता है जो समय पड़ने पर कुछ खोकर भी दोस्त के लिए कार्य करने को तत्पर रहता है।
'सब्र का फल' में नन्ही चीटियों के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया गया है कि धैर्य और सोच-विचार के साथ ही कार्य को करना चाहिए।जैसा कि भूरी चीटी बिना सोचे-विचारे ही हैंड पाइप में घुस गई और अंत में उसे अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। 'जल्दी का काम शैतान का' सोनू खरगोश की जल्दबाजी के नतीजे का परिणाम है।
इस प्रकार सभी कहानियां छोटी होते हुए भी अपने अंदर एक अर्थपूर्ण उ‌द्देश्य छिपाए हुए है। लेखक का ऐसा प्रयास रहा है कि इन कहानियों से बच्चे कुछ शिक्षा लें और वह अपने इस प्रयास में सफल भी रहा है। अपने इस उद्देश्यपूर्ण कार्य के लिए लेखक साधुवाद व बधाई के पात्र है।
(बच्चे और आप, पाक्षिक, लखनऊ, 16 से 31 जनवरी 1999, पृष्ठ : 2)


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