बुधवार, 12 जनवरी 2011

सर्दी की धूप

बाल गीत : डा. नागेश पांडेय 'संजय' 

ये सर्दी की धूप  ,कहो जी 
किसे न भाती है ? 

सुबह- सवेरे , इसे देखकर 
खिल उठता है मन . 
सभी प्रफुल्लित होकर करते , 
इसका अभिनंदन . 
सबको लाड़ -दुलार ख़ुशी से ,
खूब लुटाती है . 

कोहरा-पाला इसे देखकर , 
होते छू-मंतर . 
छोड़ रजाई होने लगती 
घर में खटर-पटर . 
सबको करती दंग , भंग में 
रंग जमाती है . 

लगती बिलकुल गरम- ये , 
बालूशाही-सी . 
मनभावन मक्खन-सी , भीनी 
मधुर मलाई-सी . 
कैसे- कैसे स्वाद याद यह , 
हमें दिलाती है !


चित्र साभार : गूगल सर्च 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही प्‍यारा गीत है। हार्दिक बधाई।

    ब्‍लॉग का लेआउट भी प्‍यारा है।

    समय मिले, तो निम्‍न पोस्‍ट को अवश्‍य देखें-

    कावेरी भूत और उसका परिवार।
    मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।

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  2. सर्दी की धूप पर अच्छा बालगीत

    जवाब देंहटाएं
  3. सचमुच.. सर्दी की धुप किसे ना भाती ?

    बहुत प्यारी कविता..

    जवाब देंहटाएं

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